उर्दू कहानी
बन्दूक
– तारिक छतारी
शे$ख सलीमुद्दीन रात में पढ़ी जाने वाली इशा की नमाका के बाद हवेली में बैठे हुए हुक्का पी रहे थे। उनका बेटा $गुलाम हैदर मोढ़ा खींचकर उनके पास आकर बैठ गया।
‘‘अब्बा हुजूर, इन दिनों माहौल ठीक नहीं है। पता चला है कि बाकाार में कुछ अकानबी लोग आपके बारे में लोगों से पूछताछ करते हैं और आपका पीछा करते हैं! वे अजनबी लोग इस $कस्बे के नहीं हैं। तेजपाल हलवाई से मालूम हुआ कि आपके बारे में पूछताछ कर रहे थे।’’ शे$ख सलीम उसी तरह हुक्का पीते रहे, जैसे यह सब सुनकर भी कुछ न सुना हो!
‘‘रात की नमाज आप घर पर ही पढ़ लिया करें।’’ आम दिनों में ऐसी सलाह पर शायद वे बिफर उठते, लेकिन आज बिलकुल चुप रहे। थोड़ी देर के बाद सि$र्फ इतना कहा, ‘‘सदर दरवाकाा बन्द कर लो।’’ यह कहकर शे$ख साहब उठे और हुक्के की चिलम उलट दी। फिर अपने बिस्तर पर जाकर लेट गये।
शे$ख सलीमउद्दीन के स्वभाव और शिष्ट व्यवहार से उनके $कस्बे ही नहीं, आसपास के गाँवों के लोग भी बहुत प्रभावित थे। उनके परिवार की बहुत प्रतिष्ठा थी। तमाम लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। वे लोगों के दु:ख-सुख में शामिल होते थे। किसी को $खबर भी नहीं होती और जरूरतमन्द की जरूरत पूरी हो जाती। वह अनेक तरह से लोगों की मदद करते। $गरीब लोगों की बेटियों की शादी में मदद करते, तो कभी किसी को कोई कारोबार शुरू करने के लिए आर्थिक मदद करते, किसी को बच्चे की पढ़ाई के लिए वकाीफे देते। मतलब यह कि लोगों की मदद करके उन्हें आन्तरिक खुशी मिलती। वैसे $कस्बे में कुछ और घराने भी थे, जिनका समाज में एक असर था….कुँअर माजिद अली खाँ। क्या दबदबा था उनका! मिर्काा अकबर खाँ… बात-बात पर बन्दूक निकाल लेते। डॉक्टर इब्राहीम…पढ़े-लिखे थे, प्रैक्टिस तो अच्छी नहीं चलती थी, लेकिन $कस्बे की राजनीति पर पकड़ अच्छी थी।
ये सब नेमतें तो शेख साहब को हासिल नहीं थी, लेकिन जिस चीका से दूसरे लोग वंचित थे, वह उनके पास भरपूर थी और वह थी $कस्बे के लोगों से हासिल मुहब्बत! यही वजह थी कि उनकी बैठक में लोग हरदम जमा रहते थे। रमकाान में लगभग हर रोका दस-बीस लोग उनके साथ इफ़्तार करते। कुछ लोग उन्हें जगाने के बहाने आकर सहरी भी उनके साथ ही करते थे। मन्दिर में कथा हो या हनुमान अखाड़े में दंगल, चन्दा वसूल करने के लिए पंडित हरप्रसाद सबसे पहले उन्हीं के यहाँ पहुँचते थे। उनका मानना था कि शुरुआत शे$ख साहब के घर से हो तो चन्दा ज्य़ादा मिलता है। रामलीला के लिए घर के सारे त$ख्त, जाकिाम और सफेद चादरें पूरे दस दिनों के लिए बड़े मन्दिर पर पहुँचा दिए जाते। क्या हिन्दू, क्या मुसलमान सभी लोग उन पर जान छिडक़ते थे। आज उन्हीं का $खून उनसे कह रहा है कि लोग उनकी जान लेना चाहते हैं!
पहली बार जब $गुलाम हैदर ने उनसे यह बात कही थी, तो वे चौंक गये थे, लेकिन उसके बाद उन्होंने $खुद को सँभाल लिया…और अब तो जैसे वे ये सब सुनते ही नहीं! कई दिनों से उन्हें $गुलाम हैदर समझाने की कोशिश कर रहा है।
‘‘अब्बा हुजूर बन्दूक $खरीद लीजिए।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘बस्ती में सभी लोगों के पास है। कुँअर माजिद अली खाँ तो आजकल बिना मतलब के बाकाार में बन्दूक लिए घूमते हैं कि लोग देखें कि उनके पास…. और मिर्जा साहब? वह अब रोकााना शिकार पर जाने लगे हैं। डॉक्टर इब्राहीम ने सैयद अनवार हुसैन को भी लाइसेंस दिलवा दिया है।’’
‘‘हूँ…’’ शे$ख सलीमुददीन ने लम्बी साँस लेते हुए कहा। वह $गुलाम हैदर की बातचीत का विषय बदलना चाहते थे, लेकिन वह था कि उसी तरह लगातार बोलता रहा, ‘‘मुकर्रम यार खाँ अपने खलिहान पर $खुद जाकर सोते हैं और साथ में बन्दूक वाले दो पहरेदार भी होते हैं। हर श$ख्स वक़्त के मिकााज को समझ रहा है, बस एक आप हैं कि….’’
‘‘$गुलाम हैदर, मेरे पास भी बन्दूक है।’’ उन्होंने तल्$ख लहको में कहा।
‘‘आपके पास’’
‘‘तुमने अभी तक नहीं देखी?’’
‘‘हैरत है!’’
‘‘हैरत तो मुझे तुम पर हो रही है।’’
‘‘लेकिन आपने आज तक कभी चलाई नहीं! आपको तो बन्दूक पकडऩा भी…’’
‘‘$खैर, छोड़ो इस बहस को…’’और फिर दोनों $खामोश हो गए।
कई दिनों तक इस मुद्दे पर दोनों बाप-बेटों के दरम्यान कोई बात नहीं हुई, लेकिन जब पूरे इला$के में दंगा फैल गया, तो शे$ख सलीमुद्दीन का $कस्बा निकाामपुर भी अछूता न रहा। मुख्य द्वार के मोटे-मोटे किवाड़ों पर ताला लगा दिया गया। शे$ख सलीमुद्दीन की किान्दगी में पहली बार हवेली का दरवाकाा दिन में बन्द हुआ था। $गुलाम हैदर ने $खबर दी कि ‘‘हमारे सब लोग बस्ती छोडक़र जा रहे हैं। कुँवर माजिद अली खाँ की कोठी जला दी गयी है। मिर्काा अकबर खाँ की उन्हीं की बन्दूक से हत्या कर दी गयी है… और सारा $कस्बा $खाली हो गया है।’’
शेख सलीमुद्दीन ने बहुत कोशिश करके अपना झुका हुआ सिर ऊपर उठाया और सूनी-सूनी आँखों से $गुलाम हैदर का चेहरा देखने लगे।
‘‘अब क्या होगा अब्बा हुजूर ? हमारा तो कोई सहारा नहीं, न कोई अजीका बचा है, न कोई रिश्तेदार-पूरे मुहल्ले में अकेला घर हमारा है। आप हैं कि…कहते हैं, तुमने देखी नही है। है कहाँ, जो देखें?’’ $गुलाम हैदर लगातार बोले जा रहा था और शे$ख सलीम बिलकुल $खामोश थे। यह $खामोशी किसी गहरे इत्मीनान का नतीकाा नहीं थी, बल्कि आज उनके चेहरे पर परेशानी की आशंका साफ झलक रही थी। पहली बार उनके दाहिने हाथ की तर्जनी में हरकत हुई थी, जैसे सपने में बन्दूक चलाने का अभ्यास कर रहे हों।
अँधेरा होता जा रहा था। सन्नाटे ने $खामोशी के गोले दा$गने शुरू कर दिये थे और पूरी हवेली किसी अज्ञान भय की आशंका से सहमी-सिमटी आसमान की ओर नकारें गड़ाए शेख सलीमुद्दीन को कोस रही थी कि अचानक फाटक पर काोरदार धमाका हुआ। शे$ख साहब उछल पड़े। $गुलाम हैदर ने घर की औरतों और बच्चों को एक सुरक्षित कमरे में बन्द कर दिया और $खुद सीढिय़ाँ चढक़र पीछे के रास्ते से घरवालों को बाहर निकाल ले जाने के रास्ते तलाश करने लगा।
‘‘म$गर जाएँगे कहाँ? जिनके यहाँ जा सकते थे, वह सब तो मारे गए या कूच कर गए।’’
‘‘$गुलाम हैदर…$गुलाम हैदर…’’ शे$ख साहब ने अपने बेटे को इतनी धीमी आवाका में पुकारा कि $गुलाम हैदर तो क्या, $खुद शे$ख साहब भी अपनी आवाका न सुन सके, लेकिन तआज्जुब की बात यह है कि अच्छी-$खासी दूरी पर होने के बावजूद $गुलाम हैदर ने अपने बुजुर्ग पिता की आवाका न केवल सुन ली, बल्कि उनके पास आकर बोला, ‘‘धीमे बोलिये अब्बू हुजूर…हवेली के पिछवाड़े में कुछ लोग जमा हैं।’’ ये कहकर $गुलाम हैदर ने लम्बी साँस ली और फिर बड़बड़ाने लगा, ‘‘लगता है सुबह होते-होते सब इसी हवेली में द$फ्न कर दिए जाएँगे। बचने की कोई उम्मीद नहीं है।’’
‘‘कोई उम्मीद नहीं तो फिर सदर दरवाकाा खोल दो।’’
‘‘कारूर खोल देता अगर इस वक़्त हमारे घर में बन्दूक होती। कोई आपकी तरह की किान्दगी गुकाारता है? इतनी बड़ी जायदाद और…’’
‘‘चलो छोड़ो, घुटन बहुत है। औरतों और बच्चों को जिस कमरे में बन्द किया है, कम-से-कम वह तो खोल दो।’’ इतने में एक और धमाका हुआ, जैसे पुराने ककय्या ईंटों से बनी हवेली की बरसों पुरानी दीवार गिरा दी गयी हो। सबका दिल धक से रह गया। औरतें मुँह पर दुपट्टे रखकर काँपने लगीं और भयाक्रान्त होकर घुटी-घुटी वहशतनाक आवाकों निकालने लगीं। शे$ख सलीमुद्दीन ने महसूस किया कि औरतों वाले कमरे और हवेली के बाहर से आने वाली आवाकाों में का$फी हद तक समानता है। बहुत देर तक ऐसी रहस्यमयी आवाकों आती रहीं। उन्होंने अन्दाकाा लगाया कि जिस तेकाी से दीवार गिरने, दरवाकाा टूटने और कामीन खोदने की आवाकों आ रही हैं उस हिसाब से तो हम अब तक $कत्ल करके दफ्ऩ भी कर दिए जाते, मगर…
उन्होंने $खुद को टटोला और $गुलाम हैदर की ओर देखा। औरतों की आवाकों सुनीं और गहरी साँस लेकर बोलें, ‘‘अल्लाह हि$फाजत करने वाला है। अब तो सुबह होने ही वाली है। $गुलाम हैदर, अकाान देने वाले मुअज्किान की कोई $खबर मिली?’’
‘‘नहीं, कुछ पता नहीं चला।’’
‘‘ओह, ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ!’’
दोनों थोड़ी देर $खामोश बैठे रहे, फिर एक मनहूस-सी आवाका दोनों ने सुनी। इससे पहले ऐसी आवाका उन्होंने किान्दगी में कभी नहीं सुनी थी। तीर की तरह चुभने वाली आवाका, ‘‘यह किसी परिन्दे की आवाका है।’’ $गुलाम हैदर ने कहा।
‘‘हाँ, तुम ठीक कह रहे हो’’
‘‘वह देखिये दीवार की मुंडेर पर…’’
‘‘हाँ, वह बैठा है, मार दो।’’ शे$ख सलीमुद्दीन ने बेसाख्ता कहा।
‘‘मगर कैसे? हमारे पास…’’
…और शे$ख सलीमुद्दीन ने एक गहरी साँस लेते हुए कहा, ‘‘कभी सोचा भी नहीं कि इस हवेली की दीवार पर एक दिन कोई मनहूस परिन्दा आ बैठेगा।’’
पौ फटने लगी थी। उजास फैलने लगा था। परिन्दा दीवार पर उसी जगह बैठा था और जब वह साफ दिखाई देने लगा, तो शे$ख सलीमुद्दीन और $गुलाम हैदर ने एक-दूसरे की ओर देखकर आँखें झुका लीं। दरअसल यह एक पालतू कबूतर था जिसे रात गु़लाम हैदर बदहवासी में दरबे में बन्द करना भूल गया था। अब धूप की किरणें आँगन में उतर आई थीं, लेकिन मुख्य द्वारा का ताला अभी तक नहीं खुला था। जब दोपहर होने को आई तो $गुलाम हैदर ने कहा, ‘‘आप कहें तो कोई इन्तकााम करूँ? कारूरी सामान के साथ दोपहर में निकल चलते हैं। इस तरह और रातें गुकाारने की अब हिम्मत नहीं।’’
शे$ख सलीमद्दीन $खामोश रहे, म$गर $गुलाम हैदर ने सुना कि वह कह रहे हैं, ‘‘हाँ, जल्दी से कोई इन्तकााम कर लो।’’
सूरज डूब रहा था-सामने हकाारों नुकीले पंजों वाला ऊबड़-खाबड़ और आड़ा-तिरछा भयावह रास्ता जमीन की छाती से चिपटा हुआ था। $गुलाम हैदर ने $खुद को तसल्ली दी।
‘‘$खुदा का लाख-लाख शुक्र है कि $खतरे से बाहर निकल आए। कोई और सवारी तो मिली नहीं, वो तो भला हो राम रतन ऊँट वाले का कि अपनी शिकरम हमें दे दी। रात होने से पहले-पहले हम नजीबगंज पहुँच जाएँगे। नवाब साहब की गढ़ी बहुत महफूज है। सुबह तक वहीं रहेंगे, उसके बाद….।’’
‘‘उसके बाद?’’ ….दोनों $खामोश हो गये। शे$ख सलीमुद्दीन ने गाड़ी पर रखे सामान से टेक लगाई ही थी कि $गुलाम हैदर की नकार दाहिनी तर$फ आती भीड़ पर पड़ी। वे एकदम से सहम गये।
‘‘अब्बा हुजूर…’’
‘‘हाँ…’’
‘‘वह देखिए…’’
‘‘हाँ, कुछ धुआँ-सा उठ रहा है। शायद किसी के खलिहान में आग लगी है।’’
‘‘नहीं अब्बा हुजूर, भीड़ हमारी तर$फ बढ़ रही है। लगता है हमारी बस्ती के ही लोग हैं। नाला पार करके आए हैं, इसीलिए इतनी जल्दी…’’
‘‘धीमे बोलो, औरतें घबरा जाएँगी।’’
‘‘लेकिन वे लोग बहुत $करीब आ चुके हैं।’’ यह कहकर $गुलाम हैदर ने लोहे की एक लम्बी छड़ सामान से खींचकर हाथ में थाम ली। बेगम साहिबा ने जब यह देखा तो वह न ची$खीं, न घबराई बल्कि इत्मीनान से खिसककर शे$ख साहब के करीब आ गयी बस इता कहा, ‘‘मैं कभी कुछ नहीं बोली, अगर आज…’’
शे$ख सलीमुद्दीन ने बेगम साहिबा की तरफ देखा और उनकी हैरानी लम्बी $खामोशी में बदल गयी।
‘‘अगर आपने $गुलाम हैदर की बात मानी होती तो आज…’’
‘‘हाँ अब्बा हुजूर, आज हमारे पास अगर बन्दूक होती तो ये लोग…’’
‘‘इत्मीनान रखो।’’
‘‘अब भी आप यही कह रहे हैं! जब हमारी जानें ही नहीं इज्कात भी…’’
‘‘नहीं $गुलाम हैदर…बस अल्लाह को याद करो।’’ यह कहकर शे$ख सलीमुद्दीन कुछ पल के लिए चुप हो गये, फिर कुछ सोचकर बोले, ‘‘$गुलाम हैदर, शायद तुम ठीक कहते हो।’’
देखते-ही-देखते भीड़ गाड़ी के चारों तरफ फैल गयी। शे$ख साहब ने देखा कि सामने वकील दयानन्द कुछ लोगों के साथ खड़ें हैं।
‘‘अब्बा हुजूर वकील साहब भी…’’
‘‘यह कैसे हो गया $गुलाम हैदर। वकील साहब भी उनके साथ हैं। कारा ठीक से देखो, वकील साहब ही हैं ना?’’
ठीक से देखने की कारूरत ही नहीं पड़ी। वकील दयानन्द, सेठ देवी सरन और पंडित हरप्रसाद ने शे$ख साहब की दोनो बाँहें पकड़ कर गाड़ी से उतार लिया। $गुलाम हैदर भी वालिद को बचाने के लिए उतरा, लेकिन कुछ लोगों ने उसे अपने घेरे में ले लिया। एक श$ख्स ने ऊँट की नकेल अपने हाथ में थाम ली। $गुलाम हैदर ने देखा कि उसके वालिद $कस्बे के सम्मानित लोगों की गिरफ़्त में बेबस और पराजित व्यक्ति इस तरह खड़े हैं, जैसे खुद को पूरे तौर पर व$क्त के हवाले कर चुके हों। वकील दयानन्द ने उनके बाजू छोड़ दिए और हाथ जोडक़र खड़े हो गये।
‘‘शे$ख साहब, यह आप क्या कर रहे हैं?’’
सेठ देवी सरन ने झुककर उनके घुटने पर हाथ रख दिया-‘‘हमारी और बस्ती की इज्कात आपके चरणों में है।’’
पंडित हरप्रसाद ने धीमे से कहा, ‘‘चलिए वापस, हम आपको इस तरह नहीं जाने देंगे।’’
शे$ख सलीमुद्दीन ने आँखें बन्द कर लीं।
‘‘अब्बा हुजूर…’’
चौंककर आँखें खोलीं, ‘‘$गुलाम हैदर…’’ वह कुछ कहना चाहते थे, लेकिन जुबान से एक ल$फज नहीं निकला। $गुलाम हैदर भी $खामोश था, मगर उसकी आवाका जंगलों में, रेगिस्तानों में, पहाड़ों और वादियों में, मस्जिदों में, मन्दिरों में और गिरजाघरों में, नाले के पास बस्ती के उजड़े मकानों और शे$ख सलीमुद्दीन के कानों में गूँज रही थी-वह $खामोश था, लेकिन शे$ख सलीमुद्दीन सुन रहे थे।
‘‘हाँ अब्बा हुजूर, देख लिया। जिसे बचपन से अब तक नहीं देखा था, उसे आज देख लिया! आपकी बन्दूक को-जो ऐसे व$क्त काम आई, जिसने ऐसे मौके पर जान बचाई, जब सारी बन्दूकें अपने मालिकों का $कत्ल कर रही हैं।’’
‘‘गुलाम हैदर चलो…’’ किसी ने धीमे से कहा। नकेल थामे शख़्स ने रस्सी खींची, ऊँट की गर्दन घूमी, ऊँटगाड़ी के अगले पहिये मुड़े और $गुलाम हैदर ने देखा कि सामने सीधा और जाना-पहचाना रास्ता कामीन से गले मिल रहा है….और फिर सब लोग अपने $कस्बे निकाामपुर की और लौट चले!
अनु.: पंकज पराशर
(‘नया ज्ञानोदय’ से साभार)
व्यंग
पहले ‘विकास’ को बेचा, अब राष्ट्र को बेच रहे हैं!
अभी पांच एक साल पहले हमारे शहर में एक मकामा लगाने वाला आया। वह तेल बेचता था। सिर दर्द का तेल, बाल काले करने का तेल, सिर पर बाल उगाने का तेल। हर मर्ज़ के लिए एक ही तेल। उसका कहना था, सिर की सारी समस्याओं की वजह है, महंगाई, बेकारी, बेचारी और भ्रष्टाचार। और उसका इलाज है उसका ये तेल। उसने नारा दिया ‘‘सबको तेल, एक जैसा तेल’’। लोग उसके बहकावे में आ गए। सबको लगा अब तो सारी समस्याएं हल हो जाएंगी। सबके अच्छे दिन आ जायेंगे। उसके ‘‘विकास’’ ब्रांड सिर के तेल की करोड़ों शीशियां बिक गयी। लोग तब से अपने सिर पर तेल मले जा रहे हैं, मले जा रहे हैं,पर न किसी का सिर दर्द खत्म हुआ, न सिर पर बाल उगे और न ही बाल काले हुए। किसी के अच्छे दिन नहीं आये।
पिछले पांच साल में वह मज़मेबाज सारे के सारे विश्व में घूम आया। वह मकामा लगाने वाला जापान भी हो आया पर वहां लोगों ने उसके तेल से ज्यादा उसकी बुलेट ट्रेन में दिलचस्पी ली। और अमेरिका ने तो साफ कह दिया कि उन्हें तेल में तो दिलचस्पी है पर उस मदारी के तेल में नहीं, इराक और ईरान के तेल में। हाँ, अमरीकी व्यापारियों ने जरूर थोड़ी दिलचस्पी दिखाई वह भी तब जब उसने ये वादा किया कि उन्हें यह तेल मुँह-मांगी कीमत पर बेचने दिया जायेगा और खूब सारा मुनाफा कमाने दिया जायेगा।
इधर, देश में लोगों में असंतोष हुआ जा रहा था। वह तेल किसी को भी फायदा नहीं दिखा रहा था। किसी के भी दिन नहीं फिर रहे थे। पर वो मकामे लगाने वाला भी कम नहीं था। वह जादुई वाशिंग पाउडर ले आया। ‘‘स्वच्छता’’ ब्रांड वाशिंग पाउडर, एक ऐसा वाशिंग पाउडर जिससे आपका तन-मन साफ हो या न हो, पर घर, सडक़, मोहल्ला, शहर, राज्य और देश सभी साफ हो जाये। उस मदारी की तन या मन की सफाई में कोई रुचि थी भी नहीं। उसको तो बस मज़मा लगाना था। तेल बिकना कम हो गया तो वाशिंग पाउडर का मज़मा लगा लिया। और कहा अब तो सबके अच्छे दिन आ ही जायेंगे। उस वाशिंग पाउडर की सरकारी खरीद के लिए वाशिंग पाउडर टैक्स भी लगा दिया गया। हजारों करोड़ रुपये का वाशिंग पाउडर खरीद लिया गया। पर सफाई न होनी थी न हुई। अच्छे दिन न आने थे न आये।
अब फिर मज़मे वाले को लगा कि कोई नया मज़मा लगाना चाहिए। कोई नया खेल दिखाना चाहिए। उस मज़मे वाले ने कहा कि वह एक ऐसी मशीन बनानी शुरू करेगा कि सब कुछ यहीं, देश में ही बनने लगेगा। सभी को नौकरी मिलेगी। नौकरियों की ऐसी बाढ़ आयेगी कि एक-एक आदमी अपने दो-दो हाथों से अलग अलग नौकरी कर सकेगा। यहां तक कि नौकरी निर्यात भी कर सकेंगे। सबके दिन बहुरेंगे। पर रफ़ाल जो यहां बनना था वह भी वहीं बन रहा है। किसी के दिन न बहुरे, न बहुरेंगे। अच्छे दिन न आने थे न आये।
अब उसे एक और मज़ाक सूझा। उस मज़मा लगाने वाले ने सबसे कहा खड़े हो जाओ। सब खड़े होंगे तो सबको हर्ष होगा, उल्लासित होंगे, चहुँ ओर खुशियां ही खुशियां होंगी। सबके अच्छे दिन आयेंगे। किसान-मजदूर, जवान-बूढ़े, सारा का सारा देश अच्छे दिनों के इंतजार में खड़ा हो गया। खुशियाँ आयेंगी, समृद्धि लायेंगी। खड़े खड़े टांगें सूख गयीं, घुटने सूज गये। दर्द के मारे हाल बुरा हो गया। पर समृद्धि न आनी थी न आयी। अच्छे दिन न आने थे न आये।
पर वह मज़मा लगाने वाला बड़ा चालाक है। वह इस बार फिर एक नया तेल ले कर आया है, राष्ट्र भक्ति ब्रांड का दर्द निवारक तेल। एक ऐसा तेल जो आपके घुटने की सूजन कम कर दे। जो टांगों की रंगत वापस लौटा दे। सारा का सारा दर्द हर ले। वो दर्द जो उसने ही सबको दिया है। उसे पता है आज भी वह अपने इस नये तेल को करोड़ों की संख्या में बेच सकता है। उसका ब्रांड सबसे अच्छा भले ही न हो, सबसे बड़ा तो है ही। उसका तेल भले ही न दर्द हर सके न सूजन कम कर सके, पर बिक तो जायेगा ही। अच्छे दिन न आने थे न आये, और न ही आयेंगे। पर लगता है, जुमले बाज का जुमला तो इस बार भी कमोबेश चल ही जायेगा।
चलते चलते : पहले विकास को बेचा, अब राष्ट्र को बेच रहे हैं। ये कुछ भी बेच सकते हैं, बस खरीदने वाला चाहिये। कहते हैं काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती। पर हमारा देश विचित्र है। यहां काठ की हांडी दोबारा ही नहीं, बार बार चढ़ सकती है। पहले कांग्रेस की चढ़ती रही, अब भाजपा की चढ़ रही है।
(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)
कविता
-रामप्रसाद बिस्मिल्ल
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।
करता नहीं क्यों दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल में है ।
रहबर राहे मौहब्बत रह न जाना राह में
लज्जत-ऐ-सेहरा नवर्दी दूरिये-मंजिल में है ।
यों खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ।
ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।
खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का जमघट आज कूचे-ऐ-कातिल में है ।
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।
कविता
मई दिवस
– हरभजन सिंह हुन्दल
दिन आते हैं, दिन जाते हैं
हाथों में वे फिसलते जाते हैं
जैसे बालू के कण हों
याद नहीं आते जिनके चेहरे
गिनती करेंगे केवल अंकों में
याद करें कुछ दिनों को
तो लगेंगे, जैसे वे अतीव उदासी भरे दिन थे
स्वर्णकर छोड़ेंगे दीर्घ निश्वास
कसक पैदा होती दिल में
मानो ताजे जख्म हों
हम बैठे होंगे या खड़े रहें
वे सुनाते जाते एक उदासी भरी कहानी
फिर एक दिन आयेगा
जब सूरज चमकता रहेगा ललाट पर
सालों तक
फैलाती जाती है रोशनी
समूची जिंदगी पर
वैसा ही एक दिन था मई दिवस
सन्देश पहुंचाता है संघर्ष का
अंग-प्रत्यंग में फैलाता है ऊष्मा
उजागर करता है आन्दोलनकारियों का पथ
जिसका चेहरा रहता है लाल गुलाब की तरह
जो खून की याद दिलाता है
गांवों व शहरों में, खेतों व कारखानों में
आन्दोलन निर्मित करते हुए बहाए गए खून
और जुझारू संघर्ष पथ पर अग्रसर होते हुए
जीवन के मुख्य मार्ग पर
वह एक मील का पत्थर है
वह बताता है
संघर्ष की राह पर
हम पार किये हैं कितनी दूरी और लांघना है कितना फासला
वर्चस्व उसका बाल-भानू का-सा
नया द्वार खुलता है नये संघर्षों के लिए
आज का दिन
एक जगह बैठकर हम सब मिलकर
अपने आन्दोलनों व संघर्षों का सिंहावलोकन करते हैं
संघर्षों के दौरान उनके प्रकाश में अपनी कमजोरियों से
सबक लेते हैं
यह दिन आयेगा साल में एक ही बार
जो हमें अपने कर्तव्यों की याद दिलायेगा
हमें अपनी मंजिल स्मरण करायेगा
जिसे निर्भीकता से हमने चयन किया था
जब तक हम न पहुंचे वहां तक
सब किस्म के अन्धकारों को बुहारेंगे नहीं
और उत्पीडक़ों के हाथों में मौजूदा
मधु का प्याला छीन न लें
हमें चैन नहीं मिलता, आराम नहीं मिलता
हमारे हाथ सर्जनात्मक हैं
जिसके कारण हम नहीं बैठ सकते निठल्लू
अनुवादक : निर्मलानन्द वात्स्यायन
कविता
सारी दुनिया मांगेंगे
-फैज़़ अहमद ‘फैज़़’
हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।
यां पर्वत-पर्वत हीरे हैं, यां सागर-सागर मोती हैं
ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे।
वो सेठ व्यापारी रजवारे, दस लाख तो हम हैं दस करोड़
ये कब तक अमरीका से, जीने का सहारा मांगेंगे।
जो खून बहे जो बाग उजड़े जो गीत दिलों में कत्ल हुए,
हर कतरे का हर गुंचे का, हर गीत का बदला मांगेंगे।
जब सब सीधा हो जाएगा, जब सब झगड़े मिट जायेंगे,
हम मेहनत से उपजायेंगे, बस बांट बराबर खायेंगे।
हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।
