Now Reading
संपादकीय जम्मू-कश्मीर के बारे में मोदी-शाह सरकार का घातक निर्णय

संपादकीय जम्मू-कश्मीर के बारे में मोदी-शाह सरकार का घातक निर्णय

भारत का सीमांत राज्य जम्मू-कश्मीर, जिसे धरती पर स्वर्ग कहा जाता है, आजकल अघोषित आपात्तकाल झेल रहा है तथा बाकी देश दुनिया से पूरी तरह से संपर्कहीन है। वहां के लोगों के साथ क्या घट रहा है इसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं क्योंकि दूर-संचार सेवायें-टैलिफोन, मोबाईल, इंटरनैट तथा यातायात आदि सब कुछ बंद है। गवर्नर का शासन होने के कारण राज्य पहले ही केंद्र के अधीन था, अब पूरी तरह फौज के हवाले है। मीडिया रिर्पोटों के अनुसार 16 व्यक्तियों के पीछे 1 सेना या अद्र्ध-सेनिक बल का जवान तैनात है। राज्य के प्रमुख राजनीतिक नेता नजरबंद हैं तथा उनके साथ क्या बीत रही है, यह भी भेद बना हुआ है।
यह स्थिति पैदा की है दूसरी बार दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई मोदी-शाह की बहुमत वाली भाजपा सरकार के जम्मू-कश्मीर संबंधी अचानक लिये गये स्वर्ग को नर्क में परिवर्तित करने वाले एक तानाशाही निर्णय के कारण। मोदी-शाह हकूमत ने रातो-रात जम्मू-कश्मीर के भारत से विलय के समय किये गये समझौते के अनुसार इस क्षेत्र को विशेष दर्जा देती संविधान की धारा 370 व 35ए  रद्द कर दी है तथा जम्मू-कश्मीर राज्य की विधान सभा का दर्जा घटा कर इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों, जम्मू-कश्मीर व लद्दाख में विभाजित कर दिया। इस पूर्ण रूप में गैर-जम्हूरी कदम को बड़ी बेशर्मी से जम्हूरियत मजबूत करने की ओर एक कदम बताया जा रहा है। इस निर्णय को बाजिव ठहराने के लिये लोक सभा में इस संबंध में पेश किये गये बिल पर बहस के दौरान मोदी-शाह जोड़ी द्वारा सरासर झूठी दलीलें दीं गईं तथा मनोकल्पित इतिहास पढ़ाने के असफल प्रयास किये गये। यहां तक कि बी.आर. अंबेडकर के नाम पर भी झूठ बोला गया। इस ‘झूठ पुराणÓ का अब बड़े स्तर पर पर्दाफाश हो चुका है। इस निर्णय को लागू करने से पहले झूठी अफवाहों व ब्यानबाजी पर आधारित एक भय का वातावरण खड़ा किया गया। सैर-सपाटा व धार्मिक यात्राओं के कारण वहां गये लोगों को सीमा पार से आतंकवादी हमले का भय दिखाकर जल्द से जल्द घाटी से निकल जाने के आदेश दिये गये। संचार माध्यम पूर्ण रूप में ठप्प कर दिये गये तथा अंत में इस राज्य का गला घोंटने का तथा उसका विभाजन करने का कुकर्म किया गया।
इस निर्णय का देश भर के बुद्धिजीवियों, प्रसिद्ध भूतपूर्व नौकरशाहों, संविधान विशेषज्ञों व कानून सृजकों, न्यायप्रिय तथा संतुलित सोच वाले लोगों ने डटकर विरोध किया। देश की वामपंथी पार्टियों व जम्हूरी जन संगठनों ने एक स्वर में इस तानाशाही पूर्ण निर्णय के विरुद्ध स्पष्ट स्टैंड लिया तथा यथाशक्ति प्रभावशाली जन प्रतिरोध किया। तथाकथित मध्यमार्गी व भाजपा विरोधी पार्टियों का व्यवहार कुछेक को छोड़कर अति निराशाजनक रहा।
दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिये जाने की मांग करने वाले ‘आपÓ के नेता अरविंद केजरीवाल ने इस निर्णय का समर्थन किया। ऐसा ही निराशाजनक व्यवहार बसपा, बीजू जनता दल आदि ने भी  किया। पर सबसे शर्मनाक व्यवहार अपने आप को संघीय ढांचे का सबसे बड़ा अलंबरदार व अल्प संख्यकों के हितों का रक्षक कहलवाने वाले शिरोमणि अकाली दल का रहा। सरकार के इस निर्णय ने यह भी स्पष्ट दर्शा दिया कि विचारधारा के मामले में कांग्रेस पार्टी कितनी खोखली व फूट का शिकार हो चुकी है। देश के बुद्धिजीवी क्षेत्रों का संतुलित व्यवहार अवश्य आशा की किरण जगाते रखने वाला है। इन क्षेत्रों ने यह बात जोर देकर कही है कि लोकतंत्र में किसी पार्टी के पास बहुमत, चाहे वह जितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, होने का अर्थ यह नहीं होता है कि वे राष्ट्रीय महत्त्व के संवेदनशील निर्णय लेते समय मनमानियां करें। बल्कि लोकतांत्रिक प्रणाली ऐसे मामलों में राष्ट्रीय आम सहमति का रास्ता सुझाती है।
यह भी कड़वी सच्चाई है कि देश की गैर कश्मीरी आबादी के एक भाग ने अज्ञानतावश इस निर्णय की प्रशंसा की है। यहां यह नहीं भूलना चाहिये कि हिंदुत्ववादी संगठनों के कार्यकत्ताओं द्वारा दशकों, निरंतर जम्मू-कश्मीर के संबंध में किये गये सांप्रदायिक सोच आधारित घृणित झूठे प्रचार का भी लोगों की सोच पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। यह भी प्रशंसनीय है कि कश्मीरी लड़कियों के बारे में संघ कार्यकत्र्ताओं द्वारा चलाये गये चरित्र के बारे में नकारात्मक प्रचार का देश की बहुसंख्यक आबादी ने बुरा मनाया है। यह समस्त पक्ष गंभीर विचार-चर्चा व उपयुक्त दखल की मांग करते हैं। मोदी-शाह के जम्मू-कश्मीर के बारे में निवर्तमान निर्णय के उपरांत वहां पैदा हुयी मौजूदा चिंताजनक स्थितियों के बारे में विचार-चर्चा करते समय एक बिंदु बड़ा महत्त्वपूर्ण व स्मरणीय है। मोदी सरकार एक ऐसी सरकार है जिसको चलाने वाला चाबुक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर.एस.एस.) के हाथ में है। आर.एस.एस. अपने कट्टड़ हिंदू राष्ट्र की कायमी के एजंडे की कामयाबी के लिये हर उस विचार, सरोकार व मूल्यों को ध्वस्त करता जा रहा है जिनका सृजन देशवासियों ने स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत मिलजुल कर सामूहिक चेतना द्वारा किया है। जम्मू-कश्मीर के संबंध में किया गया मोदी-शाह हकूमत का यह जोर-जबरदस्ती भरपूर निर्णय आर.एस.एस. की देश को एक कट्टर धर्म आधारित राष्ट्र में तब्दील करने की साजिश युक्त सोच के अनुरूप ही है। याद रहे! संघी सोच के अनुरूप काम करती मोदी सरकार द्वारा उक्त व्यवहार किसी अन्य राज्य के साथ भी किया जा सकता है।
हमारी समझ के अनुसार केंद्रीय सरकार का निर्णय सांप्रदायिक विभाजन तीव्र करने की आर.एस.एस. की साजिश व योजना का साधन है। यह निर्णय देश के संविधान, जम्हूरी व धर्म-निरपेक्ष मूल्यों व संघवाद (फैडरेलिज्म) के बिल्कुल विपरीत है। वर्तमान व भविष्य में यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की शर्मीदगी व अलगाव का कारण बनेगा। देश हित में भारत से विलय के बारे में किये गये द्विपक्षीय समझौते को एकपक्षीय रूप में तोडऩा कश्मीर के अवाम के साथ विश्वासघात है। कश्मीरी आवाम में पहले से मौजूद वायदा खिलाफी के विरूद्ध रोष व बेगानगी की भावना को और मजबूत करेगा। आतंकवाद-थकतावाद के समर्थकों को वैचारिक शक्ति प्रदान करेगा तथा भारत में कश्मीर के विलय तथा देश की एकता अखंडता के समर्थकों के प्रति आम कश्मीरियों में अलगाव पैदा करने में सहायक सिद्ध होगा। सांप्रदायिक मानसिकता के अंर्तगत किये गये विवेकहीन निर्णयों के परिणाम इसके अतिरिक्त और हो भी क्या सकते हैं? इस चिंताजनक अवस्था में हम कश्मीरी आवाम के प्रति सद्भावना प्रकट करते हुये, देश स्तर पर समस्त वामपंथी, जम्हूरी व देशभक्त शक्तियों की संयुक्त दखलअंदाजी का विनम्र सुझाव देते हैं।
– महीपाल
(25.8.2019)
(अनुवादक : रवि कंवर)

Scroll To Top