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विश्व दर्पण (संग्रामी लहर – फरवरी २०१९)

विश्व दर्पण (संग्रामी लहर – फरवरी २०१९)

रवि कंवर

वेनेजुएला के वामपंथी नेता मादुरो ने साम्राज्यवाद के भीषण हस्तक्षेप के बावजूद द्वितीय बार ग्रहण की राष्ट्रपति पद की शपथ
लातीनी अमरीकी देश वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने अमरीकी साम्राज्यवाद के भीषण विरोध के बावजूद 10 जनवरी को राष्ट्रपति  पद के दूसरे कार्यकाल के लिये शपथ ग्रहण की। यहां यह वर्णनीय है कि वेनेजुएला इस महाद्वीप के प्रसिद्ध वामपंथी नेता स्वर्गीय साथी हूगो शावेज का देश है, जिन्होंने इस महाद्वीप, जो कि साम्राज्यवादी अमरीका के बिलकुल साथ लगता है, में साम्राज्यवादी विश्वीकरण तथा नवउदारवादी आर्थिक व सामाजिक नीतियों के विरुद्ध झंडा बुलंद किया था तथा 1998  से 2013 तक, अपने कैंसर से देहांत होने तक एकछत्र राज्य किया था। उनके इस कार्यकाल की यह भी विशेषता रही की उन्होंने इस कार्यकाल के दौरान जम्हूरी कार्य प्रणाली का उपयोग करते हुये कई बार चुनाव या जनमत संग्रह करवाये तथा हर बार सत्ता पर उनकी पकड़ मजबूत हुई। उन्होंने ‘21वीं सदी का समाजवाद’ स्थापित करने का नारा दिया जो कि समूचे महाद्वीप में लोकप्रिय हुआ। इस महाद्वीप में इस सदी के प्रारंभ में साम्राज्यवादी विश्वीकरण के विरोध व अपने-अपने देश में जन कल्याणकारी नीतियां लागू करने, ने एक आंदोलन का रूप धारण कर लिया तथा महाद्वीप के अनेकों देशों में जन-समर्थक व साम्राज्यवाद विरोधी सत्तायें स्थापित हुईं।
साथी हूगो शावेज के देहांत के एक महीना बाद 2013 में बाकायदा चुनाव द्वारा निकोलस मादुरो ने राष्ट्रपति का पद संभाला था। उनका यह कार्यकाल जनवरी 2019 में पूरा हो गया था। मई 2018 में राष्ट्रपति पद के लिये चुनाव करवाये गये थे तथा इनमें वह विजयी रहे। 10 जनवरी 2019 को उन्होंने अपना दूसरा कार्यकाल ग्रहण करते हुये शपथ ली।
उनका यह शपथ ग्रहण समारोह देश की सुप्रीम कोर्ट में हुआ तथा मुख्य न्यायधीश माइकेल मोरीनो ने उन्हें पद व गोपनीयता की शपथ दिलाई। यहां, यह वर्णनयोग्य है कि आम तौर पर यह समारोह देश की संसद में होता है। परंतु साम्राज्यवाद समर्थक व दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों नेताओं से भरी इस संसद को 2016 में देश की सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त कर दिये जाने तथा इन विरोधी दलों द्वारा संसद भवन पर कब्जा कर लिये जाने के मद्देनजर यह समारोह देश की सुप्रीम कोर्ट में करना पड़ा।
निकोलस मादुरो यह शपथ देश के आवाम के नाम पर ली-‘‘वेनेजुएला के लोगों, अपने पूर्वजों की विरासत, हमारी स्वतंत्रता के लिये संघर्ष करने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी साईमन बोलीवार, अपने प्रिय कमांडर हूगो शावेज की विरासत का संज्ञान लेते हुये, मैं निकोलस मादुरो, देश के संविधान को लागू करने व उसे संपूर्ण करने के साथ-साथ सामाजिक व आर्थिक खुशहाली के लिये व 21वीं सदी का समाजवाद कायम करने के लिये संघर्ष करने की शपथ लेता हूं।’’
उनके इस समारोह में दर्जनों देशों के वरिष्ठ नेता शामिल थे। समाजवादी देश क्यूबा के राष्ट्रपति मिगुइल डियाज-कानेल, बोलीविया के राष्ट्रपति ईवो मोरालेज, अल-सल्वाडोर के सांचेज सेरेन, निकारागुआ के डेनियल आर्तेगा खुद शामिल थे। इसके साथ ही चीन, रूस, तुर्की समेत 90 देशों के प्रतिनिधि भी इस समारोह में पहुंचे तथा कई अंतर्राष्ट्रीय व इस महाद्वीप की संस्थाओं ओपेक, अफ्रीकन यूनियन, कारीकोम, अरब लीग, अलबा के साथ-साथ संयुक्त राष्ट संघ का प्रतिनिधि भी इस अवसर पर उपस्थित था। इसके अतिरिक्त देश के राज्यों के गर्वनर, मेयर, मंत्री, उच्चाधिकारी, सेना के उच्चाधिकारी तथा देश की संविधान सभा के सदस्य भी इस शपथ समारोह में शामिल थे।
साम्राज्यवादी अमरीका व उसके कठपुतली लातीनी अमरीकी देशों के शासकों ने निकोलस मादुरो के वेनेजुएला के राष्ट्रपति के रूप में पुन: पद ग्रहण करने का ऐड़ी चोटी लगाकर विरोध किया। इसके विरोध में सर्वप्रथम टवीट् करने वालों में शामिल थे-अमरीका के विदेश सचिव, माइक पोंपियो, उन्होंने कथित रूप में मादुरो के सत्ताग्रहण को अनिधिकृत रूप में सत्ता पर कब्जा करना बताते हुये उसके विरुद्ध देश की सेनाओं समेत उन लोगों, जो तथाकथित रूप में देश के संविधान के समर्थक हैं, को देश में दमन व भ्रष्टाचार समाप्त करने तथा जम्हूरियत कायम करने का आह्वान किया। यहां यह जान लेना भी उचित होगा कि वे यह जम्हूरियत कायम करने के यह संदेश मिस्र के उस तानाशाह शासक जनरल अब्देल फतह अल-सीसी के कसीदे पढ़ते हुये दे रहे थे, जिसने अमरीका के सरगर्म समर्थन से 2013 में एक खूनी तख्तापलट के दौरान सत्ता हथियाई थी तथा इसके लिये देश के निर्वाचित राष्ट्रपति मुहम्द मुर्सी के 1600 समर्थकों को मौत के घाट उतारा था तथा 60000 लोगों को जेलों में डाला था।
लातीनी अमरीकी देशों में राष्ट्रपति मादुरो का विरोध करने वालों में लीमा ग्रुप अग्रणी है, जिसमें 13 लातीनी अमरीकी देश व कनाडा शामिल हैं। इसके, अमरीकी साम्राज्यवाद के कठपुतली होने का अंदाज इससे ही लगाया जा सकता है कि अमरीका इस ग्रुप का सदस्य नहीं है परंतु फिर भी इसकी बैठक में माइक पोंपियो, जो कि अमरीका का विदेश सचिव तथा लातीनी अमरीका में कई तख्तापलटों व राज्याध्यक्षों की हत्याओं के लिये बदनाम अमरीकी खुफिया एजंसी ‘सीआईए’ का भूतपूर्व निदेशक है, को बैठक में शामिल करने के लिये विशेष रूप में विडियो-लिंक स्थापित किया गया। इन देशों ने इस शपथ-ग्रहण समारोह के बाद वेनेजुएला से अपने कूटनीतिक संंबंधों पर पुर्न: विचार करने की धमकी दी। इस गु्रुप के ही सदस्य मैक्सिको ने इसके बारे में लाये गये प्रस्ताव का, इसे वेनेजुएला के अंदरूनी मामलों में दखल तथा वेनेजुएला के आम लोगों पर इसके पडऩे वाले प्रभावों का हवाला देते हुये विरोध किया।
अमरीकी देशों के संगठन ‘ओ.ए.एस.’ ने इस शपथ समारोह के फौरन बाद एक विशेष बैठक करते हुये एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें मादुरो द्वारा पुन: राष्ट्रपति पद ग्रहण करने को अनुचित बताते हुये देश में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधियों की निगरानी में पुन: चुनाव करवाने का आह्वान किया। इस प्रस्ताव के पक्ष में 19 देशों ने मत डाले जबकि 6 ने विरोध में तथा 8 अनुपस्थित रहे। इसके बाद इन देशों ने अलग-अलग विज्ञप्तियां जारी करके भी इसका विरोध किया।
वेनेजुएला के विदेश मंत्री जोर्ज ऐरीजी ने एक विज्ञप्ति जारी करते हुए इसे अमरीकी हितों की अपमानजनक चाकरी बताया। वहीं राष्ट्रपति मादुरो ने एक पत्रकार वार्ता करके बताया कि लीमा गु्रप के सदस्यों को कूटनीतिक प्रतिरोध-पत्र दे दिये गये हैं, वे 48 घंटे में अपनी स्थिति को सुधारें नहीं तो उनके विरुद्ध ‘‘फौरी व सख्त’’ कूटनीतिक कदम उठाये जायेंगे। राष्ट्रपति मादुरो इन देशों से संबंध सुधारने के लिये भी निरंतर प्रयत्नशील हैं। उन्होंने अलबा (बोलिवारियन एलाइंस फार दी पीपुल्स आफ अमेरिका) जैसे सहयोगी व लातीनी अमरीकी देशों के अन्य संगठनों का आह्वान किया है कि वे महाद्वीप के देशों के परस्पर संबंध सुधारने के लिये पहल करें। तथा उन्होंने लातीनी अमरीकी देशों का शिखर सम्मेलन करने का भी सुझाव दिया ताकि आमने-सामने बैठकर बातचीत की जा सके।
राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के शपथ ग्रहण समारोह के समय ही लगभग सारे देश में आम लोगों, जनसंगठनों व सामाजिक संस्थाओं द्वारा रैलियां करके इसका जोरदार समर्थन किया गया। यहां यह वर्णनीय है कि इन दिनों देश भर में साम्राज्यवाद व उनके कठपुतली दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी राजनीतिक दलों द्वारा चलाये जा रहे हिंसक उत्पात के विरुद्ध जन-लामबंदी के लिये जन-संगठनों, सामाजिक संगठनों व जनपक्षीय राजनीतिक दलों द्वारा देश भर में साम्राज्यवाद-विरोधी कैंपों का आयोजन किया जा रहा है।
साथी मादुरो ने अपने शपथ ग्रहण भाषण के दौरान अपने कार्यकाल को देश के आम लोगों के प्रति समर्पित करते हुये कहा ‘‘मैं लोगों को बताना चाहता हूं कि यह राष्ट्रपति कमरबंद (सत्ता के प्रतीक के रूप में पहना जाने वाला) आपका है, यह सत्ता आपकी है, यह किसी सुविधा-संपन्न या साम्राज्यवाद की नहीं। इसका संबंध प्रभुसत्ता-संपन्न वेनेजुएला के आम लोगों से है।’’ उन्होंने अपने भाषण के अंत में देश की अर्थव्यवस्था में हुये सुधार के बारे में बताया तथा भ्रष्टाचार व आलस्य के विरुद्ध संघर्ष को अपनी प्राथमिकता बताते हुये आने वाले सोमवार को संवैधानिक सभा के सामने नये आर्थिक कदमों की घोषणा करने का प्रण किया।
देश में इस शपथ ग्रहण समारोह के बाद साम्राज्यवादी दखलअंदाजी भी शिखर पर पहुंच गई है। साम्राज्यवाद के पि_ु विपक्षी दलों द्वारा देश भर में हिंसक उत्पात जारी है तथा इन कुछेक दिनों में ही दर्जन से अधिक लोग इस हिंसा का शिकार बने हैं। विपक्षी नेता जुआन गाइडो ने अपने आपको अंतरिम राष्ट्रपति घोषित कर दिया है तथा देश में तख्तापलट करके सत्ता हथियाने को अपना उद्देश्य बताया है। साम्राज्यवादी अमरीका, उसके लातीनी अमरीकी सहियोगियों व फ्रांस जैसे यूरोपिय देशों, जो अमरीका के सहभागी हैं, ने भी उसका समर्थन किया है। राष्ट्रपति मादुरो ने इसके विरुद्ध सख्त रोष प्रकट करते हुये अमरीका से कूटनीतिक संबंध समाप्त कर लिये हैं तथा 72 घंटे में अमरीकी कूटनीतिज्ञों को देश छोडऩे की चेतावनी दी है। दूसरी ओर रूस, चीन, तुर्की, सीरिया व क्यूबा ने अमरीकी साम्राज्यवाद व इसके सहियोगियों के इस कदम की सख्त निंदा की है। रूस के विदेश मंत्री ने इसे देश की सत्ता को अनुचित ढंग से हथियाने का प्रयास व इसे पूर्ण रूप से गैर कानूनी व रक्तरंजित रास्ता बताया है। चीन के विदेश विभाग की प्रवक्ता ने इसे वेनेजुएला के आंतरिक मामलों में प्रत्यक्ष दखलंदाजी बताते हुये इसकी घोर निंदा की है। वेनेजुएला के रक्षा मंत्री वलादीमीर पाडरीनो लोपेज ने राष्ट्रपति मादुरो को सांवैधानिक राष्ट्रपति बताते हुये चेतावनी दी है कि देश की सेना वेनेजुएला की सत्ता की रक्षा करेन के लिये प्रत्यक्ष रूप में दखलंदाजी करने के पीछे नहीं हटेगी।
इस अति विस्फोटक स्थिति में 23 जनवरी को लाखों की संख्या में वेनेजुएलावासी लाल कमीजें पहने, राष्ट्रीय झंडे व लाल झंडे लहराते हुये देश के राष्ट्रपति भवन के समक्ष राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के प्रति अपना जनसमर्थन व्यक्त करने पहुंचे। भवन की बालकनी से उन्हें संबोधन करते हुये राष्ट्रपति मादुरो ने अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप की इस दखलंदाजी के लिये घोर निंदा की तथा उसकी इस नीति को आतंकवादी नीति तथा गंभीर मूर्खता बताया। उन्होंने कहा ‘‘उनके देश पर असंवैधानिक रूप में एक सरकार थोपने का प्रयत्न किया जा रहा है, हम इसे किसी भी स्थिति में बर्दाशत नहीं करेंगे।’’
वेनेजुएला के हालात, छोटे से समाजवादी देश उत्तरी कोरिया द्वारा परमाणु हथियार बना लेने की सार्थकता को पुन: सिद्ध करते हैं। यदि वेनेजुएला के पास भी परमाणु हथियार होते तो अमरीकी साम्राज्यवाद इस तरह का हिंसक उत्पात मचाने व दखलंदाजी  करने से पहले सौ बार सोचता। आज दुनियां के हर अमन-पसंद व जनवाद-पसंद व्यक्ति का जहां कर्तव्य बनता है कि वह वेनेजुएला में साम्राज्यवाद की इस भीषण दखलंदाजी का जोरदार विरोध करे वहीं उसे उत्तर कोरिया द्वारा उसके परमाणु हथियार हासिल करने व निर्माण करने के अधिकार का भी मुखर समर्थन करना चाहिये।
(24-1-2019)

‘ब्रैगजिट’ के कारण ब्रिटेन में पैदा हुआ गंभीर राजनैतिक संकट
यूरोपीय महाद्वीप का प्रमुख देश ब्रिटेन, इस समय एक गंभीर राजनैतिक संकट से गुजर रहा है। यह संकट उस समय शुरू हुआ, जब देश की प्रधान-मंत्री टैरेकाा मेय की ओर से ‘बै्रगजिट’ के सम्बन्ध में (देश को यूरोपीय यूनियन से बाहर निकाल लेने) प्रस्तावित योजना संसद के निचले सदन, हाऊस आफ कामन्का ने बड़े बहुमत से रद्द कर दी। उसकी अपनी पार्टी, कंजरवेटिन-पार्टी, जिसे आम बोल-चाल की भाषा में टोरी पार्टी के रूप में जाना जाता है, के भी 118 सदस्यों ने, यद्यपि, उस के प्रस्ताव के विरोध में वोट डाले। उसकी इस बड़ी पराजय के बाद, देश की प्रमुख विरोधी पार्टी-लेबर पार्टी की ओर से संसद में पेश किया गया अविश्वास का प्रस्ताव भी पास नहीं हो सका। इस तरह 306 मतों के मुकाबले 325 अर्थात सिर्फ 19 मतों के अन्तर से चाहे प्रधान-मन्त्री टैरेकाा मेय की सरकारी अभी कायम तो है, लेकिन डांवाडोल ही है। इस प्रकार यह राजनैतिक संकट अभी हल नहीं हो सका है।
इस संकट को अच्छी तरह से समझने के लिए कुछ बातें जानना जरूरी है। ब्रिटेन एक ऐसा राजतन्त्र-व्यवस्था वाला देश है, जहां बादशाह का देश के राजनैतिक-ढांचे में हस्तक्षेप बहुत सीमित है। इस, यू.के. (यूनाइटिड किंगडम) कहलाने वाले देश को आम लोगों की भाषा में ग्रेट-ब्रिटेन कहा जाता है तथा यह देश चार देशों का समूह है। ये देश हैं-इंग्लैंड, वेल्का, स्काटलैंड तथा उत्तरी-आयरलैंड। ‘ब्रैगजिट’, यह शब्द अंग्रेजी के दो शब्दों ‘ब्रिटेन’ तथा  ‘अैगकिाट’ जिस का अर्थ होता है- निकास, से मिल कर बना हुआ शब्द है। यह शब्द ब्रिटेन के युरोपीय यूनियन से बाहर आने के सन्दर्भ में आम बोलचाल की भाषा में प्रयोग किया जाता है। ‘यूरोपीय-यूनियन’ आर्थिक तथा राजनैतिक भागीदारी पर आधारित 28 देशों का एक समूह है। यह दूसरे विश्व-युद्ध के पश्चात अस्तित्व में आया था। यहां, यह वर्णन-योग्य है कि यूरोप की साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच हुआ दूसरा विश्व-युद्ध भी प्रमुख रूप में यूरोप तथा एशिया महाद्वीपों की धरती पर ही लड़ा गया था तथा यह एक-दूसरे के बाकाारों पर ही कब्जा जमा लेने के कारण शुरू हुआ था। इस से सबक लेते हुए यूरोपीय यूनियन अस्तित्व में आई, जिसका उद्देश्य था-परस्पर व्यापार करते हुए देशों के बीच में पैदा हुए विरोधाभासों तथा युद्ध को टालना तथा आर्थिक सहयोग को प्रफुल्लित करना। यह समझ विकसित होकर अब यहां ‘एकल’ या एक ही बाकाार का रूप धारण कर गई है, जहां वस्तुएं तथा लोग एक देश के समान आ-जा सकते हैं। इसकी अपनी मुद्रा ‘यूरो’ है, जिसे 19 सदस्य देश उपयोग में लाते हैं। ‘यूरोपीय-यूनियन’ की अपनी संसद है, जिसके बाकायदा चुनाव होते हैं तथा यह पर्यावरण, परिवहन, उपभोक्ता-अधिकारों जैसे व्यापक-क्षेत्रों के लिए नियम बनाती है। अब तो इन देशों के लिए मोबाईल-फोन नैटवर्क सम्बन्धी कीमतें तक तय करने लग पड़ी है। बैल्जियम की राजधानी ‘ब्रूसेल्ज’ में इस का मुख्य कार्यालय है।
ब्रिटेन में 23 जून, 2016 को जनमत-संग्रह हुआ था, जिस में एक ही मुद्दा था कि ब्रिटेन युरोपीय-यूनियन का भाग रहे या इस से बाहर आ जाये। इस जन मत-संग्रह में युरोपीय-यूनियन को छोड़ देने के पक्ष में 51.9′ मत पड़े थे तथा इस में बने रहने के 48.1′ मत प्राप्त हुए थे। इस प्रकार मात्र 3.8′ के अन्तर से देश को यूरोपीय यूनियन से अलग किये जाने, अर्थात, ‘ब्रैगजिट’ के पक्ष में फैसला हो गया था। इस जनमत-संग्रह में 71.8′ मतदाताओं ने भाग लिया था। जब यह जनमत संग्रह करवाया गया था उस समय देश के प्रधान-मन्त्री, कंजरवेटिव पार्टी के ही डेविड कैमरुन थे, वे ‘ब्रैगजिट’ के विरुद्ध थे, अर्थात देश को युरोपीय-यूनियन से बाहर लाने के विरुद्ध थे। जनमत-संग्रह में, उन के पक्ष की हार हो जाने, ‘ब्रैगजिट’ को बहुमत मिल जाने के कारण वह नैतिक तौर पर त्याग-पत्र दे गये थे तथा देश की प्रधान मन्त्री टैरेकाा-मेय बनी। यहां, वह वर्णन-योग्य है कि टैरेकाा मेय भी ‘ब्रैगजिट’ के विरुद्ध थी लेकिन प्रधान मन्त्री की दौड़ में शामिल ‘ब्रैगजिट’ के समर्थकों की ओर से मुकाबले से बाहर हो जाने के पश्चात वह प्रधानमन्त्री बन गई थी। उसने देश की सत्ता संभालने के पश्चात, 29 मार्च 2017 को ‘ब्रैगजिट’ प्रक्रिया शुरू की थी युरोपीय-यूनियन की लिस्बन-संधी की धारा-50, जो इस से सम्बन्धित है के अनुसार दोनों पक्षों को 2 वर्ष की अवधि इस अलगाव सम्बन्धी शर्तें तथा नियम तय करने के लिए मिलती है। इसके अनुसार 29 मार्च, 2019 को, 11 बजे, ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन से बाहर हो जायेगा। लेकिन यूरोपीय-न्यायालय के अनुसार ब्रिटेन को इस प्रक्रिया को रोकने का भी अधिकार प्राप्त है तथा यूरोपीय यूनियन के समूचे 28 सदस्य देश के समर्थन से इस समय को बढ़ाया भी जा सकता है। इस समय देश की प्रधानमन्त्री टैरेकाा मेय की ब्रैगजिट से सम्बन्धित योजना बहुत बड़े बहुमत से रद्द हो गई है जबकि बाहर हो जाने की समय-सीमा के खत्म होने में भी 80 के लगभग दिन ही बचते हैं। इस दौरान नई योजना या प्रस्ताव तैयार करना तथा उसे पास करवाना टैरेकाा मेय के लिए बहुत बड़ी चुनौती है तथा इस समय यह देश के सम्मुख एक गंभीर राजनैतिक-संकट का रूप-धारण कर गया है।
टैरेकाा-मेय की ओर से 11 जनवरी को हाऊस आफ कामन्का में ब्रैगजिट सम्बन्धी प्रस्तावित योजना पेश की गई थी, जिस पर पांच दिन बहस होने के बाद 15 जनवरी को इस पर मतदान हुआ था। इस के पक्ष में 230 वोट पड़े तथा विरोध में 432 वोट पड़े। इस प्रकार उस की ओर से प्रस्तावित योजना 202 वोटों के अन्तर से बुरी तरह रद्द हो गई। लगभग एक सदी की यह किसी भी प्रधानमन्त्री की सब से बड़ी हार है। उसकी अपनी ही पार्टी-टोरी पार्र्टी के 118 सांसदों ने भी उस के प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया जो उस की पार्टी के सदस्यों का लगभग 40′ बनता है। यह पराजय और भी बड़ी होनी थी, यदि लेबर-पार्टी के तीन ब्रैगजिट के समर्थक संसद-सदस्य तथा अन्य तीन आकााद सदस्य उसके पक्ष में वोट न डालते तो। इस के विरोध में पड़े 432 वोटों ने प्रमुख विपक्षी पार्टी-लेबर पार्टी के 248 सदस्य, स्काटलैंड की स्काटिश नैशनल पार्टी के 35 सदस्य तथा अन्य छोटे दल गरीनका तथा पलाईड कईमरु के सदस्य शामिल थे। अपनी इस शर्मिंदगी भरी पराजय के पश्चात टैरेजा मेय ने एलान किया कि प्रमुख विपक्षी पार्टी-लेबर पार्टी के नेता जैरेमी कोरबीन सरकार के विरुद्ध अविश्वास-का प्रस्ताव लेकर आने का अपना अधिकार उपयोग कर सकता है।
16 जनवरी को लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कोरबीन की ओर से संसद में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया जिसमें मुख्य-आधार टैरेजा मेय की ओर से ‘ब्रैगकिाट’ सम्बन्धी प्रस्तावित योजना के मुद्दे पर उसकी बुरी तरह पराजय को बनाया गया। लम्बी बहस के पश्चात इस पर हुई वोटिंग के दौरान सिर्फ 19 वोटों के अन्तर से यह अविश्वास प्रस्ताव रद्द हो गया। ब्रैगजिट से सम्बन्धित टैरेजा मेय की प्रस्तावित योजना को रद्द करने वाले उसकी अपनी टोरी पार्टी के 117 सांसदों ने लेबर पार्टी की ओर से पेश किये इस अविश्वास प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान किया। इसी प्रकार उत्तरी आयरलैंड की पार्टी डी.यी.पी. भी इस अविश्वास प्रस्ताव के सम्बन्ध में टैरेजा मेय के समर्थन में आ गई। इसकेलिए उनकी प्रमुख दलील थी कि देश को आमचुनावों में न धकेला जाये। जेरेमी कोरबीन की ओर से पेश किये गये अविश्वास-प्रस्ताव के पक्ष में स्काटिश नैशनल-पार्टी (एस.एन.पी.), पलाईड कईमरु तथा गरीनका पार्टी ने मतदान किया।
अपनी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव रद्द हो जाने के पश्चात टैरेजा मेय ने ‘ब्रैगजिट’ के लिए समाधान ढूंढने के लि उसकी प्रस्तावित योजना को रद्द करने वाले अपनी पार्टी के सांसदों सहित दूसरी पार्टियों के सांसदों को मिलने का क्रम शुरु कर दिया।
लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कोरबिन का कहना है कि टैरेजा मेय, सब से पहले बिना किसी समझौते के यूरोपीय यूनियन से बाहर चले जाने, अर्थात ‘नो-डील ब्रैगजिट’ की संभावना को अवश्य ही रोके, तभी ही उससे इसके सम्बंध में कोई बात की जा सकती है। उन्होंने कहा कि ‘नो-डील ब्रैगजिट’ को रोके बिना प्रधानमन्त्री का बात करना समय व्यतीत करना है तथा समझौते के बिना यूरोपीय यूनियन से बाहर चले जाने के खतरों के द्वारा डराकर सांसदों को ब्लैक-मेल करके के प्रयत्नों द्वारा अपनी रद्द हुई योजना को पास करवाने की शरारत है। उन्होंने कहा कि इस समस्या से बाहर निकलने का सबसे बढिय़ा ढंग देश में आम चुनाव करवाना है।
ब्रिटेन में, इस समय राजनैतिक-स्थिति, बहुत ही विकट तथा संकट भरपूर बन गई है। प्रधानमन्त्री टैरेजा मेय के साथ उसकी पार्टी को तो छोड़ो, उसकी अपनी कैबनिट भी पूरी तरह सहमत नहीं है। देश के मन्त्री-मण्डल से लेकर संसद तक बुरी तरह बंटी हुई है। ऊपर से, 29 मार्च 2019, युरोपीय-यूनियन से अलग होने का दिन भी सिर पर आकर खड़ा है। यदि उस दिन तक कोई समझौता नहीं होता तो ‘नो-डील ब्रैगजिट’ होने की संभावना है, अर्थात बिना किसी समझौते के देश यूरोपीय यूनियन के बाहर हो जायेगा, जिस से उसकी स्थिति, बाकी दुनियां के देशों की तरह यूरोपीय यूनियन से सम्बन्धों के मामले में हो जायेगी। उसका व्यापार, विश्व-व्यापार संस्था (डब्लयू.टी.ओ.) की शर्तों के अनुसार योरूपीय-यूनियन के देशों के साथ चलेगा। उसके अन्य यूरोपीय यूनियन के सदस्य देशों में रहने वाले नागरिकों की स्थिति भी बदल जायेगी। इस प्रकार ही अन्य यूरोपीय-यूनियन के सदस्य देशों के ब्रिटेन में रहने वाले नागरिकों की हालत होगी। इस से देश की अर्थ-व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इस स्थिति से बचने के लिए ही प्रमुख विपक्षी-पार्टी ने तो प्रधान मन्त्री के साथ बात करने के लिए ‘नो-डील ब्रैगजिट’ पर पक्की रोक लगाने की शर्त रखी है। बाकी सभी पार्टियां भी यह कह रही हैं। इस स्थिति से तो तब ही बचा जा सकता है जब ‘लिस्बन-सन्धि’ की धारा 50 के अन्र्तगत ब्रिटेन के लिए, उस के बाहर निकल जाने के समय जो कि दो वर्ष है तथा 29 मार्च, 2019 को खत्म हो रहा है, में बढ़ौतरी हो। यह बढ़ौतरी तभी ही मिल सकती है, यदि यूरोपीय यूनियन के सभी 28 देश इस के लिए सहमत होंगे। प्रधान-मन्त्री टैरेजा मेय भी अपने रद्द हो चुके प्रस्ताव में कोई विशेष तबदीली करने के लिए तैयार नहीं हैं। वह उसी प्रस्ताव को ही घुमा-फिरा कर दोबारा पास करवाना चाहती है। वह चुंगी-यूनियन में बने रहने तथा धारा 50 के अन्र्तगत समय-सीमा बढ़ाने पर विचार करने के लिए भी तैयार नहीं।
लेबर-पार्टी के नेता जेरेमी कोरबीन ने अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा कि पार्टी 21 जनवरी को प्रधान-मन्त्री की ओर से पेश की जाने वाली दूसरी ‘ब्रैगजिट’ योजना में संशोधन पेश करेगी। उस की प्राथमिकता होगी कि देश यूरोपीय के साथ चुंगी-यूनियन (कस्टम यूनियन) में बना रहे, उसके व्यापारिक सम्बन्ध निकटवर्ती एकल बाकाार पर आधारित हों तथा उसके व्यापारिक हितों की रक्षा हो। उन्होंने अपने कार्यकत्ताओं को सम्बोधन करते हुए कहा कि इस संकट का सबसे सटीक हल है देश में आम-चुनाव तथा उनकी ओर से पेश किया गया वर्तमंान अविश्वास-प्रस्ताव, जिसे आवश्यक समर्थन प्राप्त नहीं मिल सका वह अन्तिम नहीं है। उन्होंने इस मुद्दे पर दोबारा जनमत-संग्रह करवाने का विकल्प भी रखा हुआ है।
ब्रिटेन के घटक देश-स्काटलैंड में शासन कर रही पार्टी-स्काटिश नैशनल पार्टी ने तो दोबारा जनमत-संग्रह की अपनी मांग में यह भी शामिल कर लिया है कि ‘ब्रैगजिट’ तब ही किया जाये, जब देश के सभी घटक देशों में इसे जनमत-संग्रह में बहुमत मिले। यहां यह वर्णन योग्य है कि 2016 में हुए जनमत-संग्रह जो इस ‘ब्रैगजिट’ का आधार है के दौरान स्काटलैंड के लोगों ने 62′ के साथ तथा उत्तरी आयरलैंड के लोगों ने 55.8′ के बहुत बड़े बहुमत के साथ ‘ब्रैगजिट’ के विरुद्ध अपनी राय दी थी, अर्थात यूरोपीय यूनियन में देश को रखने का समर्थन किया था।
देश की कम्युनिस्ट पार्टी ने वर्तमान स्थिति को देश के लिए गंभीर राजनैतिक-संकट बताते हुए जल्दी से जल्दी आम-चुनाव करवाने तथा 29 मार्च को यूरोपीय यूनियन से बाहर जाने की मांग की है। पार्टी के महा-सचिव राबर्ट-ग्राफिथिस के अनुसार आम चुनावों के द्वारा गठित वामपंथी-पक्ष के नेतृत्व वाली लेबर सरकार ही यूरोपीय यूनियन से बात करके देश को इस संकट से निजात दिलवा सकती है। उन्होंने देश के मजदूर-वर्ग को वाम-पक्ष से सम्बन्धित लेबर पार्टी के नेता, जो इस समय पार्टी के संसदीय-नेता भी हैं, का पूर्ण स्मर्थन करने का भी आह्वान किया है। देश की एक अन्य बांये-पक्ष की पार्टी सी.पी.जी.बी. (एम.एल.) ने भी देश को हर हालात में योरूपीय-यूनियन से बाहर निकलने की बात की है।
ब्रिटेन, जिस गहरे राजनैतिक-संकट में फंसा हुआ है, उसका स्पष्ट समाधान देश में आम चुनाव ही हैं। 2017 मेें टैरेजा मेय की ओर से करवाये गये उप-चुनावों में निर्वाचित टोरी-पार्टी के संसद सदस्यों का एक बहुत बड़ा भाग, उसकी संसदीय-नेता टैरेजा मेय का ही ‘ब्रैगजिट’ सम्बन्धी अपनाये जा रहे दृष्टिकोण से सहमत नहीं है। होने वाले आम-चुनावों के द्वारा निर्वाचित सरकार, अवश्य ही इस मुद्दे पर चुनावों के दौरान, उभर कर आये बहुमत आधारित दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती होगी। समूचे राजनैतिक परिपेक्ष में एक अच्छी बात और भी यह है कि इस समय प्रमुख विपक्षी पार्टी लेबर-पार्टी की कमान वामपंथी विचारधारा के नेता जेरेमी कोरबीन के हाथों में है। आम-चुनाव होने की स्थिति मेें नई सरकार, लेबर पार्टी की बनने की संभावना है, जो देश की मेहनतकश जनता के लिए भी एक शुभ-शगुन होगा।
(22.01.2019)
हिन्दी रुपांतरण : म.ल.राही

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