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मोदी-2.0 सरकार के मेहनतकशों पर व्यापक हमले को परास्त करो!

मोदी-2.0 सरकार के मेहनतकशों पर व्यापक हमले को परास्त करो!

– रवि कंवर

भारी बहुमत से सत्ता में आई नरिंदर मोदी सरकार, जिसे मोदी 2.0 सरकार के रूप में भी जाना जाता है, ने सत्ता संभालते ही देश के मेहनतकश लोगों पर अपने हमले और तीव्र कर दिये हैं। पिछली मोदी सरकार ने देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों को देश के प्राकृतिक, मानवीय व आर्थिक संसाधन लूटने की छूट दी थी परंतु संसद में राज्य सभा पूर्ण बहुमत न होने के कारण वह अपनी इच्छानुसार छूटें देने में असमर्थ रही थी। परंतु मोदी 2.0 सरकार के पास लोक सभा में तो बहुमत है ही, साथ ही वह राज्य सभा में भी देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों से मिले खुले धन का उपयोग करके दल-बदलियां व अन्य अनैतिक हथकंडों का प्रयोग करके अपना बहुमत कायम करने में दिन-रात जुटी है ताकि वह बेरोक-टोक व बेझिझक होकर देशी-विदेशी कारपोरेटों की सेवा करते हुये देश के हर तरह के संसाधनों की लूट करने की पूर्ण छूट उन्हें प्रदान कर सके।
सरकार संभालते ही मोदी साहिब ने सबसे पहले घोषणा की थी कि सरकार के सभी मंत्री अपने-अपने मंत्रालयों के लिये पहले 100 दिनों के लक्ष्य तय करें। इन तय किये गये लक्ष्यों का विश्लेषण स्पष्ट दर्शाता है कि यह लक्ष्य देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों के लिये देश के समूचे प्राकृ तिक, मानवीय, आर्थिक व अन्य हर तरह के संसाधनों की लूट के द्वारा तो खोलते ही हैं तथा साथ ही देश के मेहनतकश लोगों के श्रम को भी घिनौने रूप में लूटने का कारपोरेट घरानों को आमत्रंण देते हैं।
मोदी 2.0 सरकार के सबसे अधिक प्राथमिकता वाले एजंडे, जो उसने तय किये हैं, वे हैं श्रम सुधार, सार्वजनिक क्षेत्र के संसाधनों का निजीकरण तथा तीसरा है भूमि अधिग्रहण संबंधी कानून। यह स्पष्ट दर्शाता है कि इस सरकार का मुख्य प्राथमिक एजंडा देश के मेहनतकश लोगों-किसानों, मजदूरों के अधिकारों पर हमला है। अपने पहले बजट में भी इस सरकार ने अपने इस एजंडे के प्रति प्रतिबद्धता प्रकट की है तथा साथ ही कारपोरेट क्षेत्र को छूटें दी हैं। मोटे रूप में यदि देखा जाये तो एक ही मद, इस सरकार द्वारा 400 करोड़ तक की पूंजी वाले कारपोरेट संस्थानों पर कारपोरेट टैक्स की दर 30 प्रतिशत से हटाकर 25 प्रतिशत कर देने से लगभग 99.3 प्रतिशत कारपोरेट संस्थानों के लाभ पहुंचेगा। यहां यह भी वर्णनीय है कि मोदी की पहली सरकार अर्थात मोदी-1 ने अपनी कार्यकाल के दौरान कारपोरेट घरानों को 4.32 लाख करोड़ रूपये की टैक्स छूटे दी थीं तथा केवल 2018-19 में ही 1 लाख 8 हजार 785 करोड़ रूपये की छूटें दीं गई, जो कि उस बजट में मुख्य जन-कल्याणकारी क्षेत्रों के लिये रक्खी गई बजट राशि से अधिक थीं।  
        श्रम सुधार
अपनी पहली सरकार के कार्यकाल के दौरान 2015 में सरकार ने श्रम सुधारों के नाम पर 44 श्रम कानूनों को समाप्त करके 4 श्रम संंहितायें बनाने का निर्णय लिया था। देश के मजदूर वर्ग द्वारा स्वतंत्रता से पहले व उपरांत दशकों लड़े गये अकथनीय त्याग पूर्ण संघर्षों द्वारा यह श्रम कानून अस्तित्व में आये थे। अपनी पहली सरकार के समय ही उसने यह श्रम संहितायें पारित करवाने का प्रयत्न किया था, परंतु राज्यसभा में बहुमत ना होने के कारण वह अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर सकी थी।
देश में लागू मौजूदा 44 श्रम कानूनों को समाप्त करके 4 श्रम संहितायें तैयार कर ली गई हैं। यह हैं, वेतन के बारे में श्रम संहिता(रुड्डड्ढशह्वह्म् ष्टशस्रद्ग शठ्ठ ङ्खड्डद्दद्गह्य), व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य व कार्य स्थितियों के बारे में श्रम संहिता (रुड्डड्ढशह्वह्म् ष्टशस्रद्ग शठ्ठ ह्रष्ष्ह्वश्चड्डह्लद्बशठ्ठड्डद्य ह्यद्गष्ह्वह्म्द्बह्ल4, द्धद्गड्डद्यह्लद्ध ड्डठ्ठस्र 2शह्म्द्मद्बठ्ठद्द ष्टशठ्ठस्रद्बह्लद्बशठ्ठह्य), औद्योगिक संबंधों के बारे में श्रम संहिता (रुड्डड्ढशह्वह्म् ष्टशस्रद्ग शठ्ठ ढ्ढठ्ठस्रह्वह्यह्लह्म्द्बड्डद्य क्रद्गद्यड्डह्लद्बशठ्ठह्य), सुरक्षा व कल्याण के बारे में श्रम संहिता (रुड्डड्ढशह्वह्म् ष्टशस्रद्ग शठ्ठ ह्यद्गष्ह्वह्म्द्बह्ल4 ड्डठ्ठस्र 2द्गद्यद्घड्डह्म्द्ग) इनमें से वेतन के बारे में श्रम संहिता तथा व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य व कार्य स्थितियों के बारे में श्रम संहिता संसद द्वारा पारित किये जा चुके हैं। यह श्रम संहितायें ‘व्यापार को सुलभÓ बनाने (श्वड्डह्यद्ग शद्घ स्रशद्बठ्ठद्द क्चह्वह्यद्बठ्ठद्गह्यह्य) के नाम पर बनाई गई हैं।
वास्तव में इन श्रम संहिताओं को बनाने का उद्देश्य देशी व विदेशी कारपोरेट घरानों को श्रम कानूनों के मामले में पूर्ण छूट देना है ताकि वह बिना किसी भय के मजदूर को जब मर्जी काम पर रख सकें तथा जब मर्जी उसे निकाल सकें (॥द्बह्म्द्ग ड्डठ्ठस्र स्नद्बह्म्द्ग) तथा साथ ही उन्हें कम से कम वेतन देकर अपने मुनाफों को बढ़ा सकें। चार श्रम कानूनों, वेतन के भुगतान के बारे में कानून-1936, न्यूनतम वेतन के बारे में कानून-1948, बोनस के भुगतान के बारे में कानून-1965 तथा समान वेतन के बारे में कानून-1976 का स्थान वेतन संबंधी श्रम संहिता ने लिया है। मोटे रूप में ही देखें तो न्यूनतम वेतन के मामले में ही यह कानून मजदूरों के हितों को भारी क्षति पहुंचाता है। पिछले कानून में श्रमिकों के कार्य के आधार पर उन्हें 1700 श्रेणियों में उनमें कार्य के स्वभाव, कठिनता आदि को ध्यान में रख कर बांटा गया था, जो नये कानून में समाप्त कर दिया गया है। न्यूनतम वेतन तय करने के लिये पहले त्रै-पक्षिय समिति थी, जिसमें श्रमिकों के प्रतिनिधी, मालिकों के प्रतिनिधी व सरकार के प्रतिनिधी होते थे, जो कि न्यूनतम वेतन तय करते थे तथा हर 5 वर्ष के बाद इसे नवीकृ त करना आवश्यक था। अब इस संहिता में न्यूनतम वेतन तय करने की प्रक्रिया तथा समय सीमा के बारे में कोई व्यवस्था नहीं है। पहले राज्य सरकारें यह न्यूनतम वेतन भिन्न-भिन्न श्रेणियों के लिये तय करती थीं अब केंद्रीय सरकार एक ‘फ्लोर मिनीमम वेजÓ अर्थात बुनियादी न्यूनतम वेतन तय करेगी। राज्य सरकारें उसके बराबर या उससे अधिक न्यूनतम वेतन तय कर सकती हैं।
अब इस विषय में केंद्रीय सरकार के घोर मजदूर विरोधी व्यवहार के भी दर्शन कर लें। 15 जुलाई को मोदी सरकार के श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने राष्ट्रीय स्तर पर 178 रूपये प्रति दिन (4,268 रूपये प्रति महीना) फ्लोर न्यूनतम वेतन की घोषणा की है। यहां यह भी वर्णनीय है कि जून 2017 में यह 176 रूपये थी। मोदी सरकार के अनुसार एक साल से भी अधिक के समय के उपरांत भी देश के मजदूर मात्र 2 रूपये बढ़ौतरी के हकदार हैं। पिछली मोदी सरकार ने जनवरी 2018 में श्री अनूप सत्पथी के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर पर बुनियादी (फ्लोर) न्यूनतम वेतन निर्धारित करने के लिये एक कमेटी का गठन किया था, जिसने जनवरी 2019 में सरकार को अपनी सिफारिशें सौंपी थीं जिनके अनुसार उसने फ्लोर न्यूनतम वेतन भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के लिये 372 रूपये प्रति दिन (9750 रूपये महीना) से 447 रूपये प्रति दिन (11622 रूपये महीना) निधार्रित किया था। यहां यह भी नोट करने योग्य है कि इस कमेटी ने यह वेतन निर्घारित करते समय 15वें श्रम सम्मेलन की सिफारिश, जिसका 46वें श्रम सम्मेलन, जिसकी अध्यक्षता नरेंद्र मोदी ने की थी, द्वारा स्वीकृ त भोजन के 2700 कैलरी के स्तर को घटाकर 2400 कैलरी कर दिया था। अपनी सरकार द्वारा बनाई हुयी कमेटी की सिफारिशों से भी आधा न्यूनतम वेतन मोदी 2.0 सरकार ने देश के मजदूरों के लिये निर्धारित किया है। यह है, इस सरकार द्वारा कारपोरेटों की चाकरी व मजदूरों के अधिकारों पर हमले की घिनौनी उदाहरण। यहां यह भी वर्णनीय है कि 2016 में 7वें केंद्रीय वेतन आयोग ने न्यूनतम वेतन उस समय 18000 रूपये तय किया था। मोदी 2.0 सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन उपरोक्त वेतन का मात्र चौथे भाग के बराबर ही बनता है। वेतन के बारे में श्रम संहिता में बोनस देने की भी व्यवस्था को काफी कमजोर कर दिया गया है। इस तरह से इस संहिता द्वारा मेहनतकशों द्वारा दशकों के अकथनीय संघर्षों द्वारा प्राप्त किये गये अधिकार एक झटके में छीन लिये गये हैं।
सरकार द्वारा बनायी गयी व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य व कार्य स्थितियों संबंधी श्रम संहिता (रुड्डड्ढशह्वह्म् ष्शस्रद्ग शठ्ठ ह्रष्ष्ह्वश्चड्डह्लद्बशठ्ठड्डद्य ह्यद्गष्ह्वह्वह्म्द्बह्ल4, द्धद्गड्डद्यह्लद्ध ड्डठ्ठस्र 2शह्म्द्मद्बठ्ठद्द ष्शठ्ठस्रद्बह्लद्बशठ्ठह्य), 13 श्रम कानूनों-फैक्ट्री एक्ट 1948, माइन एक्ट-1952, डोक वर्कर्स (सेफटी, हैल्थ, वैलफेयर) एक्ट-1986, दी बिल्डिंग एंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स (रेगूलेशन आफ इंप्लाइमैंट एंड सर्विस कंडीशंस) एक्ट-1996, प्लांटेशन लेबर एक्ट 1951, कंट्रेक्ट लेबर  (रैगूलेशन एंड अबोलीशन) एक्ट-1970, ईंटरस्टेट माईग्रैंट वर्कमैन एक्ट-1955, दी वर्किंग जर्नलिस्ट (फिक्सेशन आफ वेजिज) एक्ट-1958, दी मोटर ट्रांस्पोर्ट वर्कर्स एक्ट 1961, सेल्ज प्रमोशन इंप्लाईज एक्ट-1976, बीड़ी-सिगार वर्कर्स एक्ट 1966 तथा दी सिने वर्कर्स एंड सिनेमा थियेटर वर्कर्स एक्ट 1981 की जगह लेगा। इतने भिन्न भिन्न स्वभावों वाले व विभिन्नता भरपूर व्यवसायों व श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा एक श्रम संहिता किस तरह करेगी? सरकार की घोषणा के अनुसार यह श्रम संहिता 10 से अधिक श्रमिकों वाले संस्थानों पर लागू होगी। सिर्फ खानों व बंदरगाहों में यदि एक भी श्रमिक कार्यरत होगा, तो यह श्रम संहिता वहां भी लागू होगी। 2013-14 की आर्थिक जनगणना के अनुसार शहरों में 10 से कम श्रमिकों वाले संस्थानों की संख्या कुल का 95 प्रतिशत है। इससे बड़ी संख्या में श्रमिक, अधिकार जो पहले वे प्राप्त कर रहे थे, से वंचित हो जायेंगे। इसके साथ ही निर्माण श्रमिक, बीड़ी श्रमिक तथा अन्य श्रमिक जो कि व्यवसाय विशेष से संबंधित कानूनों के अनुसार लाभ, पैंशनों, बच्चों को पढ़ाई आदि के लिये मिलते वजीफे आदि और बहुत सी सुविधाओं से वंचित हो जायेंगे। सुरक्षा व कल्याण के बारे में श्रम संहिता (रुड्डड्ढशह्वह्म् ष्शस्रद्ग शठ्ठ ह्यद्गष्ह्वह्वह्म्द्बह्ल4 ड्डठ्ठस्र 2द्गद्यद्घड्डह्म्द्ग) के लागू हो जाने पर प्राविडैंट फंड कानून व कर्मचारी राज्य बीमा कानून (श्वस्ढ्ढ)के भी समाप्त हो जाने तथा यह सुविधायें भी धूल में मिल जाने की संभावना है।
इन श्रम संहिताओं के लागू होने के बाद पक्की नौकरी तो सपने की बात हो जायेगी। बल्कि ठेका प्रथा से भी अधिक घातक, श्रमिकों के लिये ‘तयशुदा समय की नौकरीÓ (स्नद्ब3द्गस्र ह्लद्गह्म्द्व द्गद्वश्चद्यश4द्वद्गठ्ठह्ल)की व्यवस्था की जा रही है। जिसमें श्रमिक पूरी तरह कच्चा होगा तथा उसे जब मर्जी नौकरी से निकाला जा सकेगा। पहले किसी भी 100 या उससे अधिक श्रमिकों वाले संस्थान को बंद करने या उसमें छंटनी करने के लिए सरकार की मंजूरी लेनी पड़ती थी अब इस संख्या को बढ़ाकर 300 कर दिया गया है। इस तरह 300 श्रमिकों से कम वाले संस्थान को बंद करने या छंटनी करने के लिये किसी भी तरह की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी। इसके घेरे में देश के 90 प्रतिशत से भी अधिक संस्थान आ जायेंगे। अंप्रैटिसशिप कानून में तो सरकार ने संशोधन कर ही दिया है। जिसके अंतर्गत सरकार का लक्ष्य अप्रैंटिसों की संख्या 2 लाख से बढ़ाकर 24 लाख करने की है। उन्हें न्यूनतम वेतन का केवल 75 प्रतिशत ही देना होगा। जहां इन श्रम संहिताओं द्वारा श्रमिकों की सामूहिक सौदेबाजी के आधिकार को समाप्त किया जा रहा है। वहीं कार्य में लापरवाही के नाम पर मालिकों को श्रमिकों पर जुर्माने करने की छूट होगी। श्रमिकों व मालिकों को श्रम कानूनों की उल्लंघना के मामले में समान रखा गया है। यूनियन के पंजीकरण की व्यवस्था को भी बहुत ही पेचीदा, यहाँ तक कि लगभग असंभव ही बना दिया गया है। दशकों के संघर्षों के उपरांत श्रमिकों द्वारा प्राप्त किया हड़ताल का अधिकार छीन लिया गया है। श्रम कानूनों संबंधी निरीक्षण पहले ही समूची व्यवस्था में फैले व्यापक भ्रष्टाचार के कारण प्रभावशाली नहीं था, फिर भी श्रमिकों द्वारा अपने सांगठनिक दबाव द्वारा थोड़े बहुत श्रम कानून इस रास्ते से भी लागू करवा लिये जाते थे, परंतु अब नई श्रम-संहिताओं में इस व्यवस्था को धूल में मिला दिया गया है, श्रम निरीक्षक अब सुविधा प्रदाता होगें जो मालिकों व श्रमिकों को श्रम  कानूनों को लागू करने के संबंध में परामर्श भर देंगे।
यह भी वर्णनीय है कि देश स्तर पर हुये भिन्न भिन्न अध्ययनों के अनुसार देश के 90 प्रतिशत श्रमिकों पर श्रम कानून लागू नहीं हो रहे हैं, ना उन्हें न्यूनतम वेतन मिलता है ना ही उनकी हाजरी लगती है। पिछले कई दशकों से देश की लगभग समस्त ट्रेड यूनियनें मांग कर रही थी कि श्रम कानूनों में मजदूर-पक्षीय संशोधन किये जायें तथा उन्हें लागू करने वाली मशीनरी चुस्त दरूस्त की जाये। परंतु मोदी सरकार ने देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों की चाकरी करते हुये पहले ही नग्णय रूप से लागू श्रम कानूनों को लगभग समाप्त ही कर देने के लिये कमर कस ली है। यहां यह भी वर्णनीय है कि यह सब अधिक से अधिक पूंजी निवेश आकर्षित करने के नाम पर किया जा रहा है। राजस्थान की पिछली बी.जे.पी. सरकार ने लगभग यह सब कुछ ही लागू किया था। परंतु, वह पूंजी निवेश को लाने में असफल रही। इस बात की पृष्टि तत्कालीन श्रम सचिव ने कारपोरेटों की संस्था-सी.आई.आई. द्वारा करवाये गये एक सैमीनार में की थी।
सार्वजनिक संस्थानों का बेलगाम निजीकरण
मोदी-2.0 सरकार का देश के मेहनतकश वर्ग पर दूसरा बड़ा हमला है, सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का निजीकरण का। जहां इससे लाखों श्रमिकों को अपने रोजगार से हाथ धोने पड़ेंगे, वहीं देश के लोगों की खून-पसीने की कमाई में से इक_े किये गये टैक्सों द्वारा निर्मित किये अरबों रूपये की संपत्तियों को देशी-विदेशी कारपोरेटों को कौडिय़ों के भाव बेच दिया जायेगा। 100 दिनों के लिये निर्धारित लक्ष्य के अनुसार इस सरकार ने रेलवे, ऊर्जा, एयर इंडिया, तेल, कोयला, स्टील व दूरसंचार क्षेत्रों के 42 संस्थानों को तुरंत बेचने या बंद कर देने का निर्णय किया है। इस वित्त वर्ष में 10.5 लाख करोड़ रूपये इन संस्थानों के हिस्से बेच कर या समूचे बेच कर प्राप्त करने का लक्ष्य है। एयर इंडिया के तो 100 प्रतिशत हिस्से बेचने पर सरकार बजिद है। इनमें कई संस्थान ऐसे भी हैं, जो मुनाफा कमा रहे हैं। जैसे कि भारत हैवी अर्थ मूवर्स लिमिटेड आदि। जियो व एयरटैल को लाभ पहुंचाने की खातिर बी.एस.एन.एल. को बेचने की तैयारी है तथा उसके 54000 श्रमिकों के सिर पर छंटनी की तलवार लटक रही है। कई बैंकों व बीमा संस्थाओं का आपस में इसलिये विलय किया जा रहा है ताकि वे लाभदायक बन सकें तथा उन्हें बेचने में आसानी रहे। ़
रेलवे का निजीकरण
मोदी की पिछली सरकार के समय विवेक देवराय कमेटी व नीति आयोग ने 10 वर्षों के भीतर रेलवे के गैर महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों-रेलवे अस्पतालों, स्कूलों, उत्पादन यूनिटों, रेलवे पुलिस आदि के निजीकरण की योजना बनाई थी। परंतु मोदी 2.0 के भारी बहुमत से सत्तासीन होते ही वह रेलवे जैसे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी संस्थान को, अपने कारपोरेट आकाओं को लुटाने के लिये बेताब है। अब सरकार ने 100 दिनों के भीतर लाभप्रद यात्री गाडि़य़ों-शताब्दी, राजधानी व अन्य यात्री ट्रेनों को निजी क्षेत्र को बेचने का लक्ष्य ही निर्धारित नहीं किया बल्कि रेलवे की सात उत्पादन इकाईयों को निगमों में परिवर्तित करके निजीकरण की ओर बढ़ाने का लक्ष्य प्राप्त करने हेतु कार्यवाही भी शुरू कर दी है।  रेल यात्री भाड़े को भी दुगुना करने का लक्ष्य निर्धारित कर लिया गया है। इसलिये सरकार द्वारा रेल यात्री भाड़े में दी जाती तथाकथित सबसिडी को छोडऩे के बारे में भी अभियान चलाया जा रहा है।
भारतीय रेल, एशिया का सबसे बड़ा व दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेल नैटवर्क है। जोकि इस समय 13 लाख लोगों को रोजगार प्रदान कर रहा है। इसके निजीकरण से जहां लोगों से एकत्रित टैक्सों से निर्मित अरबों-खरबों की संपत्ति देशी-विदेशी कारपोरेटों के हाथों में चली जायेगी, वहीं दुनिया के इस सबसे बड़े रोजगार प्रदाता क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बहुत घट जायेंगे। इसलिये इसका निजीकरण सिर्फ वहां कार्यरत कर्मचारियों के अधिकारों पर ही हमला नहीं बल्कि यह देश की 125 करोड़ जनता से भी धोखा-धड़ी है।
इस तरह मोदी सरकार ने मेहनतकश लोगों पर हमला, गद्दी संभालते ही आरंभ कर दिया है। जो कि उसकी सांप्रदायिक, फाशीवादी नीतियों की मार से पहले ही त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। देश के, समूचे मेहनतकश लोगों को एकजुट करके ही इस हमले को परास्त किया जा सकता है। इस लड़ाई का एक महत्त्वपूर्ण भाग सरकार की ‘गांव, गरीब और किसानÓ को समर्पित बजट जैसी चिकनी-चुपड़ी बातें व उसके गोयब्लीय प्रचार का लोगों के समक्ष पर्दाचाक करना भी है। आर.एस.एस. समर्थक ट्रेड यूनियन, भारतीय मजदूर संघ को छोड़कर बाकी सभी ट्रेड यूनियनें इन जन विरोधी कदमों के विरुद्ध संघर्ष के लिये दृढ़ हैं तथा अवश्य ही निकट भविष्य में इस हमले का मुकाबला करने हेतु एक विशाल संघर्ष उठेगा।

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