
मंगत राम पासला
हम एक ऐसी खतरनाक स्थिति से गुजर रहे हैं, जब वैश्विक स्तर पर उत्पन्न हुई परिस्थितियों का भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। अमरीका-इसराईल द्वारा ईरान के विरुद्ध छेड़ी गई जंग के परिणामस्वरूप ऊर्जा के क्षेत्र में संकट के बादल मंडरा रहे हैं और महंगाई, बेरोजगारी रॉकेट की तरह ऊपर की ओर बढ़ती जा रही है। हमारी वर्तमान सरकार की विदेश नीति ने ऐसे देशों को मित्र बनाने का जोखिम लिया है, जो अपनों को भी नहीं बख्शते। अमरीका का नाटो के सदस्य देशों के साथ वर्तमान व्यवहार इसका प्रमाण है।
जंग के दौरान हमलावर अमरीका-इसराईल के साथ खड़े होकर हमने ईरान, रूस जैसे देशों से दुश्मनों जैसी दूरी बना ली है। लगभग एक करोड़ भारतीय, जो खाड़ी देशों में रोजी-रोटी के लिए प्रवास कर रहे हैं, उनकी सुरक्षा के लिए हमारे देश की सरकार द्वारा युद्धविराम कराने हेतु आवश्यक पहल नहीं की गई। अंतर्राष्ट्रीय मामलों में ‘विश्व गुरु’ का नाम कहीं नजर नहीं आ रहा। आने वाले दिनों में यदि इस युद्ध पर विराम नहीं लगता, तो भारतीय लोगों की मुश्किलों में भारी वृद्धि होने की संभावना से आंखें बंद नहीं की जानी चाहिएं। भारतीय रुपए के मूल्य में गिरावट ने विदेशी ऋणों के बोझ की गठरी को भारी कर दिया है। विदेशी व्यापार में असंतुलन बढ़ गया है। अमीर-गरीब के बीच बढ़ते भयानक अंतर के बारे में न केवल विपक्षी दलों द्वारा चिंता व्यक्त की जा रही है, बल्कि सी. रंगराजन जैसे पूंजीवादी व्यवस्था के समर्थक अर्थशास्त्री भी अमीरों-गरीबों में बढ़ते आर्थिक अंतर से पैदा होने वाली राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता व टकराव के बारे में अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं। कच्चे तेल की आपूर्ति में आई कमी और भविष्य की अनिश्चितता में हो रही वृद्धि के साथ हजारों लघु और मध्यम औद्योगिक इकाइयां बंद होने से लाखों मजदूर बेरोजगारी की मार झेलने के लिए अपने- अपने प्रांतों को वापस लौट रहे हैं।
कृषि व्यवसाय, जो गरीब, छोटे और मध्यम श्रेणी के किसानों के लिए पहले ही घाटे का सौदा बना हुआ है, भारत-अमरीका के बीच हुए समझौतों से और भी बर्बाद होने वाला है। इस समझौते के तहत प्रस्तावित फलों, सूखे मेवों, पशुओं की खुराक, मक्का और इससे तैयार तेल के आने से भारत का किसान इन वस्तुओं का बाजार में मुकाबला कैसे कर सकेगा ? गौरतलब है कि कृषि व्यवसाय को लाभदायक बनाने के लिए अमरीका सरकार प्रति किसान 6000 डॉलर सबसिडी देती है, जबकि भारत सरकार सिर्फ 294 डॉलर तक सीमित है।
विदेशी वस्तुओं के बड़े-बड़े शोरूम जिस मात्रा में खुलते जा रहे हैं, उनका मुकाबला हमारे रेहड़ी, खोखों और छोटी दुकानों वाले दुकानदार कैसे कर पाएंगे? हमें निकट भविष्य में छोटी दुकानों और छोटे कारोबारियों के गेटों पर जड़े तालों की घिनौनी तस्वीर नजर आ रही है, जैसा कि मैक्सिको, ब्राजील और कई अफ्रीकी व एशियाई देशों में हुआ है। अफसोस कि यह कड़वा सच सत्तारूढ़ मोदी सरकार को नहीं दिख रहा। विदेशी वस्तुओं के आगमन का विरोध करने वाला संगठन आर.एस.एस. इस नई व्यवस्था का समर्थक बन गया है।
साम्राज्य-निर्देशित नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के शिकार हुए दुनिया के आर्थिक रूप से गरीब और पिछड़े देशों की दयनीय स्थिति को देखते हुए, हमें अपने देश की अर्थव्यवस्था की भविष्य की स्थिति के बारे में चिंता होनी चाहिए। देश को नई किस्म की गुलामी, यानी नव-उपनिवेशवाद का दर्द झेलना पड़ सकता है। उससे मुक्ति पाने के लिए हमें आजादी की दूसरी जंग भी लड़नी पड़ सकती है। यह जंग निस्संदेह पहले लड़े गए स्वतंत्रता संग्राम की तुलना में कहीं अधिक कठिन होगी, क्योंकि भारतीय समाज की फौलादी एकता को दक्षिणपंथी ताकतों ने सांप्रदायिक तर्ज पर बांटकर बहुत कमजोर कर दिया है।
आर.एस.एस. के निर्धारित लक्ष्य धर्म आधारित ‘गैर-लोकतांत्रिक हिंदुत्ववादी राज्य’ की स्थापना के लिए प्रयासरत लोग स्थिति की गंभीरता को समझकर प्रगतिशील नजरिए से मौजूदा समस्याओं के समाधान के उपाय करने की बजाय, स्थिति को और अधिक जटिल और दयनीय बनाने में मशगूल हैं। उनका एजेंडा’ अनेकता में एकता’ की अवधारणा को खत्म करके विभिन्न धर्मों के बीच खटास पैदा करने वाला है। जाति-पाति व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ‘मनुवादी’ विचारधारा को फिर से नेतृत्व की सीट पर बैठाने की तैयारियां की जा रही हैं।
प्रगतिशील और वामपंथी विचारधारा को देश का दुश्मन बताकर उनके विरुद्ध नफरती प्रचार शुरू करना वास्तव में मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत करके समानता, सांझापन और भाईचारे के मानवीय दर्शन को जड़ से खत्म करने के बराबर है, जिसे संघ परिवार अपना ‘पवित्र कर्त्तव्य’ समझने का भ्रम पाल रहा है। देश के अनेक हिस्सों में क्षेत्रीय, भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक मतभेदों पर आधारित ‘ युद्ध’ जैसी स्थिति बनी हुई है। देश की न्यायपालिका, संवैधानिक संस्थाओं, सरकारी मशीनरी और संवैधानिक पदों का उपयोग देश के संविधान में दर्ज धाराओं के अनुसार निष्पक्ष रूप से नहीं किया जा रहा, जिस कारण अविश्वास, संदेह और आपसी कड़वाहट का माहौल बना हुआ है और लोकतांत्रिक व्यवस्था संकट में घिरी हुई है।
जब देश विदेशी और आंतरिक खतरों के सामने खड़ा हो, तब हम सभी लोगों का यह कर्त्तव्य बनता है कि संकीर्ण और सांप्रदायिक दायरों से बाहर निकल कर देश के संविधान, प्रगतिशील सामाजिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा करते हुए देश की एकता और अखंडता को मजबूत करने का प्रयास करें।
With thanks Punjab Kesari
