केंद्रीय वित्त मंत्री श्रीमति निर्मला सीतारमण के वर्ष 2019-20 के लिए पेश किये गये प्रथम बजट ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि मोदी सरकार की कार्पोरेट समर्थक आर्थिक नीतियां पहले की तरह ही बदस्तूर जारी रहेंगी। यद्यपि इन जन विरोधी नवउदारवादी नीतियों के कारण पिछले 5 वर्षों के दौरान देश में मंहगाई का दंश भी पिछले 45 वर्षों के समस्त रिकार्ड तोड़ चुका है। यह दोनों चिंताजनक निष्कर्ष सरकारी रिपोर्टों पर आधारित हैं। वास्तविकता तो इससे भी कहीं घातक है। क्योंकि बेरोजगारी का प्रत्यक्ष संताप झेल रहे 6-7 प्रतिशत नौजवानों के अतिरिक्त यहां 40 प्रतिशत के करीब ऐसे कमेरे भी हैं जो कि अद्र्ध-बेरोजगारी का शिकार हैं, जो दिहाड़ीदार के रूप में कार्य करके अपना वक्त काटते हैं या निजी संस्थानों में अत्यंत नगण्य से वेतनों पर 12-12 काम करने के लिये मजबूर हैं। ऐसी त्रासदीपूर्ण अवस्थाओं के प्रभाव में ही, चुनावों से पहले, यह अनुमान उभर कर सामने आये थे कि चुनावों में मोदी सरकार को बड़ा झटका लगेगा। परंतु प्रधानमंत्री तथा उसके आरएसएस प्रशिक्षित सहयोगियों द्वारा चुनावों के दौरान अंध-राष्ट्रवाद का ऐसा डरावना भूत सृजित किया गया जिसने बड़ी संख्या में लोगों का ध्यान उनकी आर्थिक मंदहाली से भटका कर देश की सुरक्षा जैसे भावनात्मक मुद्दे पर केंद्रित कर दिया। तथा, भाजपा आम लोगों की आँखों में धूल झोंक कर पुन: सरकार बनाने में सफल हो गई।
शायद ऐसे ‘सफलÓ प्रयोग के आधार पर ही अब मोदी-2 सरकार लोगों की आर्थिक मांगों-उमंगों के प्रति पूर्ण रूप से लापरवाह हो गई है। स्पष्ट दीखता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य से संबंधित समस्यायें तथा मेहनतकश जनसमूहों की सामाजिक-आर्थिक मुश्किलें जैसे कि निरंतर बढ़ती जा रही मंहगाई, विस्फोटक रूप धारण कर चुकी बेरोजगारी, कुपोषण, शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं में गिरावट, भ्रष्टाचार तथा निरंतर गंभीर हो जा रहे कृषि संकट जैसे मुद्दे इस सरकार के एजंडे से बड़ी हद तक गायब हैं। तथा, यह सरकार केवल भारत को धर्म आधारित प्रतिक्रियावादी राज्य में परिवर्तित करने के आरएसएस के सांप्रदायिक फाशीवादी एजंडे को परिपूर्ण करने के प्रति चिंतित है। यही कारण है कि वित्त मंत्री के बजट भाषण से एक दिन पहले लोकसभा में पेश किये गये ‘राष्ट्रीय आर्थिक सर्वेक्षणÓ में भयंकर रूप धारण किये बैठी बेरोजगारी तथा अन्य गंभीर आर्थिक समस्याओं का उल्लेख है, परंतु वित्त मंत्री का बजट भाषण देश की आर्थिक समस्याओं के निपटारे के लिये भविष्य की कार्ययोजना की दर्शाते किसी गंभीर दस्तावेज के स्थान पर सांप्रदायिक राजनीतिक तिकड़मबाजियों का एक मसौदा भर ही सिद्ध हुआ है। जिसमें देश की अर्थव्यवस्था के समक्ष किसी भी समस्या के समाधान के लिये कोई भी ठोस नई पहलकदमी दिखाई नहीं देती। पुराने ढर्रे के अनुसार ही खोखली जुमलेबाजी का सहारा लेकर लोगों की आखों में धूल झोंकने का प्रयत्न जारी रक्खा गया है। तथा, या फिर यहां सांप्रदायिक धु्रवीकरण को और तीव्र करने वाली सुरें अलापी गई हैं। वित्त मंत्री द्वारा डिजीटल तकनीक के इस नये युग में पुरातन व साहूकारों की बर्बरता के प्रतीक ‘वही-खातेÓ का पाखंड रचना एक ऐसा ही प्रयत्न कहा जा सकता है; जिसे भाजपा के बिकाऊ मीडिया द्वारा एक बड़े क्रांतिकारी कदम के रूप में पेश किया गया है।
इस बजट भाषण में वित्त मंत्री ने दावा किया है कि चल रहे वर्ष में सरकार का वित्तीय घाटा कुल घरेलु उत्पाद (त्रष्ठक्क)के 3.3 प्रतिशत के बराबर ही रहेगा, जो कि पिछले वर्ष में 3.4 प्रतिशत था। इसका अर्थ है कि सरकार मंहगाई पर रोक लगाने के प्रति गंभीर है। परंतु यदि सरकार ने निजीकरण की जनघातक नीति को ही तीव्र करते रहना है तथा शिक्षा, स्वास्थ्य, आम लोगों के लिये पेय जल की आपूर्ति तथा सामाजिक सुरक्षा अर्थात बुढापा/विधवा पैन्शनों आदि से संबंधित सरोकारों को अच्छा बनाने के लिये पर्याप्त फंड जुटाने ही नहीं हैं तो इस वित्तीय घाटे के घटने का आम लोगों को क्या लाभ है? उन्हें तो नित्य प्रति उपयोग की वस्तुओं की निरंतर बढ़ रही कीमतों की मार झेलनी ही पड़ेगी तथा, शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के कारण इनके तीव्र हो रहे व्यापारीकरण का शिकार बनना ही पड़ेगा। अधिकतर को तो अपने बच्चों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा व उच्च शिक्षा से वंचित रखने के लिये तथा देश में पैर पसार रही नित्य नई महामारियों का मुकाबला करने में असफल रहने के कारण असमय मृत्यु के लिय मजबूर होना ही पड़ेगा। इस बजट में मंहगाई को एक हद तक रोक लगाने में सक्षम, जन वितरण प्रणाली को मजबूत बनाने जैसे कारगर कदम का तो कहीं जिक्र ही नहीं है। पेट्रोल व डीजल की कीमतों में अवश्य क्रमश: 2.50 रुपए तथा 2.36 रूपये प्रति लीटर की और बढ़ौत्तरी कर दी गई है। यह जानते हुए भी कि इससे मंहगाई में बहुपक्षीय बढ़ौत्तरी को बल मिलेगा।
इस संदर्भ में एक अन्य पक्ष भी विचारणीय है। वित्तीय घाटा घटाने के लिये मोदी सरकार धन कुबेरों व मुनाफाखोरों पर टैक्स लगाकर या बढ़ाकर संसाधन पैदा करने के पक्ष से तो बजट प्रावधानों में, सिर्फ रस्म निभाई ही करती दिखाई देती है। इस पक्ष में तो एक ही नया प्रावधान है, 200 करोड़ रुपए से अधिक की वार्षिक आमदनी पर सरचार्ज में 3 प्रतिशत तथा 500 करोड़ से ऊपर 7 प्रतिशत की बढ़ौत्तरी। इससे 12000 करोड़ रुपये से अधिक की आमदनी होने का अनुमान है। जबकि दूसरी ओर लोगों की खून-पसीने की कमाई से निर्मित सार्वजनिक क्षेत्र को देशी-विदेशी लुटेरों को कौडिय़ों के भाव बेचकर सरकारी आमदनी बढ़ाने की देश द्रोही नीति को, इस वर्ष के दौरान 1,05,000 करोड़ रुपये के हिस्से बेचकर, ‘नया उत्साहÓ प्रदान करने की घोषणा की गई है। एयर इंडिया, जैसे उच्च प्राथमिकता वाले सार्वजनिक संस्थान के तो 100 प्रतिशत हिस्से ही बेचने के लक्ष्य की घोषणा की गई है। तथा इस देशद्रोही कुकर्म को परिपूर्ण करने के लिये बनाई गई मंत्रीमंडलीय उप समिति का मुखिया गृह मंत्री श्री अमित शाह को बना दिया गया है।
1991 से अब तक, जबसे आर्थिक सुधारों के नारे के अंतर्गत साम्राज्यवाद निर्देशित नवउदारवादी नीतियां भारत में नीतिगत रूप में लागू की गई हैं, यह भलीभांति स्पष्ट हो चुका है कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवायें, यातायात, सामाजिक सुरक्षा, जल आपूर्ति तथा बिजली आपूर्ति जैसी जन सेवाओं व सुविधाओं का निजीकरण ही लोगों की बढ़ रही मंदहाली के लिये बड़ी हद तक जिम्मेवार है। सार्वजनिक क्षेत्र से संबंधित यह महत्त्वपूर्ण सेवायें व सुविधायें निजी क्षेत्र के मुनाफाखोरों के हवाले कर देने से यह नई जोकें लोगों का खून बहुत ही बेदर्दी से चूस रही हैं। इसके बावजूद मोदी सरकार द्वारा भारतीय रेल जैसे अत्याधिक महत्त्वपूर्ण व अग्रगामी संस्थान में निजी पूंजी की घुसपैठ बढ़ाने के लिये और अधिक व्यवस्थायें करने के संकेत इस बजट में दिये गये हैं। यहां तक कि रेल कोच फैक्ट्रियों का छुपे रूप में निजीकरण करने, देश में प्राईवेट रेलें चलाने तथा उन्हें अपनी मनमर्जी के अनुसार किराये-भाड़े वसूलने तक के खुले लाईसेंस देने के, छिपे भी व स्पष्ट भी दोनों तरह के संकेत किये गये हैं। ‘आर्थिक सुधारोंÓ की यह जन घातक नीति देश के मेहनतकश लोगों के रोजगार के संसाधन ही नहीं लील रही बल्कि उन्हें कंगाल भी बना रही है।
जहां तक देश की वर्तमान में सबसे बड़ी समस्या अर्थात विकराल रूप धारण करती जा रही बेरोजगारी पर रोक लगाने का प्रश्न है, इस उद्देश्य के लिये मोदी सरकार पूर्ण रूप में निजी निवेशकों पर निर्भर कर रही है। पिछले 5 वर्ष प्रधानमंत्री जी इसके लिये विदेशी अर्थात-साम्राज्यवादी निवेशकों की मिन्नत-चिरौरी करते रहे हैं। उनके समक्ष ”मेक इन इंडियाÓÓ, ”इज टू डू बिजनसÓÓ जैसे कई आर्कर्षण पेश किये गये। परंतु सत्य तो यह है कि अधिक से अधिक मुनाफा कमाने से प्रेरित साम्राज्यवादी पूंजी नई से नई तकनीक का उपयोग करती है, जोकि रोजगार पैदा नहीं करती बल्कि घरेलु रोजगार को खाती है। यही कारण है कि बेरोजगारी नित्य नई उँचाईयां छू रही है।
शायद इसीलिये बजट भाषण में ‘मेक इन इंडियाÓ जैसे बहुचर्चित नारे पर कोई चर्चा नहीं हुई है। बेरोजगारी के मुद्दे पर तो यह सरकार यहां तक लापरवाह हो चुकी है कि इस बजट भाषण में ‘मनरेगाÓ शब्द का एक बार भी उल्लेख नहीं किया गया। वैसे तो सरकार के एक मंत्री ने तो बाद में स्पष्ट ही कर दिया है कि ”मनरेगा (जो कि संसद की स्वीकृति के उपरांत बाकायदा कानून बन चुका है) हमेशा कायम नहीं रखा जा सकता।ÓÓ इस सरकार की यह जन विरोधी पहुंच अत्यंत चिंता का विषय है क्योंकि मनरेगा के अंतर्गत ग्रामीण गरीबों को विशेष रूप में स्त्रियों को रोजगार मिलने की आशायें जरूर पैदा हुई हैं। इस मुद्दे पर सरकार अब केवल स्व: रोजगार या छोटे व मध्यम कारोबारों को बढ़ाने की ही बात करती दिखाई देती है। परंतु ऐसे रोजगार व कारोबार तब ही फलने-फूलने योग्य हो सकते हैं, यदि उनके लिये कुछ क्षेत्र आरक्षित किये जायें नहीं तो वे इजारेदारों व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुकाबले में अपना अस्तित्व कदाचित कायम नहीं रख सकते। परंतु ऐसे आरक्षण की आज्ञा नवउदारवादी नीतियों का उल्लंघन है। विशेष रूप में कारपोरेट क्षेत्र इसकी आज्ञा नहीं देता। जबकि इस सरकार के भी आर्थिक निर्णयों की लगाम उसी के हाथ में है। इन स्थितियों में देश के मेहनतकश जनसमूहों को उनकी योग्यता के अनुसार गुजारेयोग्य व भरोसेयोग्य रोजगार मिलने की संभावना बहुत ही सीमित व क्षीण है। इसलिये बेरोजगारी व अद्र्ध-बेरोजगारी के संताप ने निरंतर बढ़ते ही जाना है।
इस बजट में संकटग्रस्त किसानी के प्रति सरकार की हमदर्दी का भी बड़ा गुणगान किया गया है तथा हर किसान को हर महीने 500 रुपये की दर से वार्षिक 6000 रुपये की राहत उपलब्ध करवाने के लिए धन आरक्षित करने की व्यवस्था दर्शाई गई है। परंतु इस नग्णय राहत से कर्ज के बोझ तले दबी हुई किसानी की मौजूदा त्रासदी जो कि उसे आत्महत्याओं की ओर धकेल रही है, कम नहीं हुई है। जुमला यह भी उछाला जा रहा है कि किसान अब केवल ‘अन्नदाताÓ ही नहीं रहेगा, बल्कि सौर उर्जा पैदा करके उर्जादाता भी कहलायेगा। यह समस्त पाखंड वास्तविक मुद्दे से किसानों का ध्यान भटकाने के लिये ही हैं। तथा, वास्तविक मुद्दा है, किसानों के लिये समस्त कृषि उत्पादों के तयशुदा लायह श्रम संहितायें भदायक मूल्यों की गारंटी करना तथा कृषि में उपयोग होने वाली वस्तुओं की कीमतें घटानी या उनकी कीमतें उत्पादन खर्चों के अनुसार तय करनी। अपितु नवउदारवादी नीतियों के अंतर्गत यह दोनों ही क्षेत्र अब सरकार के कंट्रोल से बाहर जा रहे है। कृषि लागतें जैसे कि खादें, कीटनाशक, खरपतवार नाशक, यहां तक कि अधिकतर बीज भी अब बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मुनाफाखोरी की भेंट चढ़ गये हैं। कृषि के निरंतर विकास के लिये आवश्यक कृषि अनुसंधान की योजनायें अब इन कंपनियों के कंट्रोल में, जीता या मरता है। जहां तक कृषि उत्पादों के मंडीकरण का संबंध है वह भी बड़ी हद तक बहुराष्ट्रीय संस्थानों के हाथों में जा चुका है तथा वे किसानों को सरेआम लूट रहे हैं। इन जालिमों को रोक सकने की इच्छा शक्ति तो इस सरकार के पास बिल्कुल भी नहीं है। इस तरह इस सरकार के किसानों के हालात बेहतर बनाने तथा 2022 तक किसानों की आय दुगुनी करने के समस्त दावे पूरी तरह खोखले हैं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ भी किसानी के नहीं मिला बल्कि यह बीमा कंपनियों की खुली लूट का साधन बना है।
इस तरह कुल मिलाकर यह बजट पूरी तरह जनविरोधी तो है ही, इसे देश की अर्थव्यवस्था को साम्राज्यवादी लुटेरों के रहमों-कर्म पर छोडऩे की ओर बढऩे के एक और कदम के रूप में ही लिया जाना चाहिये।
– हरकंवल सिंह
(25-7-2019)