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जन विरोधी है, रेलवे का निगमीकरण

जन विरोधी है, रेलवे का निगमीकरण

सुमीत सिंह
कुछ वर्ष पूर्व केंद्र सरकार के दिशा निर्देशों के अंतर्गत रेल मंत्रालय ने रेलवे के सम्पूर्ण ढांचे के पुनर्निर्माण तथा उत्पादन के बड़े प्रोजैक्टों के लिए विशाल स्तर पर आर्थिक तथा तकनीकी साधन जुटाने के उद्देश्य से विवेक देवराए कमेटी का गठन किया था। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में अलग रेल बजट का प्रावधान समाप्त करने, रेलवे में प्राइवेट-सरकारी भागीदारी के अंतर्गत रेलवे का निगमीकरण करने आदि की सिफारिशें की थीं। प्राइवेट-सरकारी भागीदारी के अंतर्गत रेलवे की सात प्रसिद्ध उत्पादन इकाईयों के साथ साथ रेलवे स्टेशन, रेल गाडिय़ां (सवारी तथा माल), रेलवे अस्पताल, रेलवे स्कूल, रेलवे प्रोटैक्शन फोर्स, रेल कारखाने, रेलवे लाईनें, रेलवे ढांचे तथा इससे सम्बंधित उत्पादन, निर्माण तथा रख-रखाव के कार्य प्राइवेट कार्पोरेट संस्थानों तथा ठेकेदारों के सुपुर्द करने के अतिरिक्त रेलवे में खाली तीन लाख पदों को समाप्त करने विशेषतया चौथा दर्जा (ग्रुप डी) को बिल्कुल समाप्त करने तथा रेलवे बोर्ड को भंग करके उसे कार्पोरेट संस्थान की भांति चलाने जैसी जन विरोधी सिफारिशें की गई थीं।
पिछले पांच वर्षों में मोदी सरकार अच्छे भले पब्लिक संस्थानों को भी एक सोची समझी साजिश के अंतर्गत उन्हें घाटे में दिखाकर निजीकरण तथा निगमीकरण की नीति के अंतर्गत उन्हें देश के बड़े कार्पोरेट घरानों के हवाले किया जा रहा है। इसी जन विरोधी नीति के अंतर्गत 2019-2020 के आम बजट में भारतीय रेल में प्राईवेट-सरकारी भागीदारी की साम्राज्यवाद पक्षीय नीति लागू करने पर बल दिया है। ऐसा करने के पीछे मोदी सरकार तर्क दे रही है कि रेलवे के विकास के लिए नई रेलवे लाईनें बिछाने, रौलिंग स्टाक अर्थात रेल इंजन, कोच तथा रेल डिब्बों के निर्माण में तेजी लाने के लिए सन् 2018 से 2030 तक 50 लाख करोड़ के पूंजी निवेश की आवश्यकता है, जिस कारण रेलवे के समग्र ढांचे के अतिरिक्त इसकी उत्पादन इकाईयों, कारखानों, रेलवे स्टेशनों, सवारी तथा माल गाडिय़ों आदि को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तथा कार्पोरेट संस्थानों के हाथों सौंपा जाना बेहद जरूरी है।
इस जन विरोधी निर्णय को लागू करने के लिए केंद्रीय वित्त मंत्रालय तथा रेल विभाग ने पिछले महीने एक कार्य योजना तैयार की है, जिसके अंतर्गत आने वाले 100 दिनों में भारतीय रेलवे की सात प्रसिद्ध उत्पादन इकाईयों, जिनमें मार्डन कोच फैक्टरी रायबरेली, डीजल रेल इंजन कारखाना वाराणसी, चितरंजन लोकोमोटिव वक्र्स आसनसोल, इंटैग्रटल कोच फैक्टरी चैन्नई, डीजल मार्डनाइजेशन वक्र्स पटियाला, व्हील एंड ऐक्सल प्लांट बंगलौर तथा रेल कोच फैक्टरी कपूरथला शामिल हैं, का प्राइवेट-पब्लिक  पार्टनरशिप नीति के अंतर्गत निगमीकरण करके उन्हें भारतीय रेल की नई इकाई इंडियन रेलवे रोलिंग स्टाक (रेल के डिब्बे तथा इंजन) कंपनी के अधीन लाए जाने का ऐक्शन प्लान तैयार किया गया है। इस संबंधी रेल मंत्रालय की ओर से सबसे पहले मार्डन कोच फैक्टरी रायबरेली के निगमीकरण का नोटिस जारी किया गया है।
मोदी सरकार के इस कर्मचारी विरोधी तथा जन विरोधी ऐलान के बाद भारतीय रेलवे की समस्त ट्रेड यूनियनों, विशेष तौर पर रेलवे कर्मचारियों की सबसे विशाल तथा सुदृढ़ यूनियन-आल इंडिया रेलवे मैन्ज फैडरेशन (्रढ्ढक्रस्न) ने निगमीकरण के इस तानाशाही आदेश के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष करने का निर्णय लिया है। इस सम्बंधी न केवल रायबरेली बल्कि रेलवे डिवीजनों, जोनल हैड क्वार्टरों, कारखानों तथा रेलवे के अन्य समूह विभागों के साथ सम्बंधित लाखों रेल कर्मियों ने ए.आई.आर.एफ. के झंडे तले मोदी सरकार के इस कर्मचारी विरोधी फैसले के विरुद्ध पूरे देश में 1 जुलाई से 6 जुलाई तक बड़े पैमाने पर लगातार रैलियां, रोष प्रदर्शन तथा भूख हड़ताल करके मोदी सरकार से इस कर्मचारी विरोधी फैसले को तुरंत रद्द करने की जोरदार मांग की है। ये रोष प्रदर्शन अभी भी जारी है।
वास्तव में भारतीय रेलवे में निगमीकरण की प्रकिया केंद्र की कांग्रेस सरकार की ओर से 1995 में ही आरंभ कर दी गई थी, लेकिन मोदी सरकार ने पिछले पांच वर्षों में इसे अधिक तेजी  से आगे बढ़ाया है। इसी नीति के अंतर्गत केंद्र सरकार ने कुछ वर्ष पूर्व अलग से रेल बजट की परम्परा बंद कर दी थी तथा रेलवे में खाली  तीन लाख पदों को जानबूझ कर नहीं भरा जा रहा था।
सच्चाई यह है कि सभी रेल उत्पादन ईकाइयां रेलवे बोर्ड की ओर से दिए जा रहे वार्षिक लक्ष्यों को समय पर पूरा कर रहे हैं  तथा और अधिक वर्कलोड की मांग कर रहे हैं जोकि मोदी सरकार के दबाव के कारण जानबूझ कर नहीं दिया जा रहा। भारतीय रेलवे देश का ही नहीं बल्कि एशिया का सबसे अधिक रोजगार प्रदान करने वाले संस्थान के साथ साथ देश की अर्थ-व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी जैसा है। देश के करोड़ों साधारण लोगों के लिए यह सबसे सस्ता, सुरक्षित तथा आरामदायक साधन है जिस द्वारा दो करोड़ तीस लाख यात्री प्रतिदिन यात्रा करते हैं। व्यापारिक क्षेत्र के लिए रेलवे माल-भाड़ा ढोने का सब सस्ता साधन है तथा भारतीय रेल प्रतिदिन तीस लाख टन माल भाड़ा ढोती है।
यदि रेलवे का निगमीकरण किया गया तो सबसे पहले व्यापक  पैमाने पर रेल कर्मचारियों की छंटनी की जाएगी। इस संबंधी रेल मंत्रालय द्वारा एक पत्र भी जारी किया जा चुका है जिसके अंतर्गत जो रेल कर्मचारी 30 वर्ष की नौकरी या 55 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, को किसी ना किसी बहाने सेवा मुक्त करने की संभावना है। इसी के साथ तीन लाख खाली पदों को समाप्त करने के साथ साथ रैगुलर नियुक्तियों पर पक्के तौर पर पाबंदी लगाई जाएगी। रेलवे को लाभ कमा कर देने वाली शताब्दी तथा राजधानी एक्सप्रैस रेल गाडिय़ों सहित अन्य महत्त्वपूर्ण यात्री तथा माल गाडिय़ों के किराए में जहां भारी वृद्धि होगी वहीं यात्रियों के जान-माल की सुरक्षा तथा किराए भाड़े में वृद्धि के प्रति सरकार की जिम्मेदारी तथा उत्तरदायित्व भी कम हो जाएगा, परिणामस्वरूप रेल दुर्घटनाओं, भ्रष्टाचार, अपराध तथा लड़ाई-झगड़ों में भी वृद्धि होगी। यहां यह भी दिला दें कि कम से कम पचास रेलवे स्टेशन पुनर्विकास के नाम पर प्राइवेट संस्थानों को दिए जा रहे हैें।
इसके अतिरिक्त सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा व उनके हितों की रक्षा के लिए बनाए गए श्रम कानूनों में परिवर्तन करके ऐसे कानून बनाए जाएंगे जो कार्पोरेट सैक्टर के पक्ष में होंगे। रेल कर्मचारियों को मिल रहे महंगाई भत्ता, बोनस, मैडीकल, रेलवे पास आदि सुविधाओं को भी सीमित किया जा सकता है। मोदी सरकार ट्रेड यूनियन अधिकारों पर भी रोक लगाने तक भी जा सकती तथा अपनी उचित मांगों के लिए रोष प्रदर्शन, रैलियां तथा हड़ताल आदि करने वाले कर्मचारियों को नौकरी से निकालने जैसे तानाशाही आदेश भी जारी कर सकती है। सबसे बड़ी चिंता की बात है कांग्रेस तथा अन्य पार्टियां जिन में राज्य स्तरीय पार्टियां भी शामिल हैं अर्थात विरोधी पक्ष या यूं कह लें कि अधिकांश विपक्ष रेलवे के रेलवे के निगमीकरण का देशव्यापी विरोध करने की अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हैं।
बहुत ही शर्म की बात है कि यह वही भाजपा है जो स्वदेशी का नारा लगाते हुए थकती नहीं थी तथा जिसने विपक्ष में होते हुए यू.पी.ए. की सरकार की ओर से पब्लिक संस्थानों में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश लागू करने के फैसले का घोर विरोध करते हुए कई दिन तक संसद की कार्यवाही नहीं चलने दी थी। लेकिन अब वही भाजपा सरकार रेलवे सहित प्रत्येक पब्लिक/सरकारी संस्थान में 100 प्रतिशत सीधा पूंजी निवेश करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। इसी भाजपा की पहली अर्थात वाजपायी सरकार ने ही सबसे पहले पब्लिक संस्थानों को बड़े कार्पोरेट घरानों को बेचने के लिए अपनिवेश मंत्रालय की स्थापना की थी तथा पुरानी पैंशन स्कीम बंद कर दी थी।
इस प्रकार भारतीय  रेलवे का निगमीकरण का निर्णय न केवल कर्मचारी विरोधी है बल्कि देश विरोधी भी है तथा इसके साथ साथ यह जन मानस के भविष्य के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगा। केंद्र सरकार के इस निर्णय से देश में महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी के साथ साथ आम जनता का शोषण और बढ़ जाएगा। मोदी सरकार को इस तथ्य को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि जिन देशों में दसियों वर्ष पहले रेलवे का निजीकरण किया गया था, उन देशों में भी जनता के भारी विरोध के चलते कुछ समय बाद रेलवे को सरकारी नियंत्रण में लाने के लिए मजबूर होना पड़ा था।
यदि मोदी सरकार रेलवे के विकास के लिए पूंजी निवेश जुटाने के लिए इतनी ही सुह्रदय है तो उसे देश-विदेश के कार्पोरेट घरानों को सात लाख करोड़ प्रति वर्ष दी जा रही टैक्स छूट व रियायतें समाप्त करने के साथ साथ बड़े पूंजीपति घरानों की ओर बैंकों के अरबों-खरबों रूपए के डूबे कर्जों की वसूली करनी चाहिए तथा विदेशी बैंकों तथा देश में बेहिसाब काले धन को सख्ती से निकलवा कर रेलवे के विकास पर खर्च करना चाहिए। ठेकेदारी प्रथा समाप्त करके सारा काम रेल उत्पादन इकाईयों से तथा रेल कारखानों से करवाना चाहिए।
इस मुद्दे पर रेलवे की समूह कर्मचारी हितों की पहरेदार ट्रेड यूनियनों को एक सांझे मंच पर एकजुट होकर ठोस रणनीति बनाकर निर्णायक आंदोलन छेडऩे की आवश्यकता है ताकि मोदी सरकार के इस कर्मचारी तथा देश विरोधी तानाशाही निर्णय को रद्द करवाया जा सके। आल इंडिया रेलवे मैन्ज फैडरेशन को चाहिए कि रेल कर्मचारियों के विशाल हितों के साथ-साथ भारतीय रेलवे को बचाने के मई 1974 में हुई अविस्मरणीय हड़ताल के इहितास को दुहराने के लिए जन-जन का एक विशाल आंदोलन खड़ा करें, यही आज की जरूरत है। इसके लिए रेल बचाओ-देश बचाओ के नारे को घर-घर पहुंचाने की आवश्यकता है।
अनुवाद : शिव कुमार

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