नोटबंदी और जीएसटी से बुरी तरह प्रभावित होने वाले छोटे-मंझोले उद्यमों को मोदी ने ‘दिवाली तोहफा’ के बतौर एक वेबसाइट के जरिये 59 मिनट के अंदर 1 करोड़ रुपये तक का ऋण मुहैया कराने की घोषणा की है।
इस पर एक करीबी नजर डालने से यह स्पष्ट होता है कि यह योजना इन उद्यमों के ऋण आवेदनों के मार्फत उन्हें ठगने और उनकी जेब से पैसे निकाल कर मोदी के एक करीबी क्रोनी के स्वामित्व वाली निजी कंपनी की झोली में डालने की चाल है।
यह घोटाला कैसे काम करता है? 59-मिनट ऋण योजना के लिए वह वेबसाइट सरकार द्वारा नहीं, बल्कि ‘कैपिटा वल्र्ड’ नामक एक गुजरात-स्थित कंपनी के द्वारा चलाई जाती है। इस वेबसाइट पर आवेदन करने के लिए हर ऋण आवेदक 1180 रुपये का आवेदन शुल्क (1000 रुपया सेवा शुल्क और इस पर 18 प्रतिशत का जीएसटी) देता है, और 59 मिनट के अंदर उसे ‘सिद्धांतत:’ स्वीकृति मिल जाती है, यह याद रखिये कि ‘यह सिद्धांतत: स्वीकृति’ अपने-आप में ऋण नहीं है, यह कागज का एक फालतू टुकड़ा है। बैंक द्वारा ऋण की स्वीकृति के लिए आवेदक को एक प्रमाणक पेश करना होगा-और, अगर किसी के पास ऐसा कोई प्रमाणक है, तो उसे बैंक से सीधे ही ऋण मिल जाएगा! इसीलिए, यह वल्र्ड कैपिटा तो एक निजी बिचौलिया है जिसे मोदी ने इस प्रक्रिया में घुसा दिया है। ऋण की स्वीकृति के लिए बैंक हमेशा की तरह अपना सेवा शुल्क तो लेगा ही, इसके इलावा, ऋण की वास्तविक स्वीकृति में 59 मिनट से कहीं ज्यादा समय तो लग
ही जाएगा।
यह बिचौलिया मोदी का क्रोनी है
यह ‘आवेदन शुल्क’ सीधे इस बिचौलिया ‘कैपिटा वल्र्ड’ की जेब में चला जाता है, चाहे अंतत: वह ऋण वास्तव में स्वीकृत हो या न हो, इस प्रकार अगर दस लाख आवेदकों ने आवेदन किया तो कैपिटा वल्र्ड को 100 करोड़ रुपये मिल जाएंगे।
अगर ऋण स्वीकृत होता है, तो कैपिटा वल्र्ड को उस ऋण का 0.35 प्रतिशत हासिल हो जाएगा। मोदी ने जिस दिन से यह घोषणा की है, वेबसाइट के एक सांख्यिकी काउंटर ने दावा किया है कि 1.69 लाख आवेदन दर्ज हुए है और 23582 करोड़ रुपये का कुल ऋण स्वीकृत हुआ है (इस काउंटर को इसके बाद चुपचाप हटा दिया गया है)-इसका मतलब यह हुआ कि ‘कैपिटा वल्र्ड’ को इस राशि का 0.35 प्रतिशत, यानी 82.53 करोड़ रुपया, बैठे-बिठाये मिल गया।
यह ‘कैपिटा-वल्र्ड’ कौन है या क्या है, जिसे सार्वजनिक क्षेत्र की ‘सिडबी’ (भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक) के बजाय मोदी सरकार ने इतने बड़े तोहफे के लिए चुन लिया? ‘कैपिटा वल्र्ड’ 30 मार्च 2015 को दर्ज किया गया और उसके बाद से अबतक इसने कोई कामकाज नहीं किया और इसे केवल 15000 रुपये की आमदनी हुई है। इस कंपनी के मालिकों में गुजरात के व्यवसायी लोग शामिल हैं-इनमें एक श्रीमान अखिल हंद हैं जो 2014 के चुनाव में मोदी के अभियान प्रबंधक थे! निदेशक मंडल के दूसरे सदस्य विनोद मोढ़ा हैं जो निरमा और मुद्रा (अनिल अंबानी जिसके मालिक हुआ करते थे) समेत कई कॉरपोरेटों के रणनीतिक सलाहकार हैं।
स्क्रॉल ने गौर किया है कि इस वेबसाइट को ढेर सारे आंकड़ों तक पहुंच हासिल हो जाती है। ‘‘ऋण हेतु आवेदन करने के लिए कंपनियों को महत्वपूर्ण सुचनाएं भी पेश करनी होंगी जिसमें न केवल बैंक स्टेटमैंट और आय-कर व जीएसटी रिटर्न शामिल होंगे, बल्कि इन दोनों वेबसाइटों के लिए लॉग-इन आईडी और पासवर्ड भी मुहैया कराने होंगे। आज के कलन गणित आधारित ऋण प्रक्रिया के जमाने में ऐसी अतिरिक्त सूचनाएं ‘कैपिटा वल्र्ड’ को अपने प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले बेहतर स्थिति में पहुंचा
देती हैं।’’
टेंडर मानकों का उल्लंघन
‘कैपिटा वल्र्ड’ को यह वेबसाइट चलाने के लिए चुन लिया गया, जबकि यह एक तथ्य है कि यह कंपनी टेंडर में निर्धारित मानकों को पूरा नहीं करती है। इस टेंडर में निर्धारित है कि वेबसाइट चलाने की अर्हता हासिल करने के लिए किसी कंपनी को इससे पहले के तीन वर्षों में प्रबंधन कंसल्टेशन से कम-से-कम 50 करोड़ रुपये का शुल्क अर्जित करना होगा; और उसे भारत में 1 अप्रैल 2012 से अस्तित्व में रहना चाहिए, कैपिटा वल्र्ड 2015 में स्थापित हुई है और 2016 तक उसे 38,888 रुपये का घाटा हुआ और 2017 में उसे 15,000 रुपये की आमदनी हुई थी।
जिस तरह राफेल सौदे में सार्वजनिक क्षेत्र में ‘एच.ए.एल.’ के मुकाबले मोदी के क्रोनी अनिल अंबानी की अनुभवहीन कंपनी को चुन लिया गया, उसी तरह से इस काम के लिए ‘सिडबी’ के बजाय मोदी और अंबानी के क्रोनियों के स्वामित्व वाली कंपनी को चुना गया है जो निर्धारित मानदंडों को पूरा करने में बिल्कुल अक्षम है। अगर ‘सिडबी’ को टेक्नोलॉजी की ही जरूरत थी तो वह इसे सहज ही ‘कैपिटा वल्र्ड’ से खरीद ले सकती थी।
‘सिडबी’ के स्पष्टीकरण से काम नहीं चलेगा
‘सिडबी’ ने 8 नवंबर को ट्वीट किया कि उसके नेतृत्व में बने छह बैंकों के संघ के पास ‘कैपिटा वल्र्ड’ का 56 प्रतिशत शेयर है, जिससे इसका चरित्र सार्वजनिक क्षेत्र का हो जाता है। इस प्रकार का समंजन प्रक्रियागत लुच्चापन और उल्लंघन से संबंधित और ज्यादा सवाल खड़ा कर देता है। दरअसल, सिडबी और अन्य राजकीय बैंकों तथा उनकी अनुषंगियों ने जुलाई 2018 में ‘कैपिटा वल्र्ड’ का बहुमत शेयर खरीदने के लिए संयुक्त रूप से प्रति शेयर 119 रुपये का प्रीमियम भरा था, इस तरह, उन बैंकों ने भविष्य में होने वाली आमदनी की संभावना के आधार पर घाटे में चलने वाली इस कंपनी को प्रीमीयम दिया था। अर्थात, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने मोदी के क्रोनियों के द्वारा संचालित इस कंपनी को कारोबार भी सौंप दिया और इस कारोबार को चलाने के लिए उसे पूंजी भी मुहैया कराया।
इस बैंकों में शामिल हैं- भारतीय स्टेट बैंक (9′), सिडबी (8.03′), सिडबी ट्रस्टी कं. लि. ए/सी समृद्धि बैंक (11.97′), बैंक ऑफ बडौदा (9′), विजया बैंक (2′), पंजाब नेशनल बैंक (5′) तथा एसबीआई काडर््स एंड पेमेंट सर्विसेज प्रा. लि. (3.5′) व बीओबी कैपिटल मार्केट्स लि. (3.5′)। इस प्रकार, कुल शेयर 54 प्रतिशत हुआ।
झूठे बहानों से इंग्लैंड के सरकारी फंड तक पहुंच बनाई गई
सिडबी समृद्धि फंड के वेबसाइट में कहा गया है कि ‘‘इंग्लैंड के अंतरराष्ट्रीय विकास विभाग (डीएफआइडी) ने भारत के सिडबी के साथ मिलकर समृद्धि फंड के निर्माण की बात सोची है, ताकि बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में सामाजिक उद्यमों को पूंजी मुहैया कराई जा सके जिससे वे वित्तीय और सामाजिक कार्य संपादित कर सकें। डीएफआइडी, इंग्लैंड की एक सरकारी वित्तीय संस्था है। ‘कैपिटा वल्र्ड’ किस तरह का सामाजिक या विकास कार्य संपादित करेगी, इसे दिखाये बगैर वह समृद्धि फंड से पूंजी हासिल करने की अर्हता कैसे हासिल कर सकती है?
छोटा व मंझोला उद्यम ऋण घोटाला खुल्लम-खुल्ला क्रोनीवाद और भ्रष्टाचार का ही एक अन्य उदाहरण है जो प्रधानमंत्री मोदी का द्वार खटखटा रहा है।
-निखिल कौशिक