महान लेनिन की यह शिक्षा तो बार-बार सही सिद्ध होती आ रही है कि एक क्रांतिकारी पार्टी का मुखपत्र उसकी राजनीतिक व सैद्धांतिक दिशा का केवल प्रचार ही नहीं करता बल्कि उसे संगठित करने तथा संघर्षों के मैदान को प्रज्वल्लित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ‘संग्रामी लहर’ ने भी अपनी पिछली लगभग 18 वर्ष की आयु में यह समस्त कार्य, एक सीमा तक, सफलतापूर्वक निभाये हैं, पंजाब में प्रकाशित होती मासिक पत्रिकाओं में अपना गणनीय स्थान बनाया है तथा प्रांत के संघर्षरत लोगों को एकजुट व एकसुर करने में अच्छा योगदान दिया है। परंतु संघर्षरत लोगों का आंदोलन किसी एक वर्ग या एक प्रांत तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता। इसका निरंतर प्रसार होता रहना चाहिए, नहीं तो समय पाकर यह नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। भारतीय क्रांति के महान कार्यों की पूर्ति के लिये भी, स्वाभाविक रूप में, इस आंदोलन के समूचे देश भर में शक्तिशाली प्रसार की आवश्यकता है। इसीलिये हमने, ‘संग्रामी लहर’ का पंजीकरण करवाते समय भी, इसे त्रै-भाषाई (पंजाबी, हिंदी, अंग्रेजी) पत्रिका के रूप में पंजीकृत करवाया था। अब जबकि भारतीय क्रांतिकारी माक्र्सवादी पार्टी (आर.एम.पी.आई.) के रूप में हमारी पार्टी की उत्तर भारत में ही नहीं बल्कि दूर दक्षिण में तामिलनाडु व केरल तक प्रभावशाली ईकाईयां गठित हो चुकी हैं तो ‘संग्रामी लहर’ के हिंदी में प्रकाशन की आवश्यकता और भी अधिक तीव्र हो गयी ताकि मासिक पत्रिका द्वारा भिन्न-भिन्न प्रांतों के साथियों की सरगर्मियों की परस्पर सांझ मजबूत हो सके तथा ठोस रूप ग्रहण कर सके।
इसके अतिरिक्त, पार्टी के पिछले वर्ष नवंबर में चंडीगढ़ में संपन्न हुये प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन में स्वीकृत की गई पार्टी की अद्वितीय युद्धनीतिक दिशा के प्रचार-प्रसार के लिये भी हिंदी में छपने वाली पत्रिका की बहुत आवश्यकता महसूस की जा रही है। पार्टी ने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की क्रांतिकारी परंपराओं को आगे बढ़ाते हुये अपने नये कार्यक्रम द्वारा तीन अद्वितीय सैद्धांतिक-राजनीतिक धारणाओं को उभारा है। पहली है: भारतीय समाज की विशेष संरचना को सामने रखते हुये, जाति-पाति के प्रश्न को क्रांतिकारी संघर्ष के एक महत्त्वपूर्ण अंग के रूप में स्वीकार करना, तथा समाजवाद की ओर बढऩे के लिये वर्गविहीन व जातिविहीन समाज के सृजन का उद्देश्य निर्धारित करना। दूसरी धारणा: देश की आधी जनसंख्या स्त्रियों को मनुवादी दासता की जंजीरों से मुक्त कर हर क्षेत्र में स्त्रियों की पुरुषों से समानता के अधिकार को सुनिश्चित करने के संघर्ष को भी क्रांतिकारी संघर्ष के एक अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार करना। तथा तृतीय है: माक्र्सवाद-लेनिनवाद से हर क्षेत्र में सैद्धांतिक दिशा निर्देश लेने के साथ साथ भारतीय समाज के लंबे इतिहास के दौरान जालिम हुक्मरानों द्वारा साधनहीन गरीबों के किये जाते रहे आर्थिक शोषण व हुक्मरानों द्वारा लोगों पर लादी गई सैद्धांतिक दासता व पिछड़ेपन के विरुद्ध लडऩे वाले जन-नायकों व विद्वानों के संघर्षों, मिथकों व बलिदानों भरपूर गौरवशाली उपलब्धियों से उपयुक्त प्रेरणा लेनी तथा उसे अपनी सरगर्मियों मेें समाहित करना। इन समस्त धारणाओं की व्याख्या व प्रचार-प्रसार के लिये भी हिंदी के मुखपत्र की तीव्र आवश्यकता महसूस की जा रही थी।
भारत के मौजूदा राजनीतिक परिपेक्ष्य में, जबकि कारपोरेट समर्थक सत्ताधारियों द्वारा साम्राज्यवादी शक्तियों के निर्देशों पर अपनाई गई नवउदारवादी नीतियों के फलस्वरूप मेहनतकश जनसमूहों की समस्याओं में तीव्र बढ़ौत्तरी हो रही है,तथा भिन्न भिन्न वर्गों से संबंधित मेहनतकश लोगों के देशव्यापी संघर्ष उठ रहे हैं, तो यह आवश्यक हो जाता है कि लोगों की ज्वलंत समस्याओं के वास्तविक कारणों की समस्त परतों को खंगाला जाये। मजदूरों-कर्मचारियों के लिये रोजगार की सुरक्षा समाप्त हो चुकी है। तथा उनकी वास्तविक आमदनियां बहुत तेजी से क्षरित हो रही हैं। दलितों पर होते सामाजिक उत्पीडऩ में भी और बढ़ौत्तरी ही नहीं हुई बल्कि उत्पादन के साधनों से वंचित होने के कारण वे आर्थिक रूप में भी कंगाली के कगार पर पहुंच चुके हैं। पूंजीवादी बाजार की दोहरी लूट के बीच पिसती जा रही तथा कर्ज के जाल में फंसी हुई किसानी बेबसी में आत्म हत्यायें करने तक जा पहुंची है। बेरोजगार व अद्र्ध बेरोजगार जवानी इस व्यवस्था से बहुत हद तक निराश हो गई है तथा मजबूरीवश नशों व असामाजिक धंधों की दलदल में फंसती जा रही है। शिक्षा का पूर्ण रूप में व्यापारीकरण हो चुका है तथा गरीब व मध्य वर्ग के परिवारों के बच्चों के लिये गुणवत्ता युक्त व उच्च शिक्षा प्राप्त करनी अति मुश्किल हो गई है। स्वास्थ्य सेवाएं भी निजीकरण की जन विरोधी नीति की भेंट चढ़ गई हैं तथा आम लोग बिना इलाज के मर रहे हैं। स्त्रियों पर लिंगक हमले निरंतर बढ़ रहे हैं। प्रशासन पूरी तरह से धनवानों का रखैल बन चुका है। आम आदमी के लिये न्याय प्राप्त करना दुर्लभ हो गया है। निरंतर बढ़ती जा रही महंगाई ने समुचे रूप में मेहनतकश आवाम का खून निचोड़ लिया है। भ्रष्टाचार चारों ओर दनदना रहा है। इसलिये जगह-जगह असंतोष व जन-रोष उबल रहा है तथा कई बार स्व: स्फूर्त जन संघर्ष भी उभर आते हैं। इन समस्त संघर्षों को क्रांतिकारी पथ पर अग्रसर करने की आवश्यकता सदैव बनी रहती है। क्योंकि क्रांतिकारी नेतृत्व की अनुपस्थिती के कारण बहुत बार विशाल जन संघर्ष भी निरे आर्थिक उपलब्धियों तक सिमट कर रह जाते हैं तथा या फिर किसी एक या दूसरी पूंजीपति समर्थक पार्टी को चुनावी लाभ पहुंचाने का साधन मात्र बन जाते हैं। जबकि वर्तमान ऐतिहासिक आवश्यकता यह है कि जनसंघर्ष लोगों की क्रांतिकारी चेतना को विकसित करें तथा मजबूत व बाकायदा संगठित हुई जनशक्ति के निर्माण का साधन बनें। पार्टी का मुख्यपत्र इस महत्त्वपूर्ण कार्य को सफलता सहित परिपूर्ण करने में भी पर्याप्त योगदान डाल सकता है।
हमारे देश के वर्तमान दृश्यपटल में सांप्रदायिक-फाशीवादी शक्तियों द्वारा जो घातक विष फैलाया जा रहा है, उसका मुकाबला करने के लिए राजनीतिक संघर्ष के साथ साथ सैद्धांतिक संघर्ष तीव्र करने की भी बहुत आवश्यकता है। आर.एस.एस. के आदेशों का पालन करते हुये मोदी सरकार सांप्रदायिक गुंडा-गिरोहों को सरेआम संरक्षण प्रदान कर रही है। भारत एक बहुराष्ट्रीय, बहुभाषाई तथा बहुनस्ली देश है। यहां भिन्न-भिन्न धर्मों को मानने वाले, भिन्न-भिन्न सांस्कृतियों का पालन करने वाले लोग बसते हैं। इसके बावजूद संघ परिवार द्वारा धार्मिक व इलाकाई अल्पसंख्यकों पर हिंसक हमले किये जा रहे हैं। धर्म-निरपेक्षता के महत्त्वपूर्ण सिद्धांतों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। मनुवादी संस्कृति के पुर्नजागरण के लिये संघ परिवार द्वारा किये जाते विषैले प्रचार के दबाव में सरकार द्वारा देश की संविधानिक व जनवादी संस्थाओं का क्षरण किया जा रहा है। इससे देशवासियों की जनवादी व सैकूलर कतारों में असंतोष भी बढ़ रहा है तथा अल्पसंख्यकों में भय की भावना भी। मोदी सरकार इन देशद्रोही तत्वों द्वारा अपनाये जाते भीड़-तंत्र को रोकने में भी असफल ही सिद्ध नहीं हुई बल्कि बहुत बार इसके जिम्मेवार कार्यकर्ताओं द्वारा इस भीड़ तंत्र को प्रोत्साहन भी दिया जा रहा है। इससे आम मेहनतकश लोगों की मुसीबतों में ही बढ़ौत्तरी नहीं हो रही बल्कि देश की एकता-अखंडता के लिये भी खतरे बढ़ रहे हैं। ऐसी अवस्था में आरएसएस की हिंदूवादी विचारधारा के विरुद्ध सैकूलर व समतावादी विचारधारा के प्रचार-प्रसार की भी बहुत आवश्यकता है।
इस समूचे परिपेक्ष्य में भारतीय क्रांतिकारी माक्र्सवादी पार्टी (आर.एम.पी.आई.) की 8 से 10 दिसंबर तक जालंधर में हो रही केंद्रीय समिति की बैठक के शुभ अवसर पर हिंदी में ‘संग्रामी लहर’ का प्रवेशांक हम पाठकों को भेंट कर रहे हैं। आशा है कि यह पत्रिका भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के समक्ष उपस्थित बहुमुखी चुनौतियों के मुकाबले के लिये अपना नम्र योगदान करने के समर्थ होगी।
-हरकंवल सिंह
(2-2-2018)