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किसी भी युद्ध में सबसे पहले मरता है प्रजातंत्र

किसी भी युद्ध में सबसे पहले मरता है प्रजातंत्र

इरफान इंजीनियर
पड़ोसी देश के साथ युद्ध जैसे हालात या धर्म के नाम पर आंतरिक विवाद, लगभग हमेशा चुनावों में शासक दल की मदद करते हैं, फिर भले ही उसने आम लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाने की दिशा में पर्याप्त प्रयास न किए हों। सीआरपीएफ के काफिले पर 14 फरवरी 2019 को हुए घृणित हमले, जिसमें इस अर्ध-सैनिक बल के 40 से अधिक सिपाही मारे गए और इसके बाद भारतीय वायुसेना द्वारा पाकिस्तान के बालाकोट पर हवाई हमले का भाजपा जमकर इस्तेमाल कर रही है। उसे उम्मीद है कि इससे चुनावों में उसे लाभ होगा। पुलवामा हमले की पूरी दुनिया में निंदा हुई है। पाकिस्तान के इस दावे में कोई दम नहीं है कि उसकी जमीन का इस्तेमाल, आतंकियों को प्रशिक्षित करने और भारत पर हमले करने के लिए नहीं किया जा रहा है। भारत-पाकिस्तान सीमा पर तैनात पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मी भारत में आतंकवादियों को घुसपैठ करने में मदद करते हैं। जैश-ए-मोहम्मद व अन्य आतंकी संगठन, पाकिस्तान की सेना के मोहरे हैं और वहां के ‘डीप स्टेट’ का हिस्सा हैं।
मध्यप्रदेश के उमरिया में भाजपा की विजय संकल्प बाईक रैली को संबोधित करते हुए, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि ‘‘चुनावों में मुद्दा यह होना चाहिए कि किसने देश और उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाया…किसने देश के गौरव को आसमान की ऊँचाईयों तक पहुंचाया…किसने देश को अधिक सुरक्षित बनाया और किसने पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया’’। उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘आप में सैनिकों के खून का बदला लेने की हिम्मत नहीं थी। मोदीजी ने यह हिम्मत दिखाई’’। भाजपा, विपक्षी दलों पर आरोप लगा रही है कि वे भारतीय वायुसेना के हवाई हमलों पर सवाल खड़े कर देश को कमजोर कर रहे हैं और सैन्यबलों के मनोबल को गिरा रहे हैं। परंतु भाजपा को सिपाहियों की लाशों पर राजनीति करने से कोई गुरेज नहीं है। कर्नाटक के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा ने दावा किया कि पाकिस्तान पर हवाई हमले, आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा की विजय में ‘निर्णायक’ भूमिका अदा करेंगे। उनका कहना था कि अब भाजपा कर्नाटक की 28 लोकसभा सीटों में से 22 जीतेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं हवाई हमलों का पूरा श्रेय लेते हुए कहा कि देश उनके हाथों में सुरक्षित है।
अमित शाह का दावा है कि बालाकोट पर हवाई हमले में 250 से अधिक आतंकी मारे गए। न तो भारतीय वायुसेना और ना ही विदेश मंत्रालय ने हमले में मारे गए आंतकियों की कोई संख्या बताई है। यहां तक कि तीनों सेनाओं के शीर्ष अधिकारियों की संयुक्त प्रेसवार्ता में भी भारतीय वायुसेना  ने मारे गए आतंकियों के संबंध में किसी प्रकार का आंकड़ा देने से इंकार कर दिया। अमित शाह को देश को यह बताना चाहिए कि उन्हें कैसे यह पता चला कि हमले में 250 आतंकी मारे गए हैं। मीडिया, आधिकारिक सूत्रों के हवाले से अनाधिकारिक रूप से यह घोषणा कर रहा है कि मरने वालों की संख्या 300 से लेकर 650 तक थी। ऐसा लगता है कि या तो सरकार में उच्च पद पर आसीन कोई व्यक्ति राजनैतिक लाभ के लिए मीडिया को ये आंकड़े दे रहा है या फिर मीडिया अपने मन से आंकड़े बता रहा है। जो भी हो, इस प्रचार का मंतव्य स्पष्ट है।
मरने वाले आतंकियों की संख्या के अपुष्ट दावे करने का एक उद्देश्य है, सरकार की अपने सुरक्षाकर्मियों की रक्षा करने में विफलता से देश का ध्यान हटाना। मीडिया का एक हिस्सा, सरकार को परेशान करने वाले सवाल उठा रहा था। जब इस आशय की गुप्तचर सूचनाएं थीं कि एक बड़ा आतंकी हमला हो सकता है, तब, क्या कारण था कि सीआरपीएफ के इतने बड़े काफिले को सडक़ मार्ग से जम्मू से श्रीनगर जाने दिया गया। उन्हें हवाई मार्ग से क्यों नहीं ले जाया गया? जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल ने स्वीकार किया है कि सरकार, गुप्तचर रपटों पर समुचित कार्यवाही करने में असफल रही। जिस राज्य में इतनी बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी तैनात हैं वहां भारी मात्रा में विस्फोटक ले जा रहे वाहन को क्यों और कैसे रोका या पकड़ा नहीं गया? जम्मू-कश्मीर सरकार का यह दावा है कि उसने बड़ी संख्या में आतंकियों को खत्म कर दिया है। फिर, इतने आतंकी कहां से आ रहे हैं? कश्मीर के स्थानीय युवक, आतंकी संगठनों से क्यों जुड़ रहे हैं? क्या इसका कारण यह है कि कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए राजनैतिक स्तर पर कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं? क्या पाकिस्तान के साथ बातचीत न करने की नीति के कारण कश्मीर में आतंकवाद और अतिवाद पर नियंत्रण करने के प्रयास असफल हो रहे हैं?
जाहिर है कि शासक दल इन मुद्दों पर चर्चा नहीं चाहता और इसके लिए यह जरूरी था कि देश का ध्यान किसी और दिशा में मोड़ दिया जाए। और इसलिए, हवाई हमले में बड़ी संख्या में आतंकियों के मारे जाने की चर्चा शुरू की गई। ‘आधिकारिक’ स्त्रोतों के हवाले से देश के लोगों को गुमराह किया गया, उन्हें यह बताया गया कि इस हमले में 300 से 650 के बीच आतंकी मारे गए। यह लोगों को लगे घावों पर मनोवैज्ञानिक मरहम लगाने का प्रयास था। परंतु क्या इससे भारत के लोग खून के प्यासे नही बन जाएंगे? क्या इससे देश की आंतरिक सुरक्षा बेहतर हो सकेगी? पठानकोट और उड़ी में हुए हमलों के बाद की गई सर्जिकल स्ट्राईक ने भी इसी तरह लोगों के गुस्से को कम किया था और इन हमलों को भूल जाने में उनकी मदद की थी। परंतु क्या इससे पुलवामा रूक सका? हिंसा के इस दुष्चक्र में अपनी जानें गंवाने वाले भारतीय सुरक्षाकर्मियों की संख्या बढ़ती जा रही है और सुरक्षाबलों व अतिवादियों की लड़ाई में कश्मीर के आम नागरिक पिस रहे हैं। कश्मीर में आतंकवाद बेरोकटोक जारी है। इससे भी बड़ा खतरा यह है कि कश्मीर के अलगाववादी आंदोलन का वहाबीकरण हो रहा है और इससे कश्मीर का सामाजिक तानाबाना पूरी तरह से ध्वस्त हो जाने की आशंका है।
हवाई हमलों में मारे जाने वाले आतंकियों की संख्या के बारे में अपुष्ट और बड़े-बड़े दावे कर भाजपा, वायुसेना द्वारा की गई कार्यवाही का श्रेय लेने का प्रयास कर रही है। शुरूआत में सरकार ने कहा कि उसने सेना को उपयुक्त समय और स्थान पर जवाबी कार्यवाही करने की खुली छूट दे दी है। वायुसेना ने अपने लड़ाकू पायलटों की जिंदगी दांव पर लगाकर यह किया। परंतु वायुसेना की इस कार्यवाही का श्रेय भाजपा सरकार ले रही है। अगर हवाई हमले में मारे गए लोगों की संख्या के संबंध में दावे नहीं किए जाते तो भाजपा इसका श्रेय न ले पाती। भाजपा ने देश भर में विजय संकल्प बाईक रैलियां आयोजित कीं और ऐसा माहौल बनाया मानो इस हमले की योजना बनाने और उसे कार्यरूप में परिणित करने का काम भाजपा ने ही किया है। इस कार्यवाही का पूरा श्रेय प्रधानमंत्री को दिया गया। नतीजा यह कि जो लोग सीआरपीएफ के 40 जवानों की अकाल मृत्यु के संबंध में कठिन सवाल पूछ रहे थे वे चुप हो गए। सोशल मीडिया पर मोदी भक्तों का राज है। कहने की आवश्यकता नहीं कि बदला-बदला चिल्लाने वाले राजनेता और खून का प्यासा देश, सैन्यबलों पर जल्दी से जल्दी कोई कार्यवाही करने का दबाव बनाता है और कई बार इस दबाव में की गई कार्यवाही  वांछित परिणाम नहीं देती।
पाकिस्तान ने भारतीय वायु सेना पायलट अभिनंदन वर्धमान को भारत को लौटा दिया। वर्धमान ने अपने मिग 21 बाईसन हवाई जहाज से पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमान को गिरा दिया। अभिनंदन को रिहा करने का कारण था पाकिस्तान में शांति के पैरोकारों का दबाव और पुलवामा के आतंकी हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद द्वारा लिए जाने के बाद, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की आलोचना। परंतु भाजपा इसका भी श्रेय ले रही है। देश में जो कुछ भी अच्छा या सकारात्मक होता है, उसका पूरा श्रेय भाजपा अपनी गोदी में बैठे मीडिया की मदद से ले लेती है। असम में एनआरसी (नैशनल रजिस्टर आफ सिटीजनशिप) को अद्यतन करने का काम उच्चतम न्यायालय के बार-बार निर्देश दिए जाने के कारण किया जा रहा है परंतु इसका श्रेय भी भाजपा ले रही है। दूसरी ओर, देश में यदि कुछ भी गलत होता है तो उसका दोष तुरंत कांग्रेस और यूपीए पर मढ़ दिया जाता है। अगर विजय माल्या, मेहुल चौकसी और नीरव मोदी देश के बैंकों के अरबों रूपये डकारकर विदेश भाग गए तो उसके लिए यूपीए जिम्मेदार है, अगर अर्थव्यवस्था धीमी गति से बढ़ रही है तो उसका कारण नोटबंदी या जीएसटी नहीं बल्कि यूपीए सरकार है, जिसका शासन आज से पांच साल पहले समाप्त हो चुका है।
क्या आज भारत अधिक सुरक्षित है ?
भाजपा दावा कर रही है कि उसके राज में देश अधिक सुरक्षित है तथा पाकिस्तान व आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब दे दिया गया है। आतंकवादी घबरा गए हैं और अब वे अपना सिर नहीं उठाएंगे। पार्टी के अनुसार, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अपने अंतिम चरण में है। परंतु तथ्य यह है कि हवाई हमलों के बाद भी, कश्मीर में आतंकियों से लड़ते हुए सुरक्षाकर्मी अपनी जान गंवा रहे हैं। ऐसे कोई संकेत नहीं हैं कि जैश-ए-मोहम्मद, डरी या घबराई हुई है। कुपवाड़ा में 3 मार्च को समाप्त हुई एक मुठभेड़ में पांच सुरक्षाकर्मी और एक नागरिक मारे गए। तथ्य यह है कि आतंकी संगठन आज भी उतने ही सक्रिय हैं जितने वे पहले थे। वे अभी भी रंगरूटों की भर्ती कर रहे हैं और उन्हें प्रशिक्षित कर रहे हैं और पाकिस्तान का ‘डीप स्टेट’ भविष्य में उनका इस्तेमाल कर सकता है। भाजपा, हवाई हमलों के नाम पर देश के अधिक सुरक्षित बन जाने की फंतासी बुन रही है।
अमरीका, भारत की तुलना में सैन्य दृष्टि से कहीं अधिक शक्तिशाली है और उसके पास आधुनिकतम हथियार हैं। इसके बावजूद अमरीका को अफगानिस्तान में आतंकवाद समाप्त करने में सफलता नहीं मिल सकी। उल्टे, आतंकवादियों की ताकत बढ़ी, इस्लामिक स्टेट अस्तित्व में आया और लाखों लोगों ने इस युद्ध में अपनी जान गंवाई। अमरीका, अफगानिस्तान में आतंकवाद समाप्त किए बगैर वहां से अपनी फौजें वापस बुलवा रहा है और यहां तक कि वह तालिबान के साथ बातचीत भी कर रहा है। तालिबान वही आतंकी संगठन है, जिसके खिलाफ अमरीका ने युद्ध की घोषणा की थी।
हवाई हमलों से आतंकी न तो समाप्त होंगे और ना ही कमजोर। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई कई स्तरों पर लड़ी जानी होगी। हमें पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव लाना होगा ताकि वह आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्यवाही करे।  कश्मीर में आतंकवाद से लडऩे के लिए सबसे जरूरी है कश्मीर समस्या का राजनैतिक हल और कश्मीर के लोगों का दिल जीतना। अगर पाकिस्तान से आतंकियों की आवाजाही पूरी तरह से बंद भी हो जाए तब भी कश्मीर में आतंकवाद की समस्या सुलझने वाली नहीं है। इसके लिए जरूरी है सभी संबंधित पक्षों के साथ बातचीत और इस समस्या का राजनैतिक हल। लंबी-चौड़ी बातें करने और कश्मीर के लोगों के खिलाफ पैलेट गनों का इस्तेमाल करने से न तो आतंकवाद रूका है और ना ही रूकेगा, बल्कि  मानवाधिकारों के उल्लंघन से वहां के लोगों के अलगाव के भाव में और वृद्धि होगी और कश्मीरी युवक आतंकी संगठनों की ओर आकर्षित होंगे। पिछले पांच सालों में कश्मीर में बंदूक के बल पर शांति स्थापित करने के प्रयासों से कुछ हासिल नहीं हुआ है। हां, मरने वाले सुरक्षाकर्मियों और आतंकियों, दोनों की संख्या में वृद्धि जरूर हुई है। कश्मीर समस्या को सेना और सुरक्षाबल नहीं सुलझा सकते और ना ही कुछ लोगों की गलतियों और नासमझी के लिए पूरे समुदाय के दानवीकरण से कुछ हासिल होगा। अपना सीना ठोंकने और हर काम का श्रेय खुद लेने से आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में सफलता नहीं मिल सकती।
प्रजातंत्र को खतरा
चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने कश्मीर के मुद्दे पर अत्यंत आक्रामक तेवर अपना लिए हैं। उसकी अपेक्षा है कि सभी नागरिक और विपक्षी पार्टियां चुपचाप उसके सभी दावों को स्वीकार कर लें। जो भी भाजपा के विरूद्ध जरा भी कुछ कहता है, उसे राष्ट्रद्रोही करार दे दिया जाता है और सोशल मीडिया में ट्रोल और मुख्यधारा का गोदी मीडिया ऐसे लोगों को चुप कराने में जुट जाता है। भाजपा जो कुछ कह रही है उसके खिलाफ अपने विचार व्यक्त करने वालों के बारे में यह कहा जा रहा है कि वे इमरान खान की भाषा बोल रहे हैं और पाकिस्तान की मदद कर रहे हैं। परंतु इन सब धमकियों और परेशानियों के बावजूद, कुछ मीडियाकर्मी और बुद्धिजीवी, प्रजातंत्र, जवाबदेह शासन और कानून के राज के पक्ष में बात कर रहे हैं। वे यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लडऩे और कश्मीर समस्या का स्थायी समाधान निकालने के लिए क्या किया जाना चाहिए। सन् 1947 में यदि जम्मू-कश्मीर के लोगों ने भारत का हिस्सा बनना स्वीकार किया था तो इसका कारण था उन्हें दिलाया गया यह भरोसा कि उनके राज्य में प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता होगी और उन्हें स्वायत्तता मिलेगी। पाकिस्तान इनमें से कोई भी गारंटी देने को तैयार नहीं था।
आज भाजपा भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक बहुलतावाद, प्रजातंत्र, धर्मनिरपेक्षता और कानून के राज को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। वह कश्मीर को स्वायत्तता देने के वायदे को पूरा करने के लिए भी तैयार नहीं है। भारत को एक ऐसा एकाधिकारवादी राज्य बनाने का प्रयास किया जा रहा है जिसमें लोगों को यह चुनने का अधिकार भी न हो कि वे क्या खाएं और क्या पहनें और उनके साथ धर्म के आधार पर भेदभाव हो। इससे कश्मीर के लोगों में अलगाव का भाव पैदा हो रहा है। यही कारण है कि कश्मीर के कुछ युवा भारतीय राज्य के खिलाफ  लड़ाई में अपनी जान कुर्बान करने के लिए भी तैयार हैं।
भाजपा, आतंकवाद के मुद्दे पर आंतरिक शत्रु तलाश रही है। और ये आतंरिक शत्रु हैं बुद्धिजीवी,  कश्मीरी और मुसलमान। स्वतंत्र राय रखने वाले बुद्धिजीवी, कश्मीरी और मुसलमान, भाजपा के लिए साफ्ट टारगेट हैं। इनको निशाना बनाकर पार्टी यह दिखाने का प्रयास कर रही है कि वह आतंक के खिलाफ लड़ रही है। परंतु इससे देश का सामाजिक तानाबाना और एकता कमजोर होगी। आतंक के खिलाफ भाजपा की लड़ाई, प्रजातांत्रिक संस्थाओं का दम घोंट रही है। यह देश के लिए अच्छा नहीं है।
अनुवाद : अमरीश हरदेनिया

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