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विश्व दर्पण (संग्रामी लहर-मार्च २०१९)

विश्व दर्पण (संग्रामी लहर-मार्च २०१९)

रवि कंवर

अमरीकी साम्राज्यवादियो वेनेजुएला से अपने हाथ दूर रखो!

साम्राज्यवाद क्यों चाहता है, वेनेजुएला पर अपना वर्चस्व?

लातीनी अमरीका महाद्वीप के महान वामपंथी नेता, मरहूम हूगो शावेज का देश, वेनेजुएला, इस समय अमरीकी साम्राज्यवाद के भीषण हमले का सामना कर रहा है। मई 2018 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में बड़ी जीत दर्ज करने बाद 10 जनवरी को साथी हूगो शावेज के निकट सहयोगी साथी निकोलस मादुरो ने राष्ट्रपति पद के दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ ली थी। साम्राज्यवादी अमरीका व उसकी पि_ू विपक्षी पार्टियों ने उन्हें स्वीकार करने की जगह एक विपक्षी नेता जुआन गाइडो को अंतरिम राष्ट्रपति घोषित कर दिया। उन्हें साम्राज्यवादी अमरीका सहित विश्व भर के उसके सहयोगी देशों, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे पूंजीवादी देशों ने मान्यता प्रदान कर दी। यहां यह वर्णन योग्य है कि मई 2018 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में मादुरो को 68′ वोट प्राप्त हुए थे जबकि विपक्षी उम्मीदवारों को कुल मिलाकर सिर्फ 32′ ही मत मिले थे।
दूसरी ओर चीन, रूस, तुर्की, क्यूबा समेत दुनिया के लगभग 50 देशों ने राष्ट्रपति मादुरो को समर्थन देते हुए अमरीकी साम्राज्यवाद व उसके सहयोगियों के इस कदम की सख्त निंदा की तथा हर स्थिति में वेनेजुएला की जनता के साथ खड़े होने का एलान किया। जब अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने वेनेजुएला में फौजी दखल देने की धमकी दी तो उसी समय रूस ने भी उसे चेतावनी दे दी कि वह ऐसा कोई कार्य न करे, इसके परिणाम भयावह होंगे।
वेनेजुएला में अमरीकी साम्राज्यवाद का यह भीषण हस्तक्षेप तथा जनता द्वारा चुनी हुई सरकार का तख्ता पलटने का प्रयास कोई नया नहीं है। 1998 में सर्वप्रथम साथी हूगो शावेज राष्ट्रपति चुने गए थे। उन्होंने अपने देश के लोगों द्वारा उनमें दर्शाये गए विश्वास की कसौटी पर पूरा उतरता हुए, इस देश के पूर्ववर्ती शासकों द्वारा अपनाई जा रही साम्राज्यवादी संसारीकरण आधारित सामाजिक व आर्थिक नवउदारवादी नीतियों को त्यागते हुए, नई वैकल्पिक नीतियां अपनाई। इन जन-कल्याण आधारित नीतियों को नाम दिया बोलिवारियन परियोजना। वेनेजुएला ही नहीं, बल्कि समूचा लातीनी अमरीकी महाद्वीप प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध महाद्वीप है। इन पर दशकों से पूंजीवादी देशों, विशेषकर अमरीका की बहुराष्ट्रीय कंपनियां काबिज हैं। साथी हूगो शावेज ने अपने देश के तेल पर काबिज कंपनियों की मनमानी पर रोक लगाई तथा उनसे प्राप्त अधिक रायल्टी का देश के लोगों के कल्याण के लिए उपयोग किया। यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर चोट थी। साम्राज्यवाद को यह फूटी आंख नहीं सुहाता था कि उनकी लूट पर अंकुश लगे। इसलिए ही 2002 में शावेज के विरुद्ध तख्ता पलट किया गया जिसे वहां की जनता ने विशाल जन आंदोलन द्वारा 48 घंटे में ही विफल कर दिया गया। तभी से अमरीकी साम्राज्यवाद व उसके सहयोगियों द्वारा निरंतर प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष देश में तख्ता पलट करने की साजिशें जारी है। राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को राष्ट्रपति न मानते हुए उनकी जगह, जुआन गाइडो को मान्यता देना अमरीकी साम्राज्यवाद की तख्ता पलट साजिशों का ताजा संस्करण है।
अमरीकी साम्राज्यवाद वेनेजुएला से इतना व्यथित क्यों है तथा पिछली शताब्दी के अंत से ही क्यों इसे, उससे भौगोलिक रूप से कहीं छोटे, सामरिक शक्ति के पक्ष से उसके मुकाबले नगण्य से इस देश में निरंतर राजनयिक, आर्थिक व सैनिक हस्तक्षेप करके वहां की सरकार के तख्ता पलट के प्रयत्न कर रहा है। उसके द्वारा इस हस्तक्षेप के आधार के रूप में पेश की जाती तथाकथित मानवीय, लोकतांत्रिक चिंताओं के पीछे क्या है, इसके बारे में पड़ताल की जाए।
क्या साम्राज्यवाद के इन प्रयत्नों के पीछे मानवीय संकट की चिंता है जिसके बारे में वह ढिंढोरा पीट रहा है?
यदि यही चिंता होती तो 2002 में शावेज सरकार के तख्ता पलट का प्रयत्न क्यों किया गया, जबकि उस समय देश में न तो खाद्यानों, दवाईयों की ही कमी थी तथा न ही वित्तीय साधनों की कमी। अमरीका ने उस समय समूचे लातीनी अमरीका पर ‘फ्री ट्रेड ऐरिया आफ अमेरिका’ जैसी घातक व्यापारिक नीतियां क्यों लादीं, जो कि इस महाद्वीप के मेहनतकश लोगों के दुखों-दर्दों को बढ़ाती थी। यदि तर्कपूर्ण रूप से इनके बारे में विमर्श किया जाए तो स्पष्ट रूप में दिखता है कि उसे इस महाद्वीप के गरीब लोगों की बजाय अधिक चिंता बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों की थी। वेनेजुएला के वामपंथी नेता हूगो शावेज से साम्राज्यवादी अमरीका को समस्या थी कि उन्होंने उन सभी तेल कंपनियों से और अधिक रायल्टी की मांग की थी जो कि वेनेजुएला के तेल भंडारों को लूट रही थीं। यही साथी शावेज की वह हिमाकत थी जिसके कारण उसके विरुद्ध 2002 में तख्ता पलट का प्रयास किया गया। यह उनके विरुद्ध ही नहीं हुआ बल्कि अमरीकी साम्राज्यवाद के हाथ ऐसे कुप्रयासों से रक्तरंजित है। 1953 में  ईरान के मुहम्मद मोसाद के साथ, 1954 में गुआटेमाला के जाकोबो अरबेंज व 1971 में चिली के राष्ट्रपति सल्वाडोर एलेंडे के साथ यही हुआ था। स्पष्ट है कि यदि अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों के विरुद्ध कदम उठाओगे तो साम्राज्यवाद के कोपभाजन का शिकार बनोगे।
माननीय संकट, जिसे इस समय सबसे बड़ा आधार बनाया जा रहा है तथा तथाकथित राष्ट्रपति गाइडो द्वारा अमरीकी खाद्य सहायता को न पहुंचने देने को लेकर घडिय़ाली आंसू बहाये जा रहें हैं। वेनेजुएला को अस्थिर करने के लिए उसके विरुद्ध आर्थिक प्रतिबंधों के रूप में छेड़े गए युद्ध को बंद कीजिए तथा निर्यातों से होने वाली उसकी आय को देश में आने दीजिए, सब ठीक हो जाएगा। वेनेजुएला सरकार खाद्यानों व अन्य उपभोक्ता वस्तुओं का आयात कर लेगी तथा इन संसाधनों का उपयोग करने अपनी अर्थव्यवस्था को विभिन्नता भी प्रदान करने में सक्षम है। परंतु अमरीकी साम्राज्यवाद व उसके पि_ू विपक्षी दल क्यों यह चाहेंगे? यहां यह जान लेने योग्य है कि जबसे राष्ट्रपति मादुरो ने पद संभाला है तभी से 2017 तक ही उस पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन में 350 अरब अमरीकी डालर की क्षति हुई है। 29 जनवरी के बाद से लगाए गए गंभीर प्रतिबंधों के परिणाम स्वरूप सिर्फ अमरीका ने ही वेनेजुएला की सार्वजनिक तेल कंपनी का 7 अरब डालर का निर्यात शुल्क रोक लिया है। यह जान लेना भी दरुस्त होगा कि बहुप्रचारित राहत पैकेज, जिसका समस्त विश्व में ढिंढोरा पीटा जा रहा है सिर्फ 2 करोड़ डालर का है।
लोकतंत्र, एक अन्य बहाना, जिसे आधार बनाकर यह साम्राज्यवादी हस्तक्षेप किया जा रहा है। अमरीकी साम्राज्यवाद के समूची दुनिया में पिछली सदी में किए गए हस्तक्षेपों (वास्तव में तख्ता पलट) के इतिहास पर नजर डालें तो स्पष्ट दिखता है कि वह अपने एजंडे को आगे बढ़ाने के लिए ही ‘लोकतंत्र’ शब्द का प्रयोग करता है। वेनेजुएला के संदर्भ में, हूगो शावेज कई बार चुनाव जीते तथा कई बार उन्होंने अपनी नीतियों व कार्यों की पुष्टि जनमत संग्रहों द्वारा करवाई। परंतु फिर भी अमरीका को वे फूटी आंख नहीं सुहाते थे, उनके समूचे कार्यकाल के दौरान देश के भीतर, साम्राज्यवाद परस्त राजनीतिक पार्टियां उन्हें अस्थिर करने के प्रयत्न करती रहीं। 2018 में राष्ट्रपति मादुरो द्वारा राष्ट्रपति चुनावों की निगरानी के लिए संयुक्त राष्ट्र व अन्य अंतराष्ट्रीय पे्रक्षकों को न्योता दिया। परंतु अमरीका द्वारा उन पर दबाव बनाकर निगरानी करने से रोक दिया गया। अमरीकापरस्त दक्षिणपंथी विरोधी दल एकजुट होकर विश्वसनीय उम्मीदवार न दे पाने के कारण पराजित हुए, फिर भी उन्हें 32′ मत प्राप्त हुए। इसके बावजूद उन्होंने जनवादी तौर-तरीके अपनाते हुए अपने आधार को बढ़ाने के प्रयत्न नहीं किए बल्कि वे अमरीकी वित्त विभाग व अमरीकी सेना की शरण में चले गए। यह कोई लोकतांत्रिक रास्ता नहीं है।
अब जान लें, वेनेजुएला में अमरीका कैसे लोकतंत्र को प्रोत्साहित करता है? इसके लिए किसी अन्य ही नहीं बल्कि 2006 में अमरीका के वहां राजदूत रहे विनियम ब्राउन फील्ड की रणनीति, जो कि उसने अपने देश को गुप्त संदेश द्वारा भेजी गई तथा निरंतर अमल में लाई जा रही है, के बारे में जान लें। इसके पांच सूत्र हैं-लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करना, शावेज के जनाधार में सेंध लगानी, चाविस्मो (स्पेनिश भाषा में शावेज की पार्टी के कार्यकत्ताओं को जिस नाम से पुकारा जाता है) में फूट डालनी, अमरीकी कंपनियों के हित की रक्षा करनी तथा शावेज को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करना। यह है, वेनेजुएला की राजनीति में अमरीकी साम्राज्यवाद के बेलगाम हस्तक्षेप का मंत्र। पहला सूत्र तो बहुत ही हास्यास्पद है, अमरीकी की कार्यवाहियों के मद्देनजर। अमरीकी सरकार, अमरीकी सहायता एजंसी-यू.एस.ऐड, नैशनल इनडोवमैंट फार डैमोक्रेसी व कुख्यात सी.आई.ए. के द्वारा वेनेजुएला की चुनाव प्रक्रिया की वैधता को चुनौती प्रदान करने के लिए तथाकथित ‘सिविल सोसाईटी’ ग्रुप्स को आर्थिक मदद प्रदान करता रहता है। एक वोट निगरानी ग्रुप, सुमाटे, का हर चुनाव को चुनौती देने के लिए उपयोग किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त सडक़ों पर भीड़ें जुटाने के लिए भी इसे व अन्य ग्रुपों को धन मुहैय्या किया जाता रहा है। अमरीकी विदेश विभाग ने खुद स्वीकार किया है कि 2009 में उसने प्रदर्शनों के लिए भीड़े जुटाने के लिए अपनी एजंसियों द्वारा धन प्रदान किया था। ऐसी ही एक एजंसी के प्रमुख, एडुआरडो फर्नाडीज ने कहा था-‘‘सडक़ें जल रही हैं’’ तथा ‘‘ये सभी व्यक्ति’’ जिन्होंने यह विरोध प्रदर्शन संगठित किए हैं ‘‘हमारा धन प्राप्त करने वाले हैं।’’ यह है अमरीकी साम्राज्यवाद का लोकतंत्र को मजबूत करना।
अब आयें उन मुख्य कारणों की ओर जिसके कारण अमरीकी साम्राज्यवाद अत्याधिक व्यथित है तथा वेनेजुएला की जन-समर्थक बोलिवारियन सरकार को नेस्नाबूद कर देना चाहता है। तेल, वेनेजुएला दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा तेल भंडारों वाला देश है। पिछली शताब्दी तक अमरीकी बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियां देश के इस बहुमूल्य खजाने की बेलगाम लूट करती रही थी। पर राष्ट्रपति शावेज ने सत्ता संभालते ही रायल्टी की राशि को कई गुना बढ़ा कर उनके मुनाफों को भारी क्षति पहुंचाई। अमरीकी तेल कंपनियां इसे पचाने के लिए तैयार नहीं। वे इसके लिए वेनेजुएला सरकार को दंड देने के लिए आमादा है।
वर्तमान में देखा जाए तो, तेल का प्रश्न कोई विशेष नहीं, क्योंकि विश्व में इस समय इसकी बहुतायत है तथा इसके अंतराष्ट्रीय दाम काफी कम हो गए हैं। परंतु तेल के निम्न दामों व मुद्रा समस्या ने मिलकर देश में मादुरो सरकार के विरुद्ध हस्तक्षेप के लिए अमरीका कोअवसर प्रदान किया। ब्राजील में अति दक्षिणापंथी नेता जैर बोलसोनारो के सत्ता में आने तथा कनाडा व अमरीका के पि_ू लातीनी अमरीकी देशों द्वारा ‘लीमा ग्रुप’ बनाकर मादुरो सरकार का तीव्र विरोध करने ने अमरीकी साम्राज्यवाद को इस भीषण हस्तक्षेप तथा तख्ता पलट करने का आह्वान करने के लिए वातावरण प्रदान किया। इस तेल की कीमतों में कमी व लातीनी अमरीका के दक्षिणपंथियों ने इस महाद्वीप के कुलीन तंत्र व बहुराष्ट्रीय कंपनियों में एक बार पुन: अपनी लूट को व्यापक करने की लालसा जगाई है, जिसे वेनेजुएला की मेहनतकश जनता पूर्ण नहीं होने देगी।
एक अन्य प्रमुख कारण है, जो अमरीकी साम्राज्यवाद व उसके पूंजीवादी लग्गे-भग्गे सहयोगियों के हृदय में शूल की तरह चुभता रहता है, वह साथी हूगो शावेज द्वारा निर्मित किया गया राजनीतिक-सामाजिक विकल्प, जिसे उन्होंने ‘बोलिवारियन प्राजैक्ट’ तथा ‘21वीं सदी के समाजवाद’ का नाम दिया था। सोवियत रूस के पतन के बाद अमरीकी साम्राज्यवाद व उसके कुलीन तंत्रीय सहयेगियों को इसकी आशा नहीं थी कि उनके प्रभुत्व को कोई राजनीतिक-सामाजिक विकल्प चुनौती देगा। इसे जानने के लिए अमरीकी सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (2002) उपयुक्त होगी। यह दस्तावेज अमरीका की शक्ति के बारे में इस घोषणा से आरंभ होता है-‘‘अमरीका के पास विश्वभर में अभूतपूर्व व अप्रतिम शक्ति व प्रभाव है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अमरीका के पास सबसे बड़ा व शक्तिशाली सैन्य बल है, इतना शक्तिशाली कि यह उसके किसी भी विपक्षी को सैन्य रूप में उसकी समानता करने, उसे लांघने से रोकने में सक्षम हैं।’’
यही वह शूल है, जो अमरीकी साम्राज्यवाद के सीने में नासूर की तरह चुभती रहती है, कि उस शक्तिशाली सैन्य बल वाले देश के पड़ोस में ही स्थिति वेनेजुएला एक ऐसे राजनैतिक सामाजिक विकल्प की कर्मभूमि बन गया। जिसने एक जन कल्याणकारी राजनीतिक-सामाजिक विकल्प पेश करते हुए उसके पूंजीवाद आधारित साम्राज्यवादी विश्वीकरण को रद्द कर दिया। अपने देश से आगे बढ़ते हुए एक बार पूरे महाद्वीप को इस रंग में रंगने में सफल रहा। इसीलिए उसने इस विकल्प को पैदा होते ही नेस्तनाबूद करने के लिए 2002 में हूगो शावेज के विरुद्ध तख्ता पलट किया था। परंतु उसे मुंह की खानी पड़ी। राष्ट्रपति निकोलस मादुरो द्वारा समस्त बाधाओं के बावजूद, बहुत कठिन स्थितियों में उस विकल्प को प्रफुल्लित किया जा रहा है। परंतु अमरीकी साम्राज्यवाद उसे नेस्तनाबूद करने की नाकाम कोशिश कर रहा है।
अमरीकी साम्राज्यवाद के वेनेजुएला में हस्तक्षेप के भीषण प्रयत्नों का विश्वभर में हर स्तर पर विरोध हो रहा है। रूस, चीन, तुर्की, क्यूबा के नेतृत्व में 50 से भी अधिक देश वेनेजुएला के समर्थन में चट्टान की तरह खड़े हैं। अमरीका व उसके पूंजीवादी सहयोगी देशों में आम लोगों के साथ-साथ कई महत्त्वपूर्ण नेता भी इस हस्तक्षेप का विरोध कर रहे हैं। साम्राज्यवाद द्वारा अपने पि_ू तथाकथित राष्ट्रपति जुआन गाइडो  को माध्यम बनाकर मानवीय सहायता के रूप में खाद्यान आदि राहत साम्रगी भेजने के प्रयत्न किए जा रहे हैं। इसे भी बेनकाब करना जरुरी है क्योंकि राहत सामग्री के नाम पर अमरीकी साम्राज्यवाद पहले भी कई देशों में वहां अपने पि_ू के लिए हथियार व धन भेजता रहा है। इसलिए ही जहां, राष्ट्रपति मादुरो व देश की जनता ने इसे रद्द कर दिया है, वहीं संयुक्त राष्ट्र ने भी इससे अपने आपको यह कहते हुए अलग कर लिया है कि अमरीका का यह कदम राजनीतिक प्रेरित है।
वेनेजुएला की जनता तो लगभग रोजाना ही रैलियां करके इस हस्तक्षेप के विरुद्ध जन लामबंदी कर रही है। देशभर में लोगों को जागृत करने के लिए साम्राज्यवाद विरोधी कैंप लगाकर लोगों को अमरीकी साम्राज्यवाद की काली करतूतों के बारे में शिक्षित किया जा रहा है। दुनिया के समस्त शांतिप्रिय, न्यायप्रिय लोगों को इस हस्तक्षेप के विरुद्ध रोष प्रकट करते हुए, नारा बुलंद करना चाहिए – ‘‘अमरीकी साम्राज्यवादियों वेनेजुएला से अपने हाथ दूर रक्खो।’’ क्योंकि अमरीकी साम्राज्यवाद का वेनेजुएला में हस्तक्षेप मानवीय मूल्यों व लोकतंत्र की रक्षा के लिए नहीं है बल्कि वह इस ग्रह, धरती को पूर्ण रूप से अरबपतियों को सौंपना चाहता है ताकि इन अरबपति तानाशाहों का धरती के हर इंच पर वर्चस्व हो।
(26.2.2019)

बेल्जियम के श्रमिकों की न्यूनतम वेतन में बढ़ौत्तरी के लिए हड़ताल
यूरोप के देश बेल्जियम में 13 फरवरी को देश के 40 लाख श्रमिकों ने हड़ताल करके चक्का जाम कर दिया। देश की तीन प्रमुख ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर यह हड़ताल वेतन में वृद्धि व बेहतर कार्य स्थितियों को लेकर हुई। इस हड़ताल में सरकारी कार्यालयों, स्कूलों, उद्योगों, ट्रांसपोर्ट व हवाई यातायात क्षेत्र के श्रमिक शामिल थे।
श्रमिकों ने कई मांगें उभारीं, जिनमें शामिल थीं; समस्त कर्मचारियों व श्रमिकों के वेतनों में बढ़ौतरी, न्यूनतम वेतन 14 यूरो प्रति घंटा या 2300 यूरो प्रति महीना किया जाये, मौजूदा श्रम कानूनों में सकारात्मक सुधार, कार्य-दबाव कम करना, व्यावहारिक कार्य लक्ष्य, अनिश्चितकालीन सीमा अवधि के नौकरी समझौते तथा बेहतर कार्य व किांदगी संतुलन आधारित कार्य स्थितियां।
देश की सरकार ने 1 जून 2016 को न्यूनतम वेतन कानून लागू किया था। जिसके अनुसार, 12 महीने के कार्य अनुभव व न्यूनतम 20 वर्षीय श्रमिक के लिए प्रति मास 1590.64 यूरो, 6 महीने कार्य अनुभव व न्यूनतम 19 वर्षीय के लिए 1572.28 यूरो तथा बिना अनुभव-न्यूनतम 18-19 वर्षीय श्रमिक के लिए 1531.93 रुपये न्यूनतम वेतन निर्धारित किया गया था। इसके ऊपर 2016 में ही अधिकतम बढ़ौत्तरी की सीमा रेखा दो वर्ष के लिए 0.8 प्रतिशत निर्धारित कर दी गई  थी।
इस हड़ताल का आह्वान करने वाली ट्रेड यूनियनो मेंं से एक, जनरल फैडरेशन आफ वर्कर्स के अनुसार-‘‘देश में माईकल सरकार वेतन को सीमित करने के लिए आंशिक रूप से जिम्मेवार है, उसने इस पर रोक लगा दी है, मुद्रा-स्फिति के अनुसार इसमें न्यूनतम बढ़ौत्तरी 1.8 बनती है परंतु नया कानून बना कर इसे अधिकतम 0.8 प्रतिशत पर सीमित कर दिया है।’’
जनरल कन्फैडरेशन आफ लिबरल ट्रेड यूनियन के महा-सचिव का कहना है-‘‘हालिया वर्षों में प्रैस ने अर्थव्यवस्था की हालत, नौकरियों के सृजन तथा श्रमशक्ति की कमी के बारे मेंं व्यापक टिप्पणियां की हैं। परंतु, इसके बारे में कोई कदम उठाने की जगह सरकार ने मालिकों द्वारा दी जाती सामाजिक सुरक्षा सहयोग राशि घटा दी है, व्यापारिक टैक्स सभी कंपनियों के लिए कम कर दिया है तथा आम नागरिकों के लिए सार्वजानिक व सामाजिक सुरक्षा में कटौतियां कर दी हैं।
वर्कर्स पार्टी आफ बेल्जियम ने श्रमिकों की इस हड़ताल के प्रति एकजुटता प्रकट की तथा उसके वक्ता राऊल हेडेवऊ ने कहा – ‘‘देश का निर्माण करने वालों के प्रति संरक्षकों व सरकार ने न्यूनतम सम्मान भी नहीं दर्शाया। समय, इस तर्क को पलटने का है। इसलिए ही हम 5 मुख्य कदम उठाने की मांग कर रहे हैं ताकि लोगों की क्रय शक्ति बढ़ाई जा सके, यह हैं-अस्पतालों की फीसों में की गई बढ़ौत्तरी वापिस ली जाए, ऊर्जा पर वैट में 6′ की कटौती की जाए, सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट निशुल्क की जाए, पैन्शन बढ़ा कर न्यूनतम 1500 यूरो की जाए तथा वेतनों में 3′ की बढ़ौत्तरी हो।
 इससे पहले 14 दिसंबर को भी देश भर में बेल्जियम सरकार की श्रमिक विरोधी नीतियों के विरुद्ध 24 घंटे की राष्ट्रीय स्तरीय हड़ताल की गई थी। बजट में मजदूर विरोधी कदमों तथा कार्य-घंटों में मजदूर विरोधी परिवर्तनों के वापिस लेने की मांग की गई थी।

अर्जेन्टीना में बढ़ रही मंहगाई के विरुद्ध व्यापक रोष प्रदर्शन
दक्षिण अमरीका के देश अर्जेन्टीना में 13 फरवरी को देश भर में विशाल प्रदर्शन हुए हैं। ‘‘बहुत हुई भूख, मंहगाई, हमें भूमि, छत व काम चाहिये’’ नारे लगाते हुए 2 लाख से भी अधिक अर्जेन्टीनावासी सडक़ों व गलियों में थे। राष्ट्रपति मैरिसियो माक्री सरकार द्वारा में बुनियादी सामाजिक सेवाओं के शुल्कों में भारी बढ़ौत्तरी की गई है, जिससे जीवन-यापन की सभी वस्तुओं की कीमतों में भारी बढ़ौत्तरी हुई है। देशवासी मांग कर रहें हैं कि सेवा शुल्कों में की गई इस बढ़ौत्तरी को शीघ्र वापिस लिया जाए।
वर्कर्स कन्फैडरेशन आफ पापूलर इकोनोमी, संघर्षशील संगठनों के मंच (एफ.ओ.एल.) व अन्य कई सामाजिक व ट्रेड यूनियों संगठनों के आह्वान पर 4 जनवरी से ही किसी ना किसी रूप में यह संघर्ष जारी है। समूचे देश में मशाल मार्च करने के बाद, बर्तन बजाने आदि जैसे कई एक्शन जनवरी महीने में किए गए। 13 फरवरी को तो देश की राजधानी ब्यूनस आयर्स में हजारों देशवासियों ने शहर भर में रोष प्रदर्शन किए तथा सभी प्रदर्शनकारी देश के स्वास्थ्य व सामाजिक विकास मंत्रालय के बाहर इक्_ा हुए। इसी तरह के रोष प्रदर्शन देश अन्य 50 शहरों में भी हुए। उनकी मांग थी कि बुनियादी भोजन वस्तुओं व सार्वजनिक सेवाओं की कीमतें व शुल्क  कम किये जायें व राष्ट्रीय स्तर पर समान किए जाएं। सरकार खाद्य पदार्थों व अन्न के बारे में आपात्तकाल घोषित करते हुए सामाजिक बुनियादी ढांचे, परिवारिक खेती व सामाजिक कार्यक्रमों के लिए धन जारी करे।
यहां यह वर्णन योग्य है कि मैरिसियो माक्री 2015 में वामपंथी उम्मीदवार को हरा कर राष्ट्रपति चुने गए थे। सत्ता संभालते ही उन्होंने नवउदारवादी आर्थिक व सामाजिक नीतियां लागू करनी शुरु कर दी थीं। देश भर में हुए भारी जन-विरोध के बावजूद अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 57 अरब डालर का कर्ज लिया था। इस कर्ज से जुड़ी शर्तों – 2018 व 2019 में वित्तिय घाटे को घटाने के लिए लागू किये गये कदमों के परिणामस्वरूप पिछले समय में बुनियादी सेवाओं के शुल्कों में भारी वृद्धि की गई है। बिजली दरें 3624′, गैस की दरें 2401′, पानी की दरें 1025′ तथा सार्वजनिक यातायात सेवाओं की दरें 601′ बढ़ी हैं। जिनके प्रभाव से उपभोग की समस्त वस्तुओं के भाव भी आसमान छूने लगे हैं।
देश में आज स्थिति यह है कि मंहगाई बेलगाम बढ़ रही है, छोटे उद्योग-धंधे बंद हो रहे हैं, व्यापक स्तर पर छंटनियां हो रही हैं। परिणामस्वरूप लोगों की खरीदशक्ति का भारी पतन हो रहा है। सरकार खुद भी इसे स्वीकार कर रही है। देश की स्वास्थ्य व सामाजिक विकास मंत्री कौरोलिना स्टेनले ने पिछले सप्ताह एक कार्यक्रम के दौरान माना कि देश के राष्ट्रीय सांख्यकीय व जनसंख्या  संस्थान के अनुसार देश में गरीबी की दर पहले के मुकाबले अधिक होगी।
इसके कारण देशवासियों में निराशा व गुस्सा पैदा हो रहा है। 13 फरवरी को हुए प्रदर्शनों में शामिल एक प्रदर्शनकारी ने अपनी भावनायें प्रगट करते हुए कहा-‘‘हम नौकरियां, स्वास्थ्य, शिक्षा व आवास आदि सब कुछ खोते जा रहे हैं, लोगों में गंभीर निराशा व्याप्त हो रही है इसलिए हमारे पास इस सब के विरुद्ध सडक़ों पर उतरने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं है।’’
देश भर में राष्ट्रपति मैरिसियों माक्री के विरुद्ध रोष बढ़ता जा रहे है। उनके कार्यकाल के दौरान राष्ट्रीय कर्ज बढ़ा है, गरीबों की संख्या बढ़ी है, मंहगाई, मंदी बढऩे के साथ राष्ट्रीय मुद्रा का भी अवमूल्यन हुआ है। आने वाले दिनों में यकीनन ही उन्हें देशवासियों के इस रोष का मूल्य चुकाना होगा। इस साल के अक्तूबर में आम चुनाव व राष्ट्रपति चुनाव भी होने हैं।

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