Now Reading
मेहनतकशों के क्रांतिकारी संघर्षों के साथ मिलकर ही स्त्रियां तोड़ सकती हैं मनुवादी संस्कृति व पितृसत्ता

मेहनतकशों के क्रांतिकारी संघर्षों के साथ मिलकर ही स्त्रियां तोड़ सकती हैं मनुवादी संस्कृति व पितृसत्ता

नीलम घुमाण
वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में लगातार तीव्र होते जा रहे आर्थिक ध्रुवीकरण के कारण, जहां मेहनतकश जनता की जिन्दगी की तकलीफें बढ़ती जा रही हैं वहां औरतों की दशा तो इससे कहीं भयंकर होती जा रही है। क्योंकि इस व्यवस्था में जहां औरतों की बड़ी आबादी गरीबी का संताप झेल रही है, वहीं इसके साथ उसे मर्द प्रधान समाज में औरत होने का संताप भी भोगना पड़ रहा है। अर्थात गरीब और औरत होने की इस चक्की में लगातार ऐसी पिसती है कि उसकी इस हालत को शब्दों में ब्यान करना मुश्किल है। भ्रूण हत्या और बचपन में ही मार दिए जाने के बाद जो बच गई उन्हें पैर-पैर पर छेडख़ानी, बलात्कार, यौन शोषण का सामना करना पड़ता है। घर हो या काम वाली जगह औरतों के साथ हिंसक घटनाएं रोज हो रही हैं। औरतों पर तेजाब फेंकना, बलात्कार के बाद हत्या कर देना ऐसी घटनाएं रोज सुनने को मिलती हैं। ऐसे में इस त्रासदीपूर्ण स्थिति में भी औरत निरंतर संघर्ष करती रही है।
आज औरत समाज में हर जगह काम कर रही है। कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जहां आदमियों के मुकाबले औरत काम न कर रही हो। शिक्षा, स्वास्थ्य, सेना तथा अनेक ही प्रशासनिक पदों पर औरतें हैं। समय ने यह सिद्ध कर दिया है कि समाज में औरत को जब भी मौका मिला है उसने अपनी सामथ्र्य से बढक़र उस कार्य को करके स्वयं को सिद्ध किया है और समाज में अपना योगदान दिया है। लेकिन अफसोस इन प्राप्तियों के बावजूद आज औरत सुरक्षित नहीं है। उस पर हिंसक हमले पहले से कहीं अधिक बढ़े हैं। यह कैसी स्थिति है कि एक ओर मनुष्य समुद्र की गहराईयों का रहस्य जानने की कोशिश में है, अंतरिक्ष में उड़ानें भर रहा है, इक्कीसवीं सदी की बातें कर रहा है। वहीं दूसरी ओर दुनियां की आधी आबादी पर हमले पहले से कहीं ज्यादा तेका हो गए हैं। उसकी उड़ान को कैद कर रहा है। बलात्कार के बाद उसकी बर्बर हत्या कर रहा है।
जैसे जैसे समाज ने तरक्की की इसके साथ पुरानी व्यवस्थाएँ बदली औरतें घरों से बाहर आयीं, साथ ही उसके शोषण और दमन के नए-नए रूप भी ईजाद हो गए। क्योंकि मुनाफे पे टिकी इस पूँजीवादी व्यवस्था में जीती जागती औरत को महज एक वस्तु में बदल कर रख दिया है। पूरी दुनियां में हुए पूँजीवादी संस्कृति के पतन के कारण औरत का जिस्म ही नहीं उसका पूरा वजूद ही उपभोक्ता सामग्री में बदल दिया गया है। आज औरत की श्रमशक्ति बाजार में सबसे सस्ती मिलती है। बराबर काम के बदले पुरुषों के मुकाबले कम वेतन मिलता है। यह पूँजीवाद की लूट है कि चाहे खेतों, कारखानों में काम करने वाली हो या मनरेगा वर्कर हो सभी शोषण का शिकार हैं। मनरेगा के नाम पर सरकारी स्तर पर औरतों का शोषण हो रहा है। दूसरी ओर सरकारी स्तर पर आंगनवाड़ी वर्कर, मिड-डे-मील वर्कर, तथा आशा वर्करों को मान भत्ते के नाम पर बहुत ही थोड़े पैसे दिए जाते हैं। यहां केवल औरतें ही काम करती हैं वहां औरतों का यह निचले स्तर के मान भत्ता ही समाज में उसकी स्थिति को दर्शाता है। इसके अलावा पूरी दुनियां की औरतों को लेकर एक नजरिया है कि उसका काम ही है घर की देखभाल करना व बच्चे पालना है। घर का काम जो औरतें सारी जिंदगी बिना किसी मेहनताने के करती हैं, जिसका कोई हिसाब नहीं।
इसका कारण यह है कि पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का जो पतन हुआ है, जो कि पूरी दुनियां में है, इसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ा है और वही औरत इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। पितृसत्ता जो समाज में पहले से ही मौजूद थी, पूँजीवाद ने नए सिरे उसे खाद पानी दिया है और मजबूत बनाया है। स्त्रियों को वस्तु के रूप में पेश करके इसने स्त्रिी विरोधी अपराधों के लिए जमीन तैयार की है। एक तरफ व्यवस्था में सबसे सस्ता मजदूर और दूसरा मीडीया, सिनेमा, विज्ञापन आदि उसे एक उपभोग की वस्तु के रूप में पेश करता है। यही कारण है कि आज औरतों के ऊपर हिंसक हमले नए-नए रूप ले रहा है।
भारतीय सामाजिक व्यवस्था में औरत की जीवन व्यथा बाकी दुनियां की औरतों के मुकाबले थोड़ी अलग है। क्योंकि यहां एक ओर वह आर्थिक लूट की शिकार हैं वहां दूसरी ओर समाज में व्याप्त औरत विरोधी संकीर्ण मनुवादी मानसिकता की भी शिकार है। जहां बेटियों को जन्म से पहले मार दिया जाता है। कोई आजादी नहीं है। उन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं जिससे वह अपने जीवन संबंधी फैसले ले सकें। दासी, पैर की जूती, आदमियों द्वारा किए जाने वाले दुष्कर्मों की जिम्मेवार आदि। अपने ऊपर होने वाले बलात्कार, जिस्मानी शोषण की वजह भी उसे ठहराया जाता है। और समाज के जनप्रतिनिधियों द्वारा स्त्री विरोधी ब्यान दिए जाते हैं। कि कपड़े कैसे पहनने चाहिएं, घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए बगैरह। और यह प्रचार किया जा रहा कि औरतों के ऊपर बढ़ रहे अत्याचारों की वह स्वयं जिम्मेवार है। दरअसल जब से हिन्दुस्तान में मोदी की सरकार आई है संघ के संगठनों द्वारा मनुवादी संस्कृति को हिन्दुस्तान में फिर से लागू करने की कोशिशें की जा रही हैं। मनुवादी विचारधारा को ज्यादा हवा दी जा रही है। मनुवादी संक्रीर्ण विचारधारा जो औरत की गुलामी की पक्षधर है जिनके अनुसार समाज में औरत, दलित और                 अल्पसंख्यकों की कोई जगह नहीं है। हिन्दुस्तान में औरत को गुलामी की जंजीरों में जकडऩा चाहता है। धर्म के नाम लोगों में नफरत फैला कर देश की अखण्डता को नष्ट करके हिन्दू राष्ट्र स्थापित करना चाहता है।
जम्मू में आशिफा बलात्कार कांड इसी मनुवादी नफरत की बहुत बड़ी उदाहरण है। जिसमें एक आठ साल की मुस्लिम बच्ची को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया कि वह मुस्लिम थी। भाजपा और आर एस एस के गुण्डा तत्त्वों द्वारा सामूहिक बलात्कार के बाद इस बच्ची की हत्या कर दी गई और यह सब इसलिए किया गया कि उन्हें क्षेत्र से उसे डरा कर भगाया जा सके। बेशर्मी की हद उस समय पार हो गई जब भाजपा के कार्यकत्र्ता और वकील बलात्कारियों के समर्थन में आए। धर्म के नाम पर संधियों द्वारा हिन्दुस्तान में जो नफरत फैलाई जा रही है। उसमें औरत निशाना बन रही है और इसके साथ ही दलित औरतों पर भी हिंसक हमले पहले से कहीं तेज हुए हैं। आये दिन हमें इस तरह की खबरें सुनने को मिलती रहती हैं।
देखा जाए तो निजी सम्पत्ति की व्यवस्था के साथ शुरु हुई स्त्री की गुलामी आज पूँजीवादी, मनुवादी व्यवस्था में सबसे अधिक प्रभावी है। उसकी गुलामी के नए-नए रूप भी सामने आए हैं और स्त्री इन गुलामी से मुक्ति और बराबरी के लिए लगातार लड़ती रही है और पूरी दुनियों के स्तर पर संघर्षोंं के एक लम्बे सिलसिले के बाद ही वो कुछ हासिल कर सकी है। और यह भी सत्य है कि चाहे सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई हो या आजादी की लड़ाई तब तक जीती नहीं जा सकती जब तक कि समाज की आधी आबादी उनमें अपनी भागीदारी नहीं निभाती।
इसके लिए औरतों को एकजुट होकर इन पूँजीवादी लूट और मनुवादी संकीर्ण बेडिय़ों को तोडऩा होगा इस व्यवस्था के विरुद्ध एक सामाजिक, सांस्कृतिक आंदोलन चलाना होगा। अपनी मुक्ति के लक्ष्य तक (हम औरतें) तभी जा सकतीं है जब समाज के तमाम शोषित उत्पीडि़त मेहनतकशों के क्रांतिकारी संघर्षों के साथ मिल कर इस पँूजीवादी पितृसत्ता के विरुद्ध संघर्ष करें। उन तमाम लूटे जा रहे लोगों के संघर्ष में अपना बराबरी का योगदान दें।

Scroll To Top