-मंगत राम पासला

विश्व भर में आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक अफरा-तफरी का माहौल व्याप्त है। विकसित पूंजीवादी देश और अधिक अमीर बनने की होड़ में आपसी मुकाबलेबाजी में लगे हैं। वहीं पिछड़े, गरीब देशों की जनता को जीवन की बुनियादी जरूरतों की आपूर्ति के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। कोरोना महामारी के दौर में दुनिया भर में कार्पोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कार्पोरेशनें आर्थिक तौर पर मालामाल हो रही हैं। जिस तरह का आम जनता इस महामारी के दौरान बदतर जीवन जी रही है उसकी शायद कभी किसी ने कल्पना भी न की हो।
बेशक देश की मोदी सरकार इस आपदा में भी अपनी कार्यशैली पर खुशी का प्रकटावा कर रही है परन्तु जिस तरह देश की समस्त स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था, दवाइयों, स्वास्थ्य उपकरणों और अस्पतालों के अंदर बैडों की भारी कमी देखी जा रही है, उसने प्रशासन की ओर से देश के विकास बारे किए सभी दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं। जीते जी लोगों की दुर्दशा तो हमने पहले से भी देखी थी परन्तु मानवीय लाशों की बेकद्री पहली बार देखने को मिल रही है।
आर्थिक विकास के ‘मोदी माडल’ में जैसे अमीर-गरीब में बढ़ते फर्क, बेरोजगारी, महंगाई तथा भुखमरी ने सभी पिछले रिकार्ड तोड़ दिए हैं, वहीं इसी र तार से देश के अंदर असहनशीलता, आपसी अविश्वास तथा असंवेदनशीलता ने भी नई बुलंदियों को छुआ है। आर्थिक स्थिति लाजिमी तौर पर सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करती है। सरकार या फिर उसके किसी तंत्र का विरोध देशद्रोह बन गया है। धर्मों का आपसी टकराव निरंतर बढ़ता ही जा रहा है।
लोगों के बहते आंसुओं को देख कर सरकारी तंत्र की आंखें नम नहीं होतीं। विश्व भर के पूंजीपतियों ने जिनमें भारतीय कार्पोरेट घराने भी शामिल हैं, 90 के दशक की शुरूआत में नव उदारवादी आर्थिक नीतियां लागू करने का फैसला ले लिया गया था। श्रमिकों के सभी आर्थिक, लोकतांत्रिक तथा कानूनी लाभों को रौंद कर उन्हें फिर से उसी दौर में पहुंचा दिया गया है जहां पूंजीवाद का विकास शुरू हुआ था।
इन सब विध्वंसक नई आॢथक नीतियों को विश्व भर में एक साथ लागू करने का प्रयत्न किया जा रहा है जिस कारण अमीर विकसित देशों के मुकाबले में पिछड़े, विकासशील देशों में मेहनतकश लोगों को अधिक आॢथक मंदहाली का सामना करना पड़ रहा है। मोदी की केंद्रीय सरकार तथा राज्य सरकारों ने सरकारी क्षेत्र को खत्म कर सब कुछ निजी लुटेरों के हवाले करने का लक्ष्य साधा है। लोगों के धन तथा अनथक मेहनत से निर्मित रेलवे जैैसे विभाग और खुशहाल सरकारी क्षेत्र को कार्पोरेट घरानों को बहुत कम कीमत पर बेचा जा रहा है। बिजली, खानें, हवाई सेवाएं, बैंक, बीमा, स्वास्थ्य, शिक्षा इत्यादि के साथ-साथ अब रक्षा क्षेत्र के सरकारी विभागों को भी देसी तथा विदेशी पूंजीपतियों के पास बेचने की प्रक्रिया देख कर लोगों के कान खड़े हो गए हैं।
जब स्वास्थ्य, शिक्षा या परिवहन में लाखों की तादाद में रिक्त पदों को भरने के लिए नौकरियां मांगने हेतु नवयुवक सरकार के दरवाजे पर जाते हैं तब उन्हें पुलिस की लाठियां तथा पानी की तेज बौछारों का सामना करना पड़ता है। वेतन तथा भत्तों को तर्कसंगत बनाने की मांग करने वाले कर्मचारी प्रत्येक दिन खून से लथपथ होकर अपने घरों की ओर खाली हाथ लौटते हैं।
महंगाई की कोई भी सीमा तय करना असंभव बन गया है। नौकरियों को खोने के बाद बेरोजगार बैठे लोग एक दिन की रोटी कैसे जुटा पाते हैं यह वह ही बता सकते हैं। जब कोई व्यक्ति किसी अस्पताल से इलाज करवा कर घर लौटता हुआ आकर कहता है कि, ‘‘उसके अस्पताल का खर्चा 20 से 25 लाख हो गया है।’’ तो पता चलता है कि देश के अंदर बड़ी गिनती में मरने वाले बीमार लोग जो अपना इलाज तक इतनी बड़ी रकम के खर्चने के काबिल नहीं हैं। वास्तव में बिना इलाज ही मौत का शिकार हो रहे हैं।
भूख तथा गरीबी के दुख से आत्महत्याएं करने वाले लोगों की ओर से अब आत्महत्या करने से पूर्व अपने परिवार को सदा के लिए मौत की नींद सुलाने का सिलसिला भी बढ़ता जा रहा है। छोटी-छोटी घटनाओं को लेकर (विशेषकर स पत्ति या पैसे से जुड़े हुए मामले) कत्ल करने का सिलसिला जोर पकड़ता जा रहा है। आॢथक तंगी के चलते पारिवारिक सामाजिक रिश्ते टूट रहे हैं। इन सब बातों को देखते हुए भी प्रशासन पर कोई असर नहीं पड़ता। वह तो चुपचाप अपना कारोबार चलाता जा रहा है। गरीबी, भूख या फिर बेरोजगारी से संबंधित घटनाओं को टी.वी. पर देख कर लोगों की आंखों से आंसू टपकने लग जाते हैं। मगर प्रशासक ‘नीरो’ की तरह बांसुरी बजाने में मस्त है।
पीड़ित लोगों को भी समझने की जरूरत है कि उनकी दुख-तकलीफों का असल में मुख्य केंद्र पूंजीवादी व्यवस्था है जिसका भारत एक अभिन्न अंग बन चुका है। मोदी के विकास माडल को मूल रूप में तिलांजलि देकर एक लोकहित वाला विकास माडल ही अपनाना ठीक रहेगा।
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