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लोकतंत्र व धर्म निरपेक्षता की रक्षा के मुद्दे पर प्रभावशाली सैमीनार

लोकतंत्र व धर्म निरपेक्षता की रक्षा के मुद्दे पर प्रभावशाली सैमीनार

सांप्रदायिक-फाशीवादी शक्तियों को पराजय देने का आह्वान  
भारतीय इंकलाबी माक्र्सवादी पार्टी (आर.एम.पी.आई.) के आह्वान पर 13 फरवरी को देशभक्त यादगार के बाबा ज्वाला सिंह हाल में ‘लोकतंत्र और धर्म निरपेक्षता की रक्षा’ के विषय पर एक प्रभावशाली सैमीनार किया गया। पार्टी के महासचिव कामरेड मंगत राम पासला की अध्यक्षता में हुए इस सैमीनार में प्रसिद्ध विद्वान तथा जनवाद-पसंद बुद्धिजीवी डा. राम पुन्यानी ने मुख्य भाषण दिया।  
पूरी तरह भरे हाल में, अपने लगभग 90 मिनट के भाषण में डा. राम पुन्यानी ने भारत में लोकतंत्र के लिए बढ़े गंभीर खतरों पर विस्तार सहित रौशनी डाली। उन्होंने कहा कि आर.एस.एस. की कमांड में चल रही मोदी सरकार द्वारा सत्ता संभालने के साथ देश में सांप्रदायिक-फाशीवाद बेरोक-टोक बढ़ा है। जिसके कारण देश के संविधान में दर्ज सभी लोकतांत्रिक व्यवस्था व संस्थाओं को बहुत बेरहमी के साथ नष्ट-भ्रष्ट किया जा रहा है। यहाँ तक कि सरकार की किसी भी नीति का विरोध करना एक अपराध समझा जाने लगा है। अभिव्यक्ति की आज़ादी पर भी सांप्रदायिक भीड़ों के पहरे बिठा दिए गए हैं तथा  सरकार की आलोचना करने वाले को झटपट ही देशद्रोही करार दे दिया जाता है। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक तत्वों ने जन समर्थक, लोकतांत्रिक व वैज्ञानिक विचारधारा को समर्पित बुद्धिजीवियों के कत्ल भी किये हैं, उन पर झूठे केस भी बनाए हैं और उनको देश छोड़ जाने की धमकियां भी दी जा रही हैं। यह सभी हमले देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को तबाह करने की ओर ही निर्देशित हैं। ऐसे देशद्रोही हमलों को रोकने की जगह सरकार संघ परिवार के साथ जुड़े हुए ऐसे प्रतिक्रियावादी तत्वों की हमेशा ही पीठ ठोकती दिखाई देती है।  
 डा. पुन्यानी ने धर्म के नाम पर लोगों को बाँटने की राजनीति की बहुत विस्तार से व्याख्या की। उन्होने कहा कि बुर्जुआ राजनीति में धर्म का प्रयोग अपने लाभ के लिए किया जाता है। बाबरी मस्जिद 6 दिसंबर 1992 को कोई अचानक ही नहीं गिरा दी गई थी। इसके बीज बहुत पहले बो दिए गए थे। ऊपरी नजर से देखने पर यह हिंदु-मुस्लिम मामला है। दरअसल यह मामला समाज के बीच की ग़ैर-बराबरी, असमानता को कायम रखने का है। उन्होंने याद करवाया कि भारतीय समाज में सांप्रदायिक ज़हर 1981 से ज़ोर पकडऩे लग पड़ा था। मीनाक्षीपुरम में दलितों के धर्म परिवर्तन पर सांप्रदायिक ताकतें बहुत अक्रामक हो गई थीं। गुजरात, खासकर अहमदाबाद में दलित-विरोधी दंगे हुए थे। उस समय से ही सांप्रदायिक ताकतें समाज में सांप्रदायिक ज़हर फैलाने के लिए भडक़ाहट फैलाने की ताक में थीं।  
 डा. पुन्यानी ने याद करवाया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से 1985 में शाहबानो केस में दिए गए फ़ैसले (जिसमें पीडि़त शाहबानो के हक में अदालत ने फ़ैसला देते कहा था कि उसको गुज़ारा भत्ते का दावा करने का हक है) के साथ सांप्रदायिक राजनीति ने ज़ोर पकड़ लिया था। उस समय की राजीव गांधी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को रद्द् करने के लिए पार्लियामेंट में एक बिल पास करवा लिया। यह बिल मुस्लिम कट्टरपंथियों को बहलाने के लिए था। चुनाव सिर पर होने के कारण हिंदु कट्टरपंथियों को खुश करना भी ज़रूरी था, इसलिए उसने हिंदु सांप्रदायिक पत्ता खेलते हुये बाबरी मस्जिद के दरवाज़े खोल दिए जो 1949 से लगातार बंद पड़े थे।  
 बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद की जड़ तक जाते हुए उन्होंने बताया कि दिसंबर 1949 में स्थानीय मैजिस्ट्रेट ने राज्य सरकार को बताया कि कुछ हिंदुओं ने बाबरी मस्जिद में दाखि़ल होकर वहां राम व सीता की मूर्तियाँ रख दीं हैं। सरकार ने इस को विवादित स्थल बताकर इसको ताला लगा दिया। स्थानीय मैजिस्ट्रेट के. के. नय्यर (जो संघ समर्थक था और बाद में जनसंघ की ओर से संसद मैंबर भी बना) ने सरकार की अपील के बावजूद मूर्तियाँ नहीं हटाई। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नेहरू की अपील भी नजऱअंदाज़ कर दी गई।  
आर.एस.एस. व उसके संगठनों की ओर से समाज को धर्म के आधार पर बाँटने की चालों का झंडा फोड़ करते हुये डा. पुन्यानी ने कहा कि बहुत ही शातिराना ढंग से राजाओं की लड़ाई को हिंदु-मुस्लिम धर्म की लड़ाई में बदला जाता है। जबकि वह धर्म के लिए नहीं लड़ते थे वह संपत्ति व अपनी सल्तनत के प्रसार के लिए लड़ते थे। उन्होंने संघ के इस पत्ते की जड़ पर हमला करते कहा कि यदि अकबर सिफऱ् मुसलमानों का बादशाह होता तो उसके दरबार के 9 रत्नों में बीरबल न होता, जो कि हिंदु था। राजा टोडरमल्ल, जो एक हिंदु था, अकबर के राज में वही काम करता था जो आज मोदी के दफ़्तर में अरुण जेतली कर रहा है। इसी तरह अफजल ख़ान को मिलने जा रहे शिवाजी को अपने साथ गुप्त हथियार लेकर जाने की सलाह उनके दोस्त रुस्तमे जमाल ने दी थी जो कि एक मुसलमान था। उधर अफजल ख़ान का सचिव एक हिंदु कृष्णाजी राव था। इसी तरह हल्दी घाटी की जंग में अकबर की फ़ौज का नेतृत्व एक हिंदु राजा मान सिंह कर रहा था जबकि राणा प्रताप सिंह की फ़ौज का मुख्य सेनापति हकीम ख़ान सूद था जो एक मुसलमान था। इसी तरह दोनों फौजें में हिंदु भी थे और मुसलमान भी। उनकी लड़ाई सत्ता के लिए थी, संपत्ति के लिए थी, धर्म के लिए नहीं।  
दोनों धर्मों में आपसी सांझ, भाईचारे का हवाला देते हुये डा. पुन्यानी ने कहा कि अंग्रेज़ों के विरूद्ध हिंदु-मुस्लिम मिल कर लड़े। 1857 के ग़दर की चिंगारी मंगल पांडे ने जलाई थी और बादशाह बहादुर शाह जफर, जो एक मुस्लिम था, ने इस चिंगारी को और प्रजल्लित किया। अंग्रेज़ों की तरफ से ‘बांटो और राज करो’ की अपनाई गई नीति का जि़क्र करते उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद के बारे में एक किताब में जि़क्र करते हुये अंग्रेज़ इतिहासकार श्रीमती ए. एफ. बेवरिज़ ने बहुत ही शातिराना ढंग से साथ एक फुटनोट में यह लिख दिया कि हो सकता है यहाँ कोई मंदिर भी रहा हो। उन्होने कहा कि संघ की तरफ से यह प्रचार किया जा रहा है कि जिस जगह बाबरी मस्जिद थी, वहां पहले राम मंदिर था। जबकि अयोध्या में पचास मंदिर होंगे और हर एक का पुजारी यह दावा करता है कि भगवान राम का जन्म उसके मंदिर वाले स्थान पर हुआ था।  
 देश की आज़ादी की जंग के दौरान अंग्रेज़ों की तरफ से ‘बांटो और राज करो’ की नीति का जि़क्र करते डा. पुन्यानी ने कहा कि सत्ताधीशों ने हिंदु और मुस्लिम धनियों के बीच के मतभेदों का इस्तेमाल किया। वह इंडियन नेशनल कांग्रेस के गठन, जो आज़ादी की माँग कर रही थी, के प्रति गुस्से में थे उन्होंने सर सईद की ओर से इन माँगों के विरोध का इस्तेमाल किया गया तथा सर सईद व उसके समर्थकों को सांप्रदायिक माँगें रखने के लिए उत्साहित किया। यह फिऱकापरस्ती केवल एक पक्ष की फिऱकापरस्ती नहीं थी। एक तरफ़ जि़न्नाह की मुस्लिम लीग थी दूसरे ओर सावरकर की हिंदु महासभा। यह वही सावरकर है, जो अंग्रेज़ों से माफियां माँग कर जेल से बाहर आया था। आज़ादी के आंदोलन के दौरान एक ओर लोकशाही का समर्थक पक्ष था जिसमें भगत सिंह की नौजवान सभा, डाक्टर अंबेडकर की रिपब्लिकन पार्टी व इंडियन नेशनल कांग्रेस थी। लोकशाही के समर्थक समानता में यकीन रखते थे तथा राजशाही के समर्थक भेद भाव व अस्पृश्यता को बनाये रखने के समर्थक थे। आर.एस.एस. आज भी वही पुरातन मूल्यों पर आधारित समाज चाहता है जिस में स्त्रियों, दलितों को दूसरे दर्जे के नागरिक समझा जाता था और सामाजिक समानता की बात करना गुनाह समझा जाता था। उन्होंने कहा कि आज आर.एस.एस. भारतीय संविधान को विदेशी मूल्यों पर आधारित बताकर इस को बदलना चाहती है जबकि वह यह भी नहीं जानते कि हिंदु शब्द भी विदेशी ही है। यह सिंधु शब्द से बना है। आर.एस.एस. के दोहरे चरित्र की बात करते उन्होंने कहा कि उत्तर-पूर्व में वह बीफ की बात करते हैं क्योंकि वहां वह सत्ता पर काबिज़ होना चाहते हैं, जिसके लिए वोट चाहिये। जबकि देश के अन्य हिस्सों में वह गौ मांस खाने का विरोध करते हैं। उन्होंने याद करवाया कि स्वामी विवेकानन्द ने यह लिखा है कि वैदिक काल में गाय का मांस खाया जाता था। डा. पुन्यानी ने कहा कि धर्म आधारित राज्य कायम करने के लिए समाज में नफऱत फैला कर दंगों की राजनीति की जा रही है। उन्होंने यह बात ज़ोर दे कर कही कि दंगे होते नहीं, करवाए जाते हैं तथा यह दंगे वही करवाता है जिसे उसका लाभ होता हो।  
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस नफऱत की राजनीति का मुकाबला मानवीय अधिकारों की लड़ाई को मज़बूत करके ही किया जा सकता है। डा. पुन्यानी ने कहा कि आर.एस.एस. द्वारा देश के भीतर धर्म आधारित हिंदु राष्ट्र स्थापित करने के अपने प्रतिक्रियावादी उद्देश्य की पूर्ति के लिए अल्पसंख्यक मुस्लिम भाईचारे के विरुद्ध व्यापक रूप में नफऱत फैलाने के लिए भारत के इतिहास को बुरी तरह तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। उन्होंने बहुत ही तर्कसंगत तथ्य पेश करके संघ परिवार के ऐसे कुकर्मों को नंगा किया। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिक तत्वों का यह व्यवहार देश की एकता-अखंडता के लिए बहुत ही ख़तरनाक सिद्ध हो सकता है। क्योंकि एक बहु-नस्ली, बहु-धार्मिक और बहु-भाषाई देश को एकजुट रखने के लिए धर्म व राजनीति को अलग-अलग रखना तथा यहाँ लोकतंत्र व सैकूलेरिज्म को मज़बूत बनाना प्राथमिक आवश्यकतायें हैं। उन्होंने कहा कि आगामी संसदीय चुनावों के दौरान भी इन मुद्दों को उठाना जाना चाहिए तथा लोकतंत्र व धर्म निरपेक्षता के दुश्मनों को पराजय दी जानी चाहिए।  
 सैमीनार के अंत में आर.एम.पी.आई. के महासचिव साथी मंगत राम पासला ने अपने संक्षिप्त भाषण में  इस बात पर ज़ोर दिया कि फिऱकापरस्ती के विरुद्ध लड़ाई केवल चुनाव तक ही जारी नहीं रहनी चाहिए, इसके बाद भी यह लड़ाई निरंतर जारी रहेगी। इस घृणित विचारधारा के विरुद्ध धर्म निरपेक्षता व लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई खेतों खलिहानों तक लेकर जानी होगी। इस कार्य के लिए जनसाधारण, विशेष रूप में कामगार वर्ग को चेतन करना होगा क्योंकि चेतना की कमी के कारण ही हम उन लोगों के साथ चल पड़ते हैं, जो समाज में नफऱत फैलाने और लोगों को बाँटने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते। उन्होंने कहा कि मोदी के सत्ता में आने के बाद अल्पसंख्यकों, दलितों, औरतें व प्रगतिशील लोगों पर दमन बढ़ा है। उन्होंने कहा कि ज़हरीली सांप्रदायिक राजनीति का रास्ता रोकने के लिए मोदी को परास्त करना बहुत ज़रूरी है। यह तब ही संभव है यदि धर्म निरपेक्ष, लोकतांत्रिक व लाल झंडे वाले पक्ष मज़बूत हों। उन्होंने कहा कि वामपंथी पक्षों को सभी मतभेदों के बावजूद अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक न्यूनतम साझे प्रोग्राम के आधार पर एक मंच पर इकठ्ठा होना चाहिए और इस मंच को मज़बूत करने के बारे में कोई मतभेद नहीं होना चाहिए।  
कामरेड पासला ने कहा कि लोकतंत्र और धर्म निरपेक्षता के यह जुड़वे मुद्दे चुनावों तक ही सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि देश के उजले भविष्य के लिए इन दोनों बहुमूल्य राजनैतिक सिद्धांतों के प्रति पूरी तरह जागरूक होने की आवश्यकता है।  
 अंत में पार्टी के प्रांतीय अध्यक्ष कामरेड रत्न सिंह रंधावा ने डा. राम पुन्यानी व सैमीनार में शामिल हुए सभी आदरणीय सज्जनों का धन्यवाद किया।

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