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क्या ऐसे मिलेगा हमें नया भारत?

क्या ऐसे मिलेगा हमें नया भारत?

सरोजिनी बिष्ट
एक तरफ देश के प्रधानमंत्री 2022 तक नए भारत के निर्माण का लक्ष्य तय कर रहे थे तो वहीं देश के एक हिस्से से चमकी बुखार से पीडि़त छोटे-छोटे बच्चों की मौत की खबरें दिल दहला रहीं थी। समुचित इलाज न मिल पाने और अस्पताल अव्यवस्था ने मासूमों की जिंदगी निगल ली।  एक तरफ प्रधानमंत्री राज्यों से उनकी क्षमताओं को पहचानने और जिला स्तर पर जीडीपी के लक्ष्य ऊपर रखने की दिशा में काम करने का आह्वान कर रहे  थे, स्वच्छ भारत अभियान का गुणगान कर रहे थे तो वहीं दूसरी ओर दो राज्यों से मेनहोल सफाई के दौरान सफाई कर्मियों की मौत की खबरें आ रहीं थी। अजीब लगता है कहां हमें एक नए भारत निर्माण के स्वप्न की ओर ले जाया जा रहा है जिसे वर्ष 2022 के भीतर पूरा करने का संकल्प भी लिया जा चुका है और कहां आज भी हमारे बच्चे ऐसे बुखार की चपेट में आकर मौत की ओर जा रहे हैं, जब की हमारा मेडिकल जगत कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से लडऩे की क्षमता काफी हद तक पैदा करने का दावा करता रहा हो।  एक तरफ़ भारत को महाशक्ति बनाने की कवायद जोरों पर है तो दूसरी ओर आज भी हमारा  मजदूर सीवर की सफाई करते हुए उसी में दम तोड़ रहा है। मानव रहित सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई से अब भी हम कोसों दूर हैं।
2022 में भारत अपनी आजादी के 75 वर्ष पूरे कर लेगा। इसी को लक्ष्य बनाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पहले कार्यकाल से ही 2022 तक नए भारत निर्माण की बात कह रहे हैं और अब जबकि एक बार फिर प्रचंड बहुमत के साथ भाजपा केंद्र में सत्तासीन हुई है, नव भारत निर्माण के अपने लक्ष्य को लेकर प्रधानमंत्री खासा उत्साहित नजर आ रहे हैं उन्हें विश्वास है कि 2022 तक भारत एक नए रूप में उभरकर विश्व के सामने प्रस्तुत होगा। उनकी मानें तो, इस नए भारत के प्रारूप में सब कुछ है यानी प्रथम पायदान में खड़े व्यक्ति से लेकर अंतिम पायदान और हाशिए पर खड़े व्यक्ति तक के  लिए नई नई सौगातें, जैसा कि प्रधानमंत्री कई बार अपने वक्तव्य में कह भी चुके हैं। हर वह राज्य जहां भाजपा का शासन है, प्रधानमंत्री द्वारा सबको 2022 तक नवभारत निर्माण का लक्ष्य दे दिया गया है।
इसमें दो राय नहीं कि एक नए भारत के निर्माण के लिए प्रधानमंत्री का उत्साह कुछ कम नहीं यदि सचमुच हमें एक ऐसा भारत मिलता है जहां खुशहाली ही खुशहाली हो तो भारत के हर एक नागरिक को उनके इस मिशन का हिस्सा होना चाहिए किन्तु कुछ महत्वपूर्ण बुनियादी सेवाओं के क्षेत्र में आज भी लडख़ड़ाते सिस्टम को देखते हुए सवाल उठना तो लाजमी है कि आखिर 2022 तक कैसे हमारे समक्ष एक नए भारत का निर्माण संभव है।
इस नए भारत में कुछ नहीं, बल्कि बहुत कुछ है जैसा कि बार-बार इशारा किया जा रहा है। नए भारत का लक्ष्य है, जहां मध्यम वर्ग, निम्न मध्यम वर्ग, निम्न वर्ग और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले  लोगों को जीवन की बुनियादी सेवाओं का भरपूर लाभ मिले। साथ ही युवा वर्ग रोजगारन्मुख शिक्षा प्राप्त कर सके। यानी बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और रोजगार के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन। उत्साह की अति तो इतनी है कि भाजपा के एक नेता ने अपने प्रचार होर्डिंग पर प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक बार फिर भारत को सोने की चिडिय़ा बनने की ओर तक बता डाला। पर सच कहें तो इस नए भारत की तस्वीर इसलिए हमें ज्यादा उत्साहित नहीं करती क्योंकि ठीक इसके उलट दम तोड़ते सिस्टम की कुछ ऐसी भयावह तस्वीरें हमारे सामने मौजूद हैं जो हमें इतनी जल्दी एक परिपूर्ण नव भारत का जश्न मनाने से रोकती है।
शिक्षा का क्षेत्र
आज भी सरकारी स्कूलों की बदहाली का आलम यह है की आठवीं कक्षा पास करने वाला छात्र  गणित का एक साधारण सवाल तक हल करने में असमर्थ है। गैर-सरकारी संगठन ‘प्रथम’ ने देश के 596 जिलों में शिक्षा की स्थिति पर अध्ययन के बाद अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि शिक्षा के अधिकार के कारण सरकारी स्कूलों में पहले के मुकाबले बच्चों की संख्या तो बढ़ी है लेकिन आज भी मिड डे मील, कन्याश्री और दूसरी स्कॉलरशिप योजनाओं के लालच में ही बच्चे स्कूल जा रहे हैं। गैर सरकारी संगठन प्रथम की रिपोर्ट बताती है कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भले ही 96 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाने लगे हैं लेकिन न तो शिक्षा का स्तर ही सुधरा है और न ही पढऩे की ललक जागी है मकसद केवल योजनाओं का लाभ उठाना ही है। स्कूल जाने वाले छात्रों की संख्या हाल के वर्षों में कुछ बढ़ी जरूर है लेकिन उनकी जानकारी का स्तर यह है कि आठवीं कक्षा में पढऩे वाले 56 फीसदी छात्र मामूली गुणा-भाग भी नहीं जानते। इसी तरह तीसरी कक्षा में पढऩे वाले 70 फीसदी छात्र जोड़-घटाव में भी फिसड्डी हैं। आठवीं के 27 फीसदी छात्र दूसरी कक्षा की पुस्तकें शुद्ध तरीके से नहीं पढ़ सकते। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2008 में जहां पांचवीं कक्षा के 37 फीसदी छात्र गणित के सामान्य सवाल हल कर सकते थे, वहीं अब ऐसे छात्रों की तादाद घट कर 28 फीसदी रह गई है। इसी तरह वर्ष 2008 में आठवीं कक्षा के 84.8 फीसदी छात्र दूसरी कक्षा की पुस्तकें शुद्ध रूप से पढ़ सकते थे, लेकिन बीते एक दशक के दौरान ऐसे छात्रों की तादाद घट कर 72.8 फीसदी रह गई है। शिक्षकों की भारी कमी, भवन और मूलभूत सुविधाओं अभाव साफ देखा जा सकता है।
चिकित्सा का क्षेत्र
यही हाल सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों का भी है डाक्टरों की भारी कमी, दवाओं का ना मिलना और बुनियादी सुविधाओं का अभाव मरीजों को बेमौत मार रहा है। अभी अभी देश चमकी बुखार का कहर देख रहा है जहां छोटे-छोटे बच्चे इलाज और सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। दो साल पहले इसी तरह गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी के चलते इंसेफेलाइटिस से ग्रसित बच्चे मर गए। विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2016 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में एलोपैथिक डॉक्टरों के तौर पर प्रेक्टिस करने वाले एक तिहाई लोगों के पास मेडिकल की डिग्री तक नहीं। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पास वर्ष 2017 तक कुल 10. 41 लाख डॉक्टरों का रजिस्ट्रेशन हुआ था, इनमें सरकारी अस्पतालों में मात्र 1.2 लाख डाक्टर थे जबकि बाकी निजी अस्पतालों में कार्यरत हैं या निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि दवा, सुविधाएं और डॉक्टरों की कमी से जूझते भारत का सरकारी स्वास्थ्य क्षेत्र आखिर गरीब जनता को कहां तक राहत पहुंचाएगा। कई जिलों के अस्पताल तो वेंटिलेटर पर हैं। सिर्फ आयुष्मान भारत योजना सरीखी सुविधाएं भर दे देना काफी नहीं। जब तक  सरकारी अस्पतालों की दशा नहीं सुधारी जाएगी और मूलभूत सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जाएंगी तब तक नए भारत का निर्माण असंभव है।
जान खोते सफाई कर्मी
जब नए भारत निर्माण की बात हो ही रही है तो यहां उस भयावह स्थिति का जिक्र करना भी जरूरी है जहां  आज भी सफाई करते हुए सफाई कर्मी सीवर या सेप्टिक टैंक की जहरीली गैसों का शिकार बन रहे हैं। वडोदरा और लखनऊ में घटित हाल की दो घटनाएं हमारे सामने हैं। हर साल सीवर सफाई कर्मी सफाई के दौरान अपनी जान गंवा रहे हैं। आज भी हम सीवर लाइनों की मानवरहित सफाई के लिए अपनाई जाने योग्य कारगर तकनीक से कोसों दूर हैं। याद कीजिये पिछले साल ही आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता (टैक्नोलॉजी चेलैंज) आयोजित की थी।
मंत्रालय द्वारा जारी परिपत्र के अनुसार, कोई भी व्यक्ति सीवर सिस्टम और सेप्टिक टैंक की मानवरहित सफाई की तकनीक, तरीके अथवा कार्ययोजना पर लिखित रूप से अपने विचार मंत्रालय को भेज सकता था। यह प्रतियोगिता गांधी जयंती के मौके पर दो अक्तूबर को आयोजित अंतरराष्ट्रीय सफाई सम्मेलन का हिस्सा थी।
प्रतियोगिता में चयनित सबसे कारगर तकनीक को सरकार द्वारा देश भर में भौगोलिक एवं अन्य स्थानीय जरूरतों के मुताबिक विभिन्न आकार में सफल व्यवसायिक मॉडल के रूप में लागू किया जाने की बात कही गई। बावजूद इसके कोई ठोस कदम उठता हुआ नजर नहीं आ रहा कि जहां हम यह उम्मीद लगा सकें कि अब हम ऐसे आधुनिक तकनीक से लैस हैं जहां सीवर या सेप्टिक टैंक में किसी व्यक्ति को उतरकर सफाई करने की जरूरत नहीं।
फिर भी हमें इंतजार है उस नए भारत का जिसका स्वप्न पिछले 5 वर्षों से दिखलाया जा रहा है। 9 सितंबर 2018 को भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें 130 करोड़ भारतीयों के समर्थन से प्रधानमंत्री के नेतृत्व में नए भारत के निर्माण के संकल्पों को हासिल करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई।
एक नया भारत जो भूख, बेघरी और बेरोजगारी से मुक्त होगा। प्रस्ताव में कहा गया कि ‘‘यह एक ऐसा नया भारत होगा जो एकजुट, मजबूत, समृद्ध और आत्मविश्वास से परिपूर्ण होगा। हम एक ऐसे नए भारत के निर्माण का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे हैं, जहां- न कोई बेघर हो, न कोई गरीब हो, न आतंकवाद हो, न भ्रष्टाचार हो, न जातिवाद हो और न संप्रदायवाद हो।’
तो एक सवाल प्रधानमंत्री जी से पूछा जाना चाहिए कि क्या उस नए भारत में उस आठ वर्षीय मासूम के लिए भी सम्मानपूर्ण और समतापूर्ण जीवन का अधिकार होगा जिसे सवर्ण जाति के व्यक्ति ने केवल इसलिए मारा और जलाया कि दलित होने के बावजूद उसने मंदिर में घुसकर खेलने की हिम्मत की। देश के विभिन्न हिस्सों से सवर्णों और दबंगों द्वारा दलितों पर अत्याचार की घटनाएं सामने आती रही हैं। क्या उस नए भारत में इस तरह की अमानवीय घटनाएं रुक जाएंगी?  
सपने देखना कोई बुरी बात नहीं पर उन सपनों को हासिल करने के लिए हकीकत से भागना सबसे बुरा होता है। जिस देश में आज भी मात्र वायु प्रदूषण के चलते हर साल 12 लाख लोग अपनी जान गवा रहे हों, जहां आज भी इलाज के अभाव में हर साल बीस लाख लोग मौत के मुंह में समा रहे हों, जिस देश में अब भी लोग सिर पर मैला ढोने की प्रथा निभा रहे हों, जहां आज भी कुपोषण से लड़ाई एक गंभीर चुनौती के रूप में खड़ी हो, दलितों का आज भी कई जगह मंदिरों में प्रवेश वर्जित हो, बेरोजगारी चरम पर हो, वहां हम कैसे यह उम्मीद लगाएं कि 2022 तक हमें एक नया भारत मिल जाएगा। चुनौतियां बहुत बड़ी और गंभीर हैं क्या इतनी बड़ी और गंभीर चुनौतियों से चुटकी में निपटा जा सकेगा, जैसा कि देश को इस भ्रम की ओर धकेला जा रहा है कि 2022 तक एक नए भारत का उदय होगा जहां ना तो गरीबी होगी न ही भुखमरी होगी ना ही कुपोषण होगा ना ही कोई भी बेघर होगा ना ही जातिवाद होगा ना ही सांप्रदायिकतावाद।
नए भारत की चाह हर भारतवासी का स्वप्न होना ही चाहिए, इसमें दो राय नहीं। लेकिन आज भी हमारा देश जिन कठिन चुनौतियों से जूझ रहा है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि एक नए भारत का उदय होने में अभी वर्षों लग जाएंगे। केवल बातों, वादों और प्रस्तावों में नए भारत का उल्लेख भर कर देने से हमें नया भारत नहीं मिलने वाला। 2022 अब बहुत दूर नहीं तो हर व्यक्ति अपने अपने विवेक से यह सोच ही सकता है कि जब तक हम देश की मूलभूत समस्याओं से छुटकारा नहीं पा लेंगे तब तक उनके हिस्से का नया भारत मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

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