शिव कुमार अमरोही
केन्द्रीय सरकार ने नई शिक्षा सम्बन्धी अन्य जरूरत को ध्यान में रखते हुए सन 2016 में श्री टी.एस. सुब्रामणियम की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था जो आगामी 20 वर्षों को ध्यान में रखते हुए अपनी सिफारशें सरकार के सामने पेश करे। जून 2017 में इस कमेटी की बागडोर इसरो (ISSRO)के भूतपूर्व चेयरमैन श्री के कस्तूरीरंगन के हाथ में दे दी गई। इस कमेटी में चेयरमैन सहित 11 सदस्य थे। इस कमेटी ने 15 दिसम्बर 2018 को अपनी रिपोर्ट मानव संसाधन मंत्री श्री प्रकाश जावड़ेकर जी को सौंप दी। इस रिपोर्ट के चार भाग है :- (1) स्कूल शिक्षा (2) उच्च शिक्षा (3) अतिरिक्त मुख्य फोक्स क्षेत्र (Additional Key Focus Area) (4) शिक्षा में परिवर्तन (Transforming Education)। रिपोर्ट के कुल 23 पाठ हैं जिनमें से कुछ को आगे उप-भागों में बाँटा गया है। इस प्रकार यह रिपोर्ट जिसके 484 पृष्ठ हैं, काफी विस्तृत कही जा सकती है।
इसे लागू करने के लिए केन्द्रीय सरकार ने जैसे ही इस पर विचार विमर्श शुरू किया तथा इस सम्बन्धी तथ्य मीडिया तथा सोशल मीडिया पर प्रकाशित व प्रसारित हुए तो भाषा के प्रश्न पर देश के कुछ दक्षिणी राज्यों में तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की शिक्षा नीति के उस राष्ट्र लिए दूरस्थ परिणाम निकलते हैं, इसलिए इस रिपोर्ट के सभी भागों, यहाँ तक कि एक-एक शब्द को बड़े ही ध्यान पूर्वक परखने की आवश्यकता है, लेकिन इतना कुछ एक ही बार एक ही लेख में लिखना शायद सम्भव नहीं होगा, इसलिए इस लेख में हम सारा ध्यान स्कूल शिक्षा भाग में वर्णित भाषा के प्रश्न पर केंद्रित करेंगे। इसके साथ ही कुछ अन्य तथ्यों पर सरसरी दृष्टि डालने का प्रयत्न करेंगे। शिक्षा बच्चों के सर्वागीण विकास का माध्यम कहा जाता है। इस शिक्षा नीति में बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए जो फ्रेम तैयार किया गया है वह 5+3+3+4 वर्षों के अनुसार तैयार किया गया है। इस के अनुसार 3 वर्षों की आयु के बच्चे को स्कूल भेजने का प्रावधान है। उपरोक्त फ्रेम के अनुसार शिक्षा का पहला फ्रेम (3 वर्ष से 8 वर्ष की आयु तक) को प्रारम्भिक स्टेज (Fundamental Stage) का नाम दिया गया है। इसमें तीन से छ: वर्ष की आयु तक प्री-प्राइमरी तथा अगले दो वर्ष ग्रेड-1 तथा ग्रेड-2 की शिक्षा देने का प्रावधान हैं। इसके बाद तीन वर्ष की शिक्षा को (8 वर्ष से 11 वर्ष की आयु तक) आरम्भिक या उत्तर-प्राइमरी (Preparatory or Latter Primary) स्टेज कहा गया है। इसके बाद तीन वर्ष अर्थात 14 वर्ष की आयु तक मिडल अथवा अठारह वर्ष की आयु तक (ग्रेड 9,10,11,12) हाई या सैंकडरी स्टेज कहा गया है। सन् 2030 तक अठारह वर्ष की आयु वाले प्रत्येक बच्चे/विद्यार्थी के लिए निशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके अतिरिक्त बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने वाले (Drop out) बच्चों की भारी संख्या पर चिंता जताई गई है तथा साथ ही साथ इस पर अँकुश लगाने के लिए कुछ उपाय भी सुझाए गए हैं। वास्तव में घर और माता-पिता की गरीबी, पढ़ाई छोड़ देने का मुख्य कारण हैं, लेकिन इस सम्बन्धी कोई सुझाव इस नीति में नहीं दिया गया है। इसके अतिरिक्त इस नीति में स्कूल-शिक्षा का प्रारम्भ तीन वर्ष की आयु से करने का सुझाव दिया गया है लेकिन तीन वर्ष के बच्चे को स्कूल लाने से पहले इसके मनोवैज्ञानिक पक्ष पर ध्यान दिया जाना चाहिए था, जो नहीं दिया गया है। शिक्षा शास्त्री बच्चों को स्कूल भेजने की आयु पाँच वर्ष कहते आए हैं, लेकिन उनके तर्कों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है।
भाषा के प्रश्न पर स्पष्ट लिखा गया है कि शिक्षा का माध्यम प्राइमरी से मिडल तक स्थानीय भाषा/मातृभाषा ही होनी चाहिए। यह सुझाव पूर्ण रूप से न केवल वैज्ञानिक है बल्कि भाषाविद् भी बार-बार इस पर मोहर लगा चुके हैं। चाहे रिपोर्ट में अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने के लिए बार-बार हतोत्साहित किया गया है लेकिन रिपोर्ट के पैरा P4.5.5 में आठवीं कक्षा से ही विज्ञान की शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा के साथ-साथ अंग्रेजी को बनाने की सिफारिश की गई है। आश्चर्य की बात है कि भाषाविद् और शिक्षा वैज्ञानिक उच्चतम स्तर तक मैडीकल, वोकेशनल तथा तकनीकि शिक्षा को भी मातृभाषा में देने के सुझाव देते हैं लेकिन इस नई नीति में आठवीं से ही विज्ञान की शिक्षा प्रत्येक छात्र को मातृभाषा के साथ-साथ अंग्रेजी में भी देने का सुझाव दिया गया है। विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में देना बिलकुल संभव है। इसके लिए आवश्यक पुस्तकों का स्थानीय भाषाओं में अनुवाद करना मुमकिन है केवल इच्छा शक्ति आवश्यकता है। लेकिन आजादी प्राप्ति के 72 वर्षों के बाद भी अफसरशाही तथा शासक वर्ग का गठजोड़ अभी भी विद्यमान है जिसकी संख्या तो शायद 10 प्रतिशत से भी कम हो लेकिन वह स्थानीय भाषाओं को उनका यथायोग्य मान-सम्मान देने के लिए तत्पर ही नहीं हैं। क्योंकि ऐसा करना इस अभिजात वर्ग के हितों के विरूद्ध है। इसी कारण से इस वर्ग ने आज तक अंग्रेजी का दबदबा कायम रखा हुआ है और यह वर्ग इससे लाभ भी उठा रहा है। गरीब और मेहनतकश लोग इस कारण से न सिर्फ हानि ही उठाते हैं बल्कि इससे स्थानीय भाषाओं का विकास बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इससे स्थानीय सभ्याचार और संस्कृति में भी विकृतियाँ पैदा हो रही हैं।
इस शिक्षा नीति में भाषा तथा शिक्षा पर सबसे बड़ा कुठाराघात तीन भाषाई फार्मूला के आधार पर तीनों भाषाओं को स्कूल शिक्षा के प्रारम्भ से ही लागू करके किया गया है। नई शिक्षा नीति के अनुसार बच्चा तीन वर्ष की आयु में स्कूल जाना शुरू करेगा और तभी से ही स्थानीय भाषा, अहिन्दी भाषाई राज्यों में हिन्दी व अंग्रेजी तथा हिन्दी भाषाई राज्यों में हिन्दी के स्थान पर कोई अन्य भारतीय भाषा का ज्ञान देना शुरू कर दिया जाएगा। तर्क दिया गया है कि इस आयु में बच्चा भाषा जल्दी सीख जाता है। कमाल है। तीन वर्ष के बच्चे पर तीन-तीन भाषाओं का बोझ डालने की बात कही गई है। इतने छोटे बच्चे, जिनका मन अत्यंत कोमल होता है उसके साथ यह सरासर अन्याय है। एक ओर तो रिपोर्ट में स्थानीय भाषाओं का गुणगान किया गया है, दूसरी तरफ दो अन्य भाषाओं को जिसका बच्चे को अपने आस पास से सहज तथा स्वाभाविक ज्ञान प्राप्त नहीं होता, विशेषतया अंग्रेजी भाषा, जिसका हमारी भारतीय भाषाओं से दूर-दूर तक कोई नाता-रिश्ता नहीं है, का बोझ कोमल बच्चों के कंधों पर पर डालना कहीं से भी तर्क संगत दिखाई नहीं देता। इससे पहले आ चुकी शिक्षा नीति/पद्धति में तीन भाषाई फार्मुले को (विशेषतया कोठारी कमीशन की रिपोर्ट) लागू करने की बात हो चुकी है (तथा वह देश के अधिकाँश भागों में इस समय भी लागू है।) जिसके अनुसार प्रथम कक्षा से स्थानीय भाषा, चौथी कक्षा से हिन्दी (हिन्दी भाषाई राज्यों में कोई और भारतीय भाषा) तथा छठी कक्षा से अंग्रेजी पढऩे का प्रावधान है। इसी के साथ-साथ पहले आ चुकी शिक्षा नीतियों में अंग्रेजी के स्थान पर धीरे-धीरे भारतीय भाषाओं को लागू करने के बारे में भी कहा गया है। प्रारम्भ में ही तीन भाषाओं की शिक्षा बच्चे को कन्फ्यूज करती है। इसी कारण अनेक बच्चे उच्चारण करते समय अटकने लगते है। जैसे एप्पल और सेब जब एक ही समय में पढ़ाए जाएँगे तो बच्चा समझ ही नहीं पाता कि उसे क्या बोलना है और क्या ठीक है। इस प्रकार तीन भाषाई फार्मूला यहाँ बच्चे के मानसिक विकास पर बुरा प्रभाव डालता है, वहीं यह सीखने की प्रक्रिया में भी विघ्न डालता है।
नई शिक्षा नीति 2019 में भाषा सम्बन्धी कुछ और त्रुटियाँ भी हैं। मसलन हिन्दी भाषाई राज्यों में दूसरी भाषा के चुनाव में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिए गए हैं। नई नीति के अनुसार बच्चा भारत में बोली जाने वाली किसी भी भाषा का चुनाव कर सकता है। पर वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। सच्चाई यह है कि कोई छात्र तो क्या, कोई स्कूल भी दूसरी भाषा का चुनाव करने में असमर्थ है। वास्तव इसका निर्णय राज्य सरकारें करती हैं और यह निर्णय लगभग सारे राज्य के स्कूलों के लिए एक ही होता है और यह निर्णय राजनैतिक अधिक तथा जमीनी हकीकतों के निकट आम तौर पर कम ही होता है। हिन्दी भाषा वाले राज्यों में सबसे निकट वाले अहिन्दी भाषाई राज्य की भाषा को दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। उदाहरणतया, राजस्थान में पंजाबी या गुजराती तथा हरियाणा, दिल्ली, तथा हिमाचल प्रदेश में पंजाबी को दूसरी भाषा का स्थान दिया जाना तर्क संगत ही होगा। नई शिक्षा नीति में इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया है।
संस्कृत भाषा के विकास के लिए इस नई शिक्षा नीति में विशेष जोर दिया गया है। अपने समय में यह भाषा बाकी भाषाओं से साहित्य व ज्ञान विज्ञान में सचमुच आगे थी। लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि यह भाषा हजारों साल पहले लोगों की बोलचाल की भाषा थी। आज यह देश के किसी भी भाग में लोगों की बोलचाल की भाषा नहीं हैं। चाहे यह उत्तरी भारत की अधिकाँश भाषाओं की जननी हो सकती है लेकिन इस पर आवश्यकता से अधिक जोर देना उसी प्रकार है, जैसे सतलुज, रावी, चिनाव आदि नदियों के व्यर्थ बह रहे पानी का उपयोग करने के उपाय ढूंढने की बजाए कुछ लोग सरस्वती नदी को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहे हों। ऐसा लगता है कि आर.एस.एस. की विचारधारा इन्हें संस्कृत पर अधिक बल देने के लिए विवश कर रही है। इस विचारधारा के अनुसार जो विज्ञान ने खोजा है या इतिहासकारों ने लिखा है उसकी महत्ता की बजाए जो हमारे वेदों तथा धार्मिक ग्रन्थों में लिखा है तथा जो पौराणिक कथाएँ है उनकी सच्चाई तथा महत्व अधिक है तथा भारत में यह उस समय के विज्ञान के अत्यन्त विकसित होने का प्रमाण भी है। यही उनके अनुसार हिंदुत्व है। क्योंकि उपरोक्त अधिकांश ग्रन्थ संस्कृत में लिखे गए हैं इसलिए ही हिंदुत्ववादी संस्कृत को मातृभाषा का दर्जा दिए जाने का विचार संजोए बैठे हैं।
हम कहना चाहते हैं कि संस्कृत भाषा की शिक्षा में कोई बुराई नहीं हैं। अन्य भाषाओं की तरह ही यदि कोई संस्कृत की शिक्षा लेना चाहता है तो यह उसका न सिर्फ अधिकार है बल्कि इसके लिए उचित प्रबन्ध भी किया जाना चाहिए। हमारा मानना है कि ऐसे प्रबन्ध स्कूल शिक्षा के स्थान पर उच्चतर शिक्षा के अंतर्गत किए जाने चाहिएं तथा इसे स्थानीय भाषाओं के मूल्य पर प्रफुल्लित नहीं किया जाना चाहिए।
जहाँ तक उर्दू भाषा की बात है, उसे इस नई भाषा नीति में बिलकुल उपेक्षित किया गया है। इतनी बड़ी रिपोर्ट में शायद ही कहीं इसका जिक्र किया गया हो।
सैकंडरी शिक्षा में विदेशी भाषाएँ सिखाने की बात भी कही गई है। यदि छात्र चाहें तो विदेशी भाषा को इलैक्टिव विषय के रूप में चुन सकते हैं (पैरा P4.5.10) पर यह चुनाव तीन भाषाई फार्मूला के अतिरिक्त होगा। ऐसी व्यवस्था राष्ट्र के लिए भविष्य में लाभप्रद सिद्ध हो सकती है।
इसके अतिरिक्त ग्रेड 6 से ग्रेड 8 के मध्य के समय में भारतीय भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन के लिए एक कोर्स का प्रबन्ध करने की भी सिफारिश की गई है। इसमें भारतीय भाषाओं की उत्पति; परस्पर सम्बन्ध, उनकी सांझी ध्वनियाँ आदि का ज्ञान देने की सिफारिश की गई है।
कुल मिलाकर भाषा के पक्ष से कहा जा सकता है कि तीन भाषाई फार्मूला को प्रारम्भिक कक्षा से आरम्भ करना न केवल शैक्षिक हितों के प्रतिकूल है बल्कि बच्चों के मानसिक विकास में भी अवरोध पैदा कर सकता है।
भारत के दक्षिणी राज्यों में हिन्दी को एक संपर्क भाषा के रूप में पढ़ाया जाना सचमुच लाभप्रद हो सकता है। लेकिन इसके लिए वहाँ की स्थानीय जनता की शँकाएँ अवश्य ही दूर की जानी चाहिएं तथा इसके लिए वहाँ आम सहमति बनाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।
कुल मिलाकर कहा जाए जो स्कूल शिक्षा में हिन्दुत्व के कई तत्वों पर मीठी चाशनी की परत सीधे-टेढ़े ढंग से चढ़ा कर इस शिक्षा नीति को जनता के सामने परोसने का प्रयत्न किया गया है।