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मई दिवस-2019 की चुनौतियां

मई दिवस-2019 की चुनौतियां

हरकंवल सिंह
शिकागो के शहीदों के अद्वितीय बलिदानों को रूपमान करता मई दिवस का ऐतिहासिक दिवस, दुनियां भर के मेहनतकशों को रौशन भविष्य के लिए संघर्ष जारी रखने का संदेश देता आया है। इसीलिए समूचे विश्व में इस दिवस पर 1886 के उन योद्धाओं की वीर-गाथाओं का गुणगान किया जाता है, अमर शहीदों के श्रद्धांजलियां अर्पित की जाती हैं तथा पूंजीपति लुटेरों व मेहनतकशों के बीच निरंतर चल रहे वर्ग संघर्ष को प्रचंड करने के निश्चय और अधिक दृढ़ किए जाते हैं। इस उद्देश्य के लिए हर देश व हर क्षेत्र के मजदूर, कर्मचारी व अन्य मेहनतकश लोग हर साल पहली मई का विशेष आयोजन करते हैं तथा अपनी-अपनी सांगठनिक व बाहरमुखी सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों व सामथ्र्य के अनुसार भविष्य के संघर्षों की रूप-रेखा तय करते हैं।
हमारे देश में इस बार का मई दिवस उस समय आ रहा है जब भारत अपने इतिहास के एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण व निर्णायक दौर में से गुजर रहा है। देश की 17वीं लोक सभा के लिए होने वाले 7 चरणों पर आधारित मतदान के लिए इस दिन तक चार चरणों का मतदान संपन्न हो चुका होगा तथा बाकी रहते तीन चरणों से संबंधित क्षेत्रों में भी चुनाव प्रचार पूरे जोरों पर होगा। इस तरह, समूचे देश के राजनीतिक रूप में सचेत लोगों की दृष्टि अवश्य ही इन चुनावों के 23 मई को आने वाली परिणामों पर लगी हुई होगी। इसलिए स्वाभाविक रूप में ही, मई दिवस के आयोजनों में भी इन चुनावों के परिणामों को प्रभावित करने वाले मुद्दों तथा उनके कारण लोगों की जीवन स्थितियों पर भविष्य में पडऩे वाले संभावित निष्कर्षों पर विचार-चर्चा अवश्य ही भारी रहेगी।
इस पृष्ठभूमि में देश के मेहनतकश जनसमूहों के समक्ष आज, सबसे बड़ी व फौरी चुनौती तो है: इन चुनावों द्वारा मोदी सरकार को गद्दी से हटाना। इसके स्पष्ट रूप में तीन कारण हैं। पहला है: एन.डी.ए. के रूप में भारतीय जनता पार्टी व उसके सहयोगियों की इस सरकार की जन विरोधी आर्थिक नीतियां। आर्थिक सुधारों के दंभी पर्दे में इन नवउदारवादी नीतियों का प्रारंभ तो चाहे कांग्रेसी सत्ताधारियों ने किया था, परंतु मेहनतकश जनसमूहों को तबाह करने वाली उदारीकरण, विश्वीकरण व निजीकरण की नीतियों ने पिछले 5 वर्षों के दौरान देश के मु_ी भर पूंजीपतियों के तो वारे-न्यारे कर दिए हैं; पर चहूं ओर बढ़ती गई मंहगाई व बेरोजगारी ने आम लोगों को बुरी तरह त्रस्त किया हुआ है। लोगों की खून-पसीने की कमाई की मुनाफाखोर गिद्दों से रक्षा करनी तथा हर देशवासी को उसकी योग्यतानुसार रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाना ही हर सरकार के लिये प्रथम तरजीह वाले दो कार्य होते हैं। इन दोनों कार्यों की पूर्ति करके ही देश के सुरक्षा तंत्र को सार्थक व मजबूत बनाया जा सकता है। परंतु, यहां रोजगार के नए अवसर पैदा करने की जगह, इस समय के दौरान, इसके विपरीत पहले प्राप्त अवसर भी समाप्त हुए हैं। एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार अकेली नोटबंदी ने ही 50 लाख लोगों का रोजगार लील लिया है। जी.एस.टी. व विदेशी पूंजी निवेश को प्रचून व्यापार जैसे क्षेत्रों में भी प्रत्यक्ष निवेश की इस सरकार द्वारा दी गई छूटों ने तो देश के भीतर रोजगार के बाजार को बड़ी हद तक चौपट कर दिया है।
इस 5 साल के समय के दौरान विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा सट्टेबाजों को मिली और अधिक छूटों के कारण देश भर में कृषि संकट दिन-प्रतिदिन और अधिक गंभीर हुआ है तथा यह ग्रामीण मजदूरों व किसानों को आत्म हत्याएं करने के निराशा भरे रास्ते पर चलने की ओर धकेल रहा है। इन नीतियों के परिणामस्वरूप ही देश में शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं का बड़ी हद तक व्यापारीकरण हो चुका है। जिस कारण लोग बिना इलाज के मरने के लिए मजबूर हो रहे हैं। बेहद मंहगे दामों पर शिक्षा प्राप्त करके भी उपयुक्त रोजगार न मिलने के कारण करोड़ों की संख्या में युवक-युवतियां नग्णय से वेतनों पर अद्र्ध-बेरोजगारी का संताप झेल रहे हैं या मानसिक तनाव से राहत प्राप्त करने के लिए नशों की घातक दलदल में घंसते जा रहे हैं। इन नीतियों के कारण ही देश के भीतर हर ओर रिश्वतखोरी व भ्रष्टाचार दनदना रहे हैं तथा अति घिनौनी किस्म की सामाजिक समस्याओं को जन्म दे रहे हैं। राफेल विमानों के अरबों रूपयों के घोटालों में जब देश के प्रधानमंत्री पर उंगलियां उठ रही हों तो भ्रष्टाचार के इस कोढ़ को काबू में कैसे किया जा सकता है? मेहनतकश लोगों की जीवन स्थितियों पर मोदी सरकार द्वारा किए गए इन समस्त नीतिगत आर्थिक हमलों के कारण इस सरकार के विरुद्ध लोगों के विद्रोही स्वर निरंतर तीखे होते जा रहे हैं। जिनका इन चुनावों में प्रकट होना अवश्यंभावी है तथा लोग मोदी सरकार को चलता करना के लिए ठोस उद्यम करेंगे।
इसके अतिरिक्त दूसरा मुद्दा है : देशवासियों के भीतर आज यह समझदारी भी प्रबल हो चुकी है कि यदि इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी व इसके सहयोगी विजयी रहते हैं तो यहां सांप्रदायिक-फाशीवादी ताकतें और अधिक उद्दंड हो जायेंगी। आर.एस.एस. के प्रतिक्रियावादी ‘धर्म आधारित राज्य’ के मंतव्यों को वास्तविक रूप देने के लिए वे अल्प संख्यकों विशेष रूप में मुसलमानों व ईसाइयों के विरुद्ध और अधिक सांप्रदायिक जहर उगलेंगी। जिससे देश का सदियों पुराना बहु-राष्ट्रीय, बहु-धर्मी व बहु-भाषाई सामाजिक ताना-बाना और अधिक खंडित हो जाएगा व देश की एकता अखंडता के लिए नए खतरे पैदा हो जायेंगे। इसके साथ ही ‘संघ परिवार’ की क_मुल्लावादी तर्कहीन विचारधारा तथा उसमें लिप्त अराजकतावादी सांप्रदायिक भीड़ों के मजबूत होने से देश के भीतर मनुवादी सामाजिक तंत्र के पुर्न जागरण का व्यवहार भी अवश्य तीव्र होगा। जिससे दलितों, औरतों व अन्य पिछड़ी श्रेणियों के लिए सामाजिक दासता की जंजीरें और अधिक कड़ी हो जायेंगी। उन पर सामाजिक दमन भी बढ़ेगा, शारीरिक शोषण भी तथा उनके श्रम की लूट भी। इन चुनावों में भाजपा की शह प्राप्त दंगाई-भीड़ों के अमानवीय कारनामे भी चर्चा का विषय बने हैं तथा, इस सांप्रदायिक फाशीवादी व्यवहार के भविष्य में यहां और अधिक भयानक रूप धारण करने की चिंताएं भी जन-मानस के भीतर बढ़ी हैं।
इसके साथ ही जिस तरह मोदी सरकार ने देश की संवैधानिक जनवादी संस्थाओं व स्थापनाओं का क्षरण किया है, वह देश के मेहनतकश वर्ग के लिए तीसरी बड़ी चुनौती है। पूंजीवादी विकास के प्रारंभिक दौर में, तानाशाही के मुकाबले में जनवाद (लोकशाही) का उभरना यकीनन ही एक अग्रगामी व क्रांतिकारी राजनीतिक संकल्प था। इसके अधीन ही राजाओं-सामंतों के ‘‘दैवीय अधिकारों’’ का अंत हुआ तथा समानता, स्वतंत्रता व मानवीय भाईचारे की प्रगतिशील सैद्धांतिक स्थापनाएं प्रफुल्लित हुईं। परंतु पूंजीवाद के इजारेदारी व साम्राज्यशाही के दौर तक पहुंच जाने के साथ अब पूंजीवादी जनवाद आम लोगों के लिए एक पूर्ण रूपेण पाखंड का रूप धारण करता जा रहा है। इस प्रणाली के अधीन, अब तो, पूंजीवादी-जागीरदार वर्गों के हितों को समर्पित कुछेक पार्टियों या सत्ताधारी वर्गों के दो गठजोड़ों में से किसी एक को पांच सालों के बाद चुनने के लिए मत डालने को ही जनवाद के रूप में प्रचारित किया जा रहा है जबकि यह किसी तरह भी वास्तविक लोकशाही (जनवाद) नहीं कहला सकती। शोषक सत्ताधारी वर्गों के हितों की सेवा करने वाली पूंजीवादी पार्टियां चुनाव जीतने के लिए केवल धन का खुला प्रयोग नहीं करतीं बल्कि अन्य हर तरह की जोर-जबरदस्तियां व धोखाधडिय़ां भी करती हैं। इस उद्देश्य के लिए पूंजीपतियों के कंट्रोल वाला मीडिया झूठे प्रचार की आंधी ला देता है। लोगों का ध्यान उनके रोटी, रोजगार, सामाजिक न्याय, सामाजिक सुरक्षा, मानव विकास व विकसित सुख-सुविधाओं जैसे वास्तविक मुद्दों से हटाने के लिए मीडिया द्वारा पूर्ण रूप से अर्थहीन व भावनात्मक मुद्दे जोर-शोर से उभारे जाते हैं। हमारे अपने देश में, इन चुनावों में इसीलिए ही लोगों की रोजगार, मंहगाई, सांप्रदायिकता व सामाजिक उत्पीडऩ जैसी वास्तविक समस्याओं को दरकिनार किया जा रहा है तथा सत्ताधारी वर्गों की पार्टियों के नेताओं द्वारा एक-दूसरे के बारे में भद्दी-से-भद्दी शब्दावलि में लगाए जा रहे आरोपों-प्रत्यारोपों को व्यापक चर्चा का विषय बनाया जा रहा है। जिससे अल्पसंख्यकों, दलितों, औरतों आदिवासियों व अन्य गरीबों पर हो रहे दमन-उत्पीडऩ की घटनाओं की चर्चा मीडिया से बड़ी हद तक गायब हो गई है। कांग्रेस पार्टी, भाजपा व क्षेत्रीय पूंजीवादी पार्टियों के अनेकों नेता जिस तरह टिकट न मिलने पर, आसानी से ही पाला बदल रहे हैं तथा इन पार्टियों द्वारा जिस तरह ऐसे धनियों को चुनावों के लिए उम्मीदवार बनाया जा रहा है, जिनका राजनीति से कभी दूर का भी वास्ता नहीं रहा, उससे स्पष्ट हो जाता है कि यह ‘‘पूंजीवादी जनवाद’’ आम लोगों के प्रति बड़ी हद तक एक धोखे भरा छलावा बनती जा रही है। वास्तविक लोकशाही के दृष्टिकोण से राजनीति एक जन सेवा वाला महान कार्य है। परंतु यहां तो यह अब  सबसे बड़ा कमाई का धंधा बनता जा रहा है।
मोदी सरकार ने विवेकशील विचारों को दबाने के लिए न केवल जनवाद विरोधी कानूनी व्यवस्थाओं का ही दुरुपयोग किया है बल्कि इस उद्देश्य के लिए न्यायपालिका, प्रसार भारती, रिजर्व बैंक व चुनाव कमीशन जैसी स्वतंत्र अस्तित्व वाली संवैधानिक जनवादी संस्थाओं में भी गैर-कानूनी हस्तक्षेप करके उनकी देशवासियों के प्रति जवाबदेही को पूरी तरह संदेहास्पद बना दिया है। इस स्थितियों में यहां जनवाद को वास्तविक अर्थों में पुर्नस्थापित करना व मजबूत बनाना भी मजदूर वर्ग के समक्ष आज एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है।
यहां यह भी याद रखना आवश्यक है कि चाहे इन चुनावों में मोदी सरकार की पराजय की संभावनाएं निरंतर बढ़ती जा रही है, पर फिर भी यदि यह जनविरोधी सरकार पुन: देश की राजसत्ता पर काबिज हो जाती है तो आम लोगों के लिए उपरोक्त समस्त चुनौतियां अवश्य ही बहुत गंभीर हो जायेंगी। इसलिए इस मतदान के अगले चरणों में भाजपा व उसके सहयोगियों को पराजित करने के लिए अवश्य ही भरसक प्रयत्न करने की जरूरत है।
इसके साथ ही यह समझना भी जरूरी है कि देश के भीतर वामपंथी ताकतों को शक्तिशाली बनाकर ही वर्तमान कारपोरेट समर्थक व मेहनतकशों को बर्बाद करने वाली आर्थिक व राजनीतिक नीतियों का मुंह मोड़ा जा सकता है। क्योंकि देश की भीतरी राजनीतिक शक्तियों के वर्तमान संतुलन के अनुसार, मोदी सरकार के गद्दी से उतर जाने के साथ भी यहां मेहनतकश लोगों की जीवन स्थितियों को बर्बाद कर रहीं पूंजीवाद-परस्त नीतियों में कोई निर्णायक व चिर-स्थाई परिवर्तन होने की बिल्कुल भी कोई संभावना नहीं है। इस दिशा में तो भारतीय समाज को पूंजीवादी व सामंती लूट-खसूट से मुक्त करवा कर ही आगे बढ़ा जा सकता है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए तो मजदूर वर्ग को अपने जुझारू जन संगठनों को मजबूत बनाने के साथ-साथ हर देश में अपनी राजनीतिक पार्टी को भी आवश्यक रूप में मजबूत व प्रभावशाली बनाना होगा। वास्तव में उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मेहनतकश जनसमूहों की सर्वप्रथम आवश्यकता एक शक्तिशाली पार्टी का निर्माण करना ही है। ऐसी अनुशासन बद्ध पार्टी जो कि लेनिनवादी बुनियादों पर विकसित किए गए सांगठनिक सिद्धांतों पर खड़ी हो, समाजवाद की पूर्ण रूप से मुद्दई हो, जनवादी केंद्रीयवाद के सिद्धांतों पर आधारित हो, हर तरह की प्रतिक्रियावादी विचारधाराओं व सामाजिक-सांस्कृतिक धारणाओं के विरुद्ध निरंतर संघर्षशील हो तथा साम्राज्यवादी लूट-खसूट व दमन-उत्पीडऩ के विरुद्ध जन लामबंदी पर आधारित ठोस व समझौता-विहीन संघर्ष के लिये कमर कसे हो। ऐसी विशाल राजनीतिक पार्टी का निर्माण करना, वास्तव में, आज मजदूर वर्ग के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है।

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