हरकंवल सिंह
केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा बीते 10 मार्च को जारी किए गए नोटिफिकेशन से, समूचे देश में, 17वीं लोकसभा के गठन के लिए चुनाव प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। आगामी दो महीनों तक अब यहां चुनावों की हलचल जारी रहेगी। पूंजीवादी व्यवस्था में राजसत्ता के घोड़े की लगाम हथियाने के लिए हर चुनाव ही देशवासियों के लिए भारी महत्त्व रखता है। राजसत्ता के दावेदार परस्पर-विरोधी राजनीतिक दलों के अतिरिक्त आम लोगों की भी इन चुनावों के साथ कई आशाएं-उमंगें जुड़ी होती हैं। इसलिए अपने-अपने राजनीतिक चेतना के स्तर के अनुरूप हर व्यक्ति ही इन चुनावों में दिलचस्पी लेता है।
हमारे देश में हो रहे वर्तमान चुनाव कुछ अधिक ही महत्त्वपूर्ण हैं। इनका भारत के अस्तित्व के भविष्य पर कुछ अधिक ही चिरस्थाई प्रभाव पडऩे के अनुमान लगाए जा रहे हैं। जहाँ, एक ओर भारतीय जनता पार्टी राजसत्ता पर अपना कब्जा कायम रखने के लिए भरसक प्रयत्न कर रही है। इस उद्देश्य के लिए उसके नेता हर तरह के अनैतिक ढंग-तरीकों का उपयोग कर रहे हैं। नित्य नई भ्रमित करने वाली जुमलेबाजियों के अतिरिक्त उनके द्वारा घटिया किस्म के आरोप लगाने तथा झूठे प्रचार का भी सहारा लिया जा रहा है। लोगों को भ्रमित करने के लिए कृत्रिम आंकड़ों का भी प्रयोग किया जा रहा है। मेहनतकश जनसमूहों के बेरोजगारी, गरीबी, मंहगाई, भ्रष्टाचार व निरंतर बढ़ रहे सामाजिक व प्रशासनिक उत्पीडऩ जैसे वास्तविक मुद्दों से उनका ध्यान बांटने के लिए मंदिर-मस्जिद जैसे धार्मिक व अंधराष्ट्रवाद आधारित भावनात्मक मुद्दे जोर-शोर से उभारे जा रहे हैं।
यद्यपि दूसरी ओर, मोदी सरकार की, विशेष रूप से खुद प्रधानमंत्री मोदी की, 5 वर्षों की जनविरोधी व बेसिर-पैर की बातों से त्रस्त लोग इस साम्राज्यवादपरस्त सांप्रदायिक सत्ताधारी गिरोह से निजात हासिल करने के लिए बेहद तत्पर दिखाई देते हैं। वे इस सरकार की देसी व विदेशी पूंजीपतियों की दिन दूगनी रात चौगुनी तरक्की करने वाली जनविरोधी नीतियों से पूरी तरह निराश व बेहद नाराज दिखाई दे रहे हैं; तथा इस सांप्रदायिक फाशीवादी सरकार से छुटकारा प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं। लोगों में इस बात का भी भारी रोष है कि मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस की भ्रष्ट सरकार के विरुद्ध उभरे देशव्यापी जनरोष का लाभ लेकर, नरेंद्र मोदी ने 5 साल पहले वोट बटोरने के समय लोगों से जो वायदे किए थे उनमें से कोई भी वायदा पूरा नहीं हुआ है। ना विदेशी बैंकों में जमा अरबों रूपये का काला धन वापिस आया है, ना गरीबों के बैंक खातों में 15-15 लाख रुपये ही जमा हुए हैं, ना किसानों को उनके उत्पादों के स्वामीनाथन आयोग की सिफारशों के अनुसार उचित भाव ही मिले हैं, ना हर वर्ष 2 लाख नए रोजगार के अवसर ही पैदा हुए हैं। ना गरीबों को घर मिले हैं, ना औरतों पर होते अत्याचारों में कमी आई है तथा ना ही देश में संस्थागत रूप धारण कर चुके भ्रष्टाचार को कोई लगाम लगी है। इसके अतिरिक्त आम लोग इस बात को लेकर भी निराशा हैं कि मोदी सरकार ने कांग्रेसी सत्ताधारियों की साम्राज्यवाद निर्देशित नवउदारवादी नीतियों पर कोई रोक लगाने की जगह उसके विपरीत उन्हें और तीव्र किया है। विशेष रूप में रोजगार गटकने वाली विदेशी वित्तीय पूंजी (एफडीआई) के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था के समस्त द्वार पूर्ण रूप से खोल दिए हैं। यहां तक कि प्रचून व्यापार में भी एमोजोन व फ्लिपकार्ट जैसी विदेशी विशालकाय कंपनियां व्यापक रूप में प्रवेश कर चुकी हैं। निजीकरण में तीव्र बढ़ौत्तरी हुई है, जिससे शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं का पूर्ण रूप से व्यापारीकरण हो जाने से यह आम लोगों की पहुंच से बाहर हो गईं हैं। इन जनविरोधी नीतियों ने केवल मंहगाई को ही पंख नहीं लगाए हैं, बल्कि रोजगार को भी बड़ी चोट पहुंचाई है। उच्च योग्यता प्राप्त नौजवान तो वास्तव में ही बेरोजगार हैं। यदि कोई छोटी-मोटी नौकरी मिलती भी है तो उससे परिवार पालना अत्यंत मुश्किल हो चुका है। यही कारण है कि बेरोजगारी व अद्र्ध-बेरोजगारी आज देश की सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है, तथा सरकार घट रहे रोजगार व बढ़ रही बेरोजगारी के आंकड़ों को छिपाती फिर रही है। जिनके अनुसार 15 से 59 वर्ष के काम करने योग्य देशवासियों में से 7.1 प्रतिशत पूर्ण रूप में बेरोजगार है। नगण्य वेतनों व मामूली आमदनी वालों की संख्या तो इससे कई गुणा अधिक है, जिनका यह सरकार संज्ञान ही नहीं लेना चाहती। इस सरकार की ऐसी कारपोरेट समर्थक नीतियों ने देश में रोजगार को भारी आघात पहुंचाया है, जिसने नशाखोरी, व्यभिचार व मारधाड़ जैसी कई सामाजिक बुराईयों में भी भारी बढ़ौत्तरी की है। इस सरकार द्वारा नोटबंदी के उठाए गए मूखर्ता भरपूर कदम ने भी आम लोगों की मुश्किलों में तीव्र बढ़ौत्तरी करने के साथ-साथ कृषि समेत छोटे कारोबारों के तबाह करके रोजगार के संसाधनों को भारी आघात पहुंचाया है। ऐसे परिणाम ही जी.एस.टी. लागू करने से स्पष्ट रूप में सामने आए हैं। इस तरह देश में इन पांच वर्षों के दौरान रोजगार बढऩे की जगह निरंतर घटता गया है तथा अनेकों मेहनतकश कंगाली के नर्क में जीने के लिए विवश होते गए हैं।
भारतीय जनता पार्टी की इस सरकार, जो कि आर.एस.एस. के दिशा-निर्देशों पर कार्य करती है, के इससे भी अधिक घातक दो अन्य कुकर्म भी इन चुनावों में व्यापक चर्चा का विषय बने हुए हैं। पहला है: इस द्वारा देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तीव्र करने के लिए बोए गए सांप्रदायिक विष के बीज, तथा द्वितीय है: देश की संवैधानिक जनवादी संस्थाओं को पहुंचाया गया आघात। मोदी सरकार की शह पर संघ परिवार से जुड़े उपद्रवियों ने अल्प-संख्यकों, विशेष रूप से मुस्लिम भाईचारे के विरुद्ध धर्म परिवर्तन, लव-जेहाद, गोमांस आदि जैसी अनेकों घृणात्मक चालें चली हैं। जिन्होंने पीडि़त अल्पसंख्यकों में भय ही नहीं पैदा किया बल्कि देश की एकता-अखंडता के लिए भी बड़े खतरे खड़े किए हैं तथा देश के धर्म निरपेक्षता पर आधारित सामाजिक व राजनीतिक ढांचे को भी चोट पहुंचाई है। इसी तरह, इस सरकार द्वारा प्रतिक्रियावादी हिंदू राष्ट्र के अपने मनोइच्छित उद्देश्य की पूर्ति के लिए भी भारत के संविधान की जनवादी व्यवस्थाओं व संस्थाओं को समाप्त करने के लिए कई घिनौने प्रयत्न किए हैं। सुप्रीम कोर्ट, रिजर्व बैंक, सी.बी.आई. व चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाओं में भाजपा की संकुचित राजनीति व कारपोरेट हितों से प्रेरित दखलअंदाजी बार-बार जगजाहिर हुई है। लोगों के खाने-पीने व लिखने-बोलने के बुनियादी अधिकारों व श्रमिकों की संयुक्त सौदेबाजी के अधिकार पर सुनियोजित हमले किए गए हैं। देश में विरोधी विचारों, विशेष रूप से सरकार की जनविरोधी नीतियों व सरकारी भ्रष्टाचार का विरोध करते विचारों के प्रति असहनशीलता निरंतर बढ़ती गई है; तथा यह संगठित गुंडा गिरोहों का रूप धारण करती जा रही है। यहां ही बस नहीं, देश की सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ हुआ है इस सरकार के कार्यकाल के दौरान। इसीलिए देशवासियों की बहुसंख्या, विशेष रूप में जनवाद पसंद बुद्धिजीवी, मंहगाई व बेरोजगारी से त्रस्त मेहनतकश जनसमूह, अल्पसंख्यक समूहों से संबंधित जनता, आदिवासी, दलित, औरतें व अन्य न्यायप्रिय नागरिक भारतीय जनता पार्टी व इसके सहयोगियों को इन चुनावों में संपूर्ण देश में करारी हार देने के लिए उत्सुक दिख रहे हैं।
जहां तक पंजाब का संबंध है, यहां लोग कांग्रेस की सरकार से भी स्पष्ट रूप में निराश दिखाई दे रहे हैं। यह भी ठीक है कि अकाली-भाजपा गठजोड़ के 10 वर्षीय शासन के दौरान जिस तरह लोगों को आर्थिक व भ्रष्टाचारी लूटपाट व प्रशासनिक उत्पीडऩ का शिकार बनाया गया, वे उसे अभी भुला नहीं पाए हैं। यद्यपि ऐसे कुशासन से पीडि़त लोगों की वोटें प्राप्त करने के लिए महाराजा अमरिंदर सिंह ने जो सब्जबाग उन्हें दिखाए थे, उन सपनों के साकार न होने के कारण भी लोगों के भीतर भारी रोष की ज्वाला स्पष्ट दिखाई देती है। दो वर्ष बीत जाने के बावजूद इस सरकार ने भी ‘‘हर घर में कम-से-कम एक सरकारी नौकरी देने’’, कच्चे कर्मचारियों को पक्का करने, जनविरोधी सरकारी नीतियों के परिणामस्वरूप मजदूरों व किसानों के सिर चढ़े कर्ज माफ करने, नौजवानों को बेरोजगारी भत्ता व मुफ्त मोबाइल फोन देने, भ्रष्टाचार खत्म करने, नशाखोरी को लगाम लगाने जैसे अनेकों लोक-लुभावन वादे भुला दिए हैं। प्रांत में रेत-बजरी व अन्य कई तरह का माफीया भी उसी तरह दनदना रहा है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार व प्रशासन में संकुचित राजनीति से प्रेरित राजनीतिक दखलअंदाजी भी वैसे ही प्रफुल्लित हो रही है, लूटपाट के रूप में अपराध भी कायम हैं, तथा लोगों के भीतर असुरक्षा की भावना भी और गंभीर हुई है।
इस समूची भयंकर राजनीतिक स्थिति में, इन दोनों अकाली-भाजपा गठजोड़ व कांग्रेस पार्टी, के विरुद्ध लोगों में बढ़ रहे रोष को पंजाब में एक सार्थक दिशा में धाराबद्ध करने के लिए प्रांत में ‘पंजाब जनवादी गठजोड़’ का बनना निश्चित रूप में एक शुभ शगुन है। इस गठजोड़ में 7 वामपंथी व जनवादी पार्टियां शामिल हैं जो कि सांप्रदायिक फाशीवादी भाजपा व उसके सहयोगियों को परास्त करने के लिए भी दृढ हैं तथा जनविरोधी नवउदारवादी आर्थिक नीतियों की बड़ी मुद्दई कांग्रेस पार्टी व अन्य हर रंग के सांप्रदायिकों के भी विरुद्ध है। इस ‘‘पंजाब जनवादी गठजोड़’’ की स्थापना की पहलकदमी तो पटियाला से वर्तमान सांसद डाक्टर धर्मबीर गांधी ने की थी। उनकी पार्टी ‘नया पंजाब पार्टी’ के अतिरिक्त इस गठजोड़ में ‘बहुजन समाज पार्टी’, ‘लोक इंसाफ पार्टी’ व ‘पंजाब एकता पार्टी’ ने मिलकर, इन चुनावों के संबंध में प्रांत की वामपंथी पार्टियों से संपर्क साधा। जिसके परिणामस्वरूप सी.पी.आई. व आर.एम.पी.आई. ने उपरोक्त चार पार्टियों के साथ मिलकर, एक न्यूनतम सांझा कार्यक्रम के आधार पर पंजाब के समस्त 13 लोकसभा क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारने का निर्णय लिया है। एम.सी.पी.आई.(यू.) भी इस गठजोड़ का भाग बन चुकी है तथा जनता दल(एस) व कुछ अन्य वामपंथी व जनवादी शक्तियों द्वारा भी इसमें शामिल होने की आशा है।
यह गठजोड़ जहां देश के भीतर संघात्मक ढांचे को मजबूत करने तथा नदी जल जैसे अंतरराज्यीय विवादों का रिपेरियन सिद्धांतों के अनुसार बातचीत द्वारा निपटारा करने का समर्थक है, वहीं जनवाद व धर्म निरपेक्षता को सुदृढ़ करने तथा मंहगाई रोकने व बेरोजगारी की समाप्ति के लिए प्रभावशाली जनसमर्थक नीतियां अपनाने के लिए दृढ़ है। इस गठजोड़ की यह भी समझदारी है कि कृषि को लाभकारी बनाकर तथा किसानों की कारपोरेट घरानों द्वारा की जा रही लूट को लगाम लगाकर ही देश के अर्थपूर्ण सर्वपक्षीय विकास की ओर बढ़ा जा सकता है। ‘पंजाब जनवादी गठजोड़’ प्रांत में नशाखोरी की बढ़ रही कुप्रवृति को खत्म करने के लिए सरकारी स्तर पर प्रभावशाली प्रयत्न जुटाने का भी जोरदार समर्थन करता है तथा शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं को सरकारी स्तर पर गुणवत्ता युक्त, समान व प्रभावशाली बनाने, सामाजिक उत्पीडऩ को लगाम लगाने, सामाजिक सुरक्षा को असरदार बनाने के लिए बुढ़ापा पैंशन में बढ़ौत्तरी करने आदि के लिए जन संघर्षों को लामबंद करने का भी मुद्दई है। इस आधार पर पूरी संभावना है कि इन चुनावों में प्रांत में पंजाब जनवादी गठजोड़ उत्साहजनक परिणाम निकालेगा।
इसके अतिरिक्त इस बात की भी पूर्ण संभावना है कि यह चुनाव गठजोड़ केवल चुनावों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि चुनावों के बाद इन समस्त मुद्दों पर लोगों को लामबंद करके जनआंदोलन निर्मित करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। इसीलिए ही इस गठजोड़ को प्रांत के भीतर आम लोगों की ओर से अच्छा समर्थन मिल रहा है। आने वाले दिनों में पंजाब, पंजाबी व पंजाबियत के विकास के लिए चिंतित समूह प्रांत-वासियों व समस्त वामपंथी शक्तियों की ओर से इस गठजोड़ को उत्साहजनक समर्थन मिलने की भारी संभावनाएं हैं। हम समस्त सामाजिक-राजनीतिक पक्षों को इस जन-समर्थक राजनीतिक विकल्प में शामिल होने तथा इसके दायरे को और अधिक विशाल व प्रभावशाली बनाने के लिए अपना बहुमूल्य सहयोग देने का सुहृदयता सहित आह्वान करते हैं।