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कौशल विकास के नाम पर भी पूंजीपतियों को मोदी सरकार कर रही मालामाल

कौशल विकास के नाम पर भी पूंजीपतियों को मोदी सरकार कर रही मालामाल

जी हाँ, मोदी राज में रोजगार के जो नए फंडे आए हैं, वे मालिकों के लिए वरदान साबित हुए हैं। लेकिन मजदूरों के लिए नौकरी के नाम पर धोखा साबित हो रहे हैं। रोजगार की ऐसी कई किस्में मोदी सरकार ने बनाई हैं, जिनमें स्थायी रोजगार गायब हो रहे हैं। इनमें है- नियत अवधि नियोजन ; (फिक्सड टर्म व नीम ट्रेनी) यानी फोकट के मजदूर।
फिक्सड टर्म: स्थायी रोजगार गायब
केंद्र सरकार ने इंडस्ट्रियल इस्टैवलिशमैंट स्टैंडिग आर्डर एक्ट 1946 अधिनियम 1946 में संशोधन किया है जो अब औद्योगिक नियोजन; स्थाई आदेश केंद्रीय संशोधन नियम 2016 बन गया है। इस संबंध में सरकार द्वारा 7 अक्टूबर 2016 को जो अधिसूचना जारी हुई थी, उसका मकसद पहले से ही सीमित स्थायी रोजगाऱ खत्म करके नियत अवधि के मजदूर भर्ती करना है। संशोधन में रेडीमेड गारमैंट सेक्टर में नियत अवधि नियोजन श्रमिक जोड़ा गया है। इसी अनुरूप उक्त की केंद्रीय नियमावली 1946 में भी अस्थाई संशोधन पारित हुआ है। इसके तहत एक निश्चित अवधि के लिए नियोजन आधार पर इन्हें कार्य पर लगाया जाएगा।
यानी, एक निश्चित अवधि के लिए मालिक और श्रमिक के बीच में एक समझौता होगा और अवधि समाप्त होते ही उक्त श्रमिक को निकाल दिया जाएगा। यही नहीं, उक्त के संबंध में औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 में भी परिवर्तन कर दिया गया है। इसके तहत नियत अवधि नियोजन श्रमिक; फिक्सड टर्म वर्कमैन के एग्रीमैंट का नवीनीकरण ना होने अथवा उसके समाप्त हो जाने के परिणाम स्वरूप उसकी सेवाएं समाप्त कर दी जाती हैं तो वह किसी वेतन का हकदार नहीं होगा। ऐसा श्रमिक अपने स्थायीकरण की भी माँग नही कर सकता। यह नया फंडा मालिकों को ’रखने व निकलने’ की खुली छूट देता है। वैसे तो लिखा यह है कि वेतन सुविधाएं स्थायी श्रमिक की भांति मिलेंगी, लेकिन यहाँ भी एक कमी है। जिसका लाभ उठाकर कंपनियां सालाना पैकेज तय कर रही हैं, जो कंपनी लागत सीटीसी आधारित होता है। यानी हाथ में आने वाला वेतन काफी कम होता है।
वैसे, तमाम कंपनियां अवैध रूप से पहले से ही फिक्सड टर्म का धंधा चला रही थीं, लेकिन अब उसे कानूनी रूप भी मिल गया है।
मोदी राज में स्किल डेवलपमेंट का जो नारा उछला, दरअसल उससे मालिकों के लिए फोकट के नए मजदूर तैयार हुए हैं। यानी कैजुअल और ठेका श्रमिकों का स्थान अप्रैंटिस (ट्रेनी)के बहाने अधिकार विहीन मजदूरों ने ले लिया। केन्द्र सरकार द्वारा 15 जून 2017 को जारी अधिसूचना से यह नया फंडा सामने आया है :
पिछले एक वर्ष के दौरान देखते ही देखते देशभर के तमाम कारखानों में अप्रैंटिसशिप (ट्रेनी) तहत बड़े पैमाने पर मजदूरों की भर्ती हो गई। इसमें ठेकेदार का स्थान ले ली हैं एनजीओ कंपनियोंं ने। रोजगार क्षमता वृद्धि के नाम पर हो रही इन भर्तियों के साथ ही लंबे समय से कार्यरत ठेका मजदूर बड़े पैमाने पर निकाले जा चुके हैं। इस धंधे के तहत रोजगार क्षमता वृद्धि के नाम पर उन्हें भी भर्ती करने का प्रावधान है, जो तकनीकी अथवा गैर तकनीकी विद्या में ग्रेजुएट/डिप्लोमाधारी होंगे और उन्हें भी जिन्होंने दसवीं कक्षा के पश्चात पढ़ाई छोड़ दी है। इसके तहत कंपनियां क्षमता के अनुसार 1000 से 5000 तक श्रमिकों की भर्ती कर सकती हैं, जिसमें 16 साल के किशोर भी शामिल होंगे। काम मजदूर का, पद ट्रेनी, नाम क्षमता वृद्धि अर्थात फोकट के ये मजदूर, प्रशिक्षु ट्रेनी कहलाएंगे और किसी भी प्रकार से स्थायीकरण की कोई माँग नहीं कर सकते हैं। यह श्रमिक की किसी परिभाषा में भी नहीं आएंगे और अप्रेंटिस एक्ट भी इन पर लागू नहीं होगा। ट्रेनी प्रशिक्षु का कंट्रेक्ट/समझौता रोजगार के लिए नियुक्ति पत्रा अथवा रोजगार की गारंटी नहीं होगा। 3 से 36 महीने तक के लिए इनकी भर्ती होगी। इनके कार्य/प्रशिक्षण की अवधि प्रशिक्षणदाता कंपनी के विवेक पर आधारित होगी। प्रशिक्षण अवधि के दौरान अनुबंध के अंतर्गत वह रोजगार का अनुबंध नहीं कर सकता। समझौते में वर्णित प्रशिक्षण अवधि के पूरा होने पर अनुबंध समाप्त हो जाएगा। प्रशिक्षणदाता कभी भी कंपनी/उद्योग की नीतियों का पालन न करने या अनुपस्थित रहने आदि के बहाने अनुबंध को समाप्त कर सकता है। साप्ताहिक या दैनिक कार्य के घंटे कंपनी/ उद्योग की नीति के अनुसार निर्धारित होंगे। चूंकि वह श्रमिक की परिभाषा में नहीं आएगा इसलिए पीएफ, ईएसआई, बोनस आदि किसी भी चीज का पात्र नहीं होगा। प्रशिक्षु पर कंपनी द्वारा निर्धारित नियम कानून लागू होंगे और उसे अकुशल श्रेणी के निर्धारित न्यूनतम वेतन के बराबर पारिश्रमिक/गुजारा-भत्ता मिलेगा, जिसका पहले साल 75 फीसदी हिस्सा व दूसरे साल 60 फीसदी हिस्सा सरकार देगी।
खतरनाक है संविदा पत्र
टे्रनी के तहत भर्ती होने वाले प्रशिक्षु को एक शपथ पत्र और एक संविदा पत्र देना होगा। दोनों के प्रारूप पूर्व से ही निर्धारित है। प्रशिक्षु संविदा पत्र की कई शर्तें बेहद खतरनाक हैं। पत्र के बिंदु संख्या 6 में स्पष्ट उल्लेख है कि श्रमिक की ओर से विपफलता से यदि प्रशिक्षण की संविदा को समाप्त कर दिया जाता है तो प्रशिक्षण की लागत के रूप में उतनी ही राशि अथवा सुविधा प्रदाता कंपनी जो निर्धारित करेगी, उसे लौटाना पड़ेगा। यानी किसी भी बहाने कंपनी उससे पूरा पैसा वसूल सकती है। बिंदु संख्या 9 में दर्ज है कि  स्टाइपेंड भुगतान का जारी रहना संतोषजनक प्रदर्शन पर निर्भर करेगा। यानी इसमें भी कटौती का अधिकार होगा। बिंदु संख्या 2 में स्पष्ट उल्लेख है कि वह प्रशिक्षु होंगे ना की एक श्रमिक। अत: श्रमिक अथवा कार्य के संबंध में किसी भी कानून के उपबंध लागू नहीं होगें। कंपनी अपनी मनमर्जी से कानून बनाकर लागू कर सकती है। कुल मिलाकर मालिक वर्ग जैसा अधिकार विहीन मजदूर चाहता है, मोदी सरकार ने उसी को कानूनी रूप में उन्हें प्रदान कर दिया है, और दे रही है। इसीलिए तो मालिकों की पहली पसंद हैं : जनाब मोदी!

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