मोदी सरकार ने भारत की राजसत्ता पुन: संभालते ही ‘‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’’ का नारा पुन: उभार दिया है। वैसे, यह कोई नया नारा नहीं है। भाजपा की पिछली सरकारों के समय भी सरकार के कुछेक समर्थकों द्वारा यह नारा उभारा गया था। परंतु इसे लागू करने संबंधी व्यवहारिक मुश्किलों तथा सत्ताधारी पक्ष की उस समय की तुरंत राजनीतिक आवश्यकताओं के मद्देनजर, सरकार ने उस समय इस नारे पर अधिक जोर नहीं दिया था। यद्यपि इस बार सरकार इस बारे में कुछ अधिक ही उत्सुक दिखाई दे रही है। नवनिर्वाचित सांसदों के शपथ ग्रहण समारोह के साथ ही प्रधानमंत्री द्वारा, इस उद्देश्य के लिए सर्वसम्मति बनाने के बहाने, लोक सभा में प्रतिनिधित्व रखतीं सभी राजनीतिक पार्टियों के शीर्षस्थ नेताओं की एक विशेष बैठक बुलाना, इस बैठक में मुख्य विपक्षी पार्टी-कांग्रेस सहित लगभग आधी पार्टियों के ना शिरकत करने के बावजूद इस गंभीर संवैधानिक मुद्दे पर ‘सब कमेटी’ गठित करके उससे तिथिबद्ध समय में सिफारशें प्राप्त करने की घोषणा करना तथा इस मुद्दे को राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी ‘‘समय की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता’’ के रूप में दर्ज करना, ऐसे स्पष्ट संकेत हैं जो कि यह दर्शाते हैं कि इस मुद्दे के प्रति सरकार बहुत बेताव है तथा वह भारतीय संविधान की जनवादी व संघीय व्यवस्थाओं पर एक जोरदार चोट करने की तैयारी में है।
अच्छी बात यह है कि इस उद्देश्य के लिए बुलाई गई उपरोक्त बैठक में 21 पार्टियों ने ही भाग लिया जबकि निमंत्रण 40 पार्टियों को भेजा गया था। बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, डी.एम.के., ए.आई.ए.डी.एम.के. तथा शिव सेना जैसी 16 पार्टियां इस बैठक में शामिल ही नहीं हुईं जबकि तृणमूल कांग्रेस व दो अन्य पार्टियों ने इस मुद्दे पर अपने विचार लिखित रूप में भेजे हैं तथा सरकार की इस ‘‘दुर्भावना से प्रेरित पहुंच’’ का विरोध करते हुए इसे ‘राष्ट्रपति शासन’, एकाअधिकारवादी प्रशासन व तानाशाही की ओर बढऩे का प्रारंभ भी करार दिया है। इस अवस्था में यह आवश्यक है कि मोदी सरकार की इस नई नारेबाजी की व्यापक जांच-पड़ताल की जाए।
जहां तक लोकसभा व विधानसभाओं के एक साथ चुनाव करवाए जाने का संबंध है, यह मोदी सरकार का कोई नया अविष्कार नहीं है तथा व्यवहारिक रूप में ही यह कोई अद्वितीय मुद्दा नहीं है। देश में ‘‘सार्वभौमिक मताधिकार’’ आधारित 1952 में हुए प्रथम चुनावों के समय तथा इसके उपरांत 1957, 1962 व 1967 के चुनावों के समय भी लोकसभा व राज्य विधान सभाओं के चुनाव एक साथ ही होते रहे हैं। यह सिलसिला उस समय खंडित हुआ जब केंद्रीय सरकार ने संविधान की धारा 356 का दुरुपयोग करते हुए विपक्षी पार्टियों के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों को तोडऩे तथा विधानसभाओं को भंग करने के, जनवाद को ध्वस्त करने वाले व्यवहार का उपयोग करना प्रारंभ किया। या कोई केंद्रीय सरकार, अल्पमत में चले जाने के कारण, लोक सभा में विश्वास प्राप्त करने में असफल रहने के डर से समय से पहले ही चुनाव करवाने की ओर बढ़ गई या फिर भंग हो गई। यह भी स्मरणीय है कि पंडित नेहरू के नेतृत्व वाली केंद्रीय सरकार ने देश में धारा 356 का उपयोग सर्वप्रथम केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की कामरेड ई.एम.एस. नंबूदिरीपाद सरकार को भंग करने के लिए किया था। परंतु 1967 के उपरांत तो इस धारा का थोक में दुरुपयोग प्रारंभ हो गया। इससे एक ही समय पर केंद्र व समस्त प्रांतों में एक साथ चुनाव करवाने की प्रणाली टूट गई। नए प्रांतों के अस्तित्व में आने के साथ भी कुछ स्थानों पर विधानसभा चुनाव करवाने की आवश्यकता पैदा हुई। इसके बावजूद पिछले दिनों संपन्न हुए 2019 के चुनावों के समय भी लोकसभा के साथ-साथ आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, अरुणाचल प्रदेश व सिक्किम के विधानसभा चुनाव भी हुए हैं। इस तरह भारतीय संविधान के अनुसार, लोकसभा के साथ किसी विधानसभा के चुनाव करवाये जाने पर न कोई पाबंदी है तथा न ही ऐसा करने की कोई मजबूरी है। दोनों सदनों के अपने-अपने कार्य क्षेत्र हैं तथा भिन्न-भिन्न महत्त्व हैं। देश के जनवादी पथ पर विकास के लिए तथा देश के भीतर संघीय ढांचे की मजबूती के लिए ऐसी व्यवस्था आवश्यक भी है।
यद्यपि अब जबकि ऐतिहासिक कारणों से यह चुनाव एक साथ करवाने संवैधानिक रूप में व्यवहारिक नहीं रहे तो इसके बावजूद मोदी सरकार की इस शिद्दत भरपूर पहल का वास्तविक कारण क्या है? इस अभिमानी चाल की पुष्टि के लिए इस सरकार के समर्थकों द्वारा जो तर्क पेश किए जा रहे हैं, वह बहुत ही ऊपरी किस्म के हैं। यह कहा जा रहा है कि अलग-अलग समय पर चुनाव करवाने से पैसा अधिक खर्च होता है, समय बहुत नष्ट होता है या देश के भीतर भिन्न-भिन्न स्थानों पर चुनाव संहिता भिन्न-भिन्न समयों पर लगने से विकास की निरंतरता में विघ्न पैदा होते हैं।
यदि इन समस्त कुतर्कों को सही भी मान लिया जाए तो इन तथाकथित बाधाओं के समाधान के लिए कोई आसान रास्ते ढूंढे जा सकते हैं। समय घटाने के लिए चुनाव एक या अधिक दो पड़ावों में किए जा सकते हैं। चुनाव संहिता के मामले में भी अर्थहीन पाबंदियां समाप्त की जा सकती हैं क्योंकि समस्त पाबंदियां अक्सर विपक्षी दलों या छोटी पार्टियों पर ही लागू की जाती हैं। सत्ताधारी पार्टियां तो ताल ठोक कर हर पाबंदी की धज्जियां उड़ाती हैं। उदाहरणस्वरूप इन चुनावों से पहले, पिछली मोदी सरकार ने समस्त नैतिक मूल्यों की तिलांजलि देते हुए किसानों की वोटें प्राप्त करने के लिए, ‘‘किसान सम्मान योजना’’ का प्रपंच ठीक चुनावों के नजदीक आ जाने के समय रचा था तथा, उसे 4 महीने पहले से लागू करके नैतिक मान्यता देने का पाखंड भी किया था। इन चुनावों के दौरान चुनाव संहिता का उल्लंघन जितना प्रधानमंत्री व भाजपा के अन्य नेताओं ने किया, वह भी चुनाव धांधलियों के पक्ष से एक नया रिकार्ड है, परंतु चुनाव आयोग ने इस संदर्भ में आई समस्त शिकायतों को पूरी तरह रद्द कर दिया तथा हर मामले में प्रधानमंत्री व भाजपा अध्यक्ष को ‘क्लीन चिट’ देकर सम्मानित किया; चाहे चुनाव आयोग के सदस्यों में इस निर्णयों पर सर्वसम्मति नहीं भी होती रही। निचले स्तर पर भी चुनाव प्रेक्षकों की ‘सेनायें’ केवल छोटे दलों के उम्मीदवारों को ही तंग-परेशान करने में जुटी रहती हैं। सत्ताधारी दल के उम्मीदवार तो राजसत्ता के बल पर हर तरह का अनुशासन भंग करते हैं। ऐसे व्यर्थ चुनाव खर्च यकीनन ही कम किए जा सकते हैैं तथा चुनाव संहिता के पालन के लिए समस्त पार्टियों से मिलकर कोई वैकल्पिक, कड़ी व प्रभावशाली व्यवस्थाएं की जा सकती हैं। चुनाव आयोग व संचार साधनों के वर्तमान राजनीतिकरण को विशेष रूप में दूरदर्शन व आकाशवाणी के निवर्तमान बंधुआ रूप को समाप्त करके भी चुनाव संहिता के पक्ष से काफी सुधार किए जा सकते हैं तथा चुनाव खर्च को कम किया जा सकता है। वैसे देश में जनवादी सामाजिक तंत्र को बनाए रखने तथा विकसित करने हेतु जनवादी संस्थाओं व मूल्यों की मजबूती के लिए किया जाता व्यय, अपव्यय नहीं समझा जा सकता।
जहां तक बार-बार चुनाव संहिता लागू होने से विकास की निरंतरता में विघ्न पैदा होने के तर्क का संबंध है, यह तो पूर्ण रूप से बेतुकी बात है। मनाही तो केवल इतनी ही होती है कि चुनावों के समय, वोटें हथियाने के लिए वोटरों को लुभाने के लिए सत्ताधारी पार्टी कोई नया पाखंड न रचे। पहले से घोषित प्रौजेक्ट तो चलते ही रहते हैं। या फिर चुनावों के बीच कर्मचारियों के स्थानांतरण का व्यापार रूक जाता है। इससे किस विकास में बाधा उत्पन्न होती है? यहां यह नोट करना भी बनता है कि जहां तक देश के विकास का संबंध है उसके बारे में तो इन पूंजीपति समर्थक सरकारों को कभी कोई चिंता हुई ही नहीं। क्योंकि विकास के दो जुड़ते मूल स्त्रोत होते हैं (1) उत्पादन में बढ़ौत्तरी तथा (2) उसका न्यायोचित वितरण। यद्यति यह सरकारें कुल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में बढ़ौत्तरी का तो ढिंढोरा पीटती है, परंतु उसके न्यायोचित वितरण की ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देती। जब एक ओर श्रमिको के वेतनों, विशेष रूप में उनकी वास्तविक आमदनी; निरंतर क्षरित होती जाती है; कृषि उपजें, देशी-विदेशी कंपनियों के रूप में शिकार की तलाश में घूम रहीं व्यापारिक गिद्धों द्वारा मिट्टी के भाव खरीदी जा रही हों तथा दूसरी ओर कारपोरेट घरानों की दौलत के अंबार दिन-प्रतिदिन ऊंचे होते चले जा रहे हों तथा किसान कंगाली की ओर धकेले जा रहा हो तथा गरीबी व अमीरी के बीच का अंतर भयंकर रूप धारण करता जा रहा हो; तो यह स्पष्ट ही है कि यहां निरंतर, समावेशी व चिरस्थाई विकास की किसी को कोई चिंता नहीं। इन सत्ताधारियों के लिए विकास का शब्द, केवल व केवल, आम लोगों की आंखों में धूल झोंकने का एक साधन मात्र ही है। क्योंकि इनका विकास माडल देश के भीतरी बाजार को विकसित नहीं करता बल्कि उसे बर्बाद ही करता है तथा निर्यात पर ही केंद्रित रहता है। उसकी अपनी अंतर्राष्ट्रीय सीमाएं हैं, जो अंतिम रूप में, मेहनतकशों की विशाल बर्बादी का साधन बनती हैं। विकास का अर्थ तो है: समूचे देश के हर मेहनतकश के लिए योग्यतानुसार, गुजारेयोग्य व भरोसेयोग्य रोजगार, सबके लिए समान, सस्ती व गुणवत्तायुक्त शिक्षा सुविधाएं, सबके लिए भरोसेयोग्य व मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं, पेय जल की बेरोकटोक उपलब्धता, यातायात के उचित प्रबंध व बजुर्गों के लिए सम्मानजनक सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थाएं आदि। ऐसा जन-पक्षीय विकास ही अंतिम रूप में देश की सुरक्षा प्रणाली को मजबूत बना सकता है। देश के करोड़ों मेहनतकशों द्वारा खून-पसीना बहा कर की गई कमाई में से टैक्सों द्वारा एकत्रित किए गए सार्वजनिक धन को भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ाकर या अफसरशाही व विधानकारों के शाही खर्चों पर लुटा कर उसमें से बचे-खुचे को गरीबों के खातों में स्थानांतरित कर देना जन कल्याण बिल्कुल भी नहीं है। ऐसे अमानवीय व घातक अभिमानी व्यवहार से उत्साही व उद्यमी लोग पैदा नहीं किए जा सकते, भिखारियों वाली मरणासन्न मानसिकता के शिकार ही जन्म ले सकते हैं। इस तरह, मोदी सरकार द्वारा ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ के छोड़े गए जुमले के लिए ‘विकास की निरंतरता’ रुकने का बहाना बनाना पूर्ण रूप से ढकौंसलेबाजी भर ही है।
इस समूची पृष्ठभूमि में, मोदी सरकार के ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ के इस नारे का वास्तविक उद्देश्य फिर क्या है? कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे बेरोजगारी, मंहगाई व कुपोषण जैसी देश के समक्ष मुंह बाये खड़ी महामारियों से लोगों का ध्यान हटाने का एक प्रयत्न कहा है। किसी सीमा तक यह समझदारी भी दरुस्त है। परंतु इसका वास्तविक उद्देश्य भाजपा को राजनीतिक, सैद्धांतिक व सांगठनिक क्षेत्र में नेतृत्व प्रदान कर रहे आर.एस.एस. की भारत को एक धर्म आधारित राष्ट्र में तब्दील करने की मनोकामना को पूर्ण करना है। इस प्रतिक्रियावादी इरादे को साकार करने के लिए, आर.एस.एस. के भिन्न-भिन्न संगठनों में कार्यरत कार्यकत्र्ता, अल्पसंख्यकों, अंधविश्वास का विरोध करने वाले बुद्धिजीवियों व समानता पर आधारित समाज का सृजन करने के लिए संघर्षशील लोगों के विरुद्ध अतिघिनौनी किस्म की घृणा फैला रहे हैं, उनके विरुद्ध हिंसा या हुल्लड़बाजी के हथियार सरेआम उठाए घूम रहे हैं, उनके इन काली करतूतों के विरुद्ध देश की जनवादी संविधानिक संस्थाओं में भी चर्चा होती है; जिन्हें वे बंद करवाना चाहते हैं क्योंकि यह कुकर्म देश के वर्तमान संवैधानिक ढाचें में पूर्ण नहीं हो सकता। इसके लिए इस जनवादी ढांचे को तोडक़र यहां संसदीय-प्रणाली की जगह राष्ट्रपति प्रणाली लागू करना चाहते हैं ताकि इनका देश में ‘‘एक धर्म-एक नेता’’ का सपना साकार हो सके। आर.एस.एस. की अपनी संरचना इस फाशीवादी सिद्धांत के अनुरूप ही है। इस उद्देश्य के लिए यकीनन ही उन्हें यहां ऐसी जनवादी, धर्म निरपेक्षता व संघवाद को रूपमान करती व्यवस्थाएं सुहाती नहीं है। इसलिए ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ के नारे के अधीन वे संविधान के भीतर ऐसी व्यवस्थाएं कायम करना चाहते हैं जिससे चुनावों संबंधी संविधान की वर्तमान समस्त धारणाओं को ध्वस्त करके ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे कि विधानसभा चुनावों के महत्त्व को घटा कर इन्हें निरर्थक बना दिया जाए तथा उन्हें लोक सभा चुनावों के साथ बांध दिया जाए। इससे प्रांतों का स्वतंत्र अस्तित्व व संप्रभुता निश्चित ही प्रभावित होगी। इसका अर्थ यह भी है कि प्रांत में बनी कोई भी सरकार, चाहे वह गैर-सैद्धांतिक जोड़-तोड़ द्वारा या अवसरवादी व स्वार्थी तत्वों को लोभ-लालच देकर ही गठित की गई हो, पूरे पांच साल कार्य करेगी। तथा यह भी कि केंद्र जब चाहे अनैतिक ढंग तरीकों का प्रयोग करके किसी राज्य सरकार को भंग कर सके तथा वहां जितना समय मर्जी हो राष्ट्रपतिशासन लागू रखे। इस तरह धारा 356 के दुरुपयोग को, जिस पर सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के कारण रोक लगी है, पुन: संवैधानिक व कानूनी मान्यता मिल जाए तथा लोगों के जनादेश को भी निरर्थक बना दिया जाएगा तथा संघीय ढांचे का भी सफाया कर दिया जाएगा।
यद्यपि हमारी यह परिपक्व राय है कि भारत जैसे ‘विभिन्नता में एकात्मता’ (ठ्ठद्बह्ल4 द्बठ्ठ ष्ठद्ब1द्गह्म्ह्यद्बह्ल4) को रूपमान करते देश में, आर.एस.एस./मोदी सरकार के ऐसे एकाधिकारवादी इरादे कदाचित सफल नहीं हो सकते। भारत एक बहुराष्ट्रीय देश है, जहां भिन्न-भिन्न नस्लों से संबंधित रहिवासियों के अपने ठोस क्षेत्र भी हैं तथा, जहां भिन्न-भिन्न राष्ट्रीयताओं की अपनी-अपनी भाषाएं हैं तथा भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक सरोकार हैं। भिन्न-भिन्न धर्मों के पैरोकारों के बीच भी यहां भाईचारक सहअस्तित्व के सहिचार का लंबा इतिहास है। हर तरह की इन सामाजिक व सांस्कृतिक विभिन्नताओं को, औपनिवेशिक दासता के विरुद्ध लड़े गए रक्तरंजित संघर्ष ने राष्ट्रीय एकजुटता प्रदान की है। यह बात अलग है कि पिछले लंबे समय के दौरान सत्ताधारियों द्वारा, यहां एकसमान विकास से आंखें मूंद कर तथा अपने संकुचित राजनीतिक हितों की खातिर, इस एकजुटता को कमजोर करने तथा इस पर सांप्रदायिक रंग चढ़ाने के भी बार-बार प्रयत्न किए गए हैं परंतु भारतीय संविधान के संघीय चौखटे तथा इसमें दर्ज जनवादी व्यवस्थाएं देश की एकता अखंडता की रक्षा के लिए बढिय़ा आधार प्रदान करती हैं।
मोदी सरकार का ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ का नारा स्पष्ट रूप में इन जनवादी व संघीय व्यवस्थाओं पर एक गुप्त हमला है, जिसका हर स्तर पर डट कर विरोध किए जाने की आवश्यकता है। इस उद्देश्य के लिए होती बैठकों का बाहिष्कार करके नहीं बल्कि बैठकों में भी तथा जनसमूहों को इस सरकार के घातक इरादों के बारे में जागरूक करके भी।
–हरकंवल सिंह
(25-06-2019)