निखिल कौशिक
क्या आप यह सोचते हैं कि मोदी सरकार के नीति निर्माता नोटबंदी से भी ज्यादा विनाशकारी विचार लेकर नहीं आ सकते हैं? अगर आप ऐसा सोचते हैं, तो आप गलत हैं।
धारा-7 दरअसल है क्या
भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 7(1) में कहा गया है कि समय समय पर केंद्र सरकार रिजर्व बैंक के गवर्नर के साथ सलाह-मशविरा करके सार्वजनिक हित में इस बैंक को ऐसे निर्देश दे सकती है।
धारा 7(2) में आगे कहा गया है: ऐसे किसी निर्देश के तहत, बैंक के मामलों और कारोबार के अधीक्षण व निर्देशन का दायित्व केंद्रीय निदेशक मंडल को सौंपा जा सकता है जो इस बैंक द्वारा इस्तेमाल में लाई जाने वाली शक्तियों का प्रयोग करेगा और बैंक द्वारा किये जाने वाले तमाम कार्यों का संपादन करेगा।
इसे केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता पर आघात के रूप में देखा जा रहा है, और स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है।
अगर केंद्र सरकार रिजर्व बैंक पर लगभग 3.6 लाख करोड़ रुपया-जो पिछले कई दशकों में संचित रिजर्व कोष के 40 प्रतिशत के बराबर है – देने के लिए दबाव डालती है, तो यह नोटबंदी से भी ज्यादा विनाशकारी कदम होगा।
केंद्र सरकार रिजर्व बैंक के इस आरक्षित कोष को कैसे हासिल कर सकती है? इसके दो उपाय हैं –
1. परिसंपत्ति मौद्रीकरण
2. मुद्रित नगदी
इन उपायों के जमीनी प्रभावों को समझा जाए।
बैंक का प्रतिधारित (रिटेंड) आरक्षित कोष लगभग 3 लाख करोड़ रुपया है।
पुनर्मूल्यांकित स्वर्ण विदेशी मुद्रा कोष (अनरियलाइज्ड, अर्थात अ-प्राप्त) लगभग 7 लाख करोड़ रुपया है।
‘अनरियलाइज्ड’ कोष क्या है?
यह गैर-नगदी लाभ है, साधारण शब्दों मेें इसे इस प्रकार समझा जा सकता है –
अगर रिजर्व बैंक ने 2004 में एक डॉलर खरीदा तो इसके लिए उसने 32 रुपये दिए होंगे, लेकिन आज अमेरिकी डॉलर का मूल्य लगभग 73 रुपये है। इसका मतलब यह हुआ कि रिजर्व बैंक ने 41 रुपये का अ-प्राप्त लाभ कमाया। इसी प्रकार, अगर रिजर्व बैंक ने किसी समय 10 ग्राम सोना 24890 रुपये में खरीदा और आज उसकी कीमत लगभग 32270 रुपये है, तो उसका मतलब यह हुआ कि बैंक ने 7380 रुपये का अप्राप्त लाभ कमाया, और भारत का कानून ऐसे अप्राप्त लाभों से नगदी लाभांश के भुगतान को प्रतिबंधित करता है।
परिसंपत्ति मौद्रीकरण के तहत क्या उपाय है?
1. बैंक के स्वर्ण भंडार को बेचना : सैद्धांतिक रूप से यह संभव है, लेकिन यह आर्थिक रूप से विनाशकारी होगा; क्योंकि इससे विदेशी मुद्रा पर निर्भरता काफी बढ़ जाएगी और आयातोन्मुखी भारत के लिए आत्मघाती उपाय होगा।
2. बैंक द्वारा धारित सरकारी क्षेत्र के बौंडों को बेचना : यह ज्यादा संभव और आसान उपाय है, लेकिन इससे अर्थतंत्र की रीढ़ टूट जाएगी। सरकारी क्षेत्र के बौंडों की आपूर्ति में अतिशय वृद्धि होती जाएगी, और नगदी बाहर निकलती जाएगी, इस नगदी वृद्धि पर रोक लगाने के लिए आरबीआई को सूद की दरों को बढ़ाना होगा और आम जनता पर अतिरिक्त सूद अदा करने का बोझा लद जाएगा। सूद की दर बढऩे से आम लोगों द्वारा कर्ज लेने की गति धीमी हो जाएगी-और, यह भी आत्मघाती ही होगी।
3. विदेशी मुद्रा भंडार की बिक्री: इससे डॉलर के मामले में भारत कंगाली की ओर चला जाएगा और रुपया का अति-मुल्यन होगा। यह सबसे खतरनाक कदम है और इससे अर्थतंत्र का ऐसा नुकसान होगा, जिसकी भरपाई संभव नहीं है।
4. ‘नए नोटों की छपाई’ का रास्ता : इसके लिए सरकार को 3.6 करोड़ रुपये का सरकारी क्षेत्र का बौंड रद्द करना होगा, और इस नुकसान को आरक्षित भंडारों के खाते में डालना होगा। इसके बाद इसे सरकार से पुुन: 3.6 लाख करोड़ रुपये के सरकारी बौंड खरीदने होंगे और नगदी नोट छाप कर इसका भुगतान करना होगा। सरकारी कर्ज अपरिवर्तित रहेगा, आरबीआई का भंडार घटेगा, और इस नई मुद्रित नगदी को सरकार अपने नियंत्रण में ले लेगी। सीधी बात यह है कि आपने नई नगदी छाप ली।
केंद्र सरकार को आरबीआई 3.6 लाख करोड़ रुपये का विशेष लाभांश अदा करे, इसका एकमात्र व्यावहारिक रास्ता यह है कि नगदी नोट छापा जाए। यह भी एक दूसरा आत्मघाती कदम होगा और भारतीय कंपनी ऐक्ट का कानून इसकी इजाजत नहीं देता है।