मंगत राम पासला
जिस ढंग से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ समर्थित नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व के अंतर्गत केन्द्रीय सरकार अस्तित्व में आई है तथा उस द्वारा अपनाई जाने वाली आर्थिक नीतियों की दिशा तय की जा रही है वह हर हालत में भारत के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक पक्षों को प्रभावित करेगी । देश की राजनीति दक्षिणपंथ की ओर घूम गई है जिसके परिणामस्वरूप पूँजीपति व जागीरदारों की वर्ग सत्ता तथा साम्राज्यवाद की लूट व शोषण की नीति पहले से भी अधिक निर्दयी, बर्बर तथा जन विरोधी रूप धारण करेगी। विदेशी साम्राज्यवादी लुटेरों तथा देसी इजारेदार घरानों के मुनाफे बढ़ाने तथा सरल करने के लिए श्रम कानूनों में मजदूर विरोधी व्यापक परिवर्तन किए जा रहे हैं ताकि धन कुबेरों को निर्वध्न तथा निर्विरोध सस्ती श्रम शक्ति उपलब्ध करवाई जा सके। उपरोक्त लुटेरों तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों व कार्पोरेट घरानों को सस्ती जमीन उपलब्ध करवाने के लिए लोगों की जमीनों को बलपूर्वक हथिया कर ‘लैंड बैंक’ बनाने की तैयारियाँ की जा रही हैं। प्राकृतिक साधन पहले ही नाममात्र मूल्य पर कार्पोरेट घरानों व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की सेवा में उपस्थित किए जा चुके हैं। एक सौ पच्चीस करोड़ लोगों का बाजार तो मोदी सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में ही देसी तथा विदेशी धन कुबेरों के हवाले कर दिया था तथा इस कार्यकाल में इसी नीति के अंतर्गत पहले ही सिसक रहे लघु तथा मध्यम कारोबार तथा उद्योगों का बर्बाद होना लगभग तय है। सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था तथा संविधानिक संस्थाओं में सीधे-टेढ़े रूप में साम्राज्यवादी जकड़ इतनी दृढ़ तथा कठोर है, जिसे तोडऩा शोषक वर्गों के रक्षक राजनीतिक दलों या सरकार के न तो वश में है न ही उनसे आवश्यक इच्छाशक्ति जुटाने की आशा की जा सकती है। साम्राज्यवादियों से युद्धनीतिक तालमेल के कारण हमारे देश की आत्म निर्भरता तथा प्रभुसत्ता सम्पन्न आजाद देश के रूप में पहचान पहले ही धँुधली हो चुकी है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ समर्थित केन्द्रीय सरकार साम्प्रदायिक फासीवादी कार्यक्रम पर तेजी से आगे बढ़ रही है । देश के धर्म निरपेक्ष तथा लोकतांत्रिक ढांचे के प्रति बहुत बड़े खतरे विद्यमान हैं। हम मध्यकालीन युग की ओर तेजी से वापिस जा रहे हैं जहाँ सनातनवादी-मनुवादी व्यवस्था के अंतर्गत जाति-पाति, महिला-उत्पीडऩ तथा अँधविश्वासों पर आधारित रूढ़ीवादी विचारधारा का बोलवाला होगा। इतिहास के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पौराणिक या मिथ्या-ऐतिहासिक दृष्टिकोण में परिवर्तित किया जा रहा है। भारतीय संविधान में शाब्दिक परिवर्तन के बिना ही मोदी सरकार उसे अपनी साम्प्रदायिक इच्छाओं के अनुरूप ढाल रही है।
कोई भी सरकार या राजनैतिक पार्टी जो मोदी सरकार की ही भाँति साम्राज्यवादी नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों का अनुसरण करती है, उपरोक्त चिंताजनक परिस्थितियों को कभी भी नहीं बदल सकती केवल व्यक्तियों या राजनीतिक पार्टियों का बदलना देश की जनता के भाग्य को रत्ती भर भी इधर-उधर नहीं कर सकता। इसके लिए एक वैकल्पिक आर्थिक नीति तथा उसे लागू करने के लिए जनहितैषी राजनीति के साथ प्रतिबद्धता रखने वाला एक शक्शिाली ग्रुप या दल वांछित होगा। यह कार्य कम्युनिस्ट तथा अन्य वामदलों की एकता, दृढ़ता तथा संघर्षशील लोगों के जनसंगठनों के परस्पर सहयोग, नेतृत्व तथा संघर्षों द्वारा ही संभव हो सकता है।
आज जब लोकसभा चुनावों में सभी कम्युनिस्ट तथा अन्य वामपंथी दल लगभग हाशिए पर जा पहुँचे हैं, तथा दूसरी ओर देश के समूह श्रमिक वर्ग (जिनकी बाँह केवल यही वामपंथी दल पकड़ते हैं) के अंदर जीवन-यापन की कठिनाइयों सम्बन्धी गम्भीर चिंता तथा मायूसी है, उस समय सभी कम्युनिस्ट पार्टियां तथा ग्रुप स्वयं अपने आप तथा सभी के साथ मिल बैठकर श्रमिक जनसमूहों के वाम दलों में इस सीमा तक सिकुड़ जाने के कारणों की छानबीन करने की आवश्यकता है। किसी अंहकार या घटिया सोच के अंतर्गत या वास्तविक मुद्दों को नजरअंदाज करके केवल सतही कमजोरियों पर उंगली रखते हुए समय गुजारना आत्मघाती सिद्ध हो सकता है। कम्युनिस्ट नेताओं की नेक-नीयत पर शंका किए बिना हमें पिछले दिनों दो बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों के आपस में मिल कर एक पार्टी के गठन का नारा पिछली राजनैतिक चूकों तथा कमजोरियों पर परदा डालने की क्रिया ही समझना चाहिए। वाम आंदोलन के कमजोर होने के खतरों की उचित चिंता करते हुए इसके वास्तविक कारणों को नजरअंदाज करना उससे अधिक खतरनाक है। सैद्धान्तिक और राजनैतिक दुर्बलताओं को छिपाने का प्रयत्न किया जाएगा तो यह कम्युनिस्ट सिद्धान्तों तथा जनहितों से दगाबाजी करने के समान होगा।
कम्युनिस्ट आंदोलन की एक धारा माओवादियों की है जो वर्तमान स्थिति में सिर्फ सशस्त्र संघर्ष द्वारा देश की सत्ता पर बैठी पूँजीपतियों-जगीरदारों के हितों की रक्षा करने वाली सरकार का तख्ता पलट करके समाजवादी तथा जनलोकतांत्रिक लक्ष्य प्राप्ति की समझदारी पर अमल कर रही है। कुछ ऐसे नक्सलवादी ग्रुप भी हैं जो सैद्धान्तिक रूप में माओवादियों की युद्धनीति को सही करार देते हैं लेकिन खुद इस रास्ते पर चलने का साहस नहीं कर रहे। इसमें कोई संदेह नहीं कि उपरोक्त वर्णित ‘कम्युनिस्टों-माओवादियों’ के अंतिम लक्ष्य के बारे में किसी का कोई मतभेद नहीं हो सकता तथा उनकी ओर से इस लक्ष्य प्राप्ति के लिए किए जा रहे सरकारी अत्याचारों तथा जुल्मों का मुकाबला करने के उनके साहस को भी कोई सच्चा कम्युनिस्ट कम करके नहीं आँक सकता। माओवादियों के आंदोलन से निपटने के लिए भारतीय शासकों के अकथनीय अत्याचारों से भी हम कभी सहमत नहीं हो सकते। माओवादियों के साथ हमारा मतभेद देश की वर्तमान परिस्थितियों के मुल्यांकन, शासक वर्ग की जनसमूहों में राजनैतिक पकड़ की मात्रा तथा राज्य सत्ता की क्रांतिकारी आंदोलन पर जुल्म-सितम ढाने की शक्ति तथा उसका मुकाबला करते हुए समाजवादी क्रांति के अंतिम लक्ष्य की जीत प्राप्त करने के लिए जनसमूहों के राजनीतिक चेतना के स्तर से है। इस स्थिति को देखते हुए आज केवल कुछ क्षेत्रों में सेना जैसे सशस्त्र संघर्ष द्वारा क्रांति का लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। क्योंकि माओवादी धारा के लोग लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने वाले कम्युनिस्ट दलों की पूर्ण रूप से निंदा करते हुए उनकी तुलना शासक वर्ग के एक हिस्से के रूप में ही करते हैं, इसलिए माओवादियों ने सेनानुमा हिंसक आंदोलन को मौजूदा रूप में ही जारी रखना है या अति-वाम भटकाव से छुटकारा पाकर देश के अन्दर एक सुदृढ़ तथा जन समुहों पर आधारित क्रांतीकारी आंदोलन निर्मित करने का मार्ग अपनाना है, यह निर्णय उन्हें ही या उनसे सम्बन्धित ग्रुपों अथवा दलों को ही करना हैं। हमारी पक्की राय है कि ठीक लक्ष्य तथा भारी बलिदानों के बावजूद वर्तमान राजनीतिक शक्तियों के संतुलन के कारण उपरोक्त ढंग से अर्थात सशस्त्र संघर्ष से इस समय सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती।
जो कम्युनिस्ट दल या ग्रुप देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेते हैं, उन्हें पिछले समय में छेड़े गए संसदीय तथा गैर संसदीय संघर्षों के बावजूद श्रमिक जनसमूहों, नवयुवकों तथा मध्यवर्गीय लोगों में वाम आंदोलन/लहर के बड़े स्तर पर सिकुडऩे या कमजोर हो जाने के कारणों का गहराई में मंथन करने की आवश्यकता है। मेहनतकश लोगों के संघर्षों की मात्रा, विधि तथा संचालन विधियाँ तथा संगठनात्मक कमजोरियों को समझने से पहले राजनीतिक लक्ष्यों, वर्गीय मित्रों तथा शत्रुओं को चिह्नित करना तथा जनसमूहों में वाम आंदोलन के प्रति विश्वास में आई कमी के कारणों का पता लगाना आवश्यक होगा।
पिछले 72 वर्षों के अनुभव के आधार पर क्या विभिन्न कम्युनिस्ट दल भारत के शासक वर्ग के उचित वर्ग चरित्र तथा उनके द्वारा अपनाई गई आर्थिक नीतियों तथा इन नीतियों की दिशा से निकले परिणामों का ठीक मुल्याँकन नहीं कर सकते? क्या हम वर्गीय संघर्षों की ऐतिहासिक महत्ता को सामने रखते हुए, इसे आने वाले समय में पूरी शक्ति लगा कर तेज करने के लिए आगे नहीं आ सकते? माक्र्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा के ज्ञानी जानते हैं कि संघर्षों के दोनों रूपों संसदीय तथा गैर संसदीय में से अधिक बल गैर संसदीय संघर्षों पर दिया जाना चाहिए जो अंतिम रूप में सामाजिक परिवर्तन का मुख्य कारक बनता है। क्या हम पिछले समय में शासक वर्ग से की गई राजनैतिक मेल-मिलाप की लाभ-हानि का हिसाब नहीं लगा सकते ताकि उसके आधार पर भविष्य में उचित मार्ग पर चला जा सके? क्या हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले कम्युनिस्ट, देश की राजसत्ता पर विराजमान साम्प्रदायिक फासीवादी सरकार की नीतियों से पैदा होने वाले खतरों को उनके असली संदर्भ में नहीं पहचान सकते तथा उनका मुकाबला करने के लिए वाम, लोकतांत्रिक तथा प्रगतिशील शक्तियों की एकता के लिए संकीर्ण विचारों से ऊपर नहीं उठ सकते? मतभेद होते हुए भी विभिन्न कम्युनिस्ट दल सांझे मुद्दों पर सांझी राय बनाकर एकजुट होकर सांझे संघर्ष लामबन्द करने से क्यों मुँह मोड़ रहे हैं? वे इसकी महानता तथा आवश्यकता को क्यों नहीं समझ रहे?
क्रांति के लक्ष्य को अंतिम रूप में सफल करने की विधि के बारे में चाहे मतभेद हों लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सभी प्रकार के संघर्षों में जनसमूहों का विशाल स्तर पर शामिल होना अति आवश्यक है। इसलिए जनसंघर्षों के आंदोलन को विशाल से विशालतम किए जाने की आवश्यकता क्या सभी दलों के लिए सांझा आधार नहीं बन सकती?
उपरोक्त लिखित सभी मुद्दों पर सभी वाम दलों के प्रतिनिधि मिल बैठ कर विचार-विमर्श कर सकते हैं। प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों-सी.पी.आई. तथा सी.पी.आई(एम.) को इस दिशा में जल्दी ही पहल करने की आवश्यकता है। यदि ये पार्टियाँ ऐसा नहीं करतीं तो दूसरे छोटे वाम ग्रुपों को आपसी विचार-विमर्श का सिलसिला आरम्भ करना चाहिए। किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को अन्तरमुखी विचारों के आधार पर किसी दूसरे ग्रुप के बारे में संकीर्णतावादी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए। सैद्धांतिक दृढ़ता तथा बाह्य अवस्थाओं का मुल्याँकन का एकाधिकार किसी भी दल या नेता के पास नहीं हैं, यह समय ने सिद्ध कर दिया है। प्रत्येक कम्युनिस्ट दल की अपनी विशेषतायें तथा दुर्बलताएँ होंगी। इसी प्रकार प्रत्येक कम्युनिस्ट दल ने अपनी समझ के अनुसार तथा सामथ्र्य के अनुसार जनसमूहों का क्रांतिकारी आंदोलन निर्मित करने तथा आगे बढ़ाने में योगदान दिया है। सौ वर्ष के कम्युनिस्ट इतिहास में अनेक स्वर्णिम संघर्ष तथा गणना योग्य प्राप्तियाँ की गई हैं। इन संघर्षों में कम्युनिस्ट के बलिदान भी वाम आंदोलन की शान बढ़ाने वाले हैं। लेकिन बलिदानों तथा प्राप्तियों के बावजूद कम्युनिस्ट लहर/आंदोलन में आए ठहराव/गिरावट के कारणों पर विचार न करना उन्हें आँखों से ओझल करना एक अपराधिक भटकाव होगा। क्रांतिकारी आंदोलन के उज्जवल भविष्य के लिए कम्युनिस्ट दलों द्वारा बीते समय में की गई भूलों को हर कीमत पर सुधारा जाना चाहिए तथा मौजूदा स्थिति का बाह्य मुल्यांकन करके उचित दाव-पेंच तथा उचित नारे रचे जाने चाहिए।
ऐसा करते हुए एक पड़ाव पर सैद्धांतिक तथा संगठनात्मक रूप में सारे कम्युनिस्ट आंदोलन का एक दल के रूप में एकता का लक्ष्य भी प्राप्त किया जा सकता है। भावनाओं के प्रबल वेग में बहकर तुरन्त कम्युनिस्ट एकता का नारा देना यर्थाथवादी नहीं है। यह नारा विभिन्न कम्युनिस्ट दलों की ओर से जनसमूहों के सांझे संघर्ष तथा एकता द्वारा ही सच्चाई में बदला जा सकता है।