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चुनाव प्रचार में भाषा का निम्न स्तर तथा असभ्य शब्दावली

चुनाव प्रचार में भाषा का निम्न स्तर तथा असभ्य शब्दावली

शिव कुमार अमरोही
लोकसभा के 2019 के चुनाव हमारे देश में आजादी के बाद हुए सभी चुनावों से विलक्षण हैं। ये चुनाव यहां भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व तथा विस्मयकारी जीत के लिए स्मरणीय रहेंगे, वहीं ये चुनाव जनता की मुद्दों पर अंधराष्ट्रवाद के हावी होने, एक दूसरे पर घटिया तथा नीच दर्जे के आरोप प्रत्यारोप, गाली गलौच तथा मानवता का सिर शर्म से झुकाने वाली शब्दावली के लिए भी याद किए जाएंगे। अनेक नेताओं ने अपने चुनावी भाषणों में शालीनता तथा नैतिकता की सभी सीमाओं को तोड़ दिया। घटिया भाषा तथा गाली गलौच के साथ साथ असभ्य भाषा का सबसे प्रचंड तांडव सोशल मीडिया में दिखाई दिया। किसी भी फोटो, वीडियो, भाषण या रैली जो सोशल मीडिया पर अपलोड की गईं तथा उस पर जो टिप्पणियां की गईं उनमें से कई इतनी गंदी तथा घटिया थी कि उन्हें पढक़र या बोलकर किसी को बताया ही नहीं जा सकता था। ऐसे लगता है कि ऐसी बेहुदा तथा गंदी व मानवता को कलंकित करने वाली टिप्पणियां करने वाले मनुष्य नहीं बल्कि मानसिक रोगी हैं। विचारों के प्रति ऐसी असहनशीलता शायद ही 2014 से पहले कभी दृष्टिगोचर हुई है। सबसे दु:खदाई बात यह है कि सोशल मीडिया जैसे वट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर आदि इस पर रोक लगाने में पूरी तरह विफल रहे हैं।
अगर नेताओं की बात करें तो चुनाव लड़ रहे अधिकतर नेता तथा उनकी राजनीतिक पार्टियों के नेता मत बटोरने के लिए अलग-अलग धर्मों, जातियों तथा फिरकों के विरुद्ध कभी सीधे तथा कभी टेढ़े-मेढ़े ढंग से घृणा भरे, फूट डालने वाले तथा कहीं-कहीं धमकी भरे शब्दों तथा भाषा का प्रयोग करते रहे। यह रुझान लोकतंत्र तथा देश की एकता-अखंडता के लिए बहुत ही घातक है। अगर थोड़ा और आगे जाकर देखें तो इन चुनावों में नेताओं द्वारा एक दूसरे पर किए गए शाब्दिक हमले तथा कई टिप्पणियां न केवल आपत्तिजनक हैं बल्कि सभी को शर्मसार करने वाली भी हैं।
उत्तर प्रदेश की रामपुर लोकसभा सीट से चुनाव लडक़र जीतने वाले समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आजम खान की ओर से भारतीय जनता पार्टी की प्रत्याशी जया प्रदा पर की गई टिप्पणी यहां बहुत ही घटिया तथा सभी का सर शर्म से झुकाने वाली है वहीं यह टिप्पणी आजम खान जैसे नेताओं की महिलाओं के प्रति निंदनीय मानसिकता की भी प्रतीक है। जिस देश के नेताओं की मानसिकता औरतों के प्रति इतनी नीच तथा निम्न स्तर की हो उस देश की महिलाएँ कैसे सुरक्षित रह सकती हैं। उस देश में महिलाओं का मान-सम्मान कायम रखने का उत्तरदायित्व कौन उठाएगा? इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में बी.जे.पी. का राज्याध्यक्ष नीचता की सभी सीमाएँ पार कर जाता है; क्योंकि कांग्रेस-अध्यक्ष राहुल गांधी बार-बार ‘चौकीदार चोर है, की रट लगाए हुए है, तो इसके उत्तर में बी.जे.पी. का राज्याध्यक्ष राहुल गांधी को मां की गाली (जो किसी भी हालत में लिखने योग्य नहीं है) निकालने तक चला जाता है। इसी प्रकार मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार के जनजाति कल्याण मंत्री लखन घनघोरिया ने प्रधानमंत्री मोदी पर घटिया टिप्पणी करते हुए उनकी तुलना ‘सज-धज कर लिपस्टिक लगा कर ताली बजाने वाली औरत’ के साथ तथा फैशन शो व कैटवाक करने वाली औरत के साथ कर दी। यू.पी. की विधायिका (क्षेत्र मुगल सराए) साधना सिंह ने भी मायावती पर घोर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि मायावती न नर है न नारी है। बी.जे.पी. की ओर से चुनाव लड़ रहे रमेश बिधूड़ी ने केजरीवाल पर बार-बार आपत्तिजनक टिप्पणियां की हैं। ये तो मात्र कुछ उदाहरण हैं, यह 2019 का चुनाव ऐसी असंख्य उदाहरणों से भरा हुआ है।
इसके अतिरिक्त जो लोग सरकार पर प्रश्न दागते रहे हैं उन्हें देशद्रोही कहना व पाकिस्तान भेजने की धमकियां देना आदि तथा असहनशीलता की सभी सीमाएं पार कर जाना 2019 के इन चुनावों में तथा इन चुनावों से पहले भी मोदी जी के शासन काल में व्यापक स्तर पर होता रहा है।
इन चुनावों में चुनाव-संहिता के उल्लंघन के दोष बी.जे.पी. के साथ-साथ कांग्रेस सहित कुछ अन्य दलों पर भी लगे। कुछ केसों में उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद चुनाव आयोग को कार्यवाही करने पर बाध्य भी होना पड़ा, लेकिन अधिकतर केसों में उचित कार्यवाही न किए जाने, विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा की गई ‘माडल कोड आफ कंडक्ट’ की उल्लंघनाओं का नोटिस तक का लेने, के कारण चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी प्रश्न उठते रहे।
इस चुनाव में, धन, बाहुबल, नशा, लालच, धर्म, जाति-पाति आदि का जितना दुरुपयोग किया गया है, इतना शायद इससे पहले कभी नहीं हुआ। अंधराष्ट्रवाद का प्रचार बहुत व्यापक स्तर पर हुआ है और चुनावों में शायद ऐसा पहली बार हुआ है।
शासन कर रही पार्टी बी.जे.पी., विरोधी दल तथा इन पार्टियों के अधिकतर नेता उचित व अनुचित (आप कह सकते हैं कि अधिकतर अनुचित) हथकंडे प्रयोग करके चुनाव जीतना चाहते थे। जनता के मुद्दे इनके लिए कोई अर्थ नहीं रखते। लोक मुद्दे केवल जनता को धोखा देने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। मुद्दों का हल निकालना इनका ऐजंडा नहीं है।
इन चुनावों में एक-दूसरे पर निम्न स्तर का तथा नीचतापूर्ण उछाला गया कीचड़ तथा अंधराष्ट्रवाद, लोकतंत्र तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए बहुत भारी खतरा है। हमारा देश आजादी के समय से अर्थात पिछले 72 वर्षों से एक धर्म-निर्पेक्ष लोकतांत्रिक प्रणाली अपनाए हुए है। इससे अंतराल में धर्म-निरपेक्षता, लोकतांत्रिक प्रणाली तथा मानवीय मूल्यों में दृढ़ता आनी चाहिए थी, लेकिन इसके विपरीत उपरोक्त तथ्यों में खोखलापन आता गया है। वास्तव में जिन नेताओं का उत्तरदायित्व उपरोक्त मूल्यों में दृढ़ता लाने का था, वास्तव में वही लोग इनकी जड़ें काट रहे हैं; अर्थात बाड़ ही खेत को खा रही है। चिंता इस बात की भी है कि यदि जनता ने अभी भी इस ओर ध्यान न दिया तो कहीं हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली ही मुँह के बल न गिर जाए।
इसलिए लोकतांत्रिक तथा मानवीय मूल्यों की रक्षा का बीड़ा उठाने वालों, धर्म-निरपेक्षता तथा औरत के मान-सम्मान का रक्षा के लिए खड़े होने वालों को, राजनीतिक नेताओं द्वारा प्रयोग की जा रही औरत विरोधी लचर भाषा तथा घटिया शब्दावली का न केवल जोरदार विरोध करना होगा बल्कि जनता में इसके विरुद्ध जोरदार आवाज बुलंद करने के साथ-साथ इसे एक आंदोलन का रूप देना होगा। यही एक रास्ता है जिससे हम अपने देश के संविधान तथा लोकतंत्र की रक्षा कर सकते हैं। नहीं तो साँप निकल जाने पर लकीर पीटने से कोई लाभ नहीं होगा।

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