रवि कंवर
प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना, देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी ने बड़े धूम धड़ाके से 2016 में आरम्भ की थी। इस योजना ने देश में पहले से चल रही राष्ट्रीय खेती बीमा योजना का स्थान ग्रहण किया था।
इस योजना में किसानों द्वारा अदा किए जाने वाले प्रीमियम के भाग को काफी कम कर दिया गया था। किसान ने खरीफ की फसलों के लिए तय प्रीमियम का 2 प्रतिशत तथा रबी की फसलों के लिए 1.5 प्रतिशत भाग देना होता है। शेष बचता प्रीमियम केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा आधा-आधा दिया जाना होता है। व्यापारिक तथा बागवानी की उपज के लिए किसान को 5 प्रतिशत भाग अदा करना होता है। इस योजना को आरम्भ करते समय प्रधानमंत्री साहिब ने इसको किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं के स्थायी समाधान व किसानों के लिए वरदान के तौर पर प्रचारित किया था। लेकिन विगत दो सालों में यह योजना सिर्फ निजी कम्पनियों के लिए ही वरदान सिद्ध हुई है। इन कम्पनियों ने अपनी जेब से बिना एक पैसे का निवेश किए सैंकड़ों करोड़ रूपए कमा लिए हैं। जबकि किसानों की जेब में से प्रीमियम के हिस्से के तौर पर पैसा निकाल कर उसकी लूट की गई है तथा जनता द्वारा विभिन्न टैक्सों के रूप में अदा की गई सार्वजनिक दौलत को लूटा गया है। यहां यह तथ्य नोट करने योग्य है कि निजी क्षेत्र की अधिकतर बीमा कम्पनियों के मालिक स्वदेशी तथा विदेशी इजारेदार है।
आइये, इन बीमा कम्पनियों की लूट पर एक निगाह डालें :
हरियाणा के आर.टी.आई कार्यकर्ता, पी.पी. कपूर द्वारा सूचना के अधिकार कानून के तहत केन्द्रीय कृषि मंत्रालय से प्राप्त सूचना के अनुसार :
* प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के पहले दो सालों, 2016-17, 2017-18 के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कम्पनी ए.आई.सी सहित 11 बीमा कम्पनियों ने 15,795.26 करोड़ रूपए लाभ कमाया।
* 2016-17 दौरान इन्होंने 22,362.11 करोड़ रूपए बतौर प्रीमीयम इक_े किए तथा इसमें से 3,01,26,403 किसानों को 15,902.47 करोड़ रूपए कृषि में हुए नुकसान के मुआवजे के तौर पर दिए गए। इस तरह 6,459.64 करोड रूपये मुनाफे के रूप में कमाये। अर्थात् इन कम्पनियों ने 530.30 करोड रूपये प्रति माह मुनाफा कमाया।
* 2017-18 में इस बीमा योजना के तहत बीमा कम्पनियों ने 25,045.87 करोड़ रूपये प्रीमियम के रूप में इक_े किए तथा 1,26,01,048 किसानों को नुकसान के मुआवजे के तौर पर 15,710.25 करोड़ रूपये बांटे। इस तरह से 9,335.62 करोड़ रूपये लाभ के रूप में कमाए, जो कि विगत वर्ष के मुनाफे से 44.52 प्रतिशत ज्यादा हैं। कम्पनियों ने प्रति माह 778 करोड़ रुपये का लाभ कमाया।
* यहां यह तथ्य भी काबिलेगौर है कि 2017-18 अर्थात् दूसरे साल फसल बीमा योजना अपनाने वाले किसानों की संख्या घट गई। यह 2016-17 के 5,72,17,159 की अपेक्षा 2017-18 में 4,87,70,515 रह गई, अर्थात 8,44,66,44 कम हो गई। परन्तु फिर भी 2017-18 के लाभ में, 2016-17 की अपेक्षा 44.52 प्रतिशत का इजाफा हुआ।
* एक और तथ्य जिस पर गौर करना बनता है कि इस लाभ का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र की कम्पनियों की तिजौरियों में गया है। सार्वजनिक क्षेत्र की कृषि बीमा कम्पनी ए.आई.सी ने 2016-17 में 21 प्रांतों में 2,46,83,612 किसानों का बीमा किया था, परन्तु 2017-18 यह संख्या कम होकर 1,50,000,00 के करीब रह गई तथा कमाई जो 2016-17 में 2,610.60 करोड़ थी, 2017-18 में सिर्फ 528 करोड़ रह गई। इस से स्पष्ट होता है कि सरकारों ने फसल बीमा करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कम्पनी ए.आई.सी की जगह निजी क्षेत्र को ज्यादा प्राथमिकता दी। यह वर्णन योग्य है कि सरकार ही बीमा कम्पनियों को जिले अलाट करती है।
* सार्वजनिक क्षेत्र की फसल बीमा कम्पनी ए.आई.सी. ने 2016-17 में किसानों से 7984.56 करोड़ रुपये बतौर प्रीमियम इक_े किए तथा 5373.96 करोड़ रूपये फसल को हुए नुकसान के मुआवजे के रूप में किसानों को दिए, साथ ही उसने इस क्षेत्र में से अपने पैर पीछे खींचने शुरू कर दिए तथा अब फसल बीमा क्षेत्र पूरी तरह 10 निजी क्षेत्र की बीमा कम्पनियों के सपुर्द है।
* कृषि अर्थव्यवस्था के नामचीन विशेषज्ञ डा. दविन्द्र शर्मा के शब्दों में—‘‘सरकार द्वारा शुरू की गई यह स्कीम, बीमा कम्पनियों के लिए मुनाफा कमाने की एक उत्तम योजना है। कृषि क्षेत्र में यह नई किस्म के दलाल पैदा हो गए हैं, जो अपनी जेब में से बिना एक पैसा निवेश किए सैंकड़ों करोड़ रुपयों के रूप में मुनाफे कमा रहे हैं।
* बैकों से कृषि ऋण लेने के लिए खेती का बीमा करवाना एक अनिवार्य शर्त है। जब भी वह ऋण लेते हैं तो उनके ऋण की रकम में से बीमें का प्रीमियम अपने आप कट कर सीधा ही बीमा कम्पनी को चला जाता है, इसी तरह हुए नुकसान का मुआवजा भी सीधा बैंक खाते में चला जाता है, जो कि ऋण के एवज में काट (्रस्रद्भह्वह्यह्ल) लिया जाता है। इस तरह ज्यादातर कृषकों को मुआवजे की राशि देखना तक नसीब नहीं होती।
* सैंटर फार साइंस एंड इवाइरनमैंट (सी.एस.सी.) नाम की संस्था ने 21 जुलाई 2017 को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के बारे मेें रिपोर्ट पेश करते हुए यह अति महत्वपूर्ण तथ्य उजागर किया कि पिछली खरीफ की फसल के दौरान बीमा कम्पनियों ने लगभग 10 हजार करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया है।
* सी.एस.सी. के अनुसार बीमा रैगुलेटरी तथा डिवैलपमैंट अथारटी द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार इन कम्पनियों ने 15,891 करोड़ रुपए बतौर प्रीमियम इक_े किए। जबकि अप्रैल 2017 तक किसानों द्वारा फसल को हुए नुकसान के पेश किए गए दावों में से महज एक तिहाई से थोड़े कम को स्वीकार किया तथा मुआवजे के तौर पर किसानों को 5,962 करोड़ रुपए दिए। इस तरह लगभग 10,000 करोड़ रूपए का मुनाफा इन बीमा कम्पनियों ने कमाया।
* ‘दी हिन्दू’ अखबार के कृषि तथा ग्रामीण मामलों के सम्पादक पी.साईंनाथ ने 3 नबम्वर 2018 को अहमदाबाद में किसानों की एक सभा को सम्बोधन करते हुए, बीमा कम्पनियों द्वारा किसानों की, की गई लूट की उदाहरण प्रस्तुत की :
महाराष्ट्र में 2 लाख 80 हजार के करीब किसानों ने अपने खेतों में सोयाबीन की खेती की। एक जिले में जहां अनिल अंबानी की बीमा कम्पनी ‘रिलाइंस बीमा’ ने फसल के बीमे किए थे, ने किसानों से 19.2 करोड़ तथा 77-77 करोड़ रुपए क्रमश: राज्य तथा केन्द्र सरकार से, कुल मिला कर 173 करोड़ रुपए बतौर प्रीमियम इक_े किए। किसानों की सोयाबीन की समूची फसल खराब हो गई। ‘रिलाइंस बीमा’ ने इस जिले के किसानों को मात्र 30 करोड़ रुपए मुआवजे के रूप में दिए। इस तरह ‘रिलाइंस बीमा’ ने एक ही जिले से 143 करोड़ रुपए, बिना एक भी पैसा खर्च किए कमा लिए।
* पी.साईंनाथ के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी तथा उनकी सरकार द्वारा किसानों के उद्धारकर्ता के तौर से प्रचारित की जा रही ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ राफेल हवाई जहाज घोटाले से भी बड़ा घोटाला बनने की ओर अग्रसर है। उन्होंने कहा, ‘‘यह घोटाला एक दैत्य का आकार ग्रहण करता जा रहा है तथा यदि यह योजना आने वाले कुछ सालों तक, इसका मौजूदा ढांचा परिवर्तित किए बिना चलते रहने की आज्ञा सरकार जारी रखती है, तो यह राफेल घोटाले से भी कहीं बड़ा घोटाला बन जायेगी। यह बीमा कम्पनियां तथा बैंकों को ढेरों मुनाफे प्रदान करने वाली योजना है। निजी बीमा कम्पनियां अपने पास से कोई भी पैसा खर्च किए बिना, इस योजना के जरिए जनता से सीधे तथा टैक्सों द्वारा लोगों के खून पसीने की कमाई से इक_ा किया गया धन लूट रही है। विगत 3 सालों में राज्य तथा केन्द्र सरकार द्वारा 66,000 करोड़ रुपए इस स्कीम में बहाए जा चुके हैं। इसके बदले में ‘मुआवजा’ जो कि किसानों को मिला, उनके साथ एक मजाक भर ही है। यह कम्पनियों द्वारा इक_े किए गए प्रीमियम का छोटा हिस्सा तथा हुए नुकसान के मुकाबले नाम-मात्र है।