अपने प्रतिक्रियावादी व कारपोरेट-समर्थक हितों को प्रफुल्लित करने के लिये, मोदी सरकार आरंभ से ही आम लोगों की आंखों में धूल झोंकने के लिए रंग-बिरंगे प्रपंच रचती आ रही है। आर्थिक आधार पर गरीबों के लिये उच्च शिक्षा संस्थानों व सरकारी नौकरियों में 10′ सीटें आरक्षित करने के लिये किया गया संवैधानिक संशोधन भी उसकी ऐसी ही ताजातरीन पहुंच का एक उदाहरण है। इस लिये, निकट भविष्य मेंं आ रहे लोकसभा चुनावों को समक्ष रखकर की गई इस धोखाधड़ी की समीक्षा करने से पहले, इस सरकार के 2014 से लेकर अब तक के समूचे प्रदर्शन पर सरसरी नकार मार लेना भी एक आवश्यकता है।
भारतीय जनता पार्टी ने, श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 के चुनाव जीतने के लिये, लोगों के हर वर्ग से बड़े-बड़े वायदे किये थे। परंतु राजसत्ता पर कब्जा करने के बाद इस सरकार ने मकादूरों, किसानों, बेरोकागार नौजवानों तथा कंगाली की कगार पर खड़े श्रमिक जनसमूहों से किये गये वायदे पूरे करने की जगह तुरंत ही इजारेदार घरानों व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कारोबारों को प्रोत्साहन देने वाली नवउदारवादी नीतियों पर और अधिक तीव्र रूप में अमल शुरू कर दिया। इस उद्देश्य के लिये सबसे पहला आक्रमण योजना आयोग पर किया गया तथा उसे पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया गया, यद्यपि आवश्यकता तो इसे लाभ-केंद्रित की जगह और अधिक मानव-केंद्रित बनाने की थी। बाजार की क्रूर-शक्तियों पर सामाजिक कंट्रोल किये बिना मंहगाई पर तो लगाम लगाई ही नहीं जा सकती तथा न ही मुनाफाखोरों की मनमानी को कंट्रोल किये बिना भ्रष्टाचार पर ही रोक लगाई जा सकती है। इसलिये भाजपा द्वारा आम जनता से मंहगाई, भ्रष्टाचार व बेरोकागारी पर तुरंत काबू पा लेने के किये गये झूठे दावों की कलई तो जल्द ही खुल गई तथा जन-असंतोष बढऩा शुरू हो गया। इस बेचैनी का इजहार ही दिल्ली प्रांत के विधान सभाई चुनावों में हुआ था। यहां श्री मोदी के बतौर प्रधानमंत्री धुंआधार प्रचार करने के बावजूद भाजपा औंधे मुंह गिरी थी।
इस व्यापक जन-असंतोष को शांत करने के लिए ही मोदी सरकार की लोक-लुभावनी जुमलेबाजी निरंतर प्रचंड होती गई। इसी दिशा में स्वच्छ-भारत के साथ-साथ जन-धन योजना का भी बड़ा आडंबर रचा गया। विज्ञापनबाजी पर करोड़ों रुपये बर्बाद करके लोगों के करोड़ों की संख्या में बैंक खाते खुलवाये गये। लोगों ने भी इस आशा के साथ कि इन खातों में ‘काले धन’ वाले 15-15 लाख रुपये जमा होंगे, धड़ाधड़ खाते खुलवा लिये। परंतु उनमें सरकार द्वारा फूटी कोड़ी भी जमा नहीं करवाई गई। हां! अनेकों खातों से, न्यूनतम राशि जमा रखने की शर्त पूरी न कर पाने के कारण, बैंकों ने लोगों द्वारा पेट काट कर जमा की गई राशि में से कटौती करके चोखी कमाई अवश्य ही कर ली है।
बेरोकागारी का दंश झेल रहे नौजवानों से भी, चुनावों से पूर्व यह वायदा किया गया था कि भाजपा सरकार हर वर्ष 2 करोड़ नये रोकागार के अवसर पैदा करेगी। परंतु निजीकरण की रोकागार घातक नीति जारी रखने तथा परचून व्यापार जैसे क्षेत्र में भी विदेशी पूंजी को निवेश करने की संपूर्ण छूट दे देने से तथा आन-लाईन व्यापार आरंभ हो जाने से देश के भीतर रोजगार के अवसर बढ़ कैसे सकते हैं? इसके विपरीत ये घट रहे हैं। इससे छोटे दुकानदारों के रूप में कार्यरत 7 करोड़ लोगों पर भी इसका दुष्प्रभाव पड़ा है। बेरोकागार व अद्र्ध-बेरोकागार तरुणों के बढ़ रहे रोष को ठंडा करने के लिए ही मोदी सरकार ने उन्हे मेक-इन-इंडिया, स्टैंड-अप-इंडिया, स्टार्ट-अप-इंडिया जैसे खोखले खिलौने दिखाये तथा बैंकों द्वारा स्व-रोकागार के लिये कर्ज की सुविधायें बढ़ाने के लिए ‘मुद्रा योजना’ का धुंआधार प्रचार किया। इन समस्त प्रयासों के फलस्वरूप देश में रोकागार तो बढ़ा नहीं, सरकार से निकटता रखने वाले कुछ महानुभव बैंकों से अरबों रुपये लेकर विदेशों में जा बसे हैं। दूसरी ओर बैंकों के एन.पी.ए. (ना वसूले जा सकने वाले कर्ज) क्षमता से ज्यादा हो जाने के कारण देश में नये कर्ज उपलब्ध करवाने की समस्या एक बड़ी चिंता का विषय अवश्य बन गई है, जिसके समाधान के लिये केंद्रीय रिजर्व बैंक की स्वायतत्ता को भी ठोका-पीटा जा रहा है तथा भारी आघात पहुंचाया जा रहा है। रोजगार के नये संसाधन पैदा करने के संबंध में जो थोड़ा-बहुत बचा था नोटबंदी व जी.एस.टी. की जोर-जबरदस्ती ने उसे भी नष्ट कर दिया है। इस सरकार के इन दोनों कदमों ने छोटे कारोबारों को बुरी तरह बर्बाद कर दिया है तथा इससे जुड़े श्रमिकों का रोकागार पूरी तरह अस्थिर कर दिया है। अधिकतर तो बेरोकागारी की भ_ी में जलने के लिए मकाबूर हैं।
लंबे समय से कर्ज-जाल में पिस रहे किसानों की वोटें बटोरने के लिये पिछले चुनावों के समय श्री नरेंद्र मोदी ने यह बार-बार कहा था कि उनकी सरकार खेती उत्पादों के लाभप्रद भाव तय करने के लिये डा.स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को अक्षर-अक्षर लागू करेगी। परंतु मोदी सरकार ने सत्ता संभालते ही सुप्रीम कोर्ट में दिये गये एक शपथ-पत्र द्वारा अपनी वित्तीय असमर्थताओं का हवाला देते हुये इस आयोग की रिपोर्ट पर अमल करने से इंकार कर दिया था। इससे देश भर के किसानों के भीतर तीव्र रोष पैदा हुआ जो एक संगठित आंदोलन का रूप ग्रहण कर गया। इस रोष को भटकाने के लिये भी सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने व प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसी कुछ नई लोक लुभावन बातें कीं। परंतु निराश हुये किसानों व गरीबी से पीडि़त खेत मकादूरों की आत्म हत्यायें निरंतर बढ़ती ही गईं। इससे संबंधित लोगों के भीतर बढ़ती जा रही बेचैनी व किसानी के भीतर सरकार द्वारा उनसे की गई धोखाधड़ी के विरुद्ध, बढ़ रहे रोष का ही इजहार 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में हुआ है।
मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान संघ परिवार की बढ़ रही सांप्रदायिक-फाशीवादी जोर-जबरदस्तियों के कारण आम लोगों, विशेष रुप से धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों, औरतों, आदिवासियों तथा न्यायप्रिय व देशभक्त लोगों के भीतर बढ़े व्यापक रोष ने ही इस सरकार की लोकप्रियता को तार-तार कर दिया है।
इन समस्त बाहरमुखी वास्तविकताओं ने आज भाजपा में, विशेष रूप से मोदी-अमित शाह जोड़ी में तथा उनके निकटवर्ती सहयोगियों में कंपकपी छेड़ दी है। इस घबराहट में से यह 10′ आरक्षण के नये शगूफे ने जन्म लिया है। कितना हैरानीजनक है कि लोकसभा के शीतकालीन सत्र के अंतिम दिन अचानक संविधान संशोधन करने से संबंधित यह बिल लाया गया, तथा उसे जल्दबाजी में दोनों सदनों से पारित करवाके अगले ही दिन राष्ट्रपति की मुहर भी उस पर लगवा ली गई तथा इसे कानून का रूप दे दिया गया। जबकि ऐसा कानून बनाने के लिये राष्ट्रपति से पहले कम-से-कम 8 राज्यों की विधानसभाओं की स्वीकृति लेनी भी आवश्यक होती है। इस तरह संसदीय चुनावों को समक्ष रख कर मोदी सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम सरासर एक धोखाधड़ी है। इससे भी आगे, यह कदम शुद्ध धोखा ही नहीं, बल्कि भारतीय संविधान में शामिल सामाजिक न्याय के संकल्प पर एक घिनौना हमला भी है।
संविधान निर्माताओं ने, विशेष रूप से डाक्टर बी.आर. अंबेडकर ने भारतीय संविधान में आरक्षण की यह व्यवस्था ‘‘सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन’’ के आधार पर उन लोगों के लिये की थी जो कि यहां कई शताब्दियों से जाति-पाति की कलंकित प्रथा के फलस्वरूप ‘अछूत’ ऐलाने गये हैं तथा हर तरह से सामाजिक व सांस्कृतिक अधिकारों से वंचित रखे गये हैं। उन्हें इस जोर-जबरदस्ती द्वारा संस्थागत रूप प्रदान कर दिये गये अमानवीय सामाजिक पिछड़ेपन से राहत प्रदान करने के लिये ही आरक्षण की व्यवस्था की गई थी, न कि आर्थिक लूट-खसूट से मुक्ति दिलवाने के लिये। परंतु अति दुखद बात तो यह है कि देश के भीतर आरक्षण की इस मानववादी व्यवस्था पर किसी भी सरकार ने सुहृदयता पूर्ण अमल नहीं किया। तथा, इसका उपयोग वोट बटोरने के एक साधन के रूप में ही होता रहा। यही कारण है कि जिनके लिये यह व्यवस्था की गई थी, वे आज 70 साल बाद भी काफी हद तक उसी सामाजिक उत्पीडऩ के भी शिकार हैं तथा आर्थिक रूप में भी बड़ी संख्या में कंगालों की कतार में खड़े हैं। देश भर में पहले व दूसरे दर्जे के पदों के लिये अनुसूचित जातियों के लिये आरक्षण कभी भी तथा कहीं भी पूरा नहीं हुआ। जबकि पूंजीपति-जागीरदार सत्ताधारियों की जनविरोधी नीतियों के कारण देश में रोकागार के संसाधन पर्याप्त मात्रा में पैदा न होने के कारण इस आरक्षण के घेरे से बाहरी लोगों में आरक्षण के लिये दावेदारियां बढ़ती गई हैं जो कि कई बार जनसंघर्षों का रूप भी धारण कर लेती है तथा हिंसक भी बन जाती है। सत्ताधारी पार्टियां अक्सर ही, वोटें बटोरने के लिये, ऐसे दावों को हवा भी देती हैं तथा, इस तरह देश के भीतर भातृत्व आधारित एकजुटता को भी आघात पहुंचाती हैं।
जहां तक आर्थिक पिछड़ेपन या गरीबी का संबंध है इसका समाधान आरक्षण नहीं है। इसके लिये तो आवश्यक है कि उत्पादन के साधनों पर कुछेक धनियों के स्वामित्व को समाप्त करके लोगों को उनकी योग्यता, के अनुसार रोजगार दिया जाये तथा साथ ही उनकी कमाई को बाजार पर काबिज मुनाफाखोर गिद्धों की लूट-खसूट से भी मुक्त किया जाये। वैसे तो, ऐसे कारगर कदमों की आशा इन लुटेरे सत्ताधारियों से तो की ही नहीं जा सकती। मोदी सरकार ने तो सामाजिक पिछड़ेपन को आर्थिक तंगदस्ती से गड्डमड्ड करके उल्टा इन वैज्ञानिक धारणाओं को कमजोर करने व कुरूप बनाने का षडयंत्र ही रचा है। भाजपा की पीठ पर खड़ा संघ परिवार तो अपने मनुवादीतंत्र से संबंधित इरादों की पूर्ति हेतू संविधान में दर्ज आरक्षण का आरंभ से ही विरोधी रहा है। मनुवाद न दलितों को ‘स्वर्णों’ के समान मानवीय अधिकारों को मान्यता देता है तथा न ही औरतों की मर्दों से समानता को स्वीकार करता है। संघ परिवार वास्तव में, हिंदू राष्ट्र के रूप में ऐसे सामाजिक ढांचे की पुर्न: स्थापना का ही इच्छुक है।
यहां यह तथ्य नोट करना भी जरूरी है कि मोदी सरकार की यह शगूफेबाजी आगामी चुनावों को प्रभावित करने के लिये एक वोट बटोरु यंत्र के रूप में तो देखी जा सकती है परंतु धरातल पर इसका लोगों को बिल्कुल भी कोई लाभ मिलने की संभावना नहीं है। देश में निजीकरण व सरकार द्वारा रेल जैसे बड़े विभाग में हर वर्ष 10′ पद समाप्त करते जाने की नीति के कारण तथा भर्तियों पर रोक लगाने के कारण सरकारी नौकरियों का तो वास्तव में ही अकाल पड़ा हुआ है। ऐसी स्थिति मेें इस 10′ के नये आरक्षण का क्या अर्थ रह जाता है? जहां तक उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश का संबंध है, वहां शिक्षा के हो रहे व्यापक व्यापारीकरण के कारण इंजीनियरिंग संस्थाओं आदि में तो पहले ही 30′ तक सीटें खाली पड़ी रह जाती हैं। इसके अतिरिक्त गरीब परिवारों के बच्चे संयुक्त प्रवेश परीक्षाओं की न्यूनयतम पास प्रतिशतता तक भी कम ही पहुंचते हैं। उनके लिये भी ऐसे आरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह जाता। और देखो, गरीबी के लिये जो 8 लाख वार्षिक आय व 5 एकड़ तक भूमि स्वामित्व का जो स्तर निर्धारित किया है उसमें तो जनरल श्रेणी के 95′ लोग आ जाते हैं तथा उनके बच्चों या नौकरियों के इच्छुकों ने अपनी मैरिट के आधार पर ही आना है। उनके लिये भी इस आरक्षण का बिल्कुल भी कोई लाभ नहीं है। आर्थिक पिछड़ेपन के प्रमाणपत्र बनाने के लिये उन्हें बेवजह भाग-दौड़ व खर्च का बिना किसी कारण शिकार अवश्य बनना पड़ेगा।
इस आधार पर यह स्पष्ट दिखाई देता है कि मोदी सरकार का यह चुनावों से संबंधित दुर्भावनापूर्ण व अवसरवाद से प्रेरित निर्णय न्यायसंगत समाज के निर्माण की धारणा को कमजोर करने तथा देश के भीतर पसरी हुई गरीबी के वास्तविक कारणों पर पर्दा डालने की एक घिनौनी चाल है। इसे परास्त करने के लिए इस सरकार को आने वाले चुनावों में करारी शिकस्त देने के लिए हर संभव साधन जुटाने की आवश्यकता है। -हरकंवल सिंह (25-1-2019)