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साहित्य व संस्कृति (संग्रामी लहर-नवंबर 2018)

साहित्य व संस्कृति (संग्रामी लहर-नवंबर 2018)

कहानी
पृथ्वी सिंह
– तारा पांचाल
चौधरी गगन सिंह अपनी नव-निर्मित कोठी में लान में बैठा हुक्का पी रहा था। हुक्के की गुडग़ुड़ाहट के साथ राजनीति की ताल में ताल मिलाने वाले कई और चौधरी अभी यहां आकर जमने वाले हैं। अकेला होने के कारण उसने हारू को राम-राम का जवाब अच्छे ढंग से दिया और भीतर बुलाकर पूछा कि बहु को बच्चा होने वाला था-क्या रहा?
हारू ने हाथ बान्धे कुछ खुलकर कहा-हम गरीबों को और क्या होना था चौधरी साहब-लडक़ा या लडक़ी। गगन सिंह को बात अखरी। हमारी औरतें भी तो लडक़ा या लडक़ी ही जनती हैं। वे कौन-सा हाथी-घोड़े  पैदा करती हैं। उसे हारू की सहजता और भोलेपन पर हँसी छूटने को हुई। लेकिन अपने स्वाभाविक रौब को कायम रखते हुए उसने पूछा-और साफ-साफ बता ना-क्या हुआ?
जी लडक़ा हुआ। महीने से ऊपर का हो गया।
क्या नाम रखा?
जी, ‘पृथ्वी सिंह!’
एक-दो आदमी साथ पड़े मोढ़ों पर आ बैठे थे। हारू चला गया था।
लोग आते रहे हुक्का चिलम-दर-चिलम चलता रहा राजनीति की फिर-फिर वही बातें दोहराते रहे और जाते रहे। गगन सिंह उसकी बातों में रम नहीं पाया।
खाना खाकर टहलता हुआ वह सीधा गांव के बीच अपनी पुश्तैनी हवेली पहुंचा और उसकी अटारी पर चढ़ गया। वह बेचैनी के साथ इधर-उधर टहलने लगा। जब भी उसे अपने भीतर चौधरियों वाली ताकत भरनी होती है वह सीधा इस हवेली में आ जाता है जो अब पशुओं के बांधने के काम आती है। साथ लगी कोठडिय़ाँ भूसा भरने के काम आती हैं और कभी-कभार कच्ची दारू भी यहां निकालने में सुविधा रहती है। गगन सिंह को यह हवेली इसलिए भी अच्छी लगती है क्योंकि यह बाहर से रोबदार है, भीतर से नहीं। नई कोठी! यह भीतर से रोबदार है बाहर से नहीं। अब किस-किस को बताते फिरें कि देखो हमारी कोठी में लाखों रूपए का पत्थर लगा है। हजारों-हजारों के तो नल ही हैं।
हवेली की अटारी से सारा गांव दिखता है। ऐसा लगता था जैसे कि गांव की बेतरतीब कोठडिय़ां चाँदनी को गड़प रही हों। थोड़ा हटकर बने चमारवाड़े के घर तो वहां से बिल्कुल बैलट-बक्सों जितने ही नजर आ रहे थे।
‘‘और नाम धरा पृथ्वी सिंह!’’ टहलता-टहलता दाँत पीसने लगा गगन सिंह। क्या जमाना आ गया है। मां मर गई अन्धेरे में और बेटी का नाम रौशनी। अब ये हमारे नामों कैलाश सिंह, सागर सिंह, गंगा सिंह, जमना सिंह, गगन सिंह, त्रिभुवन सिंह के साथ आन खड़े हुए हैं। पर किया क्या जाए? उसे लगा जैसे यह ‘किया क्या जाए?’ सोचने वाला सवाल से छोटा बन जाता है। उसकी शक्ति को ललकार जाता है। उसकी चौधराहट को चुनौती दे जाता है। उसने इस सवाल के बाप लोकतंत्र को जी भरकर कोसना शुरू कर दिया।
छोटे भाई त्रिभुवन सिंह का राजनीति में होना ऐसे समय में उसे बहुत अखरता है। वह अब लोकतंत्र के साथ-साथ राजनीति को भी गालियां देनी शुरू कर देता है। उसका गुस्सा बढ़ता जा रहा है। हारू यानी जो हार चुका है। जो कभी नहीं जीतेगा। बेटे का नाम पृथ्वी सिंह। पीढिय़ों से हमारे खेतों में और अब फार्मों पर दिहाड़ी-मजदूरी करते, सीरी-सांझी लगते आ रहे हैं। हमारे घरों से मांगी लस्सी पीकर पलते आ रहे हैं और बेटे का नाम पृथ्वी सिंह। हारा यानी मिट्टी का हारा जो घर के बाहर आंगन के एक कोने में उकडू बैठने जितनी जगह में पड़ा रहता है। हारा यानी जिसमें सदैव आग दबी रहती है धुंआती रहती है। साथ-साथ राख होती रहती है-कभी भी चुल्हे की आग की तरह धधक नहीं पाती। बेटे का नाम पृथ्वी। दांत मींचता हुआ वह अपने ही मुक्के तान-तान कर अपने दूसरे हाथ पर मारने लगा।
अगर भाई त्रिभुवन सिंह आज हारी हुई पार्टी का हारा हुआ विधायक होने की बजाय सत्ता-दल का होता तो भी वह देख लेता हारा और उसके परिवार को। लेकिन अब किया क्या जाए? कुछ ऐसा वैसा भी नहीं किया जा सकता। ये मीडिया वाले फिर कैमरे-माइक उठाए आ धमकेंगे गांव में और बात का बतंगड़ बना कर उछाल देंगे पूरे देश में। पिछले चुनाव से पहले यही तो गलती हुई थी।
साथ के गांव में चौधरियों की लडक़ी ने हरिजन के लडक़े के साथ शहर में जाकर शादी कर ली थी। कुछ दिनों बाद उन्हें बहला-फुसलाकर गांव ले आया गया था। रात-भर गांव में हलचल रही थी और तारों की छांव में उन दोनों को बिना संगी-साथियों और सहेलियों के विदा कर दिया गया था। लडक़ी को कोठड़ी में बंद कर तेल छिडक़ कर जला दिया गया था और लडक़े को पीट-पीट कर मार डाला गया था। सुबह लडक़े की लाश गांव से बाहर पीपल पर आत्महत्या करने की तरह लटकी हुई थी।
इस पूरे प्रकरण में चौधरी गगन सिंह की मुख्य भूमिका थी जो कि सभी गांव खुसर-पुसर में कहते रहे थे। उस गांव के हरिजन भय के मारे शहर में भाग गए थे। आस-पास के कुछ और हरिजन परिवार भी शहर में जा बसे थे लेकिन गगन सिंह ने अपने गांव से एक भी हरिजन को नहीं जाने दिया था। मीडिया वाले मामले को उछाल कर रह गए थे। कुछ नहीं हुआ। उलटा यहां के हरिजनों से बयान दिलवा दिया गया था कि चौधरी तो देवता आदमी हैं। ये ऐसे काम में शामिल नहीं हो सकते।
गगन सिंह बच गया था लेकिन पार्टी में त्रिभुवन सिंह को काफी खींचा गया था। तभी गगन सिंह ने अपने काम करने के तरीकों में लोकतंत्र को शामिल कर लिया था। त्रिभुवन सिंह की करारी हार ने सिखा दिया था कि अब गोली-लाठी से नहीं बल्कि सभी काम नीति से करने होंगे। और फिर इन लोगों से वोट तो लेने ही हैं अपने फार्मों पर काम भी तो करवाना है।
त्रिभुवन सिंह राजधानी गया हुआ है। वहां पार्टी की मंथन-बैठक चल रही है कि अगले चुनाव से पहले दलितों-पिछड़ों का विश्वास कैसे जीता जाए। उसके एक-दो दिन तक लौटने की कोई संभावना नहीं है। गगन सिंह को उतावलेपन के कारण उसकी प्रतीक्षा व्यर्थ लगी। ‘पृथ्वी सिंह’ नाम उसे त्याग करने वाला लग रहा था। वैसे भी वह त्रिभुवन सिंह की नहीं बल्कि त्रिभुवन सिंह उसकी सलाह के अनुसार कार्य करता है। अत: सुबह-सुबह वह हारू के घर पहुंच गया था। एक छोटी-सी दहलीज थी जहां वह स्टूल पर बैठ गया था जैसे पिछले चुनाव में कई बार आकर बैठा था। अपने-अपने कामों पर निकलने की तैयारी कर रहा पूरा चमारवाड़ा वहां इकट्टा होने लगा वे सब हैरान हो रहे थे कि चुनाव भी आसपास नहीं हैं फिर इतना बड़ा चौधरी और एम.एल.ए. साहब का भाई आज यहां कैसे?
‘‘अरे हारू! वा भई, अपने पृथ्वी सिंह को नहीं दिखाएगा, क्या?’’
कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया वहीं क्षणेक खड़ा रहने के बाद हारू भीतर चला गया। झटपट  ‘पृथ्वी सिंह’ को पोतड़ों से निकाल कर उसके मामा के घर से आए नए तौलिए में लपेट कर दूर से ही अपनी बाहों से सीधा करके दिखाने की कोशिश की। फिर खुश होकर हारा अपने नन्हें पृथ्वी सिंह को सम्बोधित करता हुआ बोला -‘‘हाथ जोडक़र नमस्ते कर चौधरी साहब को। बोल-दादा जी! पांय लागूं।’’
‘‘अरे ये सम्बन्ध तो फिर जोड़ लेना। ला मुझे दे इसे।’’
एक पल को फिर सन्नाटा छाया रहा। हारू ने बिना अधिक हिचक दिखाए ‘पृथ्वी सिंह’ को गगन सिंह की गोद में डाल दिया। गगन सिंह ने लाड़-लड़ाने के लहजे में उसे प्यारा और सुन्दर बताया तो हारू, हारू की पत्नी, परिवार वाले और पूरा चमारवाड़ा गद्दगद्द हो उठा। कुछ को तो ‘पृथ्वी सिंह के भाग्य से ईष्र्या होने लगी।’
गगन सिंह ने दस का नोट निकालकर ‘पृथ्वी सिंह’ की नन्ही-नन्ही, लाल-लाल मु_ियों के बीच ठूंसते हुए कहा-‘‘ले पकड़-पकड़ ले शाबाश! अपने बाप दादा की तरह कामचोर नहीं बनना’’ कहते-कहते ठहाका लगा दिया गगन सिंह ने, इज्जत-बेइज्जती से ऊपर उठ चुके इन लोगों ने भी हँसी में उसका साथ दिया। ‘‘और इसकी मां कहां है भाई। उसे ही तो बधाई देने आए हैं हम।’’
घूंघट काढ़े ओट में से आगे  आ गई हारू की पत्नी। जापे में मिले चिकने-चोपड़ से और घर में रहने के कारण शरीर भरने के साथ-साथ हाथ-पैर भी कुछ निखर गए थे। उसने चारों और खड़े अपने देवर-जेठों, परिवारवालों की ओर घूंघट में से देखा। सूण्डू, कूड़ा, माडू, छितरा और उनकी पत्नियां-बागों, मरियां, छापां, कांटो (गिलहरी) आदि सब उसे गगन सिंह को हाथ जोडक़र नमस्ते करने के इशारे कर रहे थे।
कच्ची को पी जाने वाली अपनी नजर पर मुश्किल से काबू पाया गगन सिंह ने और दस रूपए निकाल कर उसकी ओर बढ़ाए। वह खुश हो गया क्योंकि हारू की पत्नी ने ‘नहीं जी रहने दो’ वाली शैली में अपने दोनों हाथ छाती पर चिपका लिए थे। गगन सिंह ने झटपट अपने एक हाथ से ‘पृथ्वी सिंह’ को संभालते हुए छाती पर चिपके उसके हाथों को खोलने के लिए अपना दूसरा हाथ आगे बढ़ाया तो हारू की पत्नी ने अपने हाथ पहले ही नीचे लटका लिए हारू के कहने पर उसने नोट पकड़ लिया। गगन सिंह का उसे स्पर्श करने का मौका एकदम हाथ से निकल गया था। लेकिन अपनी खीझ पर काबू पाता हुआ गगन सिंह बच्चे की ओर देखने लगा। क्या नाम बताया इसका? पृथ्वी सिंह! हारू अरे भाई ये भी कोई नाम हुआ? आदमियों वाला नाम है ये, मेरा मतलब बड़े आदमियों वाला नाम है ये। समझ रहा है ना। भाई ऐसे नाम तो बड़े आदमियों के, मेरा मतलब है बड़ी उम्र के आदमियों के होते हैं।’’ गगन ंिसंह ने अपना लहजा लोकतांत्रिक बनाए रखते हुए कहना जारी रखा,अब देखो ना पिल्ले जैसा यह बच्चा और नाम- ‘पृथ्वी सिंह’ । धत्त तेरे की, बड़ा होकर ये खुद सोच लेगा कि ये  ‘पृथ्वी सिंह’  है या कुछ और? देख हारू! मुझे तो यह पिल्ले जैसा प्यारा लग रहा है। इसलिए इसका नाम है-पिलवा। क्यों बेटा! बोल तेरे बापू को कि ऐसे होते हैं नाम छोटों के। आहा देखो कितना खुश है इस नाम से। खुश है ना बेटा।
हारू की मां यानी पृथ्वी सिंह की दादी एक ओर खाट पर बैठी प्रसन्न हो रही थी। प्रसन्न मुद्रा में ही उसने बताया कि हारू का नाम भी इसके बाप ने कुछ ऐसा ही रखा था। मैं खेत में काम कर रही थी। यह छोटा-सा-था। पेड़ के नीचे मिट्टी खाता हुआ रो रहा था। इसका पेट बहुत बड़ा था। बड़ा चौधरी (गगन सिंह के बड़े भाई) उधर से निकला तो इसे रोते हुए देखा। इसका हारे जैसा पेट देखकर बोला-तेरा ये हारू, उसके बाद इसे हारू कहने लगे। यह बताकर हारू की मां तालियां मारकर हँसने लगी।
गगन सिंह को गर्व हुआ अपने स्वर्गीय भाई पर। उसने फिर दोहराया-‘‘ठीक है ना पिलवा। खुश है ना पिलवा?’’ यह सब वह बच्चे पर झुक कर दोहराए जा रहा था ताकि सब को सुन जाए। तभी नन्हें पृथ्वी सिंह ने ऐसी प्रतिक्रिया दिखाई कि गगन सिंह झेंप गया। मूत की धार सीधी गगन सिंह के मुंह पर मारी थी। चौधरी गगन सिंह ने राजनीति और लोकतंत्र को ढेर सारी गालियां दी और वहां से धोती के पल्ले से मुंह रगड़ता हुआ चला दिया।
उसका जी वितृष्णा से भरने लगा। लेकिन तभी उसकी खुशी का टिकाना ना रहा जब पीछे से सुनाई दिया, पिलवा को मुझे दे। पिलवा को मुझे दे। पिलवा रे! ओ पिलवा! जब बच्चे और औरतें खुश होकर पृथ्वी सिंह को ‘पिलवा-पिलवा’ पुकार रहे थे तो आदमियों में खुसर पुसर शुरू हो गई थी कि यह आज यहां किस मकसद से आया था।
         (जनवादी हिन्दी पत्रिका ‘उद्भावना’ से धन्यवाद सहित)

विकास के नये पैमाने में करोड़पति
व्यंग
सहीराम
खबर यह है जी कि अपने देश में पिछले तीन साल में करोड़पति अड़सठ फीसद बढ़ गए। असल में करोड़पतियों के बढऩे के बारे में तो खबर मिलती ही रहती है। मसलन, चुनाव लडऩे वाले करोड़पतियों की संख्या निरंतर बढ़ती ही जा रही है। हालांकि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की संख्या भी बढ़ रही है, यह भी पता चल जाता है।
विकास को असल में इन्हीं दोनों पैमानों से मापा जा सकता है। इससे नहीं मापा जा सकता कि बेरोजगारों की संख्या कितनी करोड़ बढ़ गयी। नोटबंदी और जीएसटी से कितने लाख उद्योग धंधे और कामकाज बंद हो गए। विकास को इससे भी नहीं मापा जा सकता कि इन वर्षों में कितने लाख किसानों ने आत्महत्या की और यह दर किस गति से बढ़ रही है। महिलाओं और बच्चियों के साथ बलात्कार और उनके साथ होने वाले यौन अपराधों में कितनी बढ़ोतरी हुई, इससे भी विकास को नहीं मापा जा सकता। कितने बच्चे गायब हो गए, लापता हो गए, इससे विकास का क्या लेना-देना। विकास मापने का यह तरीका है ही नहीं कि यह बताया जाए कि बैंकों के डूबे हुए कर्ज कितने बढ़ गए और बैंकों का पैसा मार कर कितने करोड़पति देश छोडक़र भाग गए।
विकास मापने का तरीका यह है कि कितने किलोमीटर सडक़ें बन गयीं। कितने शौचालय बन गए। कितने लोगों ने टैक्स चुकाया। क्योंकि खबर यह है कि टैक्स चुकाने वालों की संख्या भी बढ़ रही है। असल में टैक्स चुकाए बिना यह विश्वास नहीं दिलाया जा सकता कि हम बैंकों से जो कर्ज ले रहे हैं, वह सचमुच चुका देंगे।
विश्वविद्यालयों और कालेजों में फीस न चुका पाने की वजह से कितने छात्रों ने आत्महत्या की, यह विकास का पैमाना नहीं हो सकता। काम धंधे बंद होने से कितने दुकानदार और कारोबारी बर्बाद हो गए, इनकी संख्या कोई नहीं बताएगा। दहेज की भेंट कितनी महिलाएं चढ़ीं, कितने लोग दंगों के शिकार हुए, इनकी गिनती नहीं होती है। फिर भीड़ की हत्या में कितने मरे। विकास का पैमाना यह थोड़े ही हो सकता है कि गरीबों और बेरोजगारों की संख्या कितनी बढ़ी। विकास का पैमाना तो यही हो सकता है कि करोड़पतियों की संख्या कितनी बढ़ी और अच्छी बात यह है कि वह अड़सठ फीसद बढ़ गयी है।
अब सरकार को एक काम और करना चाहिए। विकास के पैमाने के तौर पर यह बताना भी शुरू कर देना चाहिए कि अमिताभ बच्चन ने कितने करोड़पति बनाए। इसके अलावा कितने करोड़पति और अरबपति देश छोड़ कर अच्छा और बेहतर जीवन जीने के लिए विदेश जाकर बस गए, इसे भी एक पैमाना बना देना चाहिए। अच्छा तो यह हो कि कितने करोड़पति बैंकों का कर्ज खाकर भाग गए, इसे भी विकास का एक पैमाना बना देना चाहिए।़
(‘दैनिक ट्रिब्यून’ से धन्यवाद सहित)

कविता
– हरिवंशराय बच्चन
ना दिवाली होती, और ना पठाखे बजते
ना ईद की अलामत, ना बकरे शहीद होते
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
काश कोई धर्म ना होता….
काश कोई मजहब ना होता….
ना अर्ध देते, ना स्नान होता
ना मुर्दे बहाए जाते, ना विसर्जन होता
जब भी प्यास लगती, नदियों का पानी पीते
पेड़ों की छांव होती, नदियों का गर्जन होता
ना भगवानों की लीला होती, ना अवतारों का नाटक होता
ना देशों की सीमा होती, ना दिलों का फाटक होता
ना कोई झूठा काजी होता, ना लफंगा साधू होता
ईन्सानियत के दरबार में, सबका भला होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,
काश कोई धर्म ना होता…..
काश कोई मजहब ना होता….
कोई मस्जिद ना होती, कोई मंदिर ना होता
कोई दलित ना होता, कोई का$िफर ना होता
कोई बेबस ना होता, कोई बेघर ना होता
किसी के दर्द से कोई बेखबर ना होता
ना ही गीता होती, और ना कुरान होती,
ना ही अल्लाह होता, ना भगवान होता
तुझको जो जख्म होता, मेरा दिल तड़पता,
ना मैं हिन्दू होता, ना तू भी मुसलमान होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता।

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