महेंद्र मिश्र
रुबाबुद्दीन से माफी के साथ मौजूदा राजनीतिक हालात में मुझे उस समय के रुबाबुद्दीन याद आ रहे हैं जब वो अदालत में खड़े थे और उनके पैर थरथर कांप रहे थे। मामला था स्पेशल सीबीआई कोर्ट के फैसले को बांबे हाईकोर्ट में दी गयी चुनौती की याचिका को वापस लेने का। रूबाबुद्दीन ने इस फैसले की जानकारी अपने वकील को भी नहीं दी थी। जस्टिस रेवती मोहिते डेरे के सामने रूबाबुद्दीन जब यह गुजारिश कर रहे थे तो उनके पैर थरथर कांप रहे थे। खास बात यह है कि उनके पीछे भी वही शख्स था जो आज इन हालातों के पीछे है।
जी हां, हम बात कर रहे हैं देश के मौजूदा गृहमंत्री अमित शाह की। क्या कभी किसी ने सोचा होगा कि 70 सालों की लोकतंत्र की प्रैक्टिस के बाद देश में एक ऐसा गृहमंत्री बनेगा जिसके ऊपर हत्या, अपहरण और फिरौती से लेकर हर तरह के संगीन आरोप होंगे। एक ऐसा शख्स जिसको सर्वोच्च अदालत ने तड़ीपार किया रहा हो। वह सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के सामने शपथ लेगा। बात किसी एक सोहराबुद्दीन की नहीं है या किसी कौसर बी की भी नहीं है। भक्त मन इस बात से संतुष्ट हो सकता है कि वह अपराधी था और साथ ही मुसलमान भी। भले ही वह इन साहबानों का ही एक गुर्गा रहा हो और उसे फिरौती के लिए पाला-पोसा गया हो।
इन सभी के अलावा संदिग्ध मौतें और हत्याएं और भी हुई हैं, और वो न तो अपराधी थे और न ही मुस्लिम समुदाय से रिश्ता रखते थे। और 100 फीसदी हिंदू थे। गुजरात के गृहमंत्री रहे हरेन पांड्या का आखिर क्या कसूर था जो सूरज की रोशनी निकलने से पहले ही उन्हें मौत की नींद सुला दिया गया। और जब उदयपुर जेल में बंद आजम खान नामक एक गवाह खुली अदालत में इस बात को कहता है कि पंड्या की हत्या की सुपारी पूर्व आईपीएस अफसर और कई संगीन मामलों में आरोपी डीजी वंजारा ने सोहराबुद्दीन को दी थी। तो उसका कोई संज्ञान लेना भी जरूरी नहीं समझता। क्या वंजारा की कोई निजी दुश्मनी थी पंड्या से? नहीं। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी नहीं थी। तो फिर वंजारा उनकी हत्या किसके लिए करवाएंगे? जाहिर है जिसके रास्ते का वो कांटा रहे होंगे। जिससे उनकी प्रतिद्वंदिता रही होगी। जिसके लिए वो भविष्य में खतरा बन सकते थे।
लेकिन इन नये सबूतों की रोशनी में न तो पंड्या मामले की जांच आगे बढ़ायी जा रही है और न ही उस पर कोई आवाज उठ रही है। यहां तक कि उनकी पत्नी जागृति पंड्या भी शांत हैं। और बीजेपी सरकार का हिस्सा बनी हुई हैं। आखिर ये किस तरह का भय है जिसमें कोई पत्नी अपने पति के लिए न्याय भी नहीं मांग सकती है?
हत्या सिर्फ पंड्या की नहीं हुई है। तुलसी राम प्रजापति भी इसी कड़ी का हिस्सा है। और यह सिलसिला आगे बढ़ता है जब सीबीआई के स्पेशल जज बीएच लोया भी इसके शिकार हो जाते हैं। जिनके बाद एडवोकेट खंडालकर और पूर्व जज प्रकाश थोंब्रे की इसलिए हत्या कहिए या संदिग्ध मौत हो जाती है क्योंकि इन लोगों के पास जज लोया से संबंधित जानकारियां थीं। लिहाजा उनका जिंदा रहना ‘‘किसी की’’ जिंदगी के लिए खतरा था।
मामले यहीं तक सीमित नहीं हैं। हत्या, फिरौती और स्नूपिंग कोई कागजों पर लिखी बातें नहीं हैं। बल्कि उसके जिंदा सबूत हैं। जब साहेब के लिए उनके सबसे विश्वसनीय शख्स ने एक लडक़ी की सालों तक खुफिया निगरानी की थी। और उसमें वह न केवल खुद शामिल था बल्कि उसने पूरी राज्य मशीनरी को लगा दिया था। इसकी आडियो रिकार्डिंग तक मौजूद है। और इस मामले की जानकारी के शक की बिना पर एक आईएएस अफसर को जेल की सींखचों में डाल दिया गया। वह अभी भी सलाखों के पीछे ही हैं।
इसके अलावा व्यापारी बंधुओं से फिरौती के टेप अभी भी यूट्यूब पर खोजने पर मिल जाएंगे, जिसका खुद उन मार्बेल व्यापारियों ने ही स्टिंग कर लिया था, जब उनसे रकम की वसूली गयी थी। और दिलचस्प बात यह है कि यह वही रकम थी जिसे सोहराबुद्दीन के जरिये वसूला जाना था। लेकिन इस बीच सोहराबुद्दीन का एनकाउंटर हो जाने पर बाकी का काम दूसरे से पूरा करवाया गया।
ये केवल घटनाएं नहीं हैं बल्कि संविधान के एक-एक पन्ने को चिंदी-चिंदी करने की दास्तानें हैं। क्योंकि यह सब कुछ सरकारों में रहते हुए किया गया था। और अब पूरा तांडव संविधान की पीठ पर चढ़ कर किया जा रहा है। दरअसल यह अपने तरीके से लोकतंत्र के मौत का फरमान है। यह 47 के बाद का एक नया भारत है जिसमें गांधी के हत्यारे व्यवस्था की अगुवाई कर रहे हैं। यह अपने तरीके से नेहरू और सरदार पटेल की मौत का ऐलान है। शारीरिक मौत के बावजूद अपने विचारों के जरिये वो हमेशा न केवल जिंदा रहे बल्कि अभिन्न तौर पर हमारी व्यवस्था के हिस्से बन रहे और इस तरह से पिछले 70 सालों तक लोकतांत्रिक व्यवस्था की अगुआई करते रहे। लेकिन आगे का रास्ता उनका बताया हुआ नहीं है। अनायास नहीं पटेल ने उसी समय संघ को घृणा की ताकत करार दे दिया था और उसे जड़ से समाप्त करने का आह्वान किया था। इस सिलसिले में तत्कालीन केंद्र सरकार ने बाकायदा प्रस्ताव पारित किया था।
इस पूरे काल के दौरान यह ताकतें न केवल बढ़ती रहीं बल्कि हर तरह से फलती-फूलती रहीं। लेकिन इसी के साथ यह भी सच है कि उसी के अनुपात में लोकतंत्र भी मरता गया और संविधान भी अप्रासंगिक होता गया। लिहाजा इस मुकाम पर पहुंचकर सबसे बड़ा सवाल तो यही खड़ा होता है कि आखिर हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं और उनकी पूरी व्यवस्था कैसी रही जो अपने ही हत्यारों को रोकने की बात तो दूर उन्हें हर तरीके से पालती और पोसती रही। जिस कोर्ट ने सजा देनी थी वह क्यों मौन रही। जिस पुलिस प्रशासन को इन पर नकेल कसनी थी उसने क्यों इनके सामने समर्पण कर दिया। और आज का सच यही है कि नैतिकता और ईमानदारी के सर्वोच्च मानदंडों की पालना करने वाले किसी नौकरशाह को भी इनके इशारे पर काम करना होगा।
शायद अंबेडकर इस बात को जानते थे। उन्होंने राष्ट्र को संविधान सौंपे जाने से एक दिन पहले यानी 25 नवंबर 1949 को कहा भी था कि हम एक ऐसी जगह पर खड़े हैं जब ‘एक व्यक्ति एक मत’ के सिद्धांत के साथ राजनीतिक व्यवस्था समानता के सबसे उच्च शिखर पर पहुंच गयी है। लेकिन समाज अभी भी श्रेणियों में और गैरबराबरी पर आधारित है। लिहाजा अगर इस अंतरविरोध को समय रहते हल नहीं किया गया तो पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था का वजूद ही खतरे में पड़ जाएगा। और लगता है कि अब नये निजाम ने गैरबराबरी पर आधारित इन सामाजिक श्रेणियों के अनुरूप ही संविधान को भी बदलने का मन बना लिया है। इसके साथ ही उन्होंने एक बात संविधान के लिए भी कही थी कि यह ऐसा संविधान है जिसको सत्ता में बैठने वाले नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वह उसे कैसे चलाए। लिहाजा मौजूदा संविधान में भी इस बात की अगर पूरी गुंजाइश मौजूद है कि इस देश में एक तानाशाह भी ‘‘लोकतांत्रिक ढांचे’’ के भीतर काम कर सकता है। तो यह अपने आप में सबसे बड़ी विडंबना है। और इसे अगर उस समय हल नहीं किया गया तो बाद में इस पर जरूर काम होना चाहिए था।
कहते हैं कि कोई भी आंदोलन जब अपने उच्च शिखर पर होता है तो अपने लिहाज से वह अपना सबसे बेहतर नेतृत्व भी दे रहा होता है। लेकिन चाल, चेहरा और चरित्र की बात करने वाले आरएसएस की शायद यही सच्चाई है। यही उसका असली नेतृत्व है। झूठ, फरेब, अफवाह, घृणा, नफरत और तमाम किस्म की बुराईयों को अपना बुनियादी असूल मानने वाले संगठन से इससे इतर अपेक्षा भी नहीं की जा सकती थी। बीजेपी के पिछले नेतृत्व मसलन अटल, आडवाणी और यहां तक कि दीनदयाल तक में अगर कुछ बचा भी था तो वह वही था जितना उनमें आरएसएस नहीं था।
अंत में यही कहा जा सकता है कि देश की पूरी व्यवस्था दो ऐसे लोगों के चंगुल में चली गयी है जिनका इतिहास बेहद काला है। ऊपर से आरएसएस जैसे एक आक्टोपसी संगठन का इन्हें खुला संरक्षण हासिल है। लिहाजा देश को उनके चंगुल से निकालने के लिए और गांधी, नेहरू और पटेल समेत आजादी की पुरानी विरासत को फिर से वापस लाने के लिए एक नई आजादी का संघर्ष छेडऩा होगा। जो जाहिर है पुराने तरीके से नहीं होगा। और न ही सिस्टम के भीतर होगा। बल्कि इसके लिए फिर से अब लोगों को सडक़ नापनी होगी। (जनचौक से साभार)