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गैर कानूनी खनन तथा उसके दुष्प्रभाव

गैर कानूनी खनन तथा उसके दुष्प्रभाव

शिव कुमार अमरोही
विज्ञान की उन्नति ने मानव जाति को अनेक सुख-सुविधाएँ उपल्ब्ध करवाई हैं तथा यह दिन-प्रतिदिन नए-नए अविष्कारों से नई नई उपलब्धियाँ प्राप्त कर रहा है। लेकिन पूँजीपतियों तथा कार्पोरेट जगत के लालच ने जहां गरीब जनता का बुरी तरह शोषण किया है, वहीं उसने प्रकृति, पर्यावरण तथा इस धरती को अपने मुनाफे व लालच के लिए इस प्रकार प्रयुक्त किया किया है कि आने वाले समय में उसके ये कुकृत्य हमारे इस ग्रह जिस पर हम रह रहे हैं के लिए गम्भीर खतरा बन गए हैं। इस प्रकार प्रकृति के उपरोक्त लुटेरे कुछ कानूनी रूप से तथा कुछ गैरकानूनी रूप से(जो अधिकतर माफिया के रूप में जाने जाते हैं) अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में प्रकृति के साथ खिलवाड़ करके अपनी कभी न मिटाने वाली लालच की पिपासा को पूरी करने में लगे हुए हैं।
आज हम अपने देश में हो रहे रेत, बजरी तथा पत्थर की व्यापक स्तर पर हो रही क्रशिंग तथा खनन की समस्या पर ही चर्चा करेंगे। देश में बढ़ती आबादी तथा अन्य अनेक कारणों से तथा सडक़ों तथा भवनों आदि की बढ़ती माँग के कारण देश भर में रेत तथा बजरी व कंक्रीट आदि की माँग में तेजी से वृद्धि हुई है। आज इन की महत्ता खनिज तेल की भाँति अत्यधिक बढ़ गई है। परिणामस्वरूप खनन तथा कै्रशर माफिया इस उद्योग पर छा गया है और बेतरतीव तथा और लाभ कमाने के चक्कर में प्रकृति का जो विनाश पिछले समय में खनन के नाम पर हुआ है उसके भयानक परिणाम अनेक क्षेत्रों में दृष्टिगोचर हो रहे हैं। पिछले वर्ष केरल में आई बाढ़ जहाँ एक ओर भारी वर्षा का नतीजा था उसके साथ ही पश्चिमी घाट तथा अन्य स्थानीय पहाड़ों में अन्धाधुँध खनन इसका मुख्य कारण कहा जा रहा है।
यह खनन देश के दक्षिण में पश्चिमी घाट की पर्वत माला से लेकर देश के उत्तर में शिवालिक की पहाडिय़ों से भी आगे लघु हिमालय तक तथा देश में मौजूद लगभग सभी नदियों, बरसाती खड्डों में बेलगाम हो रहा है। इन सभी स्थानों पर या तो खनन माफिया सक्रिय है या फिर इस ओर ललचाई नजरों से देख रहा है। अधिकतर स्थानों पर इस कार्य के लिये मंजूरी केवल दिखावा मात्र है और उसकी आड़ में गैर कानूनी खनन व्यापक स्तर हो रहा है। सबसे पहले पर्यावरण पर पडऩे वाले इसके कुप्रभाव का आकलन करते हैं।
खनन माफिया कानून को ताक पर रख कर नदियों, खड्डों व बरसाती नालों के किनारे जो गहरी खुदाई कर रेत, मिट्टी तथा पत्थर निकाल रहा है उससे बरसात में उन नदियों के किनारों की भूमि के बाढ़ में बहने तथा आस-पास रहने वाले लोगों के लिये बाढ़ का खतरा पैदा हो गया हैं।
खनन माफिया के इस कुकृत्य से नदी नालों का बाढ़ के समय बहाव बदल जाने से जान माल की असीम हानि हो सकती है।
रेत खनन के लिए जारी हिदायतों में क्रम नं. 9 के अनुसार यह खनन एक मीटर तक परन्तु कहीं भी किसी भी स्थिति में यह तीन मीटर से अधिक गहरा नहीं हो सकता लेकिन कहीं भी इस नियम का पालन नहीं हो रहा। अनेक स्थानों पर यह खनन 100 फुट से भी गहरा है। इससे भू-जल का स्तर तेजी से नीचे जा रहा है।
कई संवेदनशील क्षेत्रों में यह गहरा खनन अत्यधिक विनाशकारी होगा। उदाहरणार्थ जहाँ नदियों या नालों पर बाँध बने है; नहरें हैं या पुल बने हुए हैं। उपरोक्त हिदायतों में क्रम नं.17 तथा 19 में ऐसे स्थानों के आस पास खनन पूर्ण रूप में वर्जित है लेकिन अनेक छोटी नहरों तथा कई बड़े पुलों के पास खनन हो रहा है तथा अनेक स्थानों पर इनके क्षतिग्रस्त होने के समाचार आ रहे हैं।
हिदायत क्रम नं.27 में कै्रशर के व खुदाई के शोर के प्रदूषण को रोकने के लिए जारी हिदायतों की पूर्णरूप से अनदेखी करने से आस पास की आबादी इससे ग्रसित हो रही है।
खनन व क्रशिंग से वायु में धूल मिट्टी के कण भारी संख्या में मिल जाते हैं। इससे लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया जा रहा है। लोगों में दमा, एलर्जी तथा अन्य अनेक प्रकार की बीमारियां पनप रही हैं। हिदायत क्रम नं. 29, 30 तथा  31 में इसे रोकने के लिए पानी का छिडक़ाव करने, खनन सामग्री से भरे वाहनों को ढकने तथा उन्हें ओवर लोड न करने आदि की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन कहीं भी इनका पूर्णरूप से पालन नहीं किया जाता है।
निर्देश नं. 10 के अनुसार वर्षा ऋतु में खनन नहीं किया जा सकता। लेकिन इस समय जुलाई के अंतिम सप्ताह में जब वर्षा ऋतु पूरे यौवन पर है, हमारे आसपास के क्रैशर व खनन की मशीनें पूरी शक्ति से काम कर रहे हैं जो कि प्राकृतिक समन्वय के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगा।
खनन से धूल मिट्टी का प्रदूषण पर कैसा प्रभाव पड़ता है, यह देखने के लिये चंडीगढ़ तथा पंचकुला के निकट रामगढ़ में चल रहे खनन व क्रैशरों के आसपास के पांच से सात किलोमीटर के घेरे में आने वाली कालोनियों व गांवों के सर्वेक्षण पर नजर मारें, यह बताता है कि रात में घरों के बाहर खड़ी गाडिय़ों के शीशे व घरों की खिड़कियों के शीशे धूल व मिट्टी की मोटी परत से सुबह तक ढक जाते हैं। जिला होशियारपुर के कस्बा हाजीपुर के निकट के गांवों के लोगों ने जिनके आसपास कई क्रैशर लगे हुए हैं, का कहना है कि फसलों तथा पशुओं के लिए उगाए गए चारे पर इतनी धूल जम जाती है कि मजदूर फसल की कटाई से मना कर देते हैं तथा धूल से लथपथ चारा खाकर पशु बीमार हो रहे हैं।
पहाड़ों तथा पहाडिय़ों का खनन द्वारा विनाश अधिक खतरनाक है। पिछले वर्ष गर्मियों में आकाश में छाई मिट्टी की गहरी परत जिसने पंजाब हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली सहित उत्तरी भारत के अनेक राज्यों को अपनी लपेट में लिया था के बारे में विशेषज्ञों का मानना था कि यह रेगिस्तान की धूल थी जो सिंध की ओर से आई और अरावली पर्वत जो कि खनन के कारण विकृत हो चुका है इस धूल के बादल को रोकने में असफल सिद्ध हुआ। वैसे भी प्रकृति से बिना सोचे समझे की गई छेड़छाड़ से प्राकृतिक असंतुलन पैदा होगा जो हम सभी के लिए घातक होगा।
खनन से पौधों तथा वनस्पति का भी विध्वंस हो रहा है। निर्देश सूची के क्रमांक 33, 34, 35 में खनन क्षेत्र के आसपास पौधे लगाने व वनक्षेत्र में खनन न करने, आसपास पाए जाने वाले पक्षियों व जीव जंतुओं की सुरक्षा निश्चित करने के स्पष्ट निर्देश होने के बावजूद इस ओर किसी का ध्यान नहीं है, परिणामस्वरूप पौधों और वनस्पतियों व पशु पक्षियों की बर्बादी खनन की रोजमर्रा क्रिया का एक भाग बन चुकी है।
निर्देश सूची के क्रमांक 60 में खनन सामग्री गांवों व आबादी में से ले जाने पर पाबंदी है, लेकिन खनन सामग्री से ओवरलोड भारी भरकम वाहन गांवों व लिंक सडक़ों पर दनदनाते घूमते हैं जिससे न केवल दुर्घटनाएं ही हो रही हैं बल्कि लिंक सडक़ों का अनेक गांवों से नामोनिशान तक मिट चुका है।
पंजाब में रेत व बजरी खनन तथा
स्टोन क्रैशरों का जाल
पंजाब जो कभी नदियों की धरती कहलाती थी अब रेत खनन व स्टोन क्रैशरों की धरती बन चुकी है। रावी नदी, चक्की नदी, स्वां नदी, व्यास, चो, तथा बरसाती खड्ड खनन तथा स्टोन क्रशिंग के शिकंजे में हैं। रोपड़ जिले में नूरपुर बेदी का क्षेत्र, मुकेरियां से तलवाड़ा-दौलतपुर चौंक सडक़ की पूर्वी दिशा, सतलुज नदी के साथ लगते क्षेत्र इससे सर्वाधिक प्रभावित हैं। आश्चर्य की बात है कि जिला होशियारपुर की मुकेरियां तहसील में एक भी खड्ड नीलाम नहीं की गई है लेकिन यहां पर दर्जनों स्टोन क्रैशर दिन रात, बरसात के मनाही के मौसम में भी बिना किसी डर व भय के चल रहे हैं। क्रैशर माफिया के हाथ इतने लम्बे हैं कि वास्तव में, राजनीतिज्ञ, अफसरशाही, पुलिस तथा स्टोन क्रैशर माफिया गठजोड़ इतना शक्तिशाली है कि साधारण जनता इनकी ओर आँख उठाने की हिम्मत ही नहीं करती। यदि कोई अधिकारी कभी कभार इन्हें चैक करने जाने का जोखिम उठाता भी है तो शासन तंत्र तथा प्रशासन व पुलिस में इनके पि_ू इन्हें पहले ही सूचित कर देते हैं।
लेकिन पिछले कुछ समय से आशा की किरणें दिखाई देने लगी हैं। अनेक संगठन, दल तथा जगह-जगह स्थानीय लोग इनके विरोध में एकजुट हो रहे हैं। नूरपुर बेदी, तहसील मुकेरियां, गढ़शंकर, तरनतारन, फाजिलका तथा शिवालिक की पहाडिय़ों में रहने वाले लोग इनके विरोध में आगे आ रहे हैं।
‘खनन रोको, जमीन बचाओ’ संघर्ष कमेटी के झंडे तले मुकेरियां के निकट हाजीपुर ब्लाक के अनेक गांवों में तथा तलवाड़ा ब्लाक के कई गावों में लोगों ने खनन माफिया के विरुद्ध मोर्चे खोले हुए हैं। इस संघर्ष को रोकने के लिए खनन माफिया तथा पुलिस व स्थानीय प्रशासन ने संघर्ष कमेटी के नेताओं को डराने धमकाने से लेकर उनकी हत्याएं करने तक की कोशिश की तथा खनन माफिया की नकेल कसने की बजाए संघर्ष कमेटी के पांच नेताओं पर ही झूठे केस मढक़र कुछ एक को जेल में बंद कर दिया।  एक झूठे केस में एसडीएम की अदालत में वह व्यक्ति कभी हाजिर ही नहीं हुआ जिसने झूठा केस किया था लेकिन प्रशासन, संघर्ष कमेटी के पांच नेताओं को वर्ष भर हतोत्साहित करने का भरसक प्रयत्न करता रहा। इस संघर्ष में महिलाओं ने सबसे अधिक योगदान दिया। अपनी भूमि, सडक़ों, स्वास्थ्य तथा अपने मान सम्मान की रक्षा के लिए महिलाएं इस आंदोलन में सबसे आगे रहीं। इस के परिणाम स्वरूप खनन तथा स्टोन क्रैशरों पर कुछ दबाव बढ़ा है। संघर्ष कमेटी, प्रशासन व खनन माफिया के दमनचक्र के बावजूद खनन माफिया के विरुद्ध डट कर खड़ी है। यह अच्छा संकेत है। लेकिन पंजाब में अगर खनन माफिया पर रोक लगानी है तो पंजाब में खनन माफिया के विरुद्ध संघर्षरत सभी शक्तियों को इक_ा करने का प्रयत्न करना होगा तथा छिटपुट विरोध की बजाए संगठित संघर्ष द्वारा लोगों को इन लुटेरों के विरुद्ध खड़ा करना होगा। यही वर्तमान समय की मांग है।

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