मंगत राम पासला
लोकसभा चुनावों में प्रचार के पहले ही दौर में भाजपा अपने असली रंग में आ गई है। भाजपा ने जो वादे 2014 के लोकसभा चुनाव में किए थे उन सभी को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया है और 2019 के चुनाव घोषणा पत्र में उन्हें कोई स्थान नहीं दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषणों में अब विदेशों में जमा हुए काले धन को वापिस लाकर प्रत्येक नागरिक के बैंक खाते में 15-15 लाख रूपये जमा कर देने का वादा, सीमाओं पर घुसपैठ की पूरी तरह रोकथाम के ऐलान, बेरोजगार युवकों के लिए प्रतिवर्ष दो करोड़ नौकरियां देने के दमग्गजे तथा सबसे अधिक ‘सब का साथ, सब का विकास’ आदि धोखा देने वाले लुभावने नारों का जिक्र तक नहीं किया जाता। महिलाओं की सुरक्षा, भ्रष्टाचार-मुक्त-प्रशासन, जम्मू-कश्मीर में शांति की स्थापना, उग्रवादियों की कार्यवाहियों पर रोक, नोटबंदी की उपलब्धियां जी.एस.टी. की ‘दूसरी आजादी’ के रूप में व्याख्या आदि सभी बातें भुला दी गई हैं। मोदी ने प्रधानमंत्री ने पदग्रहण के अवसर पर हरिद्वार में ‘आरती कार्यक्रम’ आयोजित करके ‘शुद्ध हिन्दु’ होने का जो स्वाँग रचा था तथा राम मंदिर के निर्माण के लिए चुनाव रैलियों में इक_ा हुई भीड़ से ‘जय श्री राम’ के जो नारे बुलंद करवाए थे, अब भाजपा के चुनाव प्रचार में उनका जिक्र तक नहीं किया जा रहा। ‘गौरक्षा’ के नाम पर निर्दोष मुसलमानों, दलितों, आदिवासियों तथा पशु व्यापार द्वारा अपनी रोकाी-रोटी का जुगाड़ करने वालों की हत्याएँ करने के वीरता भरपूर कारनामे अब साधारण जनता, विशेषतया हिन्दु धर्म के अनुयायियों की वोटें बटोरने में असमर्थ तथा खोखले हुए लगते हैं। ‘लव जिहाद’ तथा ‘धर्म परिवर्तन’ जैसे चुटकुले भी अब संघियों की भीड़ में कोई नया जनून पैदा नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए 2019 के लोकसभा चुनाव जीतने के लिए मोदी भक्तों के लिए अब नए-नए जुमलों की आवश्यकता आन पड़ी है।
अब जबकि 2014 के चुनावी वादों का झूठा गुबारा पूरी तरह ठुस्स हो चुका है तब आर.एस.एस. के ‘प्रबुद्ध मंडल’ (ञ्जद्धद्बठ्ठद्म ञ्जड्डठ्ठद्मह्य) ने 2019 के लोकसभा चुनाव में जीत प्राप्त करने के लिए नए नाटक के लिए नए डायलॉग तथा नए गीत खोज लिए हैं। इस उद्देश्य के लिए संघ के निर्देशों के अनुसार भाजपा नेता विशेषतया प्रधानमंत्री मोदी द्वारा सुरक्षा बलों की ओर से देश की सुरक्षा के लिए किए जा रहे बलिदानों तथा उनकी सेवाओं को इस्तेमाल करने का अत्यन्त घटिया, नीच, खतरनाक तथा मौकापरस्त दांव खेला जा रहा है। राष्ट्र की सेनाएँ भाजपा के जन्म से पहले भी अपने उत्तरदायित्व पूरी जिम्मेदारी से निभा रही थीं और आगे भी निभाती रहेंगी। यह कार्य मोदी के जाने के बाद भी जारी रहेगा। देश की कोई भी सरकार सीमाओं पर अपना दायित्व निभा रहे सैनिकों की देश भक्ति पर तथा उनकी खुद को न्यौछावर कर देने की भावना को नजर अंदाज नहीं कर सकती तथा न ही इस सम्बन्धी कोई शंका कर सकती है। लेकिन जिस ढंग से मोदी सरकार तथा इनके चाटुकारों ने भारतीय सेना तथा हवाई सेना के शानदार सुरक्षा कारनामों को ‘मोदी सेना’ बताकर उसका अपमान किया है, उस राजनैतिक गिरावट को मापने का अभी तक कोई पैमाना भी बना हुआ नहीं दिखाई देता। सीमाओं पर भारतीय सेना के जवानों का खून वास्तव में देशभक्त किसानों, मकादूरों तथा दूसरे श्रमजीवी लोगों का खून है जो संघ परिवार की कैमिस्ट्री (ष्टद्धद्गद्वद्बह्यह्लह्म्4) से बिल्कुल भिन्न है। संघ का स्वंतत्रता संग्राम के समय का इतिहास अंग्रेज साम्राज्य की दलाली का इतिहास है तथा 1947 में आकाादी मिलने के बाद फिरकापरस्ती पैदा करने तथा परस्पर भाईचारे, समन्वय के सिद्धांत को निंदित करके साम्राज्यवादी गुणगान करने का दम्भी सफर है। आज वही संघ तथा उसके पारिवारिक सदस्य भाजपा, बजरंग दल, हिन्दुवाहिनी, गऊ रक्षक, ए.बी.वी.पी., बी.एम.एस. आदि लोगों को देशभक्ति के पाठ पढ़ा रहे हैं, जिन्होंने देश की आकाादी तथा सुरक्षा के लिए कभी खून की बूँद भी नहीं गिराई। धर्म, राष्ट्र तथा साम्प्रदायिक विचारों तथा अंधी देशभक्ति तथा अन्ध राष्ट्रवाद के परदे के पीछे साधारण लोगों की भावनाओं को भडक़ा कर युद्ध का जुनून पैदा करना कदाचित देशभक्ति नहीं कहला सकता। यह तो उस युद्ध का सृजन करने वाले ढांचे अर्थात पूंजीवाद की स्पष्ट दलालगिरी है, जिसमें मुट्ठी भर धन कुबेरों तथा साम्राज्यवादी लुटेरों के लाभ (क्कह्म्शद्घद्बह्ल) के लिए करोड़ों लोगों के बहुमूल्य जीवन की आहुति ली जाती है, देश की तबाही होती है और लाखों घर बर्बाद हो जाते हैं। ऐसे अंधराष्ट्रवाद से केवल लुटेरे लोग ही प्रसन्न हो सकते हैं जो इस समय मोदी की जय जयकार करके उसे फिर से सत्तासीन करने के लिए आतुर दिखाई पड़ते हैं। अंध राष्ट्रवाद की भावना भडक़ाकर दूसरे विश्व युद्ध के समय जर्मनी के हिटलर ने सारे विश्व को तबाही के सागर में डुबोने का यत्न किया था। इसी अंध राष्ट्रवाद ने साम्प्रदायिकता का रंग चढ़ा कर 1947 में भारत को दो भागों में बाँटा था और आज केवल राजसत्ता की हवस के लिए फिर मोदी और उसके हमजोली लोकतंत्र तथा धर्म निरपेक्षता के घेरे में अपना अस्तित्व रखने वाले राष्ट्र को अंधराष्ट्रवाद के प्रचार तथा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण द्वारा फिर से विभाजित (या कमजोर) करने वाला वातावरण तैयार करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। राष्ट्रवाद देश के उन लोगों जो सत्ताधारी ग्रुप के साथ विचारों का मतभेद रखते हों, मानवीय मूल्यों के लिए डटते हों तथा पड़ोसी देशों सहित तमाम दुनियां के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करते हुए विश्वशांति के ध्वजारोही हों को ‘देशद्रोही’ घोषित करने का नाम नहीं है। अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भिन्न-भिन्न रंगों, धर्मों और राष्ट्रियताओं के लोगों का एकजुट होकर देश की आजादी के लिए जूझना ही वास्तविक राष्ट्रवाद है, न कि लोगों को संकीर्ण विचारों के गुलाम बनाकर उनके मन में एक दूसरे के विरुद्ध घृणा की दीवार खड़ी करने का नाम।
अभी भाजपा के तरकश में एक और तीर अभी बाकी है जो चुनाव जीतने के लिए अग्नि बाण का काम कर सकता है; वह है साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पर आधारित घृणा भडक़ाने का। भाजपा के प्रवक्ता प्रतिदिन अपने भाषणों द्वारा धर्म के नाम पर मतदाताओं को साम्प्रदायिक आधार पर बाँटने का प्रयत्न कर रहे हैं। मोदी जी तो प्रत्येक भाषण में विरोधी पक्ष के प्रत्येक वाक्य के शब्द को पाकिस्तान पक्षीय होने का प्रमाण बता रहे हैं। लोकतंत्र की बहाली, कानून का राज्य तथा प्रत्येक संस्था की संविधान के प्रति जिम्मेदारी की बात करने को वे भारतीय सेना का अपमान कह देते हैं। अति तो तब हो गई जब अफसपा (्रस्नस्क्क्र) की उस धारा के बदलने की मांग करने वाले को वह उग्रवादियों तथा देश के शत्रुओं के समर्थक होने की संज्ञा दे देते हैं, जिस धारा के अंतर्गत किसी अधिकारी को औरतों से बलात्कार करने या बिल्कुल ही निर्दोष व्यक्तियों को कत्ल करने जैसी हृदय विदारक घटनाओं के दोषी सैन्य अधिकारियों के ऊपर भी मुकद्दमा चलाने की आज्ञा नहीं दी जाती।
मोदी जी, अपनी डयूटी निभाते हुए किसी सैन्य अधिकारी/सैनिक द्वारा बलात्कार करने के कुकर्म पर उसके लिए दंड की मांग करने को सुरक्षा बलों के मनोबल को गिराने की कार्यवाही बता रहे हैं। अर्थात जितने अधिक बलात्कार करने की छूट होगी (क्योंकि सैनिकों तथा सैन्य अधिकारियों पर मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता) उतना ही अधिक हमारे सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ेगा। ऐसी सोच तथा घटिया मानसिकता न केवल औरत विरोधी तथा संविधान विरोधी है बल्कि बहादुर तथा मानवीय मूल्यों के लिए समर्पित भारतीय सेनाओं का भी घोर निरादर है। भाजपा नेताओं की इस सोच से दुनियां भर में भारतीय संविधान तथा सामाजिक व्यवस्था हँसी के पात्र बन जाएंगे। परन्तु सत्ता की भूख के सामने संघ तथा भाजपा नेताओं के लिए सब कुछ उचित है।
जैसे-जैसे मतदान का दिन निकट आता जा रहा है भाजपा नेताओं का साम्प्रदायिक व फाशीवादी चेहरा साफ होता जा रहा है। भाजपा जर-खरीद पिट्ठू मीडिया विशेष तौर पर इलैक्ट्रोनिक मीडिया इस कुकर्म में भाजपा से भी आगे हैं। राजसत्ता की लालसा में संघी नेता साम्प्रदायिक खेल की कोई भी सीमा पार कर सकते हैं। इसलिये सभी देशभक्त लोकतांत्रिक प्रगतिशील विचारों वाले लोगों के लिए यह आवश्यक है कि वे भगवें ब्रिगेड के इन घिनौने इरादों के बारे में जनसमूहों को सावधान करें तथा इन शक्तियों की किसी भी उत्तेजनात्मक व भडक़ाहट भरी कार्यवाही को सफल न होने दें। लोकसभा चुनावों का केन्द्र बिन्दु साधारण जनता को दरपेश बेकारी, भुखमरी, कृषि संकट, सामाजिक उत्पीडऩ आदि मुद्दे बनाए जाएं न कि अंधराष्ट्रवाद तथा सुरक्षा सेनाओं का राजनीतिक हित साधने के लिए प्रयोग; जिसे करने के लिए भाजपा नेता होड़ लगाए हुए हैं। सबसे अधिक अफसोस की बात है कि देश का प्रधानमंत्री इस दम्भी खेल का कैप्टन बनकर भाजपा टीम का नेतृत्व कर रहा है। (हिंदी अनुवाद : शिव अमरोही)