‘संग्रामी लहर’ का यह अंक पाठकों के हाथों में पहुंचने तक भारतीय लोकसभा के होने वाले आगामी चुनावों की विधीवत घोषणा हो जाने की पूरी संभावना है। इसलिए स्वाभाविक ही, अगले दिनों में, चुनावी मुद्दे व्यापक चर्चा का विषय बने रहेंगे। भारतीय जनता पार्टी तथा कांग्रेस पार्टी जैसी पूंजीवादी समर्थक पार्टियों द्वारा, वोटरों को लुभाने के लिए, कई तरह के झूठे-सच्चे वायदे किए जाएंगे तथा जीत-हार के भी जोर-शोर से दावे दिए जाएंगे।
यद्यपि यह भी एक ऐतिहासिक सत्य है कि पूंजीपति-जागीरदार समर्थक यह पार्टियां हमेशा ही चुनाव जीतने के लिए लोगों के वास्तविक व बुनियादी मुद्दों से ध्यान भ्रमित कर देती है तथा धर्मों, जातियों, क्षेत्रों आदि से संबंधित भावनात्मक मुद्दों के आधार पर या अपने उम्मीदवारों/प्रमुख नेताओं आदि के व्यक्तिगत गुणों-अवगुणों की मुकाबलेबाजियों को व्यर्थ महत्त्व देकर लोगों के मत बटोरने के लिए जनवाद को ठेस पहुंचाने वाली अनैतिक तिकड़मबाजियां करती हैं। इन पार्टियों के लिए चुनाव घोषणापत्र मात्र एक रस्मी कवायद बन चुके हैं। मेहनतकश लोगों की दिन-प्रतिदिन अधिक गंभीर होती जा रही सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए इन पार्टियों द्वारा चुनाव घोषणा-पत्र में अक्सर ही आसमान से तारे तोड़ कर लाने तक के इकरार किए जाते हैं, परंतु चुनावों के बाद सत्ता में आते ही इन समस्त वादों को भुला दिया जाता है। इसी का परिणाम है कि भारतीय लोकतंत्र के अस्तित्व में आने के लगभग सात दशक बाद भी 20 प्रतिशत से अधिक देश की जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे कंगाली से जूझ रही है। करोड़ों लोगों के पास न तो सिर छिपाने के लिए छत है तथा न ही उन्हें पेट भर कर रोटी ही मिल रही है। अन्य सुख-सुविधाओं तथा वर्तमान जीवन-शैली के बारे में तो वे कभी स्वपन भी नहीं ले सकते।
इन आगामी चुनावों को जीतने के लिए भी भारतीय जनता पार्टी धार्मिक आधार पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए कई तरह के खेल खेलती आ रही है। वैसे तो पिछले 5 वर्षों से ही इस उद्देश्य के लिए संघ परिवार से संबंधित संस्थायें व कार्यकत्र्ता अल्प-संख्यकों के विरुद्ध जहरीला प्रचार करते आ रहे हैं, उन पर हिंसक हमले करते रहे हैं तथा उन्हें तरह-तरह की धमकियां देते आ रहे हैं। परंतु चुनावों को सम्मुख रखते हुए संघ परिवार ने पिछले दिनों में कुंभ मेले, नागरिकता संशोधन बिल, अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण आदि को खुल कर सांप्रदायिक हवा दी है। इस उद्देश्य के लिए अब, पुलवामा में सी.आर.पी.एफ. के जवानों पर आतंकवादियों द्वारा किए गए कायराना हमले के बाद तो देश भर में नियोजित ढंग से अंध-राष्ट्रवाद भडक़ाया जा रहा है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की लोगों को गुमराह करने वाली भाषण कला की प्रशंसा के पुल बांधे जा रहे हैं तथा उनकी इस नौटंकीबाजी का विपक्ष के नेताओं से मुकाबला करके समूची चुनावी प्रक्रिया को दो व्यक्तियों के बीच युद्ध के रूप तक सीमित करने के भद्दे प्रयास किए जा रहे हैं। इसी उद्देश्य के लिए देश के प्रिंट व इलैक्ट्रोनिक मीडिया पर भी मोदी सरकार काफी हद तक हावी हो चुकी है तथा, वह दिन-रात भाजपा की धर्म-आधारित सांप्रदायिक राजनीति व प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत ‘योग्यता’ का गुणगान कर रहा है।
यह खतरनाक रास्ता यकीनन ही जनवाद को नष्ट करने तथा तानाशाही स्थापित करने की ओर जाता है। क्योंकि लोकतंत्र में मुख्य मुद्दा कोई एक नेता नहीं बल्कि नीतियां होती हैं। चुनावों के समय हर राजनीतिक पार्टी ने ऐसा नीतिगत ढांचा पेश करना होता है, जिससे अधिक-से-अधिक लोगों की जीवन स्थितियों में अधिक-से-अधिक सुधार हो सके। इस उद्देश्य के लिए पेश किए जाते प्रतिस्पर्धात्मक दृष्टिकोणों के आधार पर मतदाता अपनी राय को प्रकट करता है न कि, किसी एक या दूसरे नेता के प्रति निजी वफादारी के आधार पर।
इस नकारिए से देखें तो आज देश के सम्मुख लोगों में निरंतर बढ़ती जा रही बेचैनी व निराशा मुख्य फाशी समस्याएं हैं। लोग आर.एस.एस. के समर्थकों की सांप्रदायिक-फाशीवादी कार्यवाहियों से भी चिंतित हैं तथा सरकार की पूंजीवाद समर्थक नीतियों के कारण बढ़ रही तंगदस्तियों से भी पीडि़त हैं। इस अवस्था में, इन चुनावों के परिणामों को प्रभावित करने वाले वास्तविक मुद्दे हैं: देश में गरीबी व अमीरी की बीच निरंतर बढ़ता जा रहा अंतर, व्यापक रूप में फैली हुई व विस्फोटक रूप धारण करती जा रही बेरोकागारी व अद्र्ध-बेरोकागारी, किसानों व खेत मकादूरों को आत्महत्याएं करने के लिए मकाबूर कर रहा बहुत गंभीर कृषि संकट, निरंतर बढ़ रही मंहगाई के कारण रोजाना उपयोग की वस्तुओं की आसमान छू रही कीमतें, बेहद मंहगी हो चुकी शिक्षा, दवाइयों की बढ़ रही कीमतें तथा महंगा इलाज, गरीबों विशेष रूप में दलितों पर मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान बढ़ा सामाजिक उत्पीडऩ, औरतों पर बढ़े हिंसक हमले, धार्मिक अल्पसंख्यकों विशेष रूप में मुसलमानों पर बढ़ रहे सांप्रदायिक अत्याचार तथा उनके भीतर बेहद गहराती जा रही सुरक्षा की भावना देश भर में संस्थागत रूप धारण कर चुका भ्रष्टाचार, देश के प्राकृतिक व वित्तिय संसाधनों की देशी-विदेशी कंपनियों, सत्ताधारी पार्टियों के नेताओं व बड़े-बड़े अधिकारियों द्वारा की जा रही अंधी लूट तथा देश की एकता अखंडता की रक्षा के लिए आवश्यक सुरक्षा ढांचा।
देश के हर नागरिक को जिंदा रहने के लिए तथा निजी विकास के लिए पौष्टिक भोजन, शिक्षा सुविधाएं, स्वास्थ्य सेवाएं तथा जीवन यापन योग्य व योग्यतानुसार रोजगार चाहिए। प्राकृतिक संसाधनों के पक्ष से भारत बहुत अमीर देश है। इसलिए यहां हर नागरिक की ये बुनियादी आवश्यकताएं पूरी की जा सकती हैं। यदि इसे लोकतंत्र के लुटेरों व प्रतिक्रियावादी शासक वर्गों से मुक्त किया जाए। इस उद्देश्य के लिए कारपोरेट-समर्थक आर्थिक नीतियों को लगाम लगाकर अधिक से अधिक रोजगार पैदा करने वाली नीतियां अपनाने की आवश्यकता है।
सरकार द्वारा जिन साम्राज्यवादी कंपनियों को भारतीय अर्थ-व्यवस्था में घुसपैठ करने के लिए निवेदन किए जाते हैं वे रोजगार पैदा नहीं करतीं बल्कि रोजगार खाती हैं। घरेलू उद्योगों का अस्तित्व प्रतिस्पर्धा में समाप्त हो जाता है तथा बेरोकागार होकर श्रमिक कंगाली में धकेल दिए जाते हैं। भारतीय कृषि के समक्ष खड़े गंभीर संकट के लिए भी यह विदेशी कंपनियां ही जिम्मेवार हैं। इन्होंने एक ओर कृषि के लिए उपयोग की जाती दवाइयों, बीजों, खादों आदि पर इजारेदारी कायम कर खेती लागतों में तीव्र बढ़ौत्तरी कर दी है। जबकि दूसरी ओर सट्टेबाकाी द्वारा कृषि उत्पादों की कीमतों को धूल में मिला दिया है। इन कंपनियों की दोहरी मार की चक्की में पिस रही किसानी बुरी तरह बिलबिला रही है। इसी तरह, नवउदारवादी साम्राज्यवाद निर्देशित नीतियों को अपनाने के कारण बाजार की बेरहम शक्तियों को दी गई छूट ने मंहगाई को पूरी तरह बेलगाम कर दिया है। बड़े व्यापारी इससे मालामाल हो रहे हैं तथा मंहगाई व बेरोकागारी की दोहरी चक्की में पिस रही आम जनता का कचूमर निकल रहा है।
इन चुनावों में देश की सुरक्षा के मुद्दे को भी भाजपा द्वारा जोर-शोर से उभारने की पूरी संभावना है। 1947 में; साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा पूर्ण रूप से सांप्रदायिक आधार पर किए गए देश के धार्मिक बंटवारे को स्वीकार कर लेने के कारण भारत व पाकिस्तान के बीच पैदा हो रही दुश्मनी निरंतर सुलगती जा रही है तथा दोनों देशों के लोगों के लिए बेहद घातक बनी हुई है। इस कारण हमारे देश के वे कीमती वित्तीय संसाधन जो कि शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, जल सप्लाई, ऊर्जा की सप्लाई तथा सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाओं पर खर्चे जाने चाहिएं, उनका हथियारों आदि की खरीद के लिए उपयोग करने के लिए मकाबूर होना पड़ रहा है। भारतीय शासकों के लिए तो यह खरीदारियां मोटे कमीशन प्राप्त करने का साधन बनी हुईं हैं तथा अब तक कई बड़े-बड़े घोटालों को जन्म दे चुकी हैं। जिनमें ताजा घोटाला है रफाल युद्धक विमानों की खरीद का। परंतु पड़ोसी देश से पैदा हुआ यह व्यर्थ का अंतरविरोध देशवासियों के लिए निरंतर चिंता का विषय बना हुआ है। यह नित्य-प्रति हमारे सेना व अद्र्ध-सैनिक बलों के जवानों की शहीदियों का भी कारण बन रहा है। इस अंतरविरोध के समाधान के लिए जहां अपनी सीमा की सुरक्षा को मकाबूत करने की आवश्यकता है वहीं साथ ही पड़ोसियों से पैदा हो रहे हर विरोध को बातचीत द्वारा निपटाने की भी बड़ी आवश्यकता है। केवल इस तरह ही देश की एकता अखंडता को सुनिश्चित किया जा सकता है तथा हथियारों आदि पर भी होते व्यर्थ खर्चों को लगाम दी जा सकती है। यद्यपि हमारे शासक, विशेष रूप में भाजपा ऐसी सार्थक व तर्कसंगत पहुंच अपनाने की जगह पुलवामा में सी.आर.पी.एफ. के 40 जवानों के शहीद होने के बाद से देश में जंगी उन्माद पैदा कर रही है, जो कि हर पक्ष से बेहद हानिकारक है।
इन चुनावों में ये सारे मुद्दे चर्चा का विषय बनाए जाने चाहिएं तथा वोट मांगने आने वाली भिन्न-भिन्न पार्टियों को इनके प्रति अपनी राय स्पष्ट करने के लिए मकाबूर किया जाना चाहिए।
–हरकंवल सिंह