‘हुरून रिपोर्ट लन्दन आधारित एक शोध और प्रकाशन संस्था है जो दुनिया के धन कुबेरों की संपत्ति, उसमें फेर बदल, उनके कामों आदि पर सालाना रिपोर्ट प्रकाशित करती है। यूँ तो यह संस्था पुरानी है पर भारत में यह संस्था 2012 से काम कर रही है और हाल ही में इस संस्था ने 2021 में भारत के धनपतियों की सूची और पिछले एक साल में उन की संपत्तियों में आये बदलाव सम्बन्धी अपनी रिपोर्ट जारी की है।
रिपोर्ट बताती है कि पिछले साल अडानी ग्रुप के मालिकन 1002 करोड़ रुपये रोजाना यानि 42 करोड़ रुपये प्रति घंटा कमाकर भारत के दूसरे नंबर के अमीर बन गये हैं। पिछले साल उनकी संपत्ति 261 प्रतिशत बढ़कर 505900 करोड़ रुपये हो गयी है।
मुकेश अम्बानी भारत के सबसे धनी आदमी हैं जिनकी संपत्ति 7,18,000 करोड़ रुपये जोड़ी गयी है। कोविड की दवा, कोवीशीलड बनाने वाले सीरम इंस्टीट्यूट के मालिक अदार पूनावाला परिवार 190 करोड़ रुपये प्रतिदिन कमा कर भारत के छठे नंबर के अमीर बन गए हैं। उनकी संपत्ति अब 1,63,700 करोड़ रुपये है। रिपोर्ट के अनुसार फिलहाल भारत में 279 अरबपति हैं। यानि जिनकी संपत्ति तकरीबन 7500 करोड़ रुपये से ऊपर है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत में 1007 व्यक्ति ऐसे हैं जिनकी संपत्ति 1000 करोड़ रुपये से ऊपर है। और रिपोर्ट के अनुसार पिछले दस सालों में इन धनी व्यक्तियों ने समग्रता में 2020 करोड़ रुपये रोजाना के हिसाब से धन कमाया है। यह जानना भी दिलचस्प होगा कि कोविड की वैश्विक तबाही के दौर में दुनिया के धनपतियों ने भी अपने भारतीय बिरादरों की ही तरह बेतहाशा धन कमाया है।
आम आबादी को अस्सी के दशक से जारी नवउदारवादी नीतियों के पिछले कई सालों के तजुरबे ने साफ कर दिया था कि आम आदमी के कल्याण हेतु बढ़ता विकास और टपक बूँद सिद्धांत (ह्लद्धद्गशह्म्4 शद्घ ह्लह्म्द्बष्द्मद्यद्गस्रश2ठ्ठ) का अर्थशास्त्र कितना बोदा है। यह जनता के साथ धोखा है उनके जागरूक तबकों को गुमराह करने का षडय़ंत्र है। भारत में विकास की ऊंची दर का फायदा केवल ऊपरी तबके या मध्यम वर्ग के एक छोटे से तबके को ही मिला था। ज्यादातर लोग अपने को ठगा ही महसूस कर रहे थे।
लेकिन हममें से ज्यादातर लोगों के लिए यह आश्चर्यजनक है कि आखिर कोविड जनित वैश्विक तबाही के बीच में भी इन धन्ना सेठों को बेतहाशा धन कमाने के अवसर कहां से मिल गए। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 20-21 में भारत की राष्ट्रीय आय 7.3 प्रतिशत के हिसाब से गिरी। लोगों का अपना तजुरबा भी बताता है कि उनको तो तबाही, बर्बादी का मुख देखना पड़ा है। अप्रैल 2020 के सरकारी बंदी के फरमान के बाद करोड़ों की तादाद में उन्हें पैदल ही घर जाना पड़ा है। राह में कितने भूखे प्यासे मर गए उसका कोई हिसाब ही नहीं। मोदी सरकार ने यह कहकर मदद करने से हाथ खींच लिए कि उसके पास पैसे ही नहीं हैं। बहुत से लोग इस तर्क से सहमत भी लगते हैं। न सरकार अमीर लोगों पर टैक्स लगाना चाहती है और बहुत से लोग इस नीति को ठीक ही समझते हैं। नतीजा कोविड आबादी के बहुत बड़े हिस्से की तबाही का सबब बना है।
तब यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक ही है कि आखिर इस विपत्ति काल में धन कुबेरों की संपत्ति का अम्बार कैसे लग गया! उनके लिए उलटी गंगा कैसे बह रही है! कुछ लोग इसे किस्मत का खेल मान सकते हैं। पर मामला इतना सीधा नहीं है। बढ़ती बेरोजगारी, घटती छोटे और मंझोले व्यक्तियों की आय के बीच चल रहे इस गोरख धंधे को समझने के लिए हमें उसी नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के सार को समझना पड़ेगा जो सामान्य हालात में धनिकों को फायदा पहुंचता है। और धनी बनाता है। नव उदारवादी नीतियों का सिद्धांत वाक्य है कि विकास ही किसी समाज की भलाई की कुंजी है और उसके लिए वो सब किया जाना चाहिए जो धनपतियों को निवेश के लिए प्रोत्साहित करे-उनको सस्ते ब्याज पर पैसा उपलब्ध कराओ, उनको सरकारी संपत्ति सस्ते में बेचो। कर में रियायत दो। कानून में छूट दो, सरकारी देनदारियों में रियायत दो। ताकि वो विकास को आगे बढ़ायें।
कोविड तबाही के बीच भी दुनिया की सरकारों की नजर इस मंत्र को ही लागू करने पर लगी हुई थी। भारत कोई इसका अपवाद नहीं था। ब्याज दर को कम से कम रखा गया। बड़े उद्योगपतियों को इस आधार पर कि उनकी बिक्री कम है उन्हें सस्ते दर पर कर्ज दिया गया। इन दोनों से मिलकर उनके पास नकद धन का भंडार जमा हुआ इस धन भंडार को उसने अपने से कमजोर इकाइयों की संपत्ति हड़पने में, सरकारी संपत्ति को सस्ते दाम में खरीदने में खर्च किया एवं सट्टे और शेयर बाजार में लगाया। तबाही के बीच शेयर बाजार झूमने लगा और धनपतियों की संपत्ति अनाप शनाप दर से बढऩे लगी।
आम जनता की गरीबी और सेठों के धन में बढ़ोत्तरी कोई पहली बार नहीं हो रही है। 2007-2008 के अमरीकी ‘सब प्राइम क्राइसिसÓ के दौर में भी यही देखा गया था। अपने विशाल निवेश और क्रय शक्ति के साथ, अरबपतियों के पास आर्थिक उथल-पुथल के दौरान लाभ के लिए अपने स्वयं के संसाधनों के अलावा सरकारी संसाधन भी हैं। और उन के अनुकूल कर कानून और उसकी कमियां इनको भरपूर पैसा बटोरने के अवसर देते हैं।
संक्षेप में कहा जाए तो जब तक नवउदारवादी आर्थिक नीतियों और आम आदमी के कल्याण के नाम बढ़ता विकास और टपक बूँद सिद्धांत (ह्लद्धद्गशह्म्4 शद्घ ह्लह्म्द्बष्द्मद्यद्गस्रश2ठ्ठ) के अर्थिक षडय़ंत्र से मुक्ति नहीं पाई जाएगी यह सिलसिला जारी रहेगा। यदि इससे मुक्ति पानी है तो आर्थिक संयोजन के ताने बाने को ‘व्यापार करने की आसानी ‘(द्गड्डह्यद्ग शद्घ स्रशद्बठ्ठद्द ड्ढह्वह्यद्बठ्ठद्गह्यह्य) से हटाकर ‘जीने की आसानीÓ (द्गड्डह्यद्ग शद्घ द्यद्ब1द्बठ्ठद्द) के अनुसार ढालना होगा। इसके लिए जरूरी है कि संपत्ति कर, धनी तबके पर उच्च कर आदि द्वारा पोषित जनउपयोगी जरूरतों जैसे सिंचाई, अस्पताल और विद्यालय भवनों का निर्माण, जन परिवहन सेवाएँ आदि पर सार्वजनिक निवेश तथा सबको स्तरीय शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार उपलब्ध कराने पर सरकारी खर्च करना होगा।
(सामाजिक-आर्थिक विषयों पर लिखने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर रवींद्र गोयल द्वारा संकलित लेख के प्रमुख अंश।)
(जनचौंक से साभार)
कोविड जनित वैश्विक तबाही में भी धन कुबेरों के पौ बारह