दस्तावेज
(केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर कंस्टीट्यूशन क्लब एनेक्स, नई दिल्ली, 5 मार्च 2019 को हुई श्रमिकों की राष्ट्रीय कन्वैंशन में पारित)
प्रिय श्रमिक भाइयों एवं बहनों,
हम श्रमिक, किसानों व अन्य मेहनतकश लोगों के साथ मिलकर देश में धन उत्पति करते हैं। हम ही देश की आर्थिक वृद्धि में योगदान देते हैं। इसके बावजूद भी हमारे मुखर मुद्दे व हमारी समस्याओं पर व हमारी मांगों को सरकारों द्वारा अनदेखा किया जाता है। पिछले कई वर्षों से श्रमिक संगठनों का संयुक्त आंदोलन मजदूर वर्ग के प्रश्नों व मांगों को लगातार उठाता आ रहा है। हमने कई तरीकों से अपने मुद्दे व मांगे दोहरायी हैं, जिसमें से अभी हाल ही में दो दिवसीय राष्ट्रव्यापी आम हड़ताल भी शामिल है जिसे आम पीडि़त मेहनतकश जनता का भरपूर समर्थन प्राप्त हुआ और फिर से सरकार के समक्ष मांगें पेश की गई और उनका निदान मांगा गया।
आज पूरा देश घोर संकट में है। श्रमिकों, किसानों, खेत मजदूरों अन्य मेहनतकश जनता की रोजमर्रा की जिंदगी हर पहलू से संकट में घिरी हुई है। कृषि संकट और ग्रामीण अर्थतंत्र का संकट लगातार जारी है। बहुत ही संघर्षों से प्राप्त श्रम अधिकार व ट्रेड यूनियन अधिकारों पर हमला जारी है। हजारों किसानों की आत्महत्या का दौर भी जारी है। ग्रामीण क्षेत्रों में काम के अभाव में खेतिहर मजदूर व गरीब किसान कामों की तलाश में शहर की तरफ पलायन करता है व शहर के असंगठित श्रमिकों के साथ बहुत कम वेतन पर काम करने की प्रतिस्पर्धा में शामिल होता है, जहां वेतन भी कम है तथा सामाजिक सुरक्षा भी उपलब्ध नहीं है।
सभी आवश्यक वस्तुओं, घर, बिजली, आवागमन के साधन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि की कीमतें बढ़ती जा रही हैं। जबकि मजदूरों की आमदनी में बढ़ौतरी नहीं हो रही है। बहुत से क्षेत्रों में ठेका मजदूर, रोजाना व कैजुअल मजदूरों व असंगठित क्षेत्र में लगे मजदूरों की आमदनी लगातार महंगाई के चलते असल में घट गई है। असंगठित क्षेत्र में जुड़े श्रमिकों के ऊपर इस हालात में सबसे ज्यादा कुप्रभाव है और वो ही किसी भी प्रकार की सामाजिक सुरक्षा से भी वंचित है। चाय व कॉफी बागानों में मालिकों द्वारा वहां लगे मजदूरों का घोर शोषण जारी है और बीमार उद्योग इकाइयों में तो रोजगार छिनने की नौबत है।
सरकार 15वीं राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन में सर्वसम्मति से पारित नीति तथा उसके साथ रप्टाकोस एवं ब्रेट केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय अनुसार राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन तय करने व लागू करने को इंकार कर रही है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फैसले में सुनाए गए तथा राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन द्वारा निर्देशित सिद्धांत ‘‘एक समान काम का, एक समान वेतन’’ तथा ठेका मजदूर, दिहाड़ीदार मजदूर आदि को उसी काम में लगे परमानेंट मजदूर के बराबर वेतन तथा अन्य सुविधाएं देने को भी लागू नहीं किया जा रहा है।
आम सहमति से राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन में पारित निर्देश को भी सरकार स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं जिसके मुताबिक एक करोड़ के आस-पास सरकारी स्कीमों में लगे श्रमिक जिनमें अधिकतर महिलाएं हैं, उन्हें मजदूर का दर्जा देना स्वीकृत किया गया है। मानदेय के नाम पर उन्हें बहुत ही कम पैसा दिया जाता है। श्रम जगत में कामकाजी महिलाओं के प्रति भेदभाव जारी रहता है। काम के स्थान पर महिला कर्मियों के लैंगिक शोषण की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। बेरोजगारी एक बहुत ही गंभीर प्रश्न बनता जा रहा है, केवल युवा ही इससे पीडि़त नहीं बल्कि आम मजदूर भी पीडि़त है जो कई हजारों की गिनती में रोजगार खो रहा है। चूंकि लगातार फैक्ट्रियों में तालाबंदी जारी है। दरअसल कार्य प्रदान करने वाले उद्यमों में काम बढऩे की बजाय घट रहा है।
श्रमिकों व श्रम संगठनों के घोर विरोध के बावजूद सरकार श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी परिवर्तनों को तेजी से आगे बढ़ा रही है। चूंकि वो अपने ‘इज ऑफ डूईंग बिजनेस’, बिजनेस और आसान हो के एजेंड़ा को तेजी से बढ़ाने के उद्देश्य को पूरा करने की ओर अग्रसर है। सरकार 44 केंद्रीय कानूनों को 4 कोड में बदलने के अपने निर्णय को आगे बढ़ा रही है। सरकार का उद्देश्य है श्रमिकों के कई दशकों के संघर्ष से प्राप्त कानूनों को व जितनी भी उपलब्ध सामाजिक सुरक्षा प्राप्ति के कानून है उनको कमजोर व अपदस्थ करना ताकि मजदूरों को मालिकों की गुलामी करने की ओर धकेला जा सके।
सरकार, श्रम कानूनों में संशोधन से भी पहले मालिकों को हायर एंड फायर (काम पर रखो और कभी भी निकालो) के सिद्धांंतों को लागू करने के नए उपाय निकाल लाई है। एक नोटिफिकेशन के जरिए से सरकार फिक्स टर्म एम्पलायमेंट (स्नद्ब3 ञ्जद्गह्म्द्व श्वद्वश्चद्यश4द्वद्गठ्ठह्ल) के सिद्धांत को ले आई है। नीम (श्वद्वश्चद्यश4ड्डड्ढद्बद्यद्बह्ल4 श्वठ्ठद्धड्डठ्ठष्द्गद्वद्गठ्ठह्ल रूद्बह्यह्यद्बशठ्ठ) तथा नेताप (हृड्डह्लद्बशठ्ठड्डद्य श्वद्वश्चद्यश4द्वद्गठ्ठह्ल ह्लद्धह्म्शह्वद्दद्ध ्रश्चश्चह्म्द्गठ्ठह्लद्बष्द्गह्यद्धद्बश्च क्कह्म्शद्दह्म्ड्डद्वद्वद्ग) कार्यक्रम लाए गए हैं। ताकि पक्के रोजगार को पूरी तरह से निरस्त कर दिया जाए। अब ठेका मजदूरों को भी एप्रेंटिस व ट्रेनिंग मजदूरों के रूप में बदला जा रहा है। हमारे युवाओं का भविष्य तो बहुत ही धूमिल बनाया जा रहा है जहां उन्हें पक्के काम (क्कद्गह्म्द्वड्डठ्ठद्गठ्ठह्ल द्भशड्ढह्य) की सुरक्षा व सामाजिक सुरक्षा से वंचित रखा जाएगा।
सरकार अपनी निजीकरण की नीति को विनिवेश, रणनीतिक बिक्री और पूरी तरह से बेचने के लिए विभिन्न तरीकों से आगे बढ़ रही है। जितने भी महत्वपूर्ण सार्वजनिक क्षेत्र है जैसे डिफेंस प्रोडक्शन, रेलवे, बीमा योजना, बैंक, खुदरा व्यापार आदि में 100 प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश के जरिये से आगे बढ़ रही है। कोयला क्षेत्र के निजीकरण को बढ़ावा देते हुए सरकार कमर्शियल खनन की नीति ले आई है। 600 रेलवे स्टेशनों व इसके इर्द-गिर्द की भूमि को निजी कंपनियों के हवाले करने के लिए चिन्हित करने का काम जारी है। देश के सार्वजनिक डिफेंस ओद्यौगिक इकाइयों से लगभग 272 आईटम जिसमें शस्त्र व अन्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण औजार बनाए जाते थे वो सब काम निजी कंपनियों को दे दिया गया है। मेक इन इंडिया के तहत किए जा रहे इन कदमों से असल में छ: दशकों से जो डिफेंस क्षेत्र में शोध का काम किया गया है, उत्पादन की क्षमता बढ़ी उस सबको बर्बाद किया जाएगा। सार्वजनिक क्षेत्र के दूसरे अदारे जैसे बिजली, पेट्रोलियम, टेलीकॉम, स्टील, हवाईपतन, ऊर्जा, र्पोटस, गैर कोयला खनन, सडक़ परिवहन आदि पर सरकार की तरफ से निजीकरण का तेजी से हमला जारी है।
सरकार अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी जो सब देशवासियों को सर्वव्यापी अच्छी शिक्षा व स्वास्थ्य प्रदान करने की है उसे भी नकार रही है। सरकारी स्कूलों, कॉलेजों-यूनिवर्सिटियों तथा अस्पतालों के लिए बजट प्रावधान कम किए गए हैं जबकि निजी क्षेत्र में शिक्षा व स्वास्थय को व्यापार के रूप में बढ़ाने के लिए भरपूर सहयोग व तरह-तरह की छूट दी जा रही है।
नोटबंदी में 86 प्रतिशत करंसी को एकदम रद्द करने से जो आम जनता पर संकट गहराया उसके साथ ही लाखों छोटे और मध्यम फैक्ट्रियों व उद्यमों तथा कारोबार बंद हो गए। असंगठित क्षेत्र के कई लाखों श्रमिकों की तथा छोटे किसानों की कमाई छिन गई। नोटबंदी के समय गिनाए गए उद्देश्यों में से कुछ की भी उपलब्धि नहीं हो सकी। केवल डिजिटल पेमेंट के प्लेटफार्म को फायदा पहुंचाया गया।
जी.एस.टी ने भी छोटे उद्योगों व कारोबार को बहुत संकट में डाला और उसमें लगे लाखों मजदूरों की जीविका पर कुप्रभाव डाला। हजारों छोटे व मध्यम उद्योग तथा खुदरा व्यापारी अभी भी संकट से उभर नहीं पा रहे हैं।
देश की मेहनतकश व आम जनता का पैसा जो सरकारी बैंकों में था उसे लूटने वाले कार्पोरेट बिजनेस घराने देश से पलायन कर रहे हैं। केवल 50 के करीब कार्पोरेट घराने 80 प्रतिशत एनपीए के नाम पर लूट के जिम्मेदार हैं। सरकार जो आम लागों की बुनियादी आवश्कताओं व सामाजिक उत्थान के कार्यक्रमों के लिए आवश्यक खर्चा करने से मना करती है, वहीं देश के बड़े पूंजीपतियों व दुनियां की कार्पोरेट कंपनियों को हर वर्ष 5 लाख करोड़ की तरह-तरह से छूट देती है।
यह तो स्पष्ट है कि सरकार अपने कार्पोरेट मालिकों की सेवा में दिन दूनी रात-चौगुनी लगी हुई है। जो भी सरकार की इन जन-विरोधी, देश विरोधी नीतियों का विरोध करते हैं उन्हें तानाशाही तरीकों से दबाने का प्रयास किया जाता है।
मानव अधिकारों व अन्य सामाजिक सरोकार के लिए लडऩे वाले कार्यकर्ताओं को जा श्रमिकों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा में उतरते हैं उन्हें राष्ट्र विरोधी कहना, सजा देना व यहां तक कि मार देना आम बात की तरह बढ़ता जा रहा है। केवल यही नहीं, केंद्रीय सरकार ऐसे संगठनों व तत्वों को बढ़ावा देती है जो आपसी नफरत, विद्वेष व साम्प्रदायिक भावना को भडक़ाने का काम करते हैं। यह सब इस उद्देश्य से किया जाता है, ताकि श्रमिकों व समाज के अन्य वर्गों की एकता और भाईचारे को तोड़ा व कमजोर किया जा सके ताकि उनकी नवउदारवाद की नीतियों के चलते जीविका पर कुप्रभाव के विरूद्ध उनका डटकर विरोध करने के आंदोलनों को कमजोर किया जा सके।
हम श्रमिकों ने पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से मिलजुलकर इन नीतियों का डटकर विरोध किया है। हम लोगों ने इस दौर में 18 राष्ट्रीय आम हड़ताल आयोजित की हैं। इसके अतिरिक्त संयुक्त तौर से यूनियनों ने अलग-अलग सेक्टर में भी आंदोलन व हड़तालें की हैं। इन सब आंदोलनों में श्रमिकों की भागेदारी लगातार बढ़ी है।
लेकिन जब चुनावों में सरकारें जीत जाती है, और नीतियां बनाती हैं, जो हम श्रमिकों की जिंदगी में, जीविका के लिए व जीने के साधनों के लिए बहुत अहम होती है, कई मुख्य पार्टियां हमारे प्रश्न व मुद्दों पर शांत हो जाती है। चुनावों के दौरान प्रचार अभियान में श्रमिकों के व अन्य आम जन के प्रश्न, जो जीविका के, बुनियादी सुविधाओं व समस्याओं के तथा इज्जत से मानवीय तरीके से काम करने की सुविधाओं आदि के सब सवाल चुनाव प्रचार से गायब हो जाते हैं। कई पार्टियां तो लोगों को वोट बैंक के रूप में ही देखती हैं तथा हमारे रोजमर्रा के प्रश्नों और मांगों की अनदेखी करते हुए, केवल वोट हित में लोगों में ध्रुवीकरण की राजनीति फैलाई जाती है। सत्ता में आने के बाद तो हमारी अनदेखी कर दी जाती है। सत्ता में आकर कार्पोरेट अमीर घराने जिनसे उन्हें चुनावों में भरपूर अनुदान मिलता है उन्हीं के हुक्म पर चलना और उन्हें और अमीर करने के काम में जुट जाती हैं।
यह कब तक जारी रहेगा? जबकि आज यह आवश्यकता है कि हमें बीजेपी नेतृत्व की इस सरकार को जो मजदूर विरोधी, जन विरोधी व देश विरोधी नीतियां अपना रही हैं, उसे सत्ता से बाहर करना होगा, साथ ही जो भी सरकार आए उससे इन नीतियों में बदल लाकर मजदूर समर्थक, आम जनमानस समर्थक वैकल्पिक नीतियों को बनाने व लागू करवाने की लड़ाई की ओर अग्रसर होना होगा। यह समय है कि चुनावों में श्रमिकों के मुद्दों को उठाया जाए। चुनावी प्रचार की बहस में मजदूरों के मुद्दों को अहम स्थान मिल सकें। आओ, हम सब मिलकर मजदूरों के मांग पत्र को सब राजनैतिक पार्टियों के समक्ष रखें, उन्हें बाध्य करें कि वो इन मुद्दों पर अपनी राय स्पष्ट करें ताकि मजदूरों को किन्हें वोट देना है वो तय कर सकें।
मजदूरों का मांगपत्र
1. 15वीं भारतीय श्रम सम्मेलन की अनुशंसा और रेप्टाकोस एंड ब्रेट मुकदमा में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले अनुसार, जो बाद के 45वें तथा 46वें श्रम सम्मेलनों में भी सर्वसम्मत से दुहराया जाता रहा है, के आलोक में राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन निर्धारित करें, जो 18000 रूपये से कम नहीं हो।
2. स्थायी प्रकृति के कार्यों में ठेका प्रथा का उन्मूलन करें। जब तक ठेका प्रथा का उन्मूलन लम्बित है तब तक स्थायी श्रमिकों के समान काम करने वाले ठेका मजदूरों को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले अनुसार ‘समान काम की समान मजदूरी एवं अन्य सुविधायें सख्ती से लागू करायें।
3. स्थायी और बारहमासी प्रकृति के कामों में बाहरी ठेका और ठेकाकरण बंद किया जाय।
4. भारतीय संविधान एवं समान परिश्रमिक अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार महिलाओं और पुरूषों के लिए समान काम की समान मजदूरी सख्ती से लागू किया जाय जिसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी दोहराया गया है।
5. स्वामीनाथन आयोग की अनुशंसा के अनुसार किसानों के उत्पादन का न्यूनतम समर्थन मूल्य दें एवं जन उगाही प्रणाली मजबूत करें।
6. किसानों की कर्ज माफी और लघु तथा सीमांत किसानों को संस्थानिक कर्जा दिया जाए।
7. कृषि मजदूर सहित सभी मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा और कार्य हालातों को अच्छा करने वाला व्यापक कानून बने।
8. आसमान छूती महंगाई पर नियंत्रण हेतु तत्काल ठोस कार्रवाई हो, आवश्यक वस्तुओं का वायदा कारोबार बंद करें, जन वितरण प्रणाली की सेवा लेने के लिए आधार से जोडऩे का बाध्यकारी प्रावधान खत्म हो।
9. श्रम सघनता को बढ़ावा देने वाले प्रतिष्ठानों को प्रोत्साहित देने वाली नीतियों के द्वारा बेरोजगारी पर नियंत्रण, रोजगार सृजन करने वाले प्रतिष्ठानों से जुड़े नियोजकों को वित्तिय सहायता जुड़ाव/प्रोत्साहन/छूट आदि से रोजगार सृजन को बढ़ावा दिया जाए। सरकारी विभागों के खाली/रिक्त सभी पदों को भरना व नियुक्ति पर रोक समाप्त की जाय और सरकारी पदों को प्रतिवर्ष 3 प्रतिशत समर्पित करने पर रोक लगे।
10. न्यूनतम पेंशन 6000 रूपये प्रतिमाह की गारंटी और सभी के लिए सूचकांक आधारित पेंशन हो।
11. सरकार के विभिन्न स्कीमों में कार्यरत मजदूरों जिसमें आंगनबाड़ी सेविका एवं सहायिका, नेशनल हेल्थ मिशन में कार्यरत आशाकर्मी एवं अन्य कर्मचारियों, मिड डे मिल वर्कर्स, पारा टीचर्स, राष्ट्रीय बाल श्रमिक परियोजना में कार्यरत शिक्षण और गैर शिक्षण कर्मचारी, ग्रामीण चौकीदार आदि को मजदूर की मान्यता देते हुए उन्हें न्यूतनम वेतन, पेंशन सहित सामाजिक सुरक्षा लाभ सभी मिले।
12. ‘फिक्स्ड टर्म नियोजन’ तत्काल समाप्त हो, जो अन्तर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (आइएलओ) की अनुशंसा 204 (जिसे भारत ने अनुमोदित किया है) की भावना के विरुद्ध है।
13. सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों का विनिवेश एवं रणनीतिक बिक्री बंद हो और लोक हित में महत्वपूर्ण सार्वजनिक क्षेत्रों के पुनरूत्थान/पुर्नपरिचालन के लिए पैकेज दें।
14. बीमार जूट उद्योग और चाय बगानों की बंदी के कारण, अभाव, कुपोषण और मृत्यु का सामना कर रहे हजारों मजदूरों के हित में उस उद्योग के पुनरूत्थान और खोलने का कार्य हो।
15. रेलवे, रक्षा, बंदरगाहों, बैंक, बीमा, कोयला आदि के निजीकरण के फैसले को रद्द करें। कोयला क्षेत्र में निजी कम्पनियों द्वारा व्यवसायिक खनन के फैसलों को तत्काल वापस लें।
16. डिफेंस पैदावार की इकाईयों का निजीकरण व बंदी पर तुरंत रोक लगाई जाए। डिफेंस क्षेत्र में पैदावार का विस्तार तथा इस क्षेत्र में देश को स्वावलंबन बनने की नीति सुनिश्चित हो।
17. बैंकों से लिए गए कर्जे (एनपीए) वापिस लिए जाए और कार्पोरेट घराने जो जानबूझकर कर्जे नहीं लौटा रहे उन पर अपराधिक कानूनी कार्यवाही हो और उनसे ऊँचे सेवा चार्ज लिए जाएं। सार्वजनिक बैकों का विलयीकरण बंद हो और बैंक ब्रांचें बंद करने पर रोक लगाई जाए। मुद्रास्फीति को ध्यान में रखते हुए बैंक जमा खातों पर सूद की दर बढ़ाई जाए।
18. सार्वजनिक अदारों की इकाईयों में वेतन वृद्धि की प्रक्रिया पैदावार की शर्तों को लागू किए बिना जारी रखनी चाहिए।
19. मोटर व्हीकल संशोधन बिल 2018 तथा बिजली संशोधन बिल 2017 वापिस हो।
20. 7वें वेतन आयोग के अनुशंसा से संबंधित केन्द्रीय सरकारी कर्मचरियों के मुद्दों का तत्काल समाधान करें।
21. एनपीएस समाप्त कर पुराना पेंशन स्कीम फिर से बहाल हो।
22. श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी और मालिक पक्षी संशोधन एवं संहिताकरण बंद हों। वर्तमान श्रम कानूनों का सख्ती से कार्यान्वयन सुनिश्चित करें।
23. 26 सप्ताह के भुगतेय मातृत्व अवकाश लागू हो, महिला श्रमिकों के लिए मातृत्व लाभ और जच्चा-बच्चा देखभाल केन्द्र (क्रैच) बने। जो नियोजक मातृत्व अवकाश के कानून को लागू कर रहे हैं उन्हें अलग से कोई भी प्रोत्साहन नहीं दिया जाय जैसा कि केन्द्र सरकार ने प्रस्तावित किया है।
24. कार्यस्थल पर महिलाओं के लैंगिक प्रताडऩा निवरण अधिनियम का सख्ती से अनुपालन किया जाय। महिलाओं को राजनैतिक भागेदारी को मजबूत करने के लिए विधान सभा व संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण प्रदान हो।
25. संगठन बनाने की आजादी और सामूहिक सौदेबाजी से जुड़े आइएलओ कन्वेंशन 87 और 98 के अनुमोदन के साथ घरेलू महिलाओं के लिए आइएलओ कन्वेंशन 189 का अनुमोदन किया जाय।
26. सुरक्षा स्वास्थ और पर्यावरण (ओ.एस.एच.) से जुड़े 13 अधिनियमों को मिलाकर एक कोड बनाने एवं ओ.एस.एच. एवं कल्याण प्रावधानों का घालमेल करना बंद करें। वर्तमान अधिनियम और नियमावली का कार्यान्वयन सुनिश्चित करें। कारखाना निरीक्षक, खान निरीक्षकों के खाली पदों को भरा जाय और निरीक्षण पर लगी रोक समाप्त हो। इस विषय से जुड़े आइएलओ कन्वेंशन 155 एवं अनुशंसा 164 का अनुमोदन हो। दुर्घटनाओं में माननीय एवं वित्तिय क्षति का त्रिपक्षीय अंकेक्षण बाध्यकारी हो।
27. द्विपक्षीय और त्रिपक्षीयतावाद को मजबूत करें। हर प्रतिष्ठानों के नियोजकों द्वारा ट्रेड यूनियनों की मान्यता बाध्यकारी बनाई जाए। श्रमिकों से जुड़े मुद्दों पर ट्रेड यूनियनों के साथ विमर्श किया जाये और बिना आम सहमति के फैसले नहीं लिए जाय एवं मजदूर प्रतिनिधियों से नियमित और फलप्रद सामाजिक संवाद की गारंटी की जाय।
28. कॉर्पोरेटों को दिये जा रहे अनुदानों में कटौती हो।
29. संविधान संशोधन के द्वारा काम का अधिकार मौलिक अधिकार बने।
30. मनरेगा (महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्पलाइमेंट गारंटी एक्ट) में 300 दिन काम मिले। राज्यों के न्यूनतम मजदूरी से कम न्युनतम वेतन निर्धारण नहीं हो।
31. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार मल लाइनों की अमानवीय ढंग से मानव द्वारा सफाई पर सख्ती से रोक हेतु उचित उपाय किये जायें। मल लाइनों की सफाई में मरने वाले सफाई कर्मियों को परिवारों को क्षतिपूर्ति मिले।
32. अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम का सख्ती से अनुपालन हो।
33. अनुसूचित जाति व अनुसूचित जन जातियों को आरक्षण लाभ के अनुपात में सरकारी पदों पर पुरानी रिक्तियां (बैंक लॉग) तुरंत भरी जाय। यह आरक्षण निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठानों के नियोजन में भी लागू किया जाय।
34. आदिवासियों को उनके जंगल-जमीन से बेदखल करने पर रोक लगे। उनके लिए बने कानून का सख्ती से पालन हो।
35. अंर्तजातीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय विवाह करने वाले जोड़ों की सुरक्षा हो। सम्मान के नाम पर हत्याओं (ऑनर किलिंग) को बढ़ावा देने वाले तत्वों पर सख्ती से कार्रवाई की गारंटी हो।
36. बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के दोषियों को कड़ाई से सजा दिलाने की गारंटी हो।
37. भारत के संविधान का अनुच्छेद 51 का असरदार कार्यान्वयन सुनिश्चित कराने के लिए आम नागरिकों को आह्नान किया जाय कि ये सद्भावना को प्रोन्नति दे, आम लोगों में भाईचारा, विविधता और धार्मिक, भाषायी, क्षेत्रीय और विविध सांस्कृतिक आयामों को आगे बढक़र अपनाये और महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली अपमानजनक नीतियों की निंदा करें।
38. सभी बच्चों को तकनीकि शिक्षा सहित कक्षा 12 तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा। शिक्षा का बजट आबंटन सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 10 प्रतिशत होना चाहिए।
39. सभी के लिए मुफ्त स्वास्थ्य देखभाल, ग्रामीण और खासकर और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य ढांचा का सुदृढ़ीकरण हो तथा स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च जीडीपी का 5 प्रतिशत हो।
40. पूरी आबादी के लिए स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो।
41. स्ट्रीट वेंडरों, रेहरी-पटड़ी एवं खोमचे वाले की संरक्षा सुनिश्चित हो। राज्यों को इसके लिए कानून के अनुसार नियमन बनाने चाहिए।
42. गृह आधारित मजदूरों, जो महिलाओं के प्रभुत्व वाला क्षेत्र है, के हितों की रक्षा के लिए गृह आधारित मजदूरों के लिए एक काूनन के साथ उनके हितों की रक्षा के लिए आईएलओ 177 का अनुमोदन किया जाय।
43. मजदूरों के कल्याण के लिए बनाए गये सभी कल्याणकारी बोर्डों में मजदूरों की सक्रिय और असरदार भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। भवन और अन्य निर्माण मजदूर कल्याण बोर्ड द्वारा वसूले गये उपकरों के बिना खर्च किये गये शेष रकमों का खर्च सिर्फ मजदूरों के कल्याण के लिए हो। वेलफेयर बोर्ड में समुचित मात्रा में मजदूरों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए बोर्ड का संचालन एवं क्रियाकालापों को सुदृढ़ किया जाना चाहिए ताकि मजदूर का निबंधन हो तथा कल्याण लाभ तक मजदूरों की सीधे पहुंच हो सकें।
44. सरकार को राज्यों को निर्देश देना चाहिए कि कचरे की रिसाईकलिंग में लगे हर स्तर के शहरों के लिए ठोस कचरा प्रबंधन हो और उसमें इसमें लगे सभी श्रमिकों को सम्मिलित किया जाए।
45. वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट में परिवर्तन करके सभीे मीडिया संगठनों के पत्रकारों व श्रमिकों को अच्छा वेतन और काम की सुरक्षा प्रदान हो सके। सब प्रकार के मीडिया में वेतन वृद्धि के लिए नये वेज बोर्ड का गठन किया जाये।