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भारतीय रेलवे का चोरी छिपे किया जा रहा निजीकरण

भारतीय रेलवे का चोरी छिपे किया जा रहा निजीकरण

रेलवे की निरंतर घट रही श्रम शक्ति अर्थात कम हो रहे रोजगार के अवसर

    1990-91    16,51,800
    2000-01    15,45,300
    2010-11    13,32,000
    2015-16    13,30,300
    2015-16    13,08,300
स्रोत्र : भारतीय रेल, तथ्य व आंकड़े, 2016-17

 

मोदी सरकार बड़े जोर-शोर से यह दावे करती है कि वह कभी भी भारतीय रेल का निजीकरण नहीं करेगी। परंतु अप्रत्यक्ष रूप में निजीकरण की प्रक्रिया जारी है। इस ओर एक और कदम बढ़ाने की सरकार द्वारा योजनाबंदी की जा रही है।
निगमीकरण तथा पब्लिक-प्राइवेट भागीदारी के माध्यम से यह निजीकरण की प्रक्रिया निरंतर चल रही है। निगमीकरण के नाम पर किसी भी कार्य या परिसंपत्तियों को रेल विभाग से अलग करके एक नई सार्वजनिक क्षेत्र कंपनी बनाकर उसके हवाले कर दिया जाता है। बाद में इस सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के हिस्से (शेयर) धीरे-धीरे पूंजीपतियों के हाथों बेच दिये जाते हैं।
भारतीय रेल के पास इस समय 25000 किलोमीटर बिजली आधारित विद्युतीकृत रेल मार्ग है। इस पर दौड़ते हुये विद्युत इंजन इसके ऊपर लगी विद्युत लाइनों से बिजली लेकर चलते हैं। इस समय इस बिजली ट्रांसमीशन नैटवर्क का स्वामित्व भारतीय रेल विभाग के पास है। इस समस्त नैटवर्क के स्वामित्व को अब एक अलग कंपनी बनाकर उसे स्थानांतरित कर देने का प्रस्ताव है। आशा की जा रही है कि यह नई कंपनी इस विद्युत नैटवर्क का स्वामित्व लेने के लिए भारतीय रेल को 25000 करोड़ रुपये देगी। इसके बाद भारतीय रेल, इस कंपनी को विद्युत नैटवर्क का उपयोग करने के बदले में सालाना फीस देगी। पहले रेल विभाग से अलग बनाई गई निगमों व कंपनियों की तरह ही इस कंपनी के भी हिस्से (शेयर) बाद में धीरे-धीरे करके पूंजीपतियों को बेच दिये जायेंगे।
भारतीय रेल से अलग करके 1974 में बनाई गई सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी राईटिस लिमिटिड (क्रढ्ढञ्जश्वस्-क्रड्डद्बद्य ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड ञ्जद्गष्द्धठ्ठद्बष्ड्डद्य ्रठ्ठस्र श्वष्शठ्ठशद्वद्बष् स्द्गह्म्1द्बष्द्ग) के शेयर अभी पिछले ही महीने निजी कंपनियों को बेचे गये हैं। एक अन्य बहुत ही महत्त्वपूर्ण निगम, भारतीय रेल वित्त निगम (ढ्ढक्रस्नष्ट), जो 1986 में भारतीय रेल से अलग करके बनाया गया है, के भी शेयरों का एक भाग इस वित्तीय वर्ष में निजी कंपनियों को बेचे जाने की योजना है। यह निगम, रेल इंजन, यात्री डिब्बे व मालगाड़ी के डिब्बे, जो कि भारतीय रेलवे को चाहिये होते हैं, खरीदता है तथा उन्हें लीज पर रेल विभाग को देता है। 2016-17 में ही इस निगम ने 14,281 करोड़ मूल्य के 608 रेल इंजन, 2280 यात्री डिब्बे तथा 10,000 माल ढोने वाले डिब्बे भारतीय रेल को लीज पर दिये हैं। मार्च 2017 तक ही इस निगम आई.आर.एफ.सी. द्वारा 1,51,319 करोड़ रुपये मूल्य के 8,998 रेल इंजन, 47,825 यात्री डिब्बे व 2,14,456 माल डिब्बे भारतीय रेल को लीज पर उपलब्ध करवाये जा चुके हैं। इस तरह समस्त रोलिंग स्टाक (रेल गाडिय़ों के रेल मार्गों पर दौडऩे वाला माल-असबाव-ईंजन, यात्री डिब्बे, माल डिब्बे) आई.आर.एफ.सी. की संपत्ति हैं ना कि भारतीय रेल की। यदि इस वित्तिय निगम का निजीकरण हो जाता है तो यह तमाम संपत्ति उन निजी क्षेत्र के पूंजीपतियों के कंट्रोल में चली जायेगी, जो इसके शेयर खरीदेंगे। इसी तरह अब विद्युतीकरण नैटवर्क को भी निगम बना कर उसके हाथों में दिया जा रहा है, उसका भी धीरे-धीरे निजीकरण कर दिया जायेगा तथा समस्त विद्युत नैटवर्क निजी पूंजीपतियों के हाथों में चला जायेगा।
यहां यह वर्णन योग्य है कि भारतीय रेल की समस्त परिसंपत्तियां भारतीय नागरिकों द्वारा दशकों से दिये जा रहे टैक्सों से बनी हैं। जिन्हें मोदी सरकार अप्रत्यक्ष रूप में निजी पूंजीपतियों के हवाले करती जा रही है। जिस समय यह निगम या कंपनियां रेल विभाग से परिसंपत्तियों या कार्य अलग करके बनाये जाते हैं उस समय यह दलील जाती है कि यह निजीकरण नहीं है, क्योंकि सरकारी संपत्ति सार्वजनिक कंपनी या निगम को ही स्थानांतरित की जा रही है। परंतु बाद में आम जनता की आखों में धूल झोंक कर इसके शेयर बेच कर निजीकरण कर दिया जाता है। इस निजीकरण का एक सीधा प्रभाव रेलवे की रोजगार प्रदान करने की क्षमता पर भी पड़ता है। एक अध्ययन के अनुसार भारतीय रेल, देश का सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता संस्थान है, जिसकी श्रम शक्ति 1990-91 में 16 लाख 51 हजार थी, जो 2015-16 में घट कर 13 लाख 8 हजार रह गई थी। 1990-91 के बाद से यह निरंतर घट रही है।
(‘सीजीपीआई.आरग’ से ली गई सामग्री पर आधारित)

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