मंगत राम पासला
पहले हो चुके आम चुनावों की तरह इस बार भी यह जनमत गुजऱ जायेगा और नयी सरकार सत्ता पर बिराजमान हो जायेगी। पिछले किये कामों के बारे कोई ठीक व ठोस जानकारी दे कर वोट प्राप्त करने की जगह तरह-तरह के नये जन भ्रांतिजनक वायदे किये जाएंगे और सत्ता प्राप्ति के बाद पहले की तरह उनको भुला दिया जाएगा। चुनाव प्रचार व घोषणा पत्रों में भारतीय लोगों की समस्याओं-गरीबी, बेरोजग़ारी, कुपोषण, अनपढ़ता, निम्न स्तर की जीवन स्थितियां आदि सवालों का जि़क्र तो किया जायेगा, परंतु उन के समाधान करने बारे में न तो मौजूदा सत्ताधारी वर्गों की राजनैतिक पार्टियों के पास कोई नीति है और न ही नीयत। पैसे, बाहूबलियों व बिकाऊ मीडिया के धुआंधार प्रचार की सहायता से चुनाव लडऩे वाले ज़्यादा उम्मीदवारों का परिचय-ब्यौरा फिर यही सिद्ध करेगा कि राजनीति बदमाश व लुटेरे लोगों की अंतिम और सुरक्षित छिपने की जगह है।
परंतु पहले से ही हमारे लोकतांत्रिक ढांचे को लगीं बिमारियों के साथ इस बार आर. एस. एस. व उसके संगी साथियों के नेतृत्व में सांप्रदायिक फाशीवादी शक्तियों द्वारा जिन ढंगों के साथ धर्मों व फिऱकापरस्ती का हथियार इस्तेमाल करके अब से ही चुनाव प्रचार को ज़हरीला बनाने का प्रयत्न हो रहा है, वह देश के शानदार इतिहास को कलंकित करने व भविष्य को धुंधला बनाने की परियोजना के तौर पर ही जाना जायेगा। पाँच सालों के मोदी शासन में बहुत कुछ शर्मिंदा करने वाला घट चुका है। वैज्ञानिक व तर्कशील सोच और उपलब्धियों की अंध-विश्वास, प्रतिक्रियावादी, कर्म कांडी व कूप-मंडूक मूल्यों में तुलना करने के प्रयत्न संघी सेनाएं व ख़ुद मोदी सरकार की ओर से आरंभ किये गए हैं। जो कोई वैज्ञानिक उपलब्धतायें अभी भी अधूरी हैं, प्रधानमंत्री समेत समस्त सांप्रदायिक फिरकापरस्त गिरोह उन्हें हज़ारों साल पहले मौजूद सनातनी युग की विशेषतायें बता रहा है। सदियों से भिन्न-भिन्न धर्मों के लोगों के बीच भिन्न-भिन्न विवादों व मतभेदों के बावजूद आपस में मिलजुल कर रहना और एक दूसरे की दलील को सुनने की सहनशीलता रखना हमारे समाज की अनेकता में एकता का विलक्षण नमूना है। खाने-पीने और पहनने की आदतों की आज़ादी पर किसी ने कभी किंतु-परंतु नहीं किया, जैसे संघ के ल_मारों, उत्पातियों की ओर से अब किया जा रहा है। देश के बाहर से आकर बसे आर्य लोग और मुसलमान इस धरती के साथ जुड़ गए और यहाँ के प्रचलित रीति-रिवाजों रस्मों और बोलियों के साथ अपनी भिन्न संस्कृति को आत्मसात कर लिया। अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद की ग़ुलामी के विरुद्ध आज़ादी का झंडा बुलंद करने वाले अकेले यहाँ के मूल निवासी ही नहीं, बल्कि बाहर से आ कर बसे भिन्न-भिन्न जातियों, धर्मों और नस्लों के जनमानस भी इस संघर्ष में शामिल हो गए। इस संयुक्त संघर्ष के कारण ही हमने साम्राज्यवादी ग़ुलामी से छुटकारा पाया और देश में लोकतंत्र व धर्म निरपेक्षता के सिद्धांतों को सामने रख कर नये भारत की कल्पना कर सके हैं, जहाँ समानता, आज़ादी और भ्रातृ भाव, सद्भावना का बोलबाला हो। चाहे यह सारा कुछ तो अलग-अलग रंगों के लुटेरे सत्ताधारियों की जनविरोधी नीतियों के कारण संभव नहीं हो सका, परंतु भिन्न-भिन्न धर्मों, जातियों, बोलियों व संस्कृति वाले जनसमूह देश की भौगोलिक एकता और अखंडता को कायम रखने में सफल रहे। परंतु अब यह सारा कुछ 1925 में अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद की सेवा करने हेतु जन्मी आर.एस.एस. अपने धर्म आधारित देश (हिंदु राष्ट्र) के मिशन को सफल करने के लिए तबाह करना चाहती है। ‘गौ-रक्षा’ का मुद्दा किसी धार्मिक आस्था की अपेक्षा ज़्यादा मुसलमानों, इसाईयों और दलित समाज पर ‘मनुवादी सामाजिक व्यवस्था’ कायम करने हेतू दमन, उत्पीडऩ, तोड़-फोड़ का साधन बना हुआ है। राष्ट्रीय नागरिकता (संशोधन) बिल किसी भी समय पड़ोसी देशों से पलायन करके आए शरणार्थियों में से सिफऱ् हिंदुओं को भारतीय नागरिकता प्रदान करने वाले प्रस्तावित कानून के द्वारा बाकी सब धर्मों के लोगों को भारतीय नागरिकता के अधिकार से वंचित करना अमानवीय ही नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग धर्मों से सम्बन्धित लोगों के भीतर घृणा की दीवार खड़ी करके देश को खंडित करने की साजिश के तुल्य है। हम भारतीय लोग तो अमरीका, इंग्लैंड, कनाडा आदि देशों में कुछेक साल निवास के बाद वहाँ की स्थाई नागरिकता की माँग कर रहे हैं और भाजपा सरकार दशकों से भारत में पलायन करके आए शरणार्थियों को नागरिकता से वंचित करना चाहती है। मोदी के शासन में भाजपा शासित प्रांतों में सांप्रदायिकता व जाति-पाती आधार पर भीड़तंत्र के द्वारा बेगुनाह लोगों की हत्याएँ आम बात बन गयी हैं। स्वयं सजे धर्म और संस्कृति के ठेकेदार अलग-अलग ‘सेनाओं’ के नाम पर हर रोज़ धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों व औरतों (कई बार समेत हिंदुओं के) से जिस तरह का दुरव्यवहार करते हैं, उसने जर्मनी में हिटलरशाही के दिनों की याद ताज़ा कर दी है। जब मोदी के गुजरात में मुसलमानों के विरुद्ध सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे, तो भाजपा से सम्बन्धित तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपाई ने नरिन्दर मोदी को ‘राज धर्म’ निभाने की नसीहत दे कर दंगे रोकने की प्रताडऩा की थी। परंतु आज तो ख़ुद प्रधानमंत्री अपने भाषणों व व्यवहार में दंगाकारियों को हिंसा करने के लिए उत्साहित करता है। आज़ादी के बाद पहली बार एक कट्टर ़हिन्दूवादी संगठन ‘हिंदू महासभा’ के साथ सम्बन्धित एक महिला द्वारा 30 जनवरी को, 1948 में महात्मा गांधी के बलिदान दिवस पर महात्मा गांधी का पुतला बना कर उसे गोलियों (खिलौने पिस्तोल से) का निशाना बना कर कत्ल किया गया और इस सारी घिनौनी कार्यवाही का मीडिया द्वारा एक सम्मानीय बहादुरी भरे कारनामे के तौर पर प्रचार किया गया। आर.एस.एस. से सम्बन्धित महात्मा गांधी के कातिल नत्थू राम गोडसे का मंदिर बनाना संघ की विचारधारा की रौशनी में ही देखा जाना चाहिए।
संघ प्रमुख मोहन भागवत की ओर से व अन्य बहुत से तथाकथित साधुओं व भाजपा नेताओं द्वारा अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर बनाने की धमकियां दीं जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज साहिबान को खुले रूप में ‘‘राम मंदिर-बाबरी मसजिद’’ विवाद का फ़ैसला करने के समय भारतीय संविधान का नहीं बल्कि हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का अनुसरण करने की धमकी भरे अंदाज में सलाह दी जा रही है। विवाद, राम मंदिर के निर्माण का नहीं, बल्कि एक विवादत जगह के स्वामित्व का है, जो 71 सालों से चलता आ रहा है। संघ और भाजपा वक्ता जान बूझ कर देश की सभी अन्य समस्यायें छोड़ कर, जो इस देश की सवा सौ करोड़ आबादी (जिस में बहुसंख्या हिंदुओं की है) की जि़न्दगियों से सम्बन्धित हैं, अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण व केरल में सबरीमाला मंदिर में 15 से 50 साल की औरतों के प्रवेश के अधिकार को गलत ठहरा कर लोगों में बहस का केंद्रीय मुद्दा बना रहे हैं। एक ओर भाजपा नेता इस्लाम में ‘तीन तलाक’ की प्रचलित परंपरा को औरतों की आज़ादी के नाम पर ख़त्म करने का कानून बनाने की दलीलें देते नहीं थकते और दूसरी ओर, 15 से 50 साल तक की उम्र वाली हिंदु औरतों के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश को रोकने के लिए ‘हिंदु आस्था’ का सहारा ले कर हिंसा भडक़ा रहे हैं। इससे घटिया व औरत विरोधी सोच और क्या हो सकती है, जिस के बारे में संघ परिवार गर्व कर रहा है?
फिऱकापरस्ती के रंग में रंगा आतंकवाद और फाशीवाद का भूत एक बार बोतल में से बाहर आ जाने के बाद दोबारा उसमें बंद करना यदि असंभव तो नहीं, बल्कि कठिन ज़रूर है। पंजाब में खालिस्तानी लहर के प्राथमिक दौर में सत्ताधारी वर्गों के राजनीतिक दल संकीर्ण राजनैतिक हितों के लिए एक दूसरे को मात देने के लिए आतंकवादी और सांप्रदायिक तत्वों का इस्तेमाल करते रहे हैं। परंतु जब खालिस्तानी अत्याचारियों को देश के भीतर से और बाहर से सहायता मिलने पर ‘धर्म युद्ध’ के नाम पर साधारण लोगों की हिमायत प्राप्त होने लगी, तो हथियारबंद आतंकवादी दस्ते अपने आप को अजेय समझने लगे, तब फिर जिस तरह उनकी ओर से पंजाब में मौत का तांडव नाच नाचा गया व अपने समाज विरोधी कारनामों को सिरे चढ़ाने के लिए धार्मिक स्थानों का दुरुपयोग किया गया, उस से देश, पंजाब व सिक्ख धर्म की बड़ी क्षति हुई। पंजाब की हकीकी माँगें मानने के प्रति कांग्रेसी हाकिमों की हठधर्मी, राज्य में आतंकवादी कार्यवाहियों के कारण हज़ारों बेगुनाह लोगों की मौतें, पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का कत्ल तथा दिल्ली की सडक़ों पर हज़ारों सिक्खों के ख़ून की खेली गई होली, यह सभी घटनाएँ एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। अकेली कांग्रेस नहीं, बल्कि पंजाब में आतंकवादी घटनाओं के मामले में आतंकवादी तत्वों व समूची सिक्ख जनता को एक ही रूप में देखने वाले सांप्रदायिक लोगों के प्रचार के कारण देश भर में सिक्खों के प्रति उपजी घृणा दिल्ली अन्य अनेकों शहरों में सिक्खों के कत्लेआम के लिए दोषी है। फिऱकापरस्ती की धार वाला घृणित ख़ंजर अपने विरोधियों के कत्लों से आगे जा कर अंतिम रूप में अपने खेमे के लोगों का नाश करने के राह चल पड़ता है। सांप्रदायिक फाशीवाद हर समय अपने आप को असुरक्षित समझता हुआ हिंसा पर उतारू रहता है और अंतिम रूप में अपनों के ख़ून का भी प्यासा हो जाता है। संघ द्वारा फैलाया जा रहा सांप्रदायिक फाशीवाद भी इसी प्रकृति का मालिक है। संघ का राम मंदिर बनाने का नारा किसी वास्तविक धार्मिक आस्था का मुद्दा नहीं। यह तो ‘हिंदु राष्ट्र’ की कायमी के लिए धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों व अन्य को डर व सहम के माहौल में रखने का एक साधन मात्र है, ताकि मनुवादी सामाजिक व्यवस्था कायम करने का कार्य आसानी से पूरा किया जा सके। यदि राम मंदिर का मुद्दा शांतिपूर्ण ढंग से हल भी हो जाता है, तब भी संघ के पास अन्य ऐसे मुद्दों की कमी नहीं है, लोगों में सांप्रदायिक अलगाव को मज़बूत करने व लोकतंत्र के जड़ों में म_ा डालने के लिये।
इसीलिए 2019 के लोक सभा चुनावों में संघ परिवार व भाजपा के सांप्रदायिक इरादों को पराजय देना देश के धर्म निरपेक्ष व लोकतांत्रिक सामाजिक ताने-बाने को कायम रखने की जंग है। इन मतदान के नतीजों में से कोई जन समर्थक सरकार या जनसमर्थक आर्थिक नीतियों का विकल्प नहीं निकलना, बल्कि सांप्रदायिक-फाशीवादी या लोकतांत्रिक व धर्म निरपेक्ष शक्तियों में से एक की हार या जीत ने देश के मौजूदा सामाजिक और भौगोलिक स्वरूप को प्रभावित ज़रूर करना है। देश की एकता, अखंडता, सांप्रदायिक सद्भावना, सहनशीलता व विरोध करने के अधिकार की रक्षा के लिए अति ज़रूरी है कि इन चुनावों में सांप्रदायिक फाशीवादी ताकतों की करारी हार हो।