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संपादकीय : केंद्रीय समिति के निर्णय विशाल से विशालतर जन-लामबंदी की आवश्यकता

संपादकीय : केंद्रीय समिति के निर्णय विशाल से विशालतर जन-लामबंदी की आवश्यकता

भारतीय क्रांतिक्रारी माक्र्सवादी पार्टी (आर.एम.पी.आई.) की केंद्रीय समिति की पिछले दिनों जालंधर में हुई बैठक में देश भर में जन लामबंदी का प्रसार करने के लिए तीन निर्णय किए गए हैं। इनके अनुसार आने वाले वर्ष में 30 जनवरी से 6 फरवरी तक  जन लामबंदी सप्ताह मनाया जाएगा। इन दिनों में समस्त जिला केंद्रों पर मेहनतकश लोगों की ज्वलंत मागों की प्राप्ति के लिए धरने प्रदर्शन संगठित किए जायेंगे। इसके साथ ही, प्रांतीय स्तर पर ‘जनवाद व धर्म निरपेक्षता की रक्षा’ के मुद्दे पर एक-एक सैमीनार  भी आयोजित किया जाएगा। केंद्रीय समिति ने यह निर्णय भी किया है कि मार्च महीने के पहले पक्ष में दिल्ली में एक विशाल  कन्वैनशन/सैमीनार का आयोजन किया जायेगा, जिसका विषय होगा: दलितों पर बढ़ रहे अत्याचार।
पार्टी की यह स्पष्ट समझदारी है कि देश की वर्तमान राजनीतिक अवस्था जन-समर्थक वामपंथी शक्तियों से दो तरह के हस्तक्षेप की मांग करती है। पहला है : विश्वीकरण, उदारीकरण व निजीकरण की नवउदारवादी नीतियों के कारण मेहनतकश लोगों पर निरंतर बढ़ रही मुसीबतों पर रोक लगाना तथा दूसरा है: भारत के भीतर बढ़ रहे सांप्रदायिक-फाशीवादी रूझानों को परास्त करना।
पिछली शताब्दी के 9वें दशक में नव-उदारवादी नीतियों के लागू किए जाने के साथ देश के भीतर गरीबी व अमीरी के बीच खाई निरंतर बढ़ती गयी है। वर्तमान अनुमानों के अनुसार देश के 1 प्रतिशत अमीरों के पास 73 प्रतिशत दौलत संग्रहित हो गई है जबकि निचले स्तर की 50 प्रतिशत जनसंख्या कंगाली की कगार पर पहुंच चुकी है। इन नीतियों के कारण ही देश के भीतर बेरोजगारी, महंगाई व भ्रष्टाचार में निरंतर बढ़ौत्तरी होती जा रही है, कृषि बुरी तरह संकटग्रस्त है तथा छोटे कारोबार तबाह होते जा रहे हैं। देश में विदेशी कंपनियों का हस्तक्षेप व लूट निरंतर तीव्र होती जा रही है। इन समस्त मुसीबतों से छुटकारा पाने के लिए आवश्यकता है इन मनमोहन-मोदी मार्का साम्राज्यवाद निर्देशित नीतियों को पूरी तरह त्याग कर रोजगारमुखी व जन-हितकारी नीतियां विकसित करने की, ताकि महंगाई पर रोक लगाई जा सके। देश के भीतर छोटे व मध्यम उद्योगों की भरमार हो तथा जवानी को विदेशों में जाकर दर-दर की ठोकरे खाने से मुक्ति मिल सके।
यह समस्त महत्त्वपूर्ण व तात्कालिक कार्य जन-जागृति व जन-आंदोलन के बिना पूर्ण नहीं किये जा सकते। देश में सत्ता पर बैठी दोनों ही मुख्य पार्टियां-भाजपा व कांग्रेस उपरोक्त जन-विरोधी नीतियों के प्रति पूर्ण रूप में एकमत हैं तथा इन नीतियों को लागू करने में एक दूसरे को मात देने में जुटी रहती हैं। इसलिए इनके नेतृत्व वाली सरकारों की अदला-बदली होने से देश के मेहनतकश वर्गों को इस ओर से बिल्कुल भी कोई राहत नहीं मिल सकेगी। इस उद्देश्य के लिए तो नीतिगत परिवर्तन की आवश्यकता है। जो कि जन लामबंदी पर आधारित शक्तिशाली जन दबाव की मांग करती है।
दूसरी समस्या देश के  संविधान में दर्ज जनवादी व धर्म-निरपेक्ष व्यवस्थाओं व संस्थाओं की रक्षा करने तथा उनको और अधिक सुदृढ़ व कार्यशील बनाने की है। जनवाद पर तो पहले भी हमले होते रहे हैं, जिनका बहुत ही उपयुक्त उत्तर पिछली शताब्दी के 7वें दशक में श्रीमति इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गए आपात्तकाल का व्यापक स्तर पर विरोध करके दिया गया था। परंतु वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार ने तो जनवाद को चोट पहुंचाने के साथ-साथ धर्म निरपेक्षता के बहुत ही महत्त्वपूर्ण सिद्धांत को भी नष्ट-भ्रष्ट करने का बीड़ा उठाया हुआ है। आर.एस.एस. के दिशा-निर्देशों पर कार्य कर रही यह सरकार देश के भीतर एक प्रतिक्रियावादी धर्म आधारित राज्य स्थापित करना चाहती है। इस उद्देश्य के लिए इस सरकार ने सरेआम सांप्रदायिक-फाशीवादी पहुंच अपनाई हुई है। अल्पसंख्यकों पर हमले निरंतर बढ़ रहे हैं तथा देश में सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण किया जा रहा है। इसके साथ ही यह सरकार देश के भीतर मनुवादी समाज-व्यवस्था को पुर्न-जागृत करने के लिए भरसक प्रयत्न कर रही है। जिससे अल्पसंख्यकों के साथ-साथ दलितों, स्त्रियों व आदिवासियों पर हिंसक हमले तीव्र हो गए हैं। संघ परिवार के समर्थक जगह-जगह  गुंडा-गिरोहों का रूप धारण करके एक अमानवीय भीड़-तंत्र को उभार रहे हैं। जिसने अल्पसंख्यकों व शोषक वर्गों के जान-माल के लिए खतरे ही पैदा नहीं किए, देश की एकता-अखंडता के लिए भी नये खतरे खड़े कर दिए हैं। इस देशव्यापी विकराल मुसीबत का मुकाबला करने के लिए भी शक्तिशाली जन-लामबंदी की आज विशेष रूप में भारी आवश्यकता है।
आगामी वर्ष में देश की संसद के लिए होने वाले चुनावों में अवश्य ही यह दोनों मुद्दे भी उभरेंगे तथा व्यापक चर्चा का विषय बनेंगे। इसलिए आर.एम.पी.आई. की केंद्रीय समिति ने लोगों के समक्ष खड़ी इन दोनों मुसीबतों के विरुद्ध जनउभार पैदा करने के लिए ठोस निर्णय किए हैं। आवश्यकता इस बात की है कि पार्टी द्वारा किए गए उपरोक्त तीनों ही निर्णयों को अमली रूप देने तथा सफल बनाने के लिए पार्टी के समस्त कार्यकत्र्ताओं  व नेताओं द्वारा भरसक प्रयत्न किए जायें। पार्टी का संदेश घर-घर पहुंचाया जाये तथा तयशुदा कार्यक्रम में मेहनतकशों की अधिक से अधिक शिरकत करवाई जाये।               
-हरकंवल सिंह

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