महीपाल
‘‘भारत महान’’ में आजकल शहरों, रेलवे स्टेशनों, विभागों आदि के नाम बदलने की मुहिम ज़ोरों-शोरोंं के साथ चल रही है। इस मुहिम की मुख्य सूत्रधार भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्रीय और प्रांतीय सरकारें हैं। परन्तु इस बात में थोड़े से भी शक की गुंजाईश नहीं रहनी चाहिए कि इस माँग के पीछे कार्यशील असली कारक भाजपा के पैतृक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की फूटपरस्त, राष्ट्र द्रोही योजना और सांप्रदायिक सोच है। संघ भाजपा के बग़ल बच्चे संगठनों, व्यक्तियों और मानवता विरोधी कार्यवाहियों को अंजाम देने के उद्देश्य के साथ पाले ग़ैर सामाजिक तत्वों की ओर से नाम बदलने की की जा रही माँग संघियों के कुटिल उद्देेश्य के बारे कोई शक-शुबहा नहीं रहने देती। यह ‘‘महानुभव’’ माँग कर रहे हैं कि अलीगढ़ का नाम भी हरीगढ़, आज़मगढ़ का आर्यमगढ़, आगरा का अग्रवन, अहमदाबाद का करणावती, हैदराबाद को भाग्यनगर, औरंगाबाद का संभाजीनगर कर दिया जाये। मुसलमान धर्म, संस्कृति व भाषा को दर्शाते नामों की जगह हिंदु धर्म को दिखाते नाम रखने की उक्त माँग यह दिखाने के लिए काफ़ी है कि इस शरारत के पीछे संघियों का सांप्रदायिक दंगाबाज मस्तिष्क काम कर रहा है। एक साल में पच्चीस शहरों के नाम बदले जा चुके हैं। ऐसे नाम बदलने के 48 और सुझाव सरकार के विचार अधीन पड़े हैं। इस माँग से पहले ही भाजपा के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश की योगी हकूमत ऐतिहासिक शहरों इलाहाबाद और फैजाबाद का नाम बदल कर क्रमवार प्रयागराज और अयोध्या रख चुकी है। केंद्र की मोदी सरकार अपने मौजूदा कार्यकाल की शुरुआत में ही योजना आयोग ( प्लैनिंग कमीशन) का नाम बदल कर नीति आयोग रख चुकी है। यह ‘‘आयोग’’ पहले भी कॉर्पोरेट घरानों के हितों की चौकीदारी का कार्य करता था और अब भी यही ‘‘फर्ज’’ पूरे करता है। इसी तरह मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदल कर दीन दयाल उपाध्याय नगर कर दिया गया है। बस ‘‘मोदी के संगी-साथियों’’ की इसी बात के साथ संतुष्टि होती है कि नाम में से हिंदु धर्म झलकना चाहिए।
अतीत में भाजपाईयों-संघियों द्वारा मुस्लिम धर्म के साथ सम्बन्धित स्मृति चिन्हों आदि के साथ किये गए अति के घृणित और पक्षपाती व्यवहार की संक्षिप्त समीक्षा बहुत ज़रूरी है। यह तो सब को पता ही है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हुए सभी हिंदु-मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों का ‘‘शिल्पकार’’ संघ परिवार ही रहा है। ऐसे दंगों में संघ की ओर से मासूमों-बेकसूरों की मार-काट के साथ-साथ मुसलमानों के धार्मिक स्थानों का जी भर कर अनादर ही नहीं किया गया, बल्कि ऐसे स्थानों के पुन:निर्माण में भी हर किस्म की बाधायें खड़ी की है। 1969 में हुए ऐसे ही सांप्रदायिक दंगों के बारे में कायम किये गए जस्टिस जगनमोहन रेड्डी कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दंगों के दौरान सौ से अधिक मस्जिदों, कब्रिस्तानों, दरगाहों आदि को नष्ट कर दिया गया। यह सब कुछ 1980 और 1982 में हुई सांप्रदायिक झड़पों समय फिर दोहराया गया। परन्तु इसकी अति हुई 2002 के गोधरा दंगों के समय।
इस योजनाबद्ध नरसंहार के दौरान सूफ़ी दरवेश मुहम्मद वली उर्फ ‘‘वली गुजराती’’ का मकबरा नेस्तोनाबूद कर दिया गया। वली गुजराती उर्दू के बड़े शायर भी थे। उन की लिखी प्रसिद्ध गज़ल ‘‘दार-अलगाव-ए-गुजरात’’ ने संसार की गुजराती तहज़ीब के साथ जान-पहचान कराई थी। मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार के संरक्षण में अहमदाबाद निगम ने रातों-रात उनके मकबरे (गिराऐ गए) वाली जगह में से सडक़ निकाल दी। यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुँचा जहाँ मोदी ने यह हल्फिया बयान दिया कि वली साहब के मकबरे का कोई सबूत नहीं। सर्वोच्च अदालत ने गुजरात सरकार की इस गलत बयानी के लिए खूब प्रताडऩा भी की। यह विवरण इस लिए दिया गया है ताकि संघ-भाजपा के मुसलमानों के प्रति घृणा भरपूर व्यवहार के बारे कोई भ्रम न रहे।
वैसे यह भी जि़क्रयोग्य है कि संकुचित राजनैतिक लाभों के लिए की जाती नाम बदली की इस राजनैतिक कवायद से अन्य राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियाँ भी अछूते नहीं। विशेषकर कांग्रेस, बसपा और सपा ने इस नज़रिए से बड़े भद्दे रिवाज़ डाले हैं। सपा-बसपा और भाजपा ने अति निचले स्तर के वाद-विवाद में जाते हुये यू. पी. के ‘हाथरस’ कस्बे का कोई आधी दर्जन बार नाम बदला है। 2014 में अकेले कर्नाटका के 14 शहरों के नाम बदले जा चुके हैं।
परंतु भाजपाईओं की नामों की बदली की आज की मुहिम सिफऱ् राजनैतिक हितों से प्रेरित न होकर इससे कहीं और ज्यादा ख़तरनाक है। जिसके भविष्य में अनेकों पक्षों से बहुत ही घातक नतीजे देश और देशवासियों को भुगतने पड़ेंगे। भाजपा इस नाम बदली मुहिम के साथ तत्काल और लंबे समय के निशाने लगाना चाहती है।
इसके तात्कालिक उद्देश्य को जानने के लिए भाजपा हकूमत की पिछले लगभग साढ़े चार सालों की कारगुज़ारी की समीक्षा करनी अति ज़रूरी है।
इस बात में अब संदेह नहीं रहा और न ही रत्ती भर भी गुंजाईश रही कि केंद्र की मोदी सरकार, देशवासियों की किसी भी किस्म की सकारात्मक आशाओं-उमंगों पर पूरी उतरने के पक्ष से मुकम्मल नाकाम साबित हुई है। इतना ही नहीं 2014 के लोक सभा चुनाव जीतने के लिए संघ-भाजपा अपवित्र कुनबे की तरफ से किये गए चुनावी वादों से भी यह सांप्रदायिक गिरोह पूरी तरह पल्ला झाड़ चुका है। कॉर्पोरेट घरानों और साम्राज्यवादी लुटेरों के बिकाऊ मीडिया की तरफ से ज़ोरों- शोरों के साथ प्रचारित तथाकथित ‘‘गुजरात माडल’’ और ‘‘चौतरफा विकास’’ की मारी गईं डींगों का खोखलापन भी अब बड़ी हद तक लोगों के सामने नंगा हो गया है। तथा झूठे प्रचार के सहारे प्रधानमंत्री के पद हथियाने वाला मोदी तो चुनावी वादों के बारे में अब कुछ भी बोलता ही नहीं है। इस के संगी-साथी कई भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री अब यह सरेआम कहने लग पड़े हैं कि चुनावी वादे तो चुनाव जीतने का माध्यम होते हैं ना कि अमल किये जाने के लिए। एक जोकरनुमा मंत्री तो यहाँ तक कह गया कि ‘‘हमें तो जीत कर सरकार बनने की कोई आशा-उम्मीद ही नहीं थी इस लिए हमने तो थोक के भाव वादे किए थे।’’ कुल मिला कर जनता जनार्दन की कचिहरी में भाजपायी और उन के ‘‘संघी आका’’ यह कबूल करते हैं कि वह चुनाव वादों को पूरा करने के बारे में बिल्कुल भी गंभीर नहीं थे और आवाम को बुद्धू बना रहे थे।
इस काल के दौरान लोगों ने लंगूरों से भी और ज्यादा योग्यता के साथ उल्टबाजी मारने के भाजपाईयों के ‘हुनर’ के भी खूब दर्शन किये। इस व्यवहार से व्यथित बहुत से लोगों ने मोदी का नाम ‘‘मिस्टर यू टर्न’’ रखा हुआ है। पेट्रोल, डीज़ल, रसोई गैस की नित्य बढ़ती कीमतों, जी. एस. टी. लागू करने, परचून व्यापार में विदेशी कारोबारियों के खुले दाखि़ले, भारतीय करेंसी (रुपए) के अवमूल्यन, विदेशों में काला धन जाने से न केवल रोकने बल्कि पिछला गया भी वापस लाकर लोगों का दरिद्र दूर करने, भ्रष्टाचार काबू करने और भ्रष्टाचारियों को जेलों में डालने आदि जुमलों के द्वारा बहुत बड़े स्तर पर लामबंदी की थी। देशवासी भूले नहीं उपरोक्त बिमारियों के खि़लाफ़ देश भर में भाजपा नेताओं ने कैसे नाटकीय प्रदर्शन किये थे।
परन्तु सत्ता संभालने के बाद मोदी सरकार ने उपरोक्त बिमारियों से पीछा छुड़ाने के लिए रत्ती भर भी प्रयत्न नहीं किये बल्कि उक्त सभी ‘‘असाध्य रोग’’ अपनी पक्षपाती कारगुज़ारी के साथ और भी अधिक बढ़ा दिया।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लोगों की लगातार चली आ रही दुश्वारियों जैसे गरीबी, भुखमरी, बेकारी, महँगाई और कालाबाजारी, इलाज बिना मौतें, शिक्षा प्राप्ति से वंचित रहना, बेघरों की संख्या बढ़ते जाने आदि में मोदी सरकार के कार्यकाल में ख़तरनाक हद तक बढ़ौत्तरी हुई है। उक्त दुश्वारियों में निरंतर बढ़ौत्तरी, घृणित अपराध और अराजकता भी सीमाएं लांघ चुके हैं। इस सब कुछ का स्पष्ट कारण यह है कि साम्राज्यवाद भेडिय़ों व कारोपरेट घरानों की असीमित चौतरफा लूट की गारंटी करती निजीकरण-उदारीकरण-विश्वीकरण आधारित नवउदारवादी नीतियों पर पिछली यू. पी. ए. सरकार की अपेक्षा भी तेज़ी के साथ अमल किया जाना। समूचा जनवादी आंदोलन इसी कारण उक्त नीतियों को ‘‘मोदी-मनमोहन मार्का नीतियाँ’’ के तौर पर चिन्हित करता है। कुल मिला कर अगर थोड़े शब्दों में मोदी सरकार की कारगुज़ारी का विश्लेषण करना हो तो स्पष्ट कहा जा सकता है कि ‘‘मोदी सरकार हर फ्रंट पर पूरी तरह असफल साबित हुई है।’’
मोदी हकूमत की उपरोक्त चौतरफा असफलता से लोग बुरी तरह दुखी हैं और भिन्न-भिन्न ढंगों के द्वारा सरकार के खि़लाफ़ अपने गुस्सा प्रकट कर रहे हैं। नज़दीक भविष्य में कई प्रांतों में होने जा रही प्रांतीय विधान सभा चुनावों के लिए चल रही चुनाव मुहिम के दौरान कई स्थानों पर लोग भाजपा नेताओं के बुरी तरह गले पडऩे तक चले गए हैं। इस जनरोष के कारण भाजपा नेताओं की बौखलाहट भी अब दिखाई देने लग पड़ी है।
जन मानस में उत्पन्न इस व्यापक रोष को नकारात्मक मोड़ देने के लिए और अनावश्यक भावनात्मक मुद्दों के द्वारा लोगों को भ्रमित कर एक बार पुन: चुनावी भवसागर पार करने के घृणित उद्देश्य के साथ भाजपा और उस के नापाक नेता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर.एस.एस.) और सहयोगी संगठनों की तरफ से ‘‘अजमाया हुआ’’ सांप्रदायिक कतारबन्दी का राष्ट्र विरोधी नुस्ख़ा फिर से ज़ोरों-शोरों के साथ अजमाया जा रहा है। इस नुस्ख़े में देश और देशवासियों के लिए घातक अनेकों ‘‘विष’’ शामिल हैं। जिन का जि़क्र इसी अंक में छपे दूसरे लेखों में विस्तार के साथ किया गया है। इन अनेकों प्राण घातक ज़हरोंं में से एक घातक ज़हर है संस्थानों, शहरों, स्थानों आदि के नाम बदलने की संघ भाजपा की व्यर्थ मुहिम। कई राजनैतिक विश्लेषक और बुद्धिजीवी इस नाम बदली की प्रक्रिया पर होने वाले भारी भरकम खर्चे और जटिल ढंग तरीकों का हवाला दे कर भाजपा की तीखी आलोचना कर रहे हैं। इन सभी की सहृदयता और ज्ञान का आदर करते हुए हम बहुत नम्रता के साथ कहना चाहते हैं कि इस प्रक्रिया के सामाजिक नुकसान कहीं बड़े और ख़तरनाक हैं।
इस व्यर्थ मुहिम के साथ जुड़ा संघी गुंडा-गिरोहों का अंतिम निशाना और ज्यादा ध्यान मांगता है। संघ भारत के अब तक सीमित हद तक कायम हुए धर्म निरपेक्ष और जनवादी चरित्र को नष्ट करना चाहता है। इसकी जगह संघ भारत को एक कट्टर हिंदु राष्ट्र में तबदील करने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहा है। भारतीय लोगों का धर्म-भाषाओं-इलाकायी भिन्नताओं के बावजूद भी मिलजुल कर रहना संघ के लिए सब से बड़ी समस्या है। वह इस प्यारी तहज़ीब, जिस को देश भक्त आवाम ‘‘गंगा-यमुनी तहज़ीब’’ कहते हैं, को तबाहो-बरबाद करना चाहता है। नाम बदली की घृणित मुहिम संघ की इसी साजिशी योजना का एक दांवपेच है। वैसे तो संघ और दलील का आपसी सम्बन्ध है ही नहीं। परन्तु फिर भी गोइबली गप्पबाजी के माहिर संघी अपनी नाम बदली मुहिम के हक में कोई भी दलीलें दे सकते हैं। वामपंथी, देश भक्त, संग्रामी, प्रगतिशील पक्षों को इस नाम बदली मुहिम का हर मोर्चे पर तर्क से मुकाबला करते हुये आवाम को इस मुहिम के विरुद्ध खड़ा करने की आवश्यकता है। जहाँ तक बदले नामों का लोगों को कोई लाभ पहुंचेगा उस बारे में तो नीचे लिखी पंजाब के मालवा क्षेत्र से संबंधित कहावत इसे दर्शाती है।
‘‘घास खोदती लक्ष्मी,
भेडें़ चराता लखपत ।’’