दयानंद
पिछले कुछ दिनों से भारतीय रेलवे के संदर्भ में जिस तरह की सरकारी नीतियां और कार्यवाही देखने को मिल रही हैं वो एक गहरे षड्यंत्रकारी पूंजीवादी व्यवस्था के हाथों रेलवे को सौंपने की ओर साफ इशारा कर रहीं हैं। हालांकि रेलमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक समय-समय पर रेलवे के निजीकरण की बात को सिरे से खारिज करते रहे हैं और उन्होंने रेलवे में कॉरपोरेट जगत की घुसपैठ को यात्री सुविधा व रेलवे की बदहाल स्थिति सुधार की कोशिश कहकर असल विमर्श से पल्ला झाड़ लिया है।
एनडीए के प्रथम कार्यकाल में ही रेलवे के निजीकरण की षड्यंत्रकारी प्रक्रिया शुरू हो गई थी, अब दूसरे कार्यकाल के शुरुआत से ही इसमें तेजी ला दी गई है। सबसे पहले हाल के ऐसे घटनाक्रमों का जिक्र आवश्यक है जो गहरी साजिश की ओर साफ इशारा कर रहे हैं।
डीरेका सहित रेलवे की सात उत्पादन इकाइयों के निजीकरण की तैयारी
रेलवे मंत्रालय ने रेलवे बोर्ड को उत्पादन इकाइयों के निजीकरण को लेकर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने व रेल संगठनों से बातचीत करने के लिए 100 दिन का समय दिया है और उससे डीरेका (डीजल रेलइंजन कारखाना) सहित सात उत्पादन इकाइयां कार्पोरेट जगत को सौंपने की रुपरेखा तैयार करने को कहा है। सबसे पहले रायबरेली की मार्डन कोच फैक्ट्री को इसके तहत चुना जाना है। सरकार के इस फैसले से डीरेका कर्मचारियों में काफी आक्रोश व्याप्त है और इसको लेकर कर्मचारी यूनियनों ने जीएम को विरोध का पत्र भी सौंपा है। डीरेका की वर्तमान व्यवस्था के अनुसार सभी कर्मचारी भारतीय रेलवे के हैं जिस पर रेल सेवा अधिनियम लागू होता है। डीरेका के सभी कर्मचारियों को केंद्रीय कर्मचारी माना जाता है, उत्पादन इकाइयों का सर्वेसर्वा जीएम होता है तथा रेलवे बोर्ड के चेयरमैन को जीएम रिपोर्ट करते हैं। जबकि निगम बनने के बाद डीरेका की व्यवस्था और स्वरूप में बड़ा परिवर्तन होगा जो इस प्रकार होगा :
जीएम की जगह सीईओ की तैनाती की जाएगी, सीईओ, सीएमडी को रिपोर्ट करेगा। सबसे अहम बात ग्रुप सी और डी का कोई कर्मचारी भारतीय रेलवे का हिस्सा नहीं होकर अब निगम का कर्मचारी होगा और उस पर रेल सेवा अधिनियम लागू नहीं होगा। उन सभी कर्मचारियों को कारपोरेशन के नियम के तहत काम करना होगा, वे कर्मचारी संविदा (ठेके) पर काम करेंगे, कर्मचारियों के लिए अलग से पे-कमीशन आएगा, उन्हें केंद्र सरकार की सुविधाएं भी नहीं मिलेंगी, सेवा शर्तें भी बदल जाएंगी और ग्रुप सी और डी के कर्मचारियों की नौकरी पर तलवार लटकी रहेगी, कभी भी उन्हें हटाया जा सकेगा।
राजधानी, शताब्दी और दुरंतो एक्सप्रेस जैसी महत्वपूर्ण टे्रनों के परिचालन का जिम्मा निजी कंपनियों को देने की तैयारी
रेलवे के सूत्रों के मुताबिक, प्रॉफिट में चलने के बावजूद राजधानी एक्सप्रेस और शताब्दी एक्सप्रेस जैसी प्रीमियम ट्रेनों को निजी हाथों में सौंपने के लिए रेल मंत्रालय ने अपनी पूरी योजना बना ली है। एयरलाइंस की तर्ज पर भारत में रेल गाडिय़ों को चलाने की जिम्मेदारी प्राईवेट कंपनियों को देने की तैयारी हो रही है। ट्रेनों को निजी हाथों में सौंपने के पीछे तर्क ये है कि इससे प्रीमियम ट्रेनों की यात्री सुविधाओं में इजाफा होगा। इस तरह से रेलवे के कामर्शियल ऑपरेशन में निजी क्षेत्र बेहतर सुविधाएं प्रदान करेगा।
सबसे तेज ट्रेन ‘वंदे भारत’ में बासी खाना परोसने वाले जुर्मानाधारी वेंडर ‘मेमर्स ट्रीट’ को पुन: भोजन बनाने का टेंडर देना
देश की सबसे तेज रफतार ट्रेन वंदे भारत एक्सप्रेस में बासी खाना देने का वाकया 9 जून को मिला था। शिकायतकर्ता खुद केंद्रीय मंत्री व बीजेपी नेता साध्वी निरंजन ज्योति थीं। 10 जून को मीडिया में यह खबर प्रकाशित होने के बाद 11 जून को दिल्ली और लखनऊ से अधिकारियों की टीम ने कानपुर का दौरा किया और कानपुर के इस वेंडर पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया था। लेकिन अजीब बात यह है कि इस घटना के एक सप्ताह के भीतर आईआरसीटीसी ने 14 जून, 2019 को एक पत्र जारी कर कानपुर के लैंडमार्क टावर ग्रुप की कंपनी ‘मेसर्स ट्रीट’ वेंडर को न केवल डिनर का ठेका तीन माह के लिए बढ़ा दिया बल्कि उसे लंच का भी एक माह का ठेका दे दिया।
यात्रियों को मिलने वाली सब्सिडी को समाप्त करने की दिशा में सरकार का बढऩा
नई सरकार का गठन होते ही रेलवे ने कमाई बढ़ाने के उपायों के तहत सब्सिडी छोडऩे का विकल्प ग्राहकों के सामने रखने का प्रस्ताव तैयार किया है। मंत्रालय ने सौ दिन के एजेंडे में यह प्रस्ताव शामिल कर प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजा है, ताकि रेलवे की आय बढ़ाई जा सके। केंद्र सरकार ने रेल मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह लोगों को बताए कि उन्हें कितनी सब्सिडी दी जा रही है। रेलवे ने ऐसी जानकारी टिकट पर देने की तैयारी कर ली है। रेलवे ने अब टिकट पर ये लिखना शुरू कर दिया है : ‘IR RECOVERS ONLY 57% OF THE COST OF TRAVEL ON AN AVERAGE लखनऊ मंडल में आरक्षित टिकटों पर ऐसी पंक्ति लिखी जाने लगी है।
एक बार सब्सिडी छोडऩे के बाद दोबारा कोई यात्री सब्सिडी ले पाएगा या नहीं, इस पर भी जल्द ही स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। गौरतलब है कि गैस सब्सिडी में अगर आप एक बार सब्सिडी छोडऩे का विकल्प चुन लेते हैं तो भविष्य में आपको किसी भी सिलेंडर पर सब्सिडी नहीं मिलती। अगर आपको एलपीजी सब्सिडी दोबारा शुरू करानी है तो आवेदन करना होता है।
विदित हो कि एनडीए के प्रथम कार्यकाल में पूर्व रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने भी इस विकल्प पर विचार किया था, लेकिन कई स्तरों पर कड़े विरोध के बाद उन्होंने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया था लेकिन अब नई सरकार का गठन होते ही इस पर कार्य पुन: आरम्भ कर दिया गया है। अगर पीएमओ इस प्रस्ताव पर मुहर लगाता है तो अगस्त से शुरुआत हो सकती है। वर्तमान व्यवस्था के तहत रेलवे यात्री से टिकट की वास्तविक लागत में करीब 53 फीसदी ही वसूलता है जबकि बाकी 47 फीसदी का वहन रेलवे खुद करता है जो एक तरह से यह सब्सिडी के तौर पर रेल यात्रियों को मिलता है। अभी इस प्रावधान को विकल्प के रूप में शुरू किया जा रहा है लेकिन इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि रेलवे टिकट पर सब्सिडी को पूर्ण रूप से खत्म कर दें और ऐसे में यात्रियों को टिकटों को दोगुने मूल्य पर लेना होगा। यानी सरकार ने आम जनमानस को तगड़ा झटका देने का मन बना लिया है, एक तरह से यह लोगों की जेब पर सरकारी डाका ही साबित होगा।
समझ में नहीं आता कि जब पिछली सरकार ने आजादी के बाद सबसे ज्यादा रेल किराया बढ़ाया, टिकट के कैंसिलेशन से सबसे ज्यादा राजस्व की उगाही की, जो प्लेटफॉर्म टिकट 2 रुपये का था उसका मूल्य 10 रुपये कर दिया गया, न केवल यात्री भाड़ा बल्कि माल ढुलाई चार्ज भी रेकॉर्ड स्तर पर बढ़ाया गया फिर भी भारतीय रेलवे घाटे में क्यों ? सरकार के कुप्रबंधन और गलत नीतियों से होने वाली आर्थिक नकुसान की भरपाई जनता के जेब में ही डाका डालकर पूरा करने की सरकारी स्कीम कब तक? आज भी अगर स्टेशनों के टिकट खिड़कियों पर नजर दौड़ाएं तो यात्रियों का हुजूम मिलेगा। रिजर्वेशन टिकट दो-तीन महीने तक अग्रिम ही बुक रहते हैं। ऊंचे मूल्य पर तत्काल टिकटों से भी रेलवे खुद अतिरिक्त राजस्व उगाही करता है साथ-साथ बिचैलियों के भी बल्ले-बल्ले हो जाते हैं यानी हर हाल में जेब आम लोगों की ही कटनी है ये तय है। इतने सारे ग्राहक और कमाई के इतने सारे विकल्पों के बावजूद घाटे में संचालित होने वाला भारतीय रेलवे जैसा दूसरा कोई उदाहरण विश्व भर में नहीं मिलेगा।
एक तो सरकार के कुप्रबंधन से होने वाले आर्थिक नकुसान की भरपाई जनता के जेब से नहीं होनी चाहिए वो भी उस स्थिति में जहां दूसरी ओर सांसदों को सुविधा के नाम पर लूट की खुली छूट पहले से ही प्राप्त हो। यह जानकर गहरा आश्चर्य होगा कि एक सांसद को मिलने वाली सरकारी सुविधा जनता के जेब पर कितना बड़ा सरकारी डाका है।
सांसदों को हवाई यात्रा का मात्र 25 प्रतिशत ही देना पड़ता है। इस छूट के साथ एक सांसद साल भर में 34 हवाई यात्राएं कर सकता है। यह सुविधा पति/पत्नी दोनों के लिए है। ट्रेन में सांसद फ्स्र्ट क्लास एसी में अहस्तांतरणीय टिकट पर यात्रा कर सकता है। एक सांसद को सडक़ मार्ग से यात्रा करने पर 16 रुपये प्रति किलोमीटर यात्रा भत्ता मिलता है। अगर संसद की कार्यवाही के दौरान उसमें शामिल होते हैं और रजिस्टर में हस्ताक्षर करते हैं तो उन्हें 2000 रुपये हर रोज का भत्ता मिलता है। कार्यालय खर्चों के लिए एक सांसद को 45000 रुपये प्रतिमाह मिलता है।
सांसदों को हर तीन महीने में 50 हजार रुपये यानी करीब 600 रुपये रोज घर के कपड़े धुलवाने के लिए मिलते हैं। सबसे खास बात ये है कि इनकी सैलरी पर कोई टैक्स नहीं मिलता। वहीं इन्हें मिलने वाले भत्ते कई तरह के होते हैं, जिनमें कई सुविधाएं इनके परिवार के लोगों के लिए भी होती हैं। इसमें वाइफ या पार्टनर के लिए 34 फ्री हवाई सफर, अनलिमिटेड ट्रेन का सफर और संसद सत्र के दौरान घर से दिल्ली तक सालाना 8 हवाई सफर भी शामिल हैं। एक सांसद को 50 हजार यूनिट फ्री बिजली, 1 लाख 70 हजार फ्री कॉल्स, 40 लाख लीटर पानी, रहने के लिए सरकारी बंगला शामिल है।
हबीबगंज रेलवे स्टेशन के निजीकरण से होने वाली यात्री असुविधा से सीख नहीं लेना
पूर्व से ही आईएसओ प्रमाणित रेलवे स्टेशन हबीबगंज को एनडीए के पिछले कार्यकाल के दौरान ही इसके पुनर्विकास व आधुनिकीकरण के नाम पर बंसल ग्रुप को ठेका पर दिया गया था। भारतीय रेल स्टेशन विकास निगम लिमिटेड (आईआरएसडीसी) और बंसल ग्रुप के बीच समझौते पर हस्ताक्षर के बाद से यह देश का पहला प्राइवेट रेलवे स्टेशन बन गया है। हबीबगंज स्टेशन के निजीकरण का अनुभव बताता है कि रेलवे का निजीकरण करोड़ों यात्रियों के लिए कितना घातक साबित हो सकता है। हबीबगंज स्टेशन पर सुविधा के नाम पर आर्थिक शोषण किया जा रहा है लगभग 10 गुना पार्किंग चार्ज वसूल किया जा रहा है बंसल पाथवे हबीबगंज लिमिटेड द्वारा। हबीबगंज स्टेशन परिसर में कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के बेसमेंट निर्माण के लिए मंजूरी से अधिक खुदाई की जा रही थी। इस मामले में जब शिकायत पर खनिज विभाग ने जांच किया तो पाया कि कंपनी के पास 2 हजार घनफीट की खुदाई की मंजूरी की तुलना में 10 गुना अधिक खुदाई की गई थी।
भारतीय रेल (आईआर) एशिया का दूसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क तथा एकल सरकारी स्वामित्व वाला विश्व का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है। 160 वर्षों से भी अधिक समय तक भारत के परिवहन क्षेत्र का मुख्य घटक रहा है। यह भारत का पहला और विश्व का सातवां सबसे बड़ी नियोक्ता इकाई है जिसके 13 लाख से भी अधिक कर्मचारी हैं। सरकार के तमाम कार्यों और नीतियों को देखते हुए देश की सबसे बड़ी नियोक्ता इकाई के निजीकरण के षड्यन्त्र से इंकार नहीं किया जा सकता है और अगर ऐसा हुआ तो बेरोजगारी का रिकार्ड स्तरीय दंश झेल रहे देश के युवाओं का हलकान होना तय है और आम जनता की जेब लूटकर चन्द पूंजीपतियों की तिजोरी में भर देने की यह नीति देश पर भारी पडऩे वाली है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल बिहार में रहते हैं।)
(जनचौंक.काम से धन्यवाद सहित)