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विश्व दर्पण (संग्रामी लहर मई २०१९)

विश्व दर्पण (संग्रामी लहर मई २०१९)

रवि कंवर

राष्ट्रपति बौतेफ्लिका के त्यागपत्र के बावजूद अल्जीरिया में जारी है जनसंघर्ष
अफ्रीका महाद्वीप का देश अल्जीरिया आजकल जन-संघर्षों का अखाड़ा बना हुआ है। यूरोप के अफ्रीका की ओर गेटवे के रूप में जाने वाला यह देश ‘पीपल्ज रिपब्लिक आफ अल्जीरिया’, इस महाद्वीप के उत्तरी भाग में स्थित है तथा क्षेत्रफल के अनुसार महाद्वीप का सबसे बड़ा तथा विश्व का दसवां बड़ा देश है।
इसी वर्ष की 22 फरवरी से देश में विशाल जन-आंदोलन शुरू हो गया था जब देश के 82 वर्षीय राष्ट्रपति अब्देल अजीज बौतेफ्लिका ने पांचवी बार फिर देश के राष्ट्रपति का चुनाव लडऩे की घोषणा की थी। यहां यह वर्णन योग्य है कि 1999 में सत्ता संभालवे वाले बौतेफ्लिका, 2013 में गंभीर बीमारी के कारण 3 महीने तक फ्रांस में इलाज करवा चुके हैं। देश के संविधान में राष्ट्रपति के लिए किसी भी व्यक्ति के दो कार्यकाल से अधिक रहने पर प्रतिबंध था, परंतु 2008 में उन्होंने इसमें संशोधन करके सीमित कार्यकाल के प्रावधान को समाप्त कर दिया था।
22 फरवरी को शुरू हुए जन-आंदोलन की मांग थी कि राष्ट्रपति बौतेफ्लिका अपने पद से त्यागपत्र दें। इस्लाम धर्म की बहुलता वाले इस देश में हर शुक्रवार को जुम्मे की नमाज के बाद प्रदर्शन होने लगे तथा इनमें देश के आम जन की शिरकत हर सप्ताह बढऩे लगी। पूर्ण रूप से अहिंसक प्रदर्शनों के रूप में यह आंदोलन प्रचंड रूप धारण कर गया तथा 2 अप्रैल को राष्ट्रपति अब्देल अजीज बौतेफ्लिका त्यागपत्र देने के लिए मजबूर हो गए। वास्तव में इन प्रदर्शनों के पीछे दशकों से देश में चल  रही नवउदारवाद आधारित आर्थिक व समाजिक नीतियों के कारण निरंतर बढ़ती जा रही सामाजिक-आर्थिक असमानता व बेरोजगारी के फलस्वरूप पैदा हुआ असंतोष था। देश का औद्योगिकीकरण करने के नाम पर 1976 से 78 के अपने कार्यकाल के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति कर्नल हौअरी बौमेदीन ने देश में नवउदारवाद आधारित आर्थिक व सामाजिक नीतियां लागू की थीं, वहीं उन्होंने अपनी समाजवाद के प्रति प्रतिबद्धता की भी घोषणा की थी।
राष्ट्रपति बौतेफ्लिका द्वारा त्यागपत्र देने के बावजूद भी देश भर में प्रदर्शन निरंतर जारी हैं। 2 अप्रैल के बाद 5 अप्रैल को देश के 48 प्रांतों में से 42 में जबरदस्त रोष प्रदर्शन हुए थे, जिनमें लाखों लोगों ने भाग लिया था। इनमें लोगों का कहना था कि बौतेफ्लिका के साथी अभी भी सरकार में हैं तथा यह नारा स्थिति को स्पष्ट करता था कि – ‘‘हमने लड़ाई जीती है, परंतु जंग नहीं।’’
इसी दौरान देश की अंतरिम रूप में सत्ता संभालने वाले देश की संसद के स्पीकर अब्देलकादर बेनसालाह ने देश में 4 जुलाई को चुनाव करवाने की घोषणा कर दी थी। परंतु इसके बावजूद 12 अप्रैल को भी देश में जबरदस्त रोष प्रदर्शन हुए। देश की राजधानी अल्जीर्यस में लाखों लोग रोष प्रदर्शनों में शामिल हुए। यहां पुलिस से प्रदर्शनकारियों की झड़पें भी उस समय हुई जब उन पर आंसू गैस से हमला किया गया। पुलिस सूत्रों के अनुसार 108 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया।
अल्जीरिया को लोगों की भावनायें, अल्जीरियाई बुद्धिजीवी जो इन प्रदर्शनों में शामिल रहे हैं अधिक स्पष्ट करते हैं। अमेल बौवेकेऊर, जो, एडवांस्ड स्टडीज इन सोशल सांइसिज में खोजार्थी है ने प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘अल-जजीरा’ से बात करते हुए कहा – ‘‘बौतेफ्लिका के त्यागपत्र दे देने के बाद से शासन प्रदर्शनों को दबाने के प्रयत्न कर रहा है तथा प्रदर्शनकारी इसका प्रतिरोध करने के लिए निरंतर इक_े हो रहे हैं। प्रदर्शनकारियों के लिए मौजूदा संवैधानिक ढांचे में समाधान मायने नहीं रखता क्योंकि इस संविधान का उपयोग शासक सत्ता में बने रहने के लिए करते रहे हैं।’’
दालीया घानेम, कारनेगी मिडल-ईस्ट सैंटर के शोघार्थी का कहना था- ‘‘देशवासी जानते हैं कि वे हर शुक्रवार ही नहीं बल्कि रोजाना प्रदर्शन करके क्या प्राप्त कर सकते हैं। आंदोलन की गति बनी हुई है तथा यह निरंतर बढ़ रही है। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि अल्जीरियावासी अपने मांगे मनवाने तक घरों में जाकर चुप्प नहीं बैठेंगे तथा उनकी मांगे भी अब स्पष्ट हैं। उनकी मांगें है कि शासन के शिखर पर बैठे तीनों लोग सत्ता से पूर्ण रूप से हटें – वे हैं तीन-बी, अर्थात-सरकार के अंतरिम नेता अब्देलकादेर बेनसालाह, संवैधानिक  परिषद के अध्यक्ष तायेब बैलेका, प्रधानमंत्री नौरेदीन बेदोई।’’
22 फरवरी, जबसे यह जन आंदोलन प्रारंभ हुआ था, उसके बाद से 12 अप्रैल ही पहला दिन था जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को जोर-जबर्दस्ती रोकने के प्रयत्न किए थे। इसके बावजूद नौजवान प्रदर्शनकारियों के हौसले बुलंद थे। 23 वर्षीय, यासीन की प्रतिक्रिया थी-‘‘हम सडक़ों पर बहुत बड़ी संख्या में उतरेंगे। उन्हें नहीं पता लोगों के आक्रोश का। वे हमारे विरुद्ध कुछ नहीं कर पायेंगे।’’ 4 जुलाई को चुनाव करवाने के बारे में जन भावनाओं को व्यक्त करते हुए, बेजैजा विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के व्याख्याता माहरेज बौऊच ने स्पष्ट किया – ‘‘4 जुलाई के चुनावों को लोग पहले ही रद्द कर चुके हैं, जिससे बेनसालाह का नामांकन भी अस्वीकृत हो गया है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि यदि चुनाव बौतेफ्लिका शासन के न्यायिक ढांचे व संस्थाओं द्वारा ही करवाए जाते हैं तो यह स्वतंत्र व निष्पक्ष नहीं होंगे।’’
राष्ट्रपति अब्देलअजीज बौतेफ्लिका को त्यागपत्र देने के लिए तैयार करने वाले देश के सेना प्रमुख जनरल अहमद गैद सालाह के विरुद्ध भी जन रोष बढ़ रहा है क्योंकि वे शासन के अंतरिम नेता अब्देल कादेर बेनसालाह के पक्ष में खड़े हो गए हैं।
अभी तक तो अल्जीरिया में घटनाक्रम सही दिशा की ओर बढ़ रहा है परंतु जनवाद को ओर जाता पथ कांटों व गड्डों से भरा है। अपने महीनों चले आंदोलन के दौरान विभिन्न नस्लों व धर्मों वाले जन-समूहों को एकजुट रखकर उसमें उनकी भागीदारी निरंतर बनाए रखनी व आंदोलन को अहिंसक बनाए रखना अफ्रीका महाद्वीप में एक बड़ी उपलब्धि हैं क्योंकि यह क्षेत्र नस्ली व धार्मिक हिंसा के कारण गृहयुद्ध का अखाड़ा बना रहा है तथा लाखों लोग इसका शिकार बने हैं। इस आंदोलन को अभी तक हर तरह के हस्तक्षेप-विदेशी, देशी, विशेष रूप में सैनिक हस्तक्षेप से बचाये रखना एक विशेष उपलब्धि है, क्योंकि सेना के जनरल तो ऐसी स्थिति में हस्तक्षेप करने के लिए आतुर रहते हैं। यह स्पष्ट दर्शाता है कि इस आंदोलन में शरीक जनता व इसे निर्देशित कर रहे कार्यकत्र्ताओं व बुद्धिजीवियों ने असफल रहे ‘अरब वसंत’ आंदोलन से उचित सबक लिए हैं तथा इस आंदोलन में उनका उपयोग किया है।                            (22-4-2019)

तुर्की के स्थानीय निकाय चुनाव : इरदूगान के अजेय होने का भ्रम चूर-चूर
यूरोप व एशिया दो महाद्वीपों में स्थित तुर्की गणराज्य, इन दोनों द्वीपों को जोड़ता है तथा काला सागर किनारे स्थित देश हैं। यहां 31 मार्च को हुए स्थानीय निकाय चुनावों में देश के शक्तिशाली राष्ट्रपति रजब तैयब इरदूगान को उस समय धक्का लगा जब उसकी पार्टी, जस्टिस एंड डवैलपमैंट पार्टी (ए.के.पी.) देश के सबसे बड़े 6 शहरों में से 5 के चुनाव हार गई तथा देश की राजधानी अंकारा समेत दूसरे सबसे बड़े शहर इस्तांबूल विरोधी पक्ष की पार्टी सी.एच.पी. के नेतृत्व वाले गठजोड़ के पास चले गए। यहां के स्थानीय निकायों पर 1994 से ए.के.पी. का कब्जा था। यहां यह भी स्मरण योग्य हैं कि राष्ट्रपति इरदूगान ने अपनी राजनीतिक यात्रा इस्तांबूल के मेयर के रूप में ही शुरू की थी।
देश के 30 मैट्रोपोलिटन शहरों व 1351 जिला म्यूनिसिपल निकायों के चुनाव हुए थे। सत्ताधारी पार्टी ए.के.पी. तथा उसकी सहयोगी पार्टी एम.एच.पी. क्रमश: 44.31 प्रतिशत तथा 7.31 प्रतिशत मत लेकर अभी भी सबसे आगे हैं। दूसरी ओर सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी, सी.एच.पी. व उसकी सहयोगी आई.वाई.आई. ने क्रमश: 30.11 प्रतिशत व 7.45 प्रतिशत मत प्राप्त किए हैं। तुर्की की कम्युनिस्ट पार्टी (टी.के.पी.) ने भी पहली बार प्रांतीय राजधानी टुनसेली में जीत प्राप्त की है।
देश की वामपंथी पार्टी, पीपुल्ज डैमोक्रेटिक पार्टी (एच.डी.पी.), जो कि मुख्य रूप में देश के कुर्द बहुल प्रांतों में आधार रखती है, ने उस पर इरदूगान सरकार द्वारा चलाए जा रहे दमनचक्र के मद्देनजर इन चुनावों में पूरी शक्ति से भाग नहीं लिया। इस पार्टी के प्रमुख नेता सेलहात्तिन डैमिरैटै सहित 700 से अधिक राजनीतिक कार्यकत्र्ता जेल में हैं तथा पिछले समय में एच.डी.पी. के कब्जे वाले 100 स्थानीय निकायों को भंग करके सरकार ने अपने अफसर उनके प्रशासन के लिए नियुक्त कर दिए थे। इस दमन चक्र का सामना करते हुए भी एच.डी.पी. ने कुर्द बहुल क्षेत्र की 102 में से 70 म्यूनिसिपल निकायों में जीत प्राप्त की है। महत्त्वपूर्ण प्रांत सिरनाक के चुनावों में धांधली करके सत्ताधारी ए.के.पी. ने इस पर कब्जा कर लिया है। कुर्द बहुल प्रांतों के अतिरिक्त बाकी देश में एच.डी.पी. ने सी.एच.पी. व आई.वाई.आई. गठजोड़ का पूर्ण रूप से समर्थन किया था। अंकारा व इस्तांबूल की सी.एच.पी. की जीत में उसका विशेष योगदान रहा।
तुर्की के इन चुनावों में विपक्ष की जीत इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रपति इरदूगान को तुर्की में अजेय के रूप में देखा जा रहा था। वे 2003 से देश की सत्ता के शिखर पर हैं। पहले 2014 तक वे देश के प्रधानमंत्री रहे तथा 2014 में राष्ट्रपति बने। इन दौरान वे देश को एक इस्लामिक देश बनाने की दिशा में बढ़ाने में सफल रहे। जुलाई 2016 में एक तख्तापलट को असफल बनाने के बाद तो उन्होंने एक एकाधिकारवादी शासक के रूप में अपने को मजबूत बनाना शुरू कर दिया। इसके बाद देश में आपातकाल लगा दिया तथा देश के हजारों बुद्धिजीवियों व अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को या तो जेलों में डाल या फिर देश छोडऩे के लिए मजबूर कर दिया। 2017 में जनमत संग्रह करवाके, देश के संविधान में संशोधन करके राष्ट्रपति प्रणाली को लागू कर दिया। धर्म निरपेक्षता को क्षति पहुंचाते हुये देश को एक इस्लामिक मूल्यों वाला राष्ट्र बनाने के लिए व्यवस्था कर दी गई। नए संविधान के अनुसार 2018 में राष्ट्रपति के सीधे चुनाव करवा के इरदूगान देश के राष्ट्रपति बन गए। अपने विपक्ष में उठने वाली हर आवाज को दबा दिया गया। समूची व्यवस्था पर अपनी जकड़ जमा ली। एक उदाहरण से स्थिति स्पष्ट हो जाती है। इन चुनावों में देश के राष्ट्रीय प्रसारण संस्थान-टर्किश रेडियो व टी.आर.टी. टैलीविजन नैटवर्क के प्रसारणों के दौरान इरदूगान की पार्टी ए.के.पी. व उसके सहयोगी दलों को 53 घंटे का प्रसारण समय दिया गया जबकि समूचे विपक्ष को मात्र 6 घंटे दिए गए, उसमें से वामपंथी पार्टी एच.डी.पी. को सिर्फ 7 मिनट मिले। ऐसे एकाधिकारवादी शासन के दौरान विपक्ष द्वारा 6 बड़े शहरों में से 5 पर जीत प्राप्त करना एक बड़ी उपलब्धि है। यहां यह भी महत्त्वपूर्ण है कि यह 5 शहर देश के कुल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में 65 प्रतिशत का योगदान देते हैं।
देश में जनवाद की जीत संस्थाओं के चरित्र या इरदूगान की दयालुता के कारण प्राप्त नहीं हुई बल्कि इसके पीछे एक मुख्य कारक यह भी था कि दमन-उत्पीडऩ के बावजूद देश की जनता ने जनवाद में यकीन बनाए रखा तथा वे भारी संख्या में मतदान करने के लिए पहुंचे। यहां यह वर्णनीय है कि इन चुनावों में मत प्रतिशत 84.67 रहा। दूसरा कारक यह था कि विपक्षी राजनीतिक पार्टियां भीषण दमन के बावजूद लोगों के साथ मजबूती से खड़ी रहीं, विशेष रूप से एच.डी.पी. तथा सभी विपक्षी पार्टियों ने एकजुट होकर एक संयुक्त लड़ाई इन चुनावों के दौरान दी।
विपक्षी पार्टियों को देश में जनवाद को मजबूत करने के लिए एक लंबा रास्ता तय करना होगा। क्योंकि देश में 2023 से पहले कोई चुनाव नहीं तब तक अपनी इस जीत की गति को कायम रखना तथा एकाधिकारवादी शासकों के दमनचक्र का मुकाबला करने की चुनौती उनके समक्ष खड़ी है।

फिनलैंड के संसदीय चुनाव : वामपंथ ने स्थिति सुधारी
फिनलैंड, यूरोप महाद्वीप का वह देश है जो खुशी-सूचकांक में दुनियां भर में प्रथम स्थान पर है। रिपब्लिक ऑफ फिनलैंड के नाम से जाना जाता है। यह देश पूंजीवादी विश्व व्यवस्था में स्थिरता, स्वतंत्रता, जन सुरक्षा व सामाजिक विकास के पक्ष से दुनियां भर में मार्ग दर्शक माना जाता है। यह 1917 में रूस से उस समय स्वतंत्र हुआ था, जब रूस में समाजवादी क्रांति आने के बाद रूसी शासक जार द्वारा परतंत्र बनाए गए सभी देशों को रूस की समाजवादी सरकार ने स्वतंत्र कर दिया था।
फिनलैंड की संसद को स्थानीय भाषा में ईडूसकुंटा कहा जाता है। संसद के लिए यहां हर चार वर्ष के बाद चुनाव होते हैं। चुनाव प्रणाली मुख्य रूप से अनुपातिक है। परंतु देश के सभी जिलों से एक एक प्रत्याशी को सबसे अधिक वोट प्राप्त करने वाले उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित करने, अर्थात सीधी चुनाव प्रणाली द्वारा चुना जाता है। बाकी उम्मीदवार पार्टियों को हर क्षेत्र में मिले मतों के प्रतिशत के अनुपात के अनुसार, अर्थात अनुपातिक प्रणाली द्वारा चुने जाते हैं। देश में 70 जिले हैं, जिन्हें उपक्षेत्र कहा जाता है तथा 19 क्षेत्र हैं।
देश की 200 सदस्यीय संसद के लिए 14 अप्रैल को चुनाव हुए हैं। इस वर्ष के मार्च महीने में देश के प्रधानमंत्री जुहा सिपिला द्वारा सामाजिक कल्याण तथा स्वास्थ्य के बारे में घोषित निशाने प्राप्त करने में नाकाम रहने के कारण अपनी सरकार का त्यागपत्र दे दिया था। इन चुनावों में वामपंथ की ओर झुकाव रखने वाली पार्टी, सोशल डैमोक्रेटिक पार्टी (एस.डी.पी.) 17.7. प्रतिशत मतों के साथ 40 सीटें प्राप्त करके सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। इसका नेतृत्व भूतपूर्व ट्रेड  यूनियन नेता अंटी रिन्ने कर रहे हैं। वामपंथी पार्टियों के गठजोड़ ने भी अपनी स्थिति मजबूत की है। उसने 8.2 प्रतिशत मत प्राप्त करके 16 सीटें प्राप्त की हैं जबकि इससे पहली संसद में इसके पास केवल 4 सीटें थीं। दूसरे नंबर पर प्रतिक्रियावादी अप्रवासी विरोधी पार्टी फिन्नज पार्टी रही है, जिसने 17.5 प्रतिशत मत प्राप्त करके 39 सीटें प्राप्त की हैं। त्याग-पत्र देने वाली सरकार में भागीदार, दक्षिणपंथी पार्टी, नैशनल कोलिशन पार्टी ने 17 प्रतिशत मत प्राप्त करके 38 सीटें प्राप्त की हैं।
सबसे ज्यादा क्षति त्यागपत्र देने वाली गठजोड़ सरकार में मुख्य भागीदार पार्टी, सैंटर पार्टी को हुई है। प्रधानमंत्री जूहा सिपिला के नेतृत्व वाली इस पार्टी को 13.9 मतों के आधार पर 31 सीटें प्राप्त हुईं हैं। जबकि पिछली संसद में यह 21 प्रतिशत मत प्राप्त करके 49 सीटों पर काबिज थी। इन चुनावों में सबसे अधिक प्रगति सीटों के मामले में ग्रीन लीग पार्टी ने की है, जिसने 11.5 प्रतिशत मत प्राप्त करके 20 सीटें प्राप्त की हैं, जबकि पिछली संसद में इसके पास 15 सीटें थीं। अन्य पार्टियों स्विडिश पीपल्ज पार्टी ने 4.5 प्रतिशत मतों के साथ 9 सीटें व क्रिस्चियन डेमोक्रेटस ने 3.9 प्रतिशत के साथ पांच सीटें प्राप्त की हैं। जबकि फिन्नज पार्टी से अलग होकर बनी ब्लू रिफार्म पार्टी 1 प्रतिशत वोट प्राप्त करके संसद में कोई सीट नहीं प्राप्त कर सकी है।
200 सदस्यीय संसद में बहुमत के लिए 101 सीटों की आवश्यकता है। एस.डी.पी. के लिए गठजोड़ सरकार बनाना सुलभ होगा क्योंकि वामपंथी गठजोड़ व ग्रीन लीग सैद्धांतिक रूप में उसके निकट हैं। पार्टी की मुख्य नीतियां देश में कार्य-आधारित अप्रवास को सुनिश्चित बनाने की ओर निर्देशित हैं ताकि बूढ़ी हो रही देश की बहुसंख्यक जनसंख्या के कारण अर्थ-व्यवस्था संकटग्रस्त न हो। इसके साथ ही एस.डी.पी. मानवीय आधार पर संकटग्रस्त देशों के लोगों को भी सीमित संख्या में शरण प्रदान करने की समर्थक है। इन चुनावों का यूरोप के अन्य देशों में होने  वाले चुनावों पर भी प्रभाव पडऩा स्वाभाविक है। राजनीतिक दर्शकों द्वारा इन देशों में भी वामपंथ की स्थिति सुधरने के बारे में अनुमान लगाये जा रहे हैं।

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जर्मनी में बढ़ते आवास किरायों के विरुद्ध संघर्ष
यूरोप महाद्वीप का आर्थिक ईंजन माने जाने वाले प्रमुख देश जर्मनी की राजधानी बर्लिन में 7 अप्रैल को हजारों लोगों ने रोष प्रदर्शन किया। वे शहर की आवास समस्या के समाधान व तेकाी से बढ़ रहे आवास किरायों पर रोक लगाने हेतु विशालकाय निजी आवास कंपनियों की संपत्तियों को जब्त किए जाने की मांग कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों ने बैनर व प्लेकार्ड उठाए हुए थे, जिन पर मकान मालिक मगरमच्छों व जमाखोरों के विरुद्ध नारे लिख गए थे तथा वे 3000 से अधिक आवास-समूहों वाले निजी भवन निर्माताओं की संपत्तियों का नियमीकरण करने के लिए कानून बनाने के पक्ष में आवाज बुलंद कर रहे थे।
इस प्रदर्शन में 40,000 से अधिक लोग शामिल थे। एक अध्ययन के अनुसार पिछले 5 वर्षों में जर्मनी के बड़े शहरों में आवास किरायों में नाटकीय बढ़ौतरी हुई है। बर्लिन में यह बढ़ौत्तरी 51 प्रतिशत है। इसी अध्ययन के अनुसार पिछले एक दशक में लगभग 40,000 नये लोग इस शहर में रहने के लिए आए हैं तथा 2008 के मुकाबले आवास किराया दुगना हो गया है।
देश की राजधानी बर्लिन में शहर के सबसे बड़े आवास समूहों की स्वामी कंपनी, जिसके पास शहर में 1 लाख 15000 फ्लैट हैं, की संपत्ति को जब्त करने के बारे में ‘‘डयूश वोहेन को जब्त करो’’ अभियान चलाया जा रहा है।
आवासीय किराया मगरमच्छों पर रोक लगाने की मांग करने वाले प्रदर्शन के एक आयोजक ताहेरी के अनुसार लोगों का इन विशालकाय कंपनियों के प्रति अनुभव बहुत अनुचित है, वे लोगों की जिंदगियों की नहीं बल्कि केवल अपने मुनाफों की ही चिंता करते हैं।
बर्लिन शहर के स्थानीय निकायों से संबंधित कानून के अनुसार 3000 से अधिक आवासों के मालिकों की संपत्तियां जब्त करवाने के लिए जनमत संग्रह करवाने हेतु हस्ताक्षर अभियान प्रारंभ कर दिया गया है। ‘डयूश वोहेन को जब्त करो’ अभियानकत्र्ताओं को 6 महीने में 20000 हस्ताक्षर इक्_े करने होंगे तथा जनमत संग्रह करवाने हेतु फरवरी तक 1 लाख 70 हजार हस्ताक्षर एकत्रित करने होंगे।

पाकिस्तान में बेरोजगारी के विरुद्ध कांफ्रैंस व प्रदर्शन
हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के सिंध प्रांत के दादू शहर में ‘बेरोजगार नौजवान तहरीक’ व रैवोल्यूशनरी स्टूडैट्स फ्रंट (आर.एस.एफ.) की ओर से एक कांफ्रैंस का आयोजन किया गया। इसकी अध्यक्षता ‘बेरोजगार नौजवान तहरीक’ के सिंध प्रांत के संगठक रामीज मिसरानी ने की तथा आर.एस.एफ. के केंद्रीय संगठक अवैस कारनी मुख्य अतिथि थे। सिंध के शहरों दादू, शक्कर, शादादकोट, के.एन.शाह, खैरपुर, नबावशाह से बड़ी संख्या में नौजवान व विद्यार्थी इस कांफ्रैंस में पहुंचे। हैदराबाद, जामशेरो व कराची से कई विद्यार्थी नेता भी उपस्थित थे।
सद्दाम खासखेली ने सभी का स्वागत किया तथा सिंध यूनीवर्सिटी विद्यार्थियों को ओर से मुख्य अतिथि को ‘सिंधी अजरक’ तोहफे के रूप में दिया गया। साजिद जामली ने इस आयोजन में मंच संयोजन की भूमिका निभाई।
मुख्य अतिथि अवैस कारनी के अतिरिक्त बहुत से विद्यार्थी व नौजवान नेताओं ने भी इस कांफ्रैंस के संबोधन किया। वक्ताओं ने अपने संबोधन में कहा कि देश की सरकार की यह बुनियादी जिम्मेवारी है कि वह नौजवानों को उचित रोजगार उपलब्ध कराए परंतु यह गली-सड़ी आर्थिक व्यवस्था करोड़ों पाकिस्तानी नौजवानों को रोजगार प्रदान करने में नाकाम है, यहां तक कि बुनियादी आवश्यकताएं जैसे, स्वास्थ्य सेवाएं, साफ पानी, मुफ्त शिक्षा आदि भी आम लोगों की पहुंच से बाहर हो गई हैं। पंूजीवाद के गंभीर संकट के मद्देनजर मंहगाई निरंतर बढ़ रही है। पी.टी.आई. की नई सरकार भी पहले की सरकारों की तरह निजीकरण की प्रतिक्रियावादी नीतियां लागू कर रही है जिससे बेरोजगारी बढ़ रही है तथा लोग बुनियादी आवश्यकताओं से वंचित होते जा रहे हैं। मौजूदा सरकार नौजवनों व आम जनता से धोखा-धड़ी कर रही है। उसने चुनावों के दौरान 1 करोड़ नौकरियां व 50 लाख घर बनाने का वायदा किया था परंतु, इसके विपरीत घरों को ऊजाड़ा जा रहा है तथा लाखों लोग अपनी नौकरियां गवां चुके हैं। उन्होंने कहा कि यह पूंजीवादी व्यवस्था के लक्षण हैं तथा इसमें अब सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। कांफ्रैंस द्वारा नौजवानों व विद्यार्थियों ने मांग की कि रोजगार दिया जाए या फिर 20000 रुपए प्रति महीना बेरोजगारी भत्ता दिया जाए। उन्होंने निशुल्क शिक्षा व शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थी संगठनों के चुनावों को बहाल करने की भी मांग की। कांफ्रैंस ने नौजवानों से इन समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष करने तथा क्रांतिकारी सिद्धांतों से अपने आप को लैस करने का आह्वान किया।
कांफ्रैंस के अंत में दादू प्रैस क्लब से सिनेमा चौक तक प्रदर्शन किया गया। जिसमें मंहगाई, निजीकरण, बेरोजगारी के विरुद्ध आवाज बुलंद की गई।

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