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ईंट भट्ठा मजदूर राष्ट्रीय समन्वय समिति के उद्देश्य व कार्ययोजना

ईंट भट्ठा मजदूर राष्ट्रीय समन्वय समिति के उद्देश्य व कार्ययोजना

शिव कुमार पठानकोट

राजस्थान प्रदेश ईंट भट्ठा मजदूर यूनियन की ओर से पहल करते हुए 24 अक्तूबर 2018 को उत्तरी भारत के कुछ राज्यों के ईंट भट्ठा मजदूर संगठनों को एक मंच पर लाकर मजदूरों को पेश आ रही समस्याओंं को दूर करने के उद्देश्य से देश व्यापी ईंट भट्ठा मजदूर राष्ट्रीय समन्वय समिति का गठन किया गया। प्रारंभिक दौर में राजस्थान, पंजाब, उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार तथा दिल्ली की अलग-अलग ट्रेड यूनियनों से संबंधित ईंट भट्ठा मजदूर यूनियनों और कुछ गैर-सरकारी मजदूर सहयोगी सामाजिक संगठनों के मुख्य नेता इस मीटिंग में शामिल हुए। भट्ठा मजदूरों का संयुक्त मांग पत्र तैयार करने के लिए, भट्ठा मजदूर समन्वय समिति के सांगठनिक ढांचे को अंतिम रूप देने के लिए तथा ईंट भट्ठा मजदूरों के राज्यीय और देशव्यापी आंदोलन कीे कार्ययोजना तैयार करने हेतु आगामी जनवरी के दूसरे सप्ताह में दिल्ली में मीटिंग रखी गई है, जिसमें पूरे भारत में काम करने वाले ईंट भट्ठा मजदूर संगठनों को निमंत्रित किया गया है।
वैसे तो हर क्षेत्र में मजदूरों की हालत बहुत ही दयनीय है। मजदूरी बहुत ही कम है, मजदूरों का रोजाना 10-12 घंटे काम करना आम बात है, कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है, लेकिन ईंट भट्ठा मजदूरों की हालत बहुत ज्यादा गंभीर है। ईंट भट्ठा मजदूरों को सर्दी-गर्मी में नंगे पांव और तन पर कम कपड़ों के साथ मजबूरीवश काम करना पड़ता है। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण ज्यादातर मजदूर एडवांस राशि लेकर कार्य पर आते हैंं। एक बार काम पर लगने के बाद साप्ताहिक या पंद्रह दिन का खर्च केवल रोटी के लिए, पीस रेट पर किए हुए काम के आधार पर दिया जाता है। बीमारी की हालत में काम कम होने पर खर्चे के हालात और भी खराब हो जाते हैं। एक बार टूट/कर्ज की मार से दबा हुआ मजदूर सदा के लिए मालिक का गुलाम बन जाता है। आम तौर पर यह मजदूर देश के बहुत गरीबी वाले इलाकों से अलग-अलग राज्यों में मजदूरी करने के लिए जाते हैं। बड़ी संख्या में ईंट भ_ा मजदूरों को आमदनी के साधनों की कमी के कारण, पूरे परिवार, बच्चों व औरतों समेत दिन-रात काम करना पड़ता है, वह भी काम के सीजऩ की समाप्ति तक।
ज्यादातर भट्ठा मजदूर देश के अत्यंत गरीबी वाले अंचलों से पलायन करते हैं। बहुसंख्यक मजदूर अनुसूचित जाति, जनजाति और अत्यंत पिछड़ी जातियों से हैं तथा पीढ़ी दर पीढ़ी भट्ठा पर काम करने के लिए अभिशप्त हैं। अगर किसी परिस्थितिवश खुशी या दुखद घटना के कारण काम बीच सीजऩ में छोडक़र जाना पड़े तो मालिक की ओर से निश्चित मजदूरी से आधी मजदूरी दी जाती है। विरोध करने पर मार पीट की जाती है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ज्यादातर भट्ठा मजदूर बंधुआ मजदूरों की श्रेणी में ही आते हैं। यात्रा के समय आर्थिक लूट व पुलिस प्रशासन बिना किसी कारण परेशान करता है। प्रति वर्ष कई राज्यों से ईंट भट्ठा मजदूर संगठनों तथा नागरिक संस्थाओं द्वारा बंधुआ मजदूरी उन्मूलन कानून के तहत सैंकड़ों बंधुआ मजदूर बने भट्ठा मजदूरों को छुड़ाया जाता है।
इस समय देश में अंदाजन 45000 ईंट भट्ठा पर 50 लाख मजदूर कार्यरत हैं। ज्यादातर मजदूर असंगठित क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। ईंट भट्ठा मजदूर संगठनों की स्थिति का आकलन किया जाए तो अलग-अलग ट्रेड यूनियन केंद्रों से जुड़े हुए संगठनों की पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, दिल्ली के आसपास, दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा तथा महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में गतिविधियां दिखाई देती हैं, लेकिन संगठनों का काम कुछ क्षेत्रों तक सीमित है। कुछ राज्यों में ईंट भट्ठा मजदूर संगठनों के कारण मजदूरी में बढ़ौतरी हुई तथा कार्य स्थलों पर सुविधा उपलब्ध कराने में सफल हुए हैं। कई राज्य जैसे छत्तीसगढ़ व ओडिशा के मजदूर कच्ची ईंट बनाने, उत्तर प्रदेश व बंगाल का मजदूर कच्ची ईंट की भराई और जलाई में तथा राजस्थान व बिहार का मजदूर पक्की ईंट की निकासी का काम करने के लिए बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों को प्रवास करता है। प्रवास के दौरान यह मजदूर संगठनों की ओर से की गई आंदोलनकारी गतिविधियों का प्रभाव लेते हैं। किसी नई जगह काम करते समय आई समस्या में मदद के लिए संगठन की जरूरत महसूस करते हैं। पहले जान पहचान वाले संगठनों से सम्पर्क कर सहयोग की गुहार लगाते हैं, लेकिन उस संगठन का क्षेत्र भी सीमित होने के कारण मदद नहीं कर पाता। इन दोनों परिस्थितियों में ईंट भट्ठा मजदूरों और ईंट भट्ठा मजदूर संगठनों व नागरिक संस्थाओं की राष्ट्रीय स्तर पर समन्वय समिति में शामिल होकर ईंट भट्ठा मजदूरों के समक्ष बड़ी संख्या में पेश आ रही मुश्किलों को दूर करने के लिए तथा उनकी मांगों के समाधान के लिए एक मंच आना आवश्यक है।
प्रदूषण की रोकथाम हेतु पंजाब में ईंट भट्ठा 1 अक्तूबर 2018 तक जलाई नही कर पाऐंगे। इन चार महीनों में ईंट भट्ठा मजदूरों को काम नहीं मिलने से उनके लिये घर परिवार चलाना मुश्किल होगा। लेकिन बड़े ईंट भट्ठा मालिक पहले जमा पड़ी ईंट के भाव अपनी मर्जी से बढ़ा कर बिक्री करेंगे। इसमें ईंट भट्ठा मालिकों को कोई कोयला व मजदूरी का खर्च नही पड़ेगा, मुफ्त में एक-एक भट्ठा के मालिक को लाखों/करोड़ों रूपये का लाभ होगा। ईंट भट्ठा उद्योग का माफिया भी यही चाहता है कि छोटा मालिक जल्द मार्कीट से बाहर हो जाये।
उस के बाद ईंट भट्ठा उद्योग का माफिया पहले सरप्लस लेबर का खूब आर्थिक, सामाजिक तथा शारीरिक शोषण करेगा और बाद में पक्की ईंट की खरीद करने वाले को मनमाने ढंग से लूटने लगेंगे। यह बात धीरे-धीरे एक राज्य से दूसरे राज्य में फैलने लगेगी और देश भर में मजदूरों के साथ-साथ उपभोक्ताओं की लूट होगी। नशा, भूमि व रेत-बजरी माफिया ने देश भर में लूट मचा रखी है। यही हाल ईंट भट्ठा माफिया करने वाला है। प्रदूषण विभाग की नई तकनीक संबंधित नीतियां भी स्पष्ट नहीं है। एक तरफ  कह रहे हैं कि नई तकनीक से प्रदूषण नहीं होगा, तो कहीं दूसरी ओर जब एन.जी.टी. (हृड्डह्लद्बशठ्ठड्डद्य त्रह्म्द्गद्गठ्ठ ञ्जह्म्द्बड्ढह्वठ्ठड्डद्य) ने प्रदूषण के कारण चार महीने के लिए ईंट भट्ठा में जलाई का काम रोक दिया तो प्रदूषण विभाग कोई ठीक उत्तर नहीं दे पाया। आने वाले समय में भट्ठा मजदूर को काम नहीं मिलने के कारण उनका आर्थिक नुकसान भी होगा और मुश्किलें भी बढ़ेगी यह सब स्पष्ट दिखाई दे रहा है। पर्यावरण प्रदूषण मुक्त रहे, हम भी सहमत हैं, लेकिन मजदूरों का रोजगार भी सुरक्षित रहे। ईंट भट्ठा मजदूर संगठनों की क्या भूमिका रहेगी इस सब पर, मिल बैठकर चर्चा करने की आवश्यकता है।
ईंट भट्ठा उद्योग में नई जिग-जैग/हाई ड्राफ्ट तकनीक में पर्यावरण प्रदूषण मुक्त रहे, यह एक अच्छा काम है। इस में ईंट भट्ठा व्यवसायी के लिए ईंट बनाने में कोयला व लकड़ी का 25 प्रतिशत कम खर्च होगा, ईंट की गुणवत्ता पहले से बेहतर व वेस्टेज कम होगी। ईंट भट्ठा मालिक का मुनाफा बढ़े, हर छोटी छोटी बात पर भी गौर किया गया है। परंतु इस जिग-जैग तकनीक में भट्ठा मजदूरों के हितों को एक दम नजऱ अंदाज किया गया है, इसमें भट्ठा मजदूरों की सुरक्षा पर कोई ख्याल नहीं रखा गया है। मजदूरों के लिए काम करना पहले से ज्यादा खतरनाक होगा और मेहनत भी ज्यादा करनी पड़ेगी। इस नई तकनीक को ईजाद करते समय भट्ठा मजदूरों के लिए स्वास्थ्य, स्कूल, बिजली, साफ  पीने का पानी, रहने की सुविधा आदि उपलब्ध कराने के लिए कोई प्रावधान नहीं किया गया।
जयपुर, राजस्थान में हुई मीटिंग में  24 अक्तूबर 2018 को ईंट भट्ठा मजदूरों की कुछ मांगों पर चर्चा हुई, मुख्य मांगें निम्न प्रकार
हैं :    
 एक समान काम के लिए एक समान मजदूरी राष्ट्रीय स्तर पर हो।
 ईंट भट्ठा उद्योग में फैक्टरी एक्ट लागू हो।
 न्यूनतम मजदूरी 18000/- रूपये प्रति माह हो व इस के अनुसार पीस रेट मजदूरी निश्चित किया जाए।
 श्रम कानूनों का सख्ती से पालन हो।
 पक्के मकान, साफ पानी, बिजली व बाथरूम-शौचालय की व्यवस्था की जाए।
 बाल मजदूरी खत्म करने के लिए ईंट भट्ठा के नजदीक आंगनबाड़ी सैंटर तथा कम से कम प्राईमरी स्कूल की व्यवस्था की जाए।
 मजदूरों को प्रोडक्शन कार्ड जारी किये जाएं।
 मजदूरी बैंक के माध्यम से दी जाए, बंधुआ मजदूरी व बाल श्रम मजदूरी कानून का सख्ती से पालन हो।
 अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक अधिनियम 1979 के तहत मजदूरों की सुरक्षा यकीनी हो।
इसके अतिरिक्त अन्य मांगों को भी जोड़ा जाएगा। लेकिन राष्ट्रीय स्तर के मांग पत्र पर अंतिम निर्णय जनवरी के दूसरे सप्ताह में की जा रही बैठक में होगा।
 श्रम विभाग के अधिकारी मजदूरों की मुश्किलों को देख कर भी नजऱ-अंदाज कर देते हैं। मजदूरों की सुरक्षा के लिए बने श्रम कानून कागज़ का टुकड़ा साबित हो रहे हैं। केंद्र सरकार पहले बने हुए श्रम कानूनों में संशोधन के नाम पर कानूनों को कार्पोरेट/पूंजीपतियों के पक्ष में करने जा रही है। इन सभी मजदूर विरोधी कदमों को रोकने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ईंट भट्ठा मजदूर संगठनों का राष्ट्रीय संगठन, राष्ट्रीय आंदोलन खड़ा करने तथा आंदोलन की कार्य योजना तैयार की जाए, यह अति आवश्यक है। अंतिम निर्णय लेने के लिए देश भर के सभी ईंट भट्ठा मजदूर संगठनों को जनवरी के दूसरे सप्ताह में दिल्ली में होने वाली बैठक में आने के लिए आमंत्रित किया गया है। आशा करते हैं कि सफलता मिलेगी।

(लेखक, ‘लाल झंडा पंजाब भट्ठा लेबर यूनियन’
के महासचिव हैं)

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