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धर्म के मानवीय सरोकार व अंधविश्वास

धर्म के मानवीय सरोकार व अंधविश्वास

मंगत राम पासला

धर्म निरपेक्ष व सांप्रदायिक होने में उतना ही अंतर है, जितना कि धार्मिक व अंधविश्वासी होने में। प्रगतिशील विचारों का अनुसरण करने वाले लोगों के विरुद्ध भ्रामक व दुष्प्रचार करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियों ने इन अंतर को मिटाने का भरसक प्रयास किया है। जिसके कारण, कुछ लोगों के मन-मस्तिष्क में विज्ञान व मानवीय विचारों पर चलने वाले धर्म-निरपेक्ष पक्षों के बारे में कई तरह के भ्रम व शंकायें ही पैदा हुई हैं। इन शंकाओं व गलत फहिमियों के कारण वामपंथी व जन हितैषी शक्तियों के लिये, मनुष्य के हाथों मनुष्य की लूट-खसूट से मुक्त वर्ग विहीन, जाति-विहीन व नारी मुक्ति युक्त सैकूलर समाज के निर्माण के संघर्ष में, भारी बाधायें पैदा हो रही हैं।
कम्युनिस्ट व अन्य वामपंथी प्रगतिशील लोग हमेशा ही व्यक्ति के अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म को अपनाने के अधिकार के पूर्ण समर्थक रहे हैं। हर व्यक्ति अपनी आत्मिक शांति व आनंद की प्रप्ति के लिये बिना किसी रोक-टोक इस अधिकार का प्रयोग कर सकता है। किसी भी अन्य व्यक्ति, संस्था या धर्म को उसके इस निजी अधिकार को छीनने का हक नहीं है। इस अधिकार की रक्षा के लिये कम्युनिस्टों ने पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद के दौर में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर आतंकवादियों द्वारा किये जाते हमलों, उनकी धार्मिक मान्यताओं व रीति-रिवाजों को जोर-जबरदस्ती से कुचलने के विरुद्ध व भय मुक्त होकर अमन-शांति से जीने की इच्छा की रक्षा करते हुये अपनी जानें न्यौछावर की हैं। इसी तरह जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी कार्यवाहियों के कारण कश्मीरी पंडितों को डरा-धमका कर घरों से बेघर करने के घिनौने कृत्य, गुजरात में हुई सांप्रदायिक गुंडागर्दी, जिसमें हजारों मुसलमानों का कत्लेआम किया गया तथा 1984 में दिल्ली की सडक़ों पर सिखों के बेरहमी से किये गये कत्लेआम के प्रति वामपंथी शक्तियों की  पहुंच जग-जाहिर है, जो हर व्यक्ति के बिना किसी भेदभाव के, धार्मिक आजादी के अधिकार की रक्षा करने की ओर निर्देशित है। ऐसा करते हुये वामपंथी शक्तियों ने सदैव ही अल्प संख्यकों के उचित अधिकारों के संघर्ष में उनका साथ भी दिया है। यह समझ ही धर्म-निरपेक्षता का मूल है, जो धर्म व राजनीति को अलग-अलग रखता है? यही कारण है कि किसी भी धर्म के नाम पर की जाती राजनीति या धर्म व राजनीति के विलय के परिणामस्वरूप किसी भी देश में धर्म आधारित राज्य की हुई स्थापना का या ऐसे प्रतिक्रियावादी आंदोलनों का कम्युनिस्टों व वामपंथी शक्तियों ने डटकर विरोध किया है। जब भी धार्मिक जनून से प्रेरित होकर, अपने धर्म को सर्वोच्च दर्शाने व लोगों की धार्मिक आस्था का दुरुपयोग करके किसी राजनीतिक पार्टी, सामाजिक संस्था या व्यक्ति विशेष द्वारा अन्य धर्मों का अपमान किया जाता है या निंदा की जाती है, तो इसके फलस्वरूप सांप्रदायिकता की बुराई पैदा होती है। यह बुराई समूचे देश व अन्य विरोधी धर्मों के लोगों को ही तबाह नहीं करती, बल्कि जिस धर्म के नेताओं द्वारा धार्मिक कट्टरता व सांप्रदायिक जनून फैलाकर धर्म आधारित देश की स्थापना की गई होती है, उस धर्म के अनुयाइयों को भी इसका भारी मूल्य चुकाना पड़ता है। साऊदी अरब, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, राजाशाही के समय का नेपाल इसकी जीती जागती उदाहरणें हैं।
भारत में आरएसएस, संघ परिवार व अन्य प्रतिक्रियावादी शक्तियों द्वारा कम्युनिस्टों व वामपंथियों के विरुद्ध, उनके द्वारा धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा व सांप्रदायिकता के विरुद्ध लिये जाते स्पष्ट, निरंतर व अडिग स्टैंड लेने के कारण, अक्सर ही विषैला प्रचार किया जाता है। जबकि अपने इस स्टैंड पर कम्युनिस्ट व अन्य प्रगतिशील शक्तियां उचित रूप से गर्व कर सकती हैं।
दूसरा प्रश्न है,धार्मिक व अंध-विश्वासी होने की भिन्नता का। सामाजिक विकास को भिन्न-भिन्न धर्मों की उत्त्पति ने, कई रूपों से प्रभावित किया है। कई प्रभाव अस्थाई व कई अन्य चिरस्थाई साबित हुये हैं। परंतु इन प्रभावों की कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति अनदेखी नहीं कर सकता। सामाजिक विकास की लंबी यात्रा में भिन्न-भिन्न पड़ावों पर जब भी मनुष्य को अपने जीवित रहने के लिये, उसकी पकड़-समझ से बाहर, ना हल हो सकने वाली कठिनाईयों का सामना करना पड़ा, तब उसने इन्हें हल करने के लिये कई तरह के मिथकों को गढ़ा, जिन्होंने समय के साथ धर्मों का रूप धारण कर लिया। इसीलिये धर्म को ‘दुखी व्यक्ति के लिये राहतÓ, उत्पीडि़त व्यक्ति के ‘दिल से निकली सिसकीÓ व ‘मन को शांति व धैर्य प्रदान करने वाला बहुमूल्य स्रोत्रÓ कहा जाता है। यद्यपि वास्तविक जीवन में त्रुटियुक्त आर्थिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप उसके समक्ष मुश्किलें तो बार-बार सिर उठाती रहतीं हैं, परंतु किसी भी अवसर पर जितने भी समय के लिये उसे धर्म की ओट में चैन प्राप्त होता है, उसके सार्थक पक्ष को समझने की आवश्यकता है।
परंतु यह तथ्य भी याद रखना होगा कि शोषक सत्ताधारी वर्गों व स्वार्थी-संकुचित हितों ने अपनी सत्ता व लूट को कायम रखने के लिये सदैव ही धर्म के मानवीय मूल्यों को लोगों की नजरों से दूर रखने व उनके धार्मिक विश्वासों को ‘अंध विश्वासÓ में बदलनेे के लिये भरसक प्रयत्न किये हैं, जो आज भी जारी हैं। पीडि़त लोगों का बड़ा भाग सत्ताधारी शोषक वर्गों की इस घिनौनी चाल का शिकार बनता आ रहा है। जब कोई व्यक्ति किसी शारिरिक रोग, गरीबी या अन्य मुश्किल से मुक्ति पाने के लिए किसी ऐसे तथाकथित ‘बाबाÓ, ‘धर्म गुरुÓ या तांत्रिक के जाल में फंसता है, जो मोरपंखों से, पानी की बोतल से, अंगारों पर चलाकर, सिर झपट कर या किसी अन्य अवैज्ञानिक मूर्खता भरपूर विधि द्वारा उसके दुखों का इलाज करने का दावा करता हो, तब इससे समाज के भीतर दकियानूसी व प्रतिक्रियावादी वातावरण का निर्माण आरंभ हो जाता है। इस अंधविश्वास के फलस्वरूप ऐसे धार्मिक डेरे व तथाकथित आडंबरी धर्म गुरू वर्षाकाल में पैदा होते मेंढकों की तरह इसलिये पैदा हो रहे हैं क्योंकि एक ओर सरकारों की नीतियां व धोखाधडिय़ों के कारण लोगों की मुश्किलों में बढ़ौत्तरी हो रही होती है व दूसरी ओर दुखी लोगों की भीड़ें जुटाने की योजनायें बनाकर जन-दुश्मन सत्ताधारी खुद अपने कुकर्मों से पैदा हुये जन-रोष से बचाव के प्रयत्न करते रहते हैं। जो व्यक्ति प्राकृतिक रूप से शरीरिक या मानसिक रूप से अपंग होने के कारण सोचने, बोलने, लिखने, पढऩे व अन्य कोई भी सामाजिक क्रिया करने से असमर्थ होते हैं तथा लोगों की भीड़ों के समक्ष भिन्न-भिन्न नशों का सेवन करके अद्र्ध-बेहोश से बैठे रहते हैं, उनसे हर तरह की तकलीफों से मुक्ति पाने के लिए व निचले स्तर के मनोरंजन के लिये जो असंख्य नौजवान लड़कियां, लडक़े एकत्र होते हैं, वे फिर कभी भी सहज व अच्छा जीवन जीने के लिये आवश्यक तर्कशीलता, ज्ञान व संघर्षशील पहुंच की ओर प्रेरित नहीं होते। धर्म की व्याख्या करने वाले कथावाचक व प्रचारक ‘रब्ब के दूतÓ के रूप में कार्य करते करते खुद ‘परमात्माÓ, ‘भगवानÓ, ‘वाहेगुरूÓ, ‘गॉडÓ, ‘देवी-देवतेÓ आदि बने बैठे हैं व मनमर्जी का बेहूदा झूठ भरा प्रचार करते रहते हैं। समय की सरकारों व अफसरशाही के वरदहस्त तथा उनके पास चढ़ावे के रूप में लोगों की लूट द्वारा एकत्रित धन के बल के कारण आम तौर पर समाज के भीतरी बुद्धिजीवी, विद्वान, तर्कशील व वैज्ञानिक सोच रखने वाले लोग उनके झूठ के विरूद्ध कुछ कहने या लिखने का साहस नहीं करते। कई बार ऐसी हिम्मत दिखाने को हिंसा व सरकारी तंत्र द्वारा दबा भी दिया जाता है।
इन परिस्थितियों का लाभ लेकर ही आर.एस.एस. अपनी घोर प्रतिक्रियावादी अवैज्ञानिक व सांप्रदायिक विचारधारा को अंधराष्ट्रवाद व भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता के रूप में पेश करके देश के धर्म निरपेक्ष व जनवादी ढांचे को तबाह करने को लक्ष्य बनाये बैठी है। वर्तमान संदर्भ में धर्म के नाम पर सांप्रदायिकता का खेल खेलते हुये, देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के विवाद के संबंध में होने वाली सुनवाई को जनवरी 2019 के लिये स्थागित किये जाने के निर्णय पर, भाजपा व इसके समर्थक हिंदू संगठनों द्वारा दी गई प्रतिक्रिया बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण व उत्तेजना भरपूर है। यदि अन्य कोई राजनीेतक पार्टी या व्यक्ति विशेष अदालत के किसी निर्णय के विरुद्ध अदालतों व भारतीय संविधान के बारे में ऐसी टिप्पणी कर देता तो भाजपा तुरंत ही उसे ‘देशद्रोहीÓ होने का फतवा दे देती। वास्तव में भाजपा, अयोध्या विवाद के संदर्भ में राम मंदिर बनाने की रट लगाकर समाज के सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण द्वारा साल 2019 के लोक सभा चुनावों को जीतने की योजना बनाये बैठी है। भाजपा व इसके सहियोगी संगठनों के अतिरिक्त अन्य कोई भी राजनीतिक दल या संस्था ऐसी नहीं है,जो राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद के बारे में सुप्रीम कोर्ट के किसी भी संभावित निर्णय को मानने से आनाकानी करती हो। इसलिये ही संकुचित राजनीतिक हितों की प्राप्ति के लिये धर्म का दुरुपयोग करके सांप्रदायिकता फैलाने की दोषी है, भाजपा। परंतु ऐसी टिप्पणी से उसके नेता बहुत चिढ़ते हैं।
ऐसी स्थितियां समाज व देश के विकास की राह में बाधा हैं तथा मनुष्य के हाथों मनुष्य के शोषण के खात्में, समानता आधारित समाज व अमन शांतिमय वातावरण के सृजन के लिये संघर्षरत शक्तियों की बढ़ौत्तरी में भारी मुश्किलें खड़ी करतीं हैं। आवश्यकता है कि आम लोगों को धर्म निरपेक्षता व सांप्रदायिकता, धार्मिक व अंधविश्वासी होने के बीच के व्यापक अंतर के बारे में समझाया जाये ताकि वे धर्म के मानवीय सरोकारों से जुड़ते हुये अंधविश्वास से दूर रहें। इसके बिना समाज का वास्तविक जन हितैषी विकास किया जाना असंभव है।

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