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साहित्य व संस्कृति (संग्रामी लहर-अप्रैल २०१९)

साहित्य व संस्कृति (संग्रामी लहर-अप्रैल २०१९)

कहानी
विकास
– ममता कालिया
हवाओं से भी प्रचंड विकास का बहाव था। लोगों और चीकाों की रफ्तार और बदलाव से ऐसा लगता जैसे इन्हें कोई ऐसी गाड़ी पकडऩी है जो वक्त से पहले छूट जानी है। लोग दौड़ते हुए चलते और चलते हुए दौड़ते। वे एक मोबाइल फोन पर बात करते होते कि उनकी जेब का दूसरा मोबाइल भी चीख पड़ता। बच्चे स्कूल से थके माँदे घर पहुँचते। जब तक वे दाल भात निगलते उनका कोचिंग क्लास जाने का समय हो जाता। वे बड़े बस्ते बिस्तर पर पटक, कोचिंग क्लास का छोटा बस्ता और पानी की छोटी बोतल लेकर दौड़ जाते पढऩे।
स्त्रियाँ सामान की सूची लेकर पड़ोस के बाकाार जातीं जहाँ उन्हें दुकान के बन्द शटर पर इश्तेहार चिपका मिलका। ‘अब से अपनी जरूरत का सामान इस मोबाइल नम्बर पर वॉट्सअप करके मँगाएँ।’ दुकान और दुकानदार अनुपस्थित होते जा रहे थे। नयी गृहणियों को कोई खास $फर्क न पड़ता, लेकिन अधेड़ स्त्रियाँ भुनभुनाती हुई लौटतीं, ‘कोई चीका आँख से ना देखो न परखो, बस मोबाइल पर खरीदो। यह मोबाइल मरजाना, सब्जीवाला, दूधवाला, किराना, केमिस्ट, हलवाई सब बन गया।’
घर के पुरुष खुश होते। औरतों का दगड़-दगड़ बाकाार घूमना उन्हें पहले भी नापसन्द था। जब से सरे राह औरतों, लड़कियों के साथ छेडख़ानी के $िकस्सों में हवा पकड़ी थी, पुरुष ज्यादा सचेत हो गये थे। दिलचस्प यह था कि पुरुष ही छेडख़ानी करते और वे ही सचेत सतर्क रहते कि उनके घर-परिवार की स्त्री के साथ कोई वारदात न हो। कई बार लगता समाज में पुरुषों के कई सेट एक साथ सक्रिय हैं-छेडख़ानी करने वाले, निगहबानी करने वाली, वीडियो $िफल्म बनावे वाली और समाचार लिखने वाले।
रात को दिनभर की दास्तान सुनाने के साथ मर्द, औरतों से कहते, ‘‘अच्छा है दुकान बन्द हो गई। तुम शान से बिस्तर पर लेटे-लेटे सामान की सूची मोबाइल पर भेज दिया करो। जब सामान आए तो इस कार्ड से यों पैसे दे दो। देखो बस ये दो क्लिक करने से काम पूरा। यह रख लो मेरा कार्ड’’  ‘‘लेकिन सामान $खराब निकला तो। दुकान में चार तरह का चावल मिलता है। छू कर, सूँघ कर अन्दाका हो जाता है क्या लें क्या नहीं।’’
‘‘ये सब पुरानी बातें हैं’’ मर्द कहते हैं, ‘‘वक़्त के साथ आगे बढऩा सीखो। अपना राजा साब भी कहते हैं न कि हम डिजिटल क्रान्ति के रास्ते में विकास कर रहे हैं।’’ औरतें बड़बड़ातीं, ‘‘पता नहीं यह कैसा विकास है। धड़ाधड़ दुकानें बन्द हो रही हैं। पूरी बिल्डिंग में बस कूरियर वाले छोकरे घूमते दिखते हैं। सामान $खराब आया तो तुम्हीं चिल्लाओगे।’’
मर्द समझाते, ‘‘देखो सामान अच्छा न हो तो उसकी शिकायत का नम्बर यहाँ दिया रहता है, रसीद के नीचे। वहाँ का नम्बर घुमाओ और शिकायत कर दो।’’
‘‘सारा दिन मोबाइल लेकर बैठे रहो।’’
‘‘और क्या। यह छोटा-सा मोबाइल तुम्हारे हाथ में सि$र्फ एक फोन नहीं, सारी दुनिया को काबू करने का रिमोट कंट्रोल है, रिमोट कंट्रोल।’’
इस समस्त रिमोट कंट्रोल विकास में अभी एक घरेलू सेवा पक्की, नियमित और पुरातन थी। जिसमें बदलाव नहीं आया था। घरों में बर्तन, झाड़ू, पोंछा करने के लिए सेविकाएँ अभी भी मिल जातीं। पास की बस्ती से वे सुबह सात बजे झुंड में आतीं और शाम चार बजे तक फारिग होकर वापस चल देतीं। अपने घरों से सब नहाकर, साफ कपड़े पहनकर आतीं। कुछ सलवार सूट पहने होतीं तो कुछ साड़ी ब्लाउका। सबके पैरों में प्लास्टिक की चपटी चप्पलें होतीं। उनकी फुर्ती देखने लायक होती। किसी के पास चार-पाँच घर से कम काम नहीं थे फिर भी वे सुबह शाम के काम के बीच सामने गोल पार्क में मिल बैठकर खाना खाने और सुस्ताने का वक्त निकाल लेतीं। फ्लैटों में फोन के साथ एकाकी जीवन बिताने वाली महिलाएँ सोचतीं ‘ये क्या बातें करती होंगी। क्या ये हम लोगों की चुगली खाती होंगी या हमारी हँसी उड़ाती होंगी।’ सेविकाओं को इतनी फुरसत कहाँ थी। दोपहर की उतरती धूप में वे अपनी बस्ती चिपियाना की समस्याओं पर तबसिरा करतीं। सबके अपने कुनबे और किटकिट थी। सब के बच्चे आसपास के स्कूलों में पढ़ते। उनके आदमी छोटी-मोटी नौकरी करते या मामूली-सा रोकागार। जिनके आदमी दूसरे शहर में नौकरी करते थे थोड़ा बेहतर जीवन जीतीं। हालाँकि उन्हें अपने बच्चों को काबू रखने में ज्यादा मशक्कत पड़ती। एक दिन सेवक बस्ती चिपियाना में धूम मच गयी। उस दिन सभी कामवालियाँ देर से काम पर आईं।
कई दिनों से चिपियाना में बड़े-बड़े पोस्टर लगाए जा रहे थे। पोस्टर में लाल रंग की चमचमाती हुई गैस सिलिंडर की तस्वीर थी और साथ में गैस का चूल्हा भी दिखाया गया था। जो पढऩा नहीं जानती थीं उन्हें भी बच्चों से $खबर लग गई कि उनकी बस्ती में हर घर को गैस चूल्हा और गैस सिलिंडर मिलने वाली है, वह भी बिलकुल मुफ्त।
पहले तो किसी को विश्वास ही नहीं हुआ ‘हिश्ट, सब वोट लेने की चालें हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि हमें मु$फ्त गैस और चूल्हा मिल जाए।’ एक दिन मशालची ढिंढोरा सिंह ने आकर बताया, ‘राजा साहब की परोपकारी योजना के तहत आपकी हस्ती के हर परिवार को एक गैस सिलिंडर और गैस चूल्हा मुफ्त दिया जाएगा। राजा साब चाहते हैं आपकी आँखें लकड़ी के धुएँ से खराब न हों। खाना बनाने में सुभीते से तो वक़्त बचे उसमें आप सब पढऩा-लिखना सीखें।’
पूरी बस्ती के चेहरे चमक उठे। वाकई एक सुबह बड़ी-सी ट्रक लिए सरकारी कर्मचारी आए और हर घर में लाल चमकदार गैस सिलिंडर और चूल्हा बाँट गए। सबने तालियाँ बजाईं, कर्मचारियों का शुक्रिया अदा किया और कहने लगे ‘यह तो सतयुग आ गया।’
तकरीबन हर घर में चाय का पानी खौला कर गैस का उद्घाटन किया। यह पाँच किलो वाला गैस सिलिंडर था और एक बर्नर वाला सिंगल चूल्हा लेकिन चिपियाना बस्ती के लिए नियामत से कम न था। सुबह शाम का खाना जल्दी से बन जाता। छोटे बच्चों को दूध-पानी देने के लिए स्टोव से जूझना नहीं पड़ता। घर के मर्दों की फरमाइश पर गैस के चूल्हे पर कभी गोश्त पकने लगा तो कभी दूध का जुगाड़ कर खीर बनाई गई।
शकीला का शौहर अशर$फ गैस की बाबत सुनकर मुम्बई में बहुत खुश हुआ जहाँ वह एक छापेखाने में ट्रेडिल मशीन पर छपाई का काम करता। ईद बकरीद पर जब वह घर आता उसकी बीवी शकीला तीन-चौथाई वक्त तो चूल्हे चौके में बिता देती। कभी कोठरी में धुआँ भर जाता तो कभी सालन धुआँ जाता। अशर$फ को लगा गैस आ जाने से शकीला अब उसके पास बैठने की फुरसत पा सकेगी।
इस ईद पर घर आते वक्त अशर$फ ने तीनों बच्चों के लिए खिलौने खरीदे। सफिया के लिए ऑटोमैटिक रोबो, दाजू के लिए रिमोट कंट्रोल कार और चिम्पू के लिए उडऩे वाला हेलिकॉप्टर। शकीला के लिए उसने नई चाल के कपड़े $खरीदे जो पहनने से ज्यादा शरमाने के काम आए। अब्बा के लिए पूरी आस्तीन की सदरी ली।
अशर$फ के आने पर ह$फ्ता भर घर में $खूब रौनक रही। गली के दोस्त वक्त-बेवक्त मिलने आते रहे। मुम्बई के किस्से चलते रहे। चाय बिस्कुट को साथ मुम्बई की बातों में सब दोस्त जानना चाहते कि अशर$फ ने कभी $िफल्मों का कोई हीरो हिरोइन देखी या नहीं।
अशर$फ कहता, ‘‘देखो यार मेरा छापाखाना अँधेरी में है जहाँ पाँच $िफल्म स्टूडियो हैं पर आज तक मुझे कोई एक्टर, एक्ट्रेस देखनी नसीब नहीं हुई। जैसे आप लोग वैसे ही मैं कभी दो तीन महीने पर एक सिनेमा देख लेता हूँ। ज्यादा छुट्टी भी नही मिलती। हर समय काम काम।’’ अशर$फ एक स्याही कम्पनी के डिब्बे का लेबिल छापता। काम की तडफ़ड़ ऐसी रहती कि स्याही की शीशियां ज्यादा बन जातीं, डिब्बे का लेबिल पिछड़ जाता। बारह घंटे ड्यूटी चलती।
अशर$फ छुट्टी बिताकर वापस चला गया। बच्चे स्कूल से आकर खिलौनों से खेलते। शकीला जल्दी से खाना बनाती और अब्बा बाकाार का चक्कर लगा लेते।
अभी अशर$फ को वापस गए हफ्ता भर भी नहीं हुआ था कि यकायक एक दिन गैस $खत्म हो गई। शकीला ने सिलिंडर को टेढ़ा किया, बर्नर के छेद पिन से कुरेदे। माचिस की कई तीलियां जला डालीं पर गैस नहीं जली। उसे काम पर जाने को देर हो रही थी। अब्बा ने कहा ‘‘और तो किसी की गैस खलास नहीं हुई। तुमने लापरवाही से बरती है। खैर तुम काम कर जाओ। मैं कोई जुगाड़ लगाता हूँ।’’ शकीला मुँह लटकाए काम पर गई। दोपहर में पार्क में वह खाली हाथ थी। साथिन ने उसके साथ अपना खाना बाँट कर खाया।
बातों में उसे पता चला कि लक्ष्मी और शशि के घरों में भी गैस खत्म हो गई। शशि ने कहा, ‘‘मेरे आदमी ने बताया, कि गैस कम्पनी के कारीगर ने कहा है कि सौ रुपये किलो भरी जावे है गैस। एक दो किलो न देंगे। पूरी पाँच किलो भरवाओ। मरे पाँच सौ माँगें हैं।’’
एकमुश्त इतने पैसों का जुगाड़ आसान नहीं था। शकीला को तसल्ली हुई कि वह इस नई विपदा से अकेली नहीं है।
इस बार तो अब्बा जी कड़ा कर गैस भरवा लाए सिलिंडर में। साथ ही उन्होंने बहू को लम्बा-सा हिदायतनामा थमा दिया, ‘‘पहले की तरह एक बेर पकाओ दो बेर खाओ। दो बार दिन में गैस जलेगी तो हकाार रुपए महीने का खर्च है। अशर$फ अपने सौ खर्चे काट कर दस हकाार भेजता है। तुम खर्चे बढ़ाओगी तो गुजर कैसे चलेगी।’’
शकीला को बुरा लगा। पाँच हजार तो वह भी कमा रही थी तीन घरों के काम से पर हर कमाई, खर्च के आगे छोटी पड़ रही थी।
इतवार को राजू की कार में रिमोट कंट्रोल का हुक्म मानना बन्द कर दिया। राजू रिमोट का बटन दबा दबा कर हार गया। उसने कार को सीधा किया। कार को एकदम रिमोट के सामने रखा पर कार टस से मस न हुई। गुस्से में वह चिम्पू का हेलिकॉप्टर पटकने के लिए लपका। बड़ी मुश्किल से मां ने उसका ध्यान बिस्कुट देकर बँटाया। शाम तक हेलिकॉप्टर भी धराशायी हो गया। रोबी ने आँखें मटकानी बन्द कर दीं। तीनों बच्चे सहम गए।
माँ ने कहा, ‘‘महीने भर से खिलौनों के पीछे लगे हो। जान निकाल दी इनकी। कौन इन्हें ठीक करवाएगा।’’
अब्बा ने रोबो को उठाकर उलटा पलटा। उन्हें उसकी पीठ पर लगा छपका दिखा। उन्होंने कहा, ‘‘अरे शकीला ये तो बैटरी वाले खिलौने हैं। बैटरी खत्म हो गई तो कैसे चलेंगे।’’
सभी खिलौनों कुल जमा छह बैटरी दरकार थी।
शकीला झल्लाने लगी, ‘‘इनको क्या कारूरत थी ऐसे खिलौने लाने। मरा खर्चा ही खर्चा।’’
अब्बा चिढ़ गए, ‘‘मेरे बेटे पर इलकााम लगा रही हो। अपनी औलाद नहीं देखतीं। न पढऩा न लिखना। हाथ धो के खिलौनों के पीछे लगे रहना।’’
आँसू भरी आँखों से बच्चों ने खिलौने ताक पर रख दिए।
बैटरी का एक सैल पन्द्रह रुपये का था यानी सीधे नब्बे रुपये का खर्च सिर पर था। इसी महीने तीनों बच्चों की फीस भी भरनी थी।
अब्बा यह सोचकर बाकाार गए कि घर के सामान में कुछ कटौती कर वे वह बैटरी सैल $खरीद लेंगे। पर उन्होंने पाया साबुन, तेल, मंजन, सब्जी, चप्पल, चीनी हर चीका का दाम इतना बढ़ गया कि वे सौ बचाने की जगह बाकाार में सवा सौ रुपये उधार कर आए।
माँ और दादू से डरकर बच्चे अपने बस्ते खोलकर पढ़ाई में लग गए। चौतरफा चिन्ताओं में शकीला का जी उड़ा उड़ा रहता। उसकी मालकिनें झींकतीं, ‘‘कैसी झाड़ू लगाती हो, दरवाको के पीछे कूड़ा पड़ा है। बर्तनों में बिम लगा रहता है।’’
शकीला मुँह लटकाए सबकी फटकार सुनती। महीना खत्म नहीं हुआ कि उसके घर की गैस फिर खत्म हो गई। जी भन्ना गया उसका। अब्बे के गुस्से का खौ$फ अलग। आ$िखरकार शकीला ने पड़छत्ती पर से अपना पुराना मिट्टी का चूल्हा उतारा और राजू से बोली, ‘बेटा टाल पर से लकड़ी लेकर आ तो चूल्हा जले।’
उसने सफिया को मिट्टी के तेल की खाली बोतल पकड़ाई, ‘भैया के साथ चली जा। बनिए से मिट्टी का तेल भरवा लेना। पैसे माँगे तो कहना पहली को हिसाब कर देंगे।’ अब्बा सारी फजीहत देखकर भी चुप थे। उसका हाथ इस वक्त खाली था। आध घंटे में बच्चे कामयाब होकर लौटे। राजू ने सूखी लकडिय़ाँ चूल्हे के पास रखीं और ताक कर पड़ी अपनी मोटर कार उठाई। बरामदे में पुरानी सुलती के ढेर में से उसने एक सुतली उठाई। अपने खिलौने के बीचोबीच उसने सुतली बाँधी और गली में कार दौड़ाने लगा।
सफिया और चिम्पू बजाते उसके पीछे भागे, ‘‘अहा भैया की कार चल पड़ी, भैया की कार चल पड़ी।’’
शकीला नम आँखों से बच्चों को ताकती रह गई।
(साभार ‘नया ज्ञानोदय’)

कविता
– बल्ली सिंह चीमा
बिकाऊ मीडिया को आज मैनेज कर लिया उसने,
कलम कैसे लिखेगी और क्या तय कर दिया उसने।
    किसी को वश में करने का हुनर अब आ गया उसको,
    बड़े नामों को पद-वद दे के गूंगा कर दिया उसने।
किसे क्या चाहिए अच्छी तरह मालूम है उसको,
कहीं तमगा कहीं छाती पे खंज़र धर दिया उसने।
    वो वादों और जुमलों का बड़ा माहिर खिलाड़ी है,
    चुनावी दौर में जनता को सब कुछ दे दिया उसने।
वो खाली जेब वालों के भी खाते खोल देता है,
वतन को नोटबंदी का भी झटका दे दिया उसने।
    शराबों और तेलों पर तो जीएसटी नहीं लगता,
    बड़े सेठों की इनकम को भी दुगना कर दिया उसने।
भगत के झूठ में सच से ज्यादा जान होती है,
वतन खुशहाल है ये कह दिया तो कह दिया उसने।
    प्राणायाम या आसन तो भूखे पेट होते हैं,
    गरीबों के लिए योगा है बेहतर कह दिया उसने।
जो भगवा रंग में रंग जाए उसी सूबे की सुनता है,
डबल इंजन की सरकारों को तोहफा दे दिया उसने।
    भले आदेश कुछ भी हो भगत करते हैं उल्टा ही,
    कई शब्दों के अर्थों को बदल कर रख दिया उसने।
कोई जुगनू अंधेरे में जला तो बच न पायेगा,
मशालों को बुझाने का भी टैंडर भर दिया उसने।

कविता
‘ढपोरशंख’
ढपोरशंख वायदे करता है
फिर वायदे पूरे करने का जोरदार वायदा करता है
जीवन में जितनी हो वचन में दरिद्रता क्यों हो
    बहुत भाषाएं नहीं जानता
    लेकिन वह भाषा खूब जानता है
    जिसे इस देश की जनता बूझती है
    चुनावी बंसी में सपनों की बोटी लगाता है
    और मछलियों की तरह फंसते चले जाते हैं लोग
उसे सफाई बहुत प्रिय है
जैसे हाथ की सफाई
सबसे ज्यादा जुबान की सफाई
    वह नदियों को साफ करता है
    सडक़ों को साफ करता है
    रिश्तों को साफ करता है
    मतभेदों को साफ करता है
    संसद को साफ करता है
    संविधान को साफ करता है
    उसके बाद देश का सफाया तो हो ही जाना है
उसने कथा वाले ढपोरशंख के मूल मंत्र
‘अहं ढपोरशंखोस्मि – बदामि च, ददामि न’
बस छोटा-सा बदलाव किया है
उसका नारा है – ‘बदामि न ददामि’
इस छोटी सी अस्पष्टता से
सबकुछ कितना स्पष्ट हो गया है
बैठे ठाले अच्छे दिन आ गये हैं
    जब वह बोलना शुरू करता है
    भाषा धीरे धीरे शब्दों के समूह में बदल जाती है
    फिर शब्द गुर्राहटों में तब्दील हो जाते हैं
    विचार तो पहले ही बाहर कर दिया था
    उसका काम अब केवल ध्वनियों से चल रहा है
इस तरह जो पहले एक गपोड़ भर था
धीरे-धीरे ढपोर में बदल गया है!  

कविता
-नीलम घुमान
चुप हो जाओ कुछ न बोलना,
बस देखते जाओ कुछ न बोलना।
लगी है आग गुलिस्तां में
जल रहा ईमान, कुछ न बोलना-बस….।
आँखें बोलती है कुछ देखकर यह सब,
पर बन्द है जुबान कुछ न बोलना-बस……।
ये मसान मेरा है के कब्र तेरी है।
जब कि है मिलना मिट्टी में दोनों को
फिर क्या तेरा क्या मेरा है।
कहाँ जाए इंसान कुछ न बोलना-बस ……।
बांटकर धरती के टुकड़े को, तुम बड़ा इतरा रहे हो,
तुम्हें मानें अगर बांट सकते हो, इन बहती हवाओं को।
फिर कैसी लड़ाई है, जिसमें मरते ही अपने भाई हैं।
कुछ न बोलना-बस देखते जाओ कुछ न बोलना।
नाप रहा इंसान सागर की गहराईयों को,
उड़ रहा ब्रह्माण्ड में देखने आसमाँ की ऊँचाईयों को।
पर अफसोस कि इंसानियत गिर गई इतनी,
कि आज बंदा ही बंदे का बैरी है।
क्या इस कदर गिरने का भी कोई पैमाना है,
कुछ न बोलना-बस देखते जाओ कुछ न बोलना।
जब एक है रंग हम सब के खून का,
दर्द क्यों नहीं होता जब ये गिरता है धरती पर,
तो क्यों न आओ सब मिलकर एक हो जाएं
ये धरती हमारी है यह आसमां हमारा है।

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कविता
– गोपालदास नीरज
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए
आग बहती है यहां गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहां जाके नहाया जाए
प्यार का खून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अंधेरे को उजाले में बुलाया जाए
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूं भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए
जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आंसू तेरी पलकों से उठाया जाए।

कविता
– दुष्यंत कुमार
अब किसी को भी नजर आती नहीं कोई दरार,
घर की हर दीवार पर चिपके हुए हैं इश्तहार।
रोज अखबारों में पढ़ कर ये ख्याल आया हमें,
इस तरफ आती तो हम भी देखते फसल-ए-बहार।
मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूँ पर कहता नहीं,
बोलना भी है मना, सच बोलना तो दर-किनार।
इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-जुर्म हैं,
आदमी या तो जमानत पर रिहा है या फरार।
दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा जरूर,
हर हथेली खून से तर और ज्यादा बेकरार।

व्यंग
मन की असली बात
डा. द्रोण कुमार शर्मा
इस बार मैं ‘‘मन की असली बात’’ किसान भाइयों से करना चाहता हूँ। किसानों के बारे मैं इतना चिंतित रहता हूँ, इतना दुखी रहता हूँ कि बोल भी नहीं पाता हूँ। हज़ारों किसानों ने आत्महत्या कर ली, सल्फास खा कर मर गए, पेड़ पर लटक गए पर मैं दुख के मारे कुछ भी नहीं बोल पाया। किसान भाइयों, मैं आपके दुख से बहुत ही दुखी हूँ। अब किसी तरह से, सर्जिकल स्ट्राईक के बाद, माहौल कुछ मन मुताबिक हुआ है तो मन कुछ हल्का हुआ है, बहला है, दु:ख कम हुआ है, और चुनाव भी घोषित हो गये हैं, तो किसान भाइयों, आज मैं आपसे अपने मन की असली बात करता हूँ।
मेरे प्यारे किसान भाइयों, मैंने पिछले चुनाव से पहले वायदा किया था कि आपको आपकी फसल का वाजिब दाम दिलवाऊंगा, पर मैंने वह पूरा किया नहीं। यह बात मुझे 2014 के चुनावों से पहले भी मालूम थी और अब भी मालूम है और आने वाले चुनावों के बाद भी मालूम रहेगी। इन चुनावों में भी मैं बहुत से ऐसे वायदे करुंगा  जिनके बारे में मुझे स्वयं पता होगा कि मैं उन वायदों को पूरा नहीं करूंगा।  
अब फसल का वाजिब दाम दिलाने के वायदे की ही बात लें। अगर, किसान भाइयों, आपकी फसल के वाजि़ब दाम आपको दिलवाऊं, तो शहरों में महंगाई कहाँ तक पहुँच जायेगी। और मुझे शहरवासियों की भी चिंता करनी है। बल्कि कहा जाये तो उनकी चिंता आपकी चिंता से ज्यादा करनी है क्योंकि वे आप लोगों से बड़े उपभोक्ता हैं। अगर उनकी कमाई का बड़ा भाग दाल-भात, गेहूं और सब्जियाँ आदि खरीदने में ही चला जायेगा तो मैं जो इतनी बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज लगवा रहा हूँ, उनका सामान कौन खरीदेगा। जो मैं विदेशों में जा कर वहां के बड़े-बड़े लोगों की खुशामद करता हूँ कि वे भारत आएं, यहाँ पैसा लगाएं, इंडस्ट्री खोलें, और खूब सारा पैसा कमा कर ले जाएँ, वे यहां आयेंगे क्या। जब खरीददार ही ख़तम हो जायेंगे तो भारत में पैसा लगाने कौन आएगा। अब आप खुद बताओ, मैं आप किसान भाइयों के बारे में सोचूँ या भारत माता के विकास के बारे में सोचूँ।
प्रिय किसान भाइयों, सिर्फ यही एक वजह नहीं है कि मैं किसानों को उनकी फसल के वाजिब दाम नहीं दिला रहा हूँ। इसके पीछे और भी कई वजह हैं। आप सब लोग तो जानते ही हैं, मैं भारत माता को असीम ऊंचाइयों तक ले जाना चाहता हूँ। बहुत सारे कारखाने लगाना चाहता हूँ। बहुत सारे बड़े-बड़े कारखाने। अम्बानी, अडानी और टाटा के सहयोग से कारखाने देसी विदेशी पैसे से कारखाने और उन सब कारखानों के लिए चाहिए जमीन, बहुत सारी जमीन। और वो जमीन है आपके पास। अगर आपको खेती से अच्छी आमदनी होने लगे तो आप वो जमीन बेचोगे? नहीं बेचोगे न। तो इसीलिए खेती में आमदनी नहीं बढ़ानी है। देश की उन्नति के लिए, बड़ी से बड़ी इंडस्ट्रीज लगाने के लिए जरूरी है कि खेती में आमदनी बढ़े नहीं, बल्कि घटे। इसीलिए सरकार खेती में लागत बढ़ाती जा रही है बिजली महंगी, बीज महंगा, खाद भी महंगी। पर सरकार फसलों के दाम लागत के अनुपात में नहीं बढ़ा रही है। जिससे किसान भाई, आपकी आमदनी न बढ़े और आप अपनी जमीन कम से कम दामों पर बेच दें। भारत माता असीम ऊंचाइयों को छुए, नये नये कारखाने लगें, इसलिए किसान भाइयों आपका बलिदान जरूरी है।
अब किसान भाइयों, जमीन मिल जाने के बाद, इंडस्ट्रीज को बनाने के लिए, उनमे काम करने के लिए लोग चाहियें, चाहिए या नहीं। आर्किटेक्ट चाहियें, इंजीनियर चाहियें, अफसर चाहियें, मैनेजर चाहियें। वे सब तो शहरों से आ जायेंगे। पर मजदूर कहां से आयेंगे। मजदूरों के बिना तो ये फ़ैक्टरियाँ न बनेंगी न चलेंगी। और किसान भाइयों, वे मजदूर कहाँ से आएंगे, आपके गावों से ही न। किसान भाइयों, आप ही के बच्चों को उन फैक्टरियों में नौकरी मिलेगी और जरूर मिलेगी। पर अगर किसानी में अच्छी कमाई होने लगे, तो क्या कोई फैक्टरियों में मजदूरी करने आएगा। नहीं आएगा न। फैक्ट्रियां चलें, कारखाने चलें, कम तनख्वाह में कारखानों को मजदूर मिलें, मेरा भारत वर्ष ऊंचाई के नए आसमान छुए, इसलिए जरूरी है किसान भाइयों, कि किसानी में आमदनी न हो।
किसान भाइयों, आपने चुन कर मुझे अपना प्रधान सेवक बनाया है। और अब यह भारत का प्रधान सेवक पूरे विश्व का प्रधान सेवक बन चुका है। मैं ऐसे-ऐसे देशों में हो आया हूँ, जहाँ का नाम आपने कभी सुना भी नहीं होगा। क्या किसान भाइयों ने मोज़ाम्बिक नाम के देश का नाम सुना है। नहीं न। जब मैं वहां गया तो वहां के किसानों का हाल मुझसे देखा नहीं गया। दिल भर आया उनकी दरिद्र हालत देख कर। मैंने उनसे वायदा किया कि वे दाल पैदा करें, भारत उनकी सारी पैदावार खरीद लेगा, वो भी अच्छे दामों पर। आप भी उनकी गरीबी देखते तो आपसे भी नहीं रहा जाता। अब आपके द्वारा चुना गया मैं, विश्वनेता बन गया हूँ तो मस्तक किसका ऊँचा होगा। आपका ही न और भारत माता का। इसीलिए किसान भाइयों, देश का मस्तक ऊँचा करने के लिए, मोज़ाम्बिक के बेचारे गरीब किसानों को दाल का अधिक दाम देना पड़े और आपको कम, तो भी आप मेरे साथ ही तो रहेंगे न और वोट भी मुझे ही देंगे न। इसलिए भी जरूरी है किसान भाइयों, कि आपको आपकी फसल की पूरी कीमत न दी जाये।
किसान भाइयों, मुझे पता है, आप लोगों ने मुझसे मिलने, अपनी तकलीफें बतलाने की, दिल्ली में आने की कई बार कोशिश की। पर मैंने आप लोगों को दिल्ली के बार्डर पर ही बलपूर्वक रोक दिया। मुझे आपकी कठिनाइयों के बारे में पहले से ही भलीभांति पता है। मुझे पता था कि आप लोग बहुत दूर से, कोई सौ किलोमीटर से तो कोई दो सौ किलोमीटर से। और कोई कोई तो पांच सौ या हजार किलोमीटर दूर से भी, सिर्फ और सिर्फ मुझसे मिलने और अपना दुख दर्द बताने चले आ रहे थे। फिर भी मैंने जबरन क्यों रोका। मुझसे आपकी थकान देखी नहीं जाती थी। मुझे लगा, आपकी जितनी भी सेवा कर सकूं, अच्छा है। इस लिए दस-पंद्रह किलोमीटर पहले आपकी यात्रा रोक दी। आप नहीं माने, तो जबरन रोकी। पर सब आपके भले के लिए ही किया, आपको फालतू की और थकान न हो इसीलिए ऐसा किया। वैसे भी, आप दिल्ली में आते तो दिल्ली के लोगों को भी बुरा भी लगता। उनका जीवन अस्त व्यस्त हो जाता। उनका खयाल भी तो रखना ही था न।
किसान भाइयों, मैं जानता और मानता हूँ कि आप लोग बहुत बड़े देशभक्त हैं। आप कभी नहीं चाहेंगे कि आप के किसी कृत्य से देश का नाम नीचा हो। अब मैं आपके सामने सारी बात रख चुका हूँ। मैं जानता हूँ, अब सारी बात जान-समझ कर आप कभी भी नहीं चाहेंगे कि आपको आपकी फसल की अधिक कीमत मिले। ऐसा नहीं है कि सरकार के पास पैसा नहीं है। पर आप देशभक्त हैं। आप जान दे देंगे, आत्महत्या कर लेंगे, पर अब आप फसल की कीमत बढऩे की इच्छा कभी नहीं करेंगे। और हाँ ! 2019 के इस चुनाव में वोट मुझे ही देना। आप लोगों के इसी सहयोग से मैं भारत माता को और ऊपर ले जाऊंगा। भारत माता की जय। किसान भाइयों की जय ।
इस बार का नारा : जय जवान, जय किसान। सरकार की नीति, जय धनवान।

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