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आगामी लोक सभा चुनावों के सम्बन्ध में आर.एम.पी.आई. का दृष्टिकोण

आगामी लोक सभा चुनावों के सम्बन्ध में आर.एम.पी.आई. का दृष्टिकोण

मंगत राम पासला
इसी वर्ष, निकट भविष्य में होने वाले लोक-सभा के चुनावों के लिए सभी राजनैतिक पार्टियां तैयारी में जुट गई हैं। इस  बार मुख्य रूप में मुकाबला एक ओर भाजपा तथा इसके समर्थकों के गठबंधन (हृ.ष्ठ.्र.) तथा दूसरी ओर कांग्रेस तथा इसके सहयोगियों के बीच है। कुछ ऐसे राजनैतिक दल भी हैं जैसे:- बसपा एस.पी. इत्यादि जो भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस का समर्थन करने की अपेक्षा अपना अलग मोर्चा बनाने को प्रमुखता दे रहे हैं। कई राजनैतिक दलों ने अभी अपना राजनैतिक दांव-पेच तय करना है। वैसे देश के राजनैतिक मानचित्र पर चुनाव दंगल के लिए दो राजनैतिक-केन्द्र भाजपा (समर्थकों सहित) तथा गैर-भाजपा राजनैतिक दल, सत्ता की दौड़ में हैं। चुनावों की घोषणा होने तक, बहुत सारे राजनैतिक दलों के नेताओं ने परस्पर राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए, बिना किसी सिद्धान्त या ठोस नीति के, अपनी अवसरवादी प्रमुखताओं को बदलते जाना है।
देश की परंपरागत वामपंथी राजनैतिक पार्टियां, मुख्य रूप से सी.पी.आई. तथा सी.पी.आई.(एम) ने, इस चुनाव-युद्ध में  भाजपा को हराने के लिए, कांग्रेस या अपनी सुविधा के अनुसार अन्य गैर-भाजपा राजनैतिक दलों के साथ हाथ मिलाने का फैसला कर लिया है। इससे भी आगे ये राजनैतिक-दल, चुनावों के बाद, केन्द्र में गैर-भाजपा सरकार की स्थापना का लक्ष्य सोचे बैठी हैं, जिसमें उनकी भागीदारी हो सके।
संसार भर में, नौंवे दशक के दौरान समाजवादी सोवियत यूनियन तथा पूर्वी यूरोप के अन्य समाजवादी देशों में समाजवाद को पहुंचे बड़े आघातों की रोशनी में, भारत के हाकिमों ने, विश्वीकरण, उदारीकरण तथा निजीकरण के चौखटे के अधीन नव-उदारवादी आर्थिक-नीतियों की राह पकड़ ली थी। इस में शंका नहीं कि आर्थिक विकास का यह माडल बाकी दुनियां के विकासशील देशों की तरह भारतीय जनता की भीं तबाही का कारण बन रहा है। बेरोकागारी, $गरीबी, महंगाई, तालाबंदियां, कृषि-संकट, स्वास्थ्य तथा शिक्षा सम्बन्धी सुविधाओं का व्यापारीकरण, प्राकृतिक-साधनों की बेरोक-टोक लूट तथा पर्यावरण की तबाही, ये सब इसी विकास-माडल की ‘उपलब्धियां’ हैं। ये जन विरोधी नीतियां, चाहे कांग्रेस के शासनकाल के दौरान शुरू की गई थीं लेकिन पिछले लगभग पांच वर्षों से भाजपा की मोदी-सरकार पहले से भी कहीं अधिक तेकाी से इन्हें लागू कर रही है। इन नीतियों के कारण ही देश में $गरीबी-अमीरी की खाई खतरनाक हद तक पहुंंच गई है तथा कुल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) अस्थिर है तथा औद्योगिक उत्पादन की दर लगातार नीचे जा रही है। जो दुर्गति भारतीय रुपये की हो रही है, उसने पहले सारे रिकार्ड मात पा दिये हैं।
केन्द्र में चल रही भाजपा की मोदी सरकार तथा राज्यों की भाजपा सरकारें आर.एस.एस. के निर्देशन पर अमल करते हुए देश के वर्तमान लोकतांत्रिक तथा धर्म-निरपेक्ष ढांचे को एक धर्म पर आधारित देश (हिन्दू-राष्ट्र) में बदल डालने की मुकाबलेबाकाी में लगी हुई हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये संघ-परिवार की ओर से अल्प-संख्यकों, विशेषत: मुस्लिम भाईचारे, दलितों, औरतों, आदिवासियों तथा प्रगतिशील बुद्धिजीवियों पर योजनाबद्ध ढंग से हमले किये जा रहे हैं। देश के महत्त्वपूर्ण संस्थाओं जैसे: न्यायपालिका, सी.बी.आई. रिजर्व बैंक, नीति-आयोग तथा यहां तक कि सुरक्षा-एजंसियों में भी संघ की विचारधारा के घोर समर्थक तथा साम्प्रदायिक दृष्टिकोण वाले लोगों की घुसपैठ के द्वारा कब्जा किया जा रहा है। मोदी सरकार ने, सभी गुट-निरपेक्ष तथा साम्राज्य-विरोधी परम्पराओं का पूरी तरह त्याग करके साम्राज्यवाद के साथ युद्धनीतिक साझेदारी विकसित कर ली है, जिससे देश की आकाादी एकता, अखंडता तथा आत्म-निर्भर आर्थिक-विकास को नई खतरनाक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
इन परिस्थितियों में, भारतीय क्रांतिकारी माक्र्सवादी पार्टी (आर.एम.पी.आई.) ने लोक-सभा चुनावों में भाग लेने के लिए अपने चुनावी दांव-पेच तथा नारे तैयार किये हैं। पार्टी, सामाजिक-परिवर्तन (वर्ग-रहित, जाति-रहित तथा नारी-मुक्ति की ओर निर्देशित धर्म-निरपेक्ष समाज के निर्माण) के लक्ष्य को सामने रखती हुई, चुनावों को भी अन्य संघर्षों के समान ही संघर्ष का एक रूप समझती है न कि अपना अंतिम लक्ष्य। चुनावों में भाग लेने का हमारा उद्देश्य भी, युद्धनीतिक-लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, एक विशाल क्रांतिकारी जन आंदोलन का निर्माण करना है। अल्पकालिक लाभों को प्राप्त करने के लिए अन्तिम-लक्ष्यों को आंखों से ओझल नहीं किया जाना चाहिये। आर.एम.पी.आई. ने सांप्रदायिक फाशीवादी शक्तियों के खतरों को अनुभव करते हुए तथा साम्राज्यवाद द्वारा निर्देशित नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों द्वारा देश के मेहनतकश लोगों, प्राकृतिक-स्त्रोतों तथा पर्यावरण की तेकाी से की जा रही तबाही को प्रमुखता देते हुए फैसला किया है कि इन चुनावों में:
छ्व सांप्रदायिक भाजपा तथा इसके नेतृत्व वाले गठजोड़ को पूरी शक्ति से हराया जाये,
छ्व वामपंथी तथा लोकतांत्रिक शक्तियों को मकाबूत किया जाये।
उपरोक्त दोनों कार्यों को सफलता सहित पूरा करने के लिए, जहां अन्य वामपथी, लोकतांत्रिक तथा धर्म-निरपेक्ष शक्तियों के साथ ज्यादा से ज्यादा सहयोग करने का प्रयत्न किया जायेगा वहीं कांग्रेस, सांप्रदायिक पार्टियों तथा किसी भी उस दल के साथ, जो साम्राज्य निर्देशित, नव-उदारवादी आर्थिक नीति को घोर समर्थक हो, के साथ किसी भी किस्म की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में सांझ या गठजोड़ बिल्कुल नहीं किया जायेगा।
जहां, आर.एम.पी.आई., संघ परिवार द्वारा समर्थन-प्राप्त भाजपा की ओर से देश के लोकतांत्रिक तथा धर्म-निरपेक्ष ताने-बाने को नष्ट करने के लिए पैदा किये जा रहे गंभीर खतरों को अनुभव करती हुई, भाजपा के इस गठबंधन को हराने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा देगी, वहां पार्टी, इस लक्ष्य को भी भली-भांति समझती है कि जिन आर्थिक नीतियों से देश का मकादूर जन-समूह गंभीर रूप से पीडि़त है उन नीतियों को लागू करने वाली पार्टियों तथा सरकारों से किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग वामपंथी-आंदोलन के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है। पहले ही वर्ग-सहयोग तथा संसदीय-राजनैतिक अवसरवाद की गाड़ी पर सवार होकर देश की धारा में मग्न पारंपरिक कम्युनिस्ट पार्टियों ने वामपंथी आंदोलन को कभी भी पूरा न होने वाला नुकसान पहुंचाया है। वर्तमान में, देश में राजनैतिक शक्तियों का संतुलन ऐसा नहीं है कि कोई भी सरकार जो इन लोक-सभा चुनावों के पश्चात गठित होगी वह इन नीतियों में कोई बुनियादी-परिवर्तन लाने में योग्य होगी या ऐसा करने की राजनैतिक इच्छा शक्ति से ओत-पोत होगी। इस महान कार्य को करने के लिए एक सुदृढ़ कम्युनिस्ट पार्टी तथा वामपंथी आंदोलन की जरूरत है। इस प्रकार का लक्ष्य तो पूंजीपति-सामंतवादी वर्गों की राजनैतिक-पार्टियों से बिल्कुल भिन्न तथा जन-समर्थक राजनैतिक तथा आर्थिक निर्देशों के आधार पर विशाल लोकतांत्रिक आंदोलन ही प्राप्त कर सकता है। कुछ सीटों या वोटों के लिए वामपंथी-आंदोलन की इस दरुस्त सैद्धांतिक-पहचान को धुंधली करना माक्र्सवादी-लैनिनवादी-सिद्धांत से विश्वासघात है। वामपंथी पार्टियों को, लूट-खसूट करने वाले सत्ताधारी वर्गों के साथ किये गये कई किस्म के सहयोग तथा निकटता, पहले ही, मेहनतकश-लोगों के मन मेें इन राजनैतिक-दलों के प्रति विश्वास में काफी हद तक कमी ला चुका हैं।
इसलिए आर.एम.पी.आई. जहां भाजपा को सत्ता से दूर करने के लिए किसी भी प्रकार की कसर बाकी नहीं छोड़ेगी, वहीं वर्तमान परिस्थितियों में, केन्द्र में भावी सरकार की संभावित जन-घातक आर्थिक-नीतियों का विरोध करने तथा चुनावों के दौरान किये गये वायदों को पूरा करवाने के लिए, वामपंथी आंदोलन की मकाबूती के लिए हर संभव प्रयत्न करेगी तथा साधन जुटायेगी। भाजपा की पराजय तथा नयी गैर-भाजपा सरकार की स्थापना के लिए वामपंथी-आंदोलन को लोगों की नकारों में सिद्धांतहीन या शोषक-वर्गों के साथ साझेदारी करने वाली राजनैतिक-शक्ति के रूप में स्थापित करने का क्रम लम्बे समय के लिए, क्रांतिकारी आंदोलन के विकास के लिए, कभी भी लाभदायक साबित नहीं हो सकता।
देश का कम्युनिस्ट-आंदोलन, एक महत्त्वपूर्ण राजनैतिक-कारक होने के बावजूद, अभी तक न तो अपने बलबूते पर भाजपा को पराजित करने तथा न ही गैर-भाजपा सरकार को कायम करवाने में अपनी सिद्धांतपूर्ण भूमिका निभाने के लिए योग्य है तथा न ही किसी ऐसी सरकार (पूंजीपति-सामंतवादी-वर्गों वाली सरकार जिस का नेतृत्व बड़ा पूंूजीपति-वर्ग कर रहा हो), में वामपंथी-शक्तियों की ओर से, उस में सरगर्म भूमिका निभाना, लोकतांत्रिक-आंदोलन के विकास में सहायक-सिद्ध हो सकता है। नयी $गैर-भाजपा सरकार की स्थापना पूंजीपति तथा सामंतवादी सरकारों का अपना उत्तरदायित्व है, जो उन्होंने खुद पूरा करना है। कम्युनिस्टों ने तो नई सरकार के प्रति अपना दृष्टिकोण, उसकी समूची नीतियों के गुण-दोषों के आधार पर ही तय करना है जबकि इस के स्वरूप, बुनियादी रूप से, इस के विरोध के सम्बन्ध में तो किसी भी प्रकार की शंका की गुंजायश नहीं रहनी चाहिये।
भारतीय क्रांतिकारी माक्र्सवादी पार्टी (आर.एम.पी.आई.) चुनावों में भाजपा-विरोधी, $गैर-कांग्रेसी राजनैतिक-दलों, पक्षों या व्यक्तियों के साथ, उपरोक्त लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किसी संपर्क या लेन-देन करने के अवसरों की तलाश करेगी, जो इसके चुनावी दांव-पेचों को ध्यान में रखकर तय किये जायें। इसके साथ ही पार्टी ने फैसला किया है कि चुनावों में उन क्षेत्रों में ही अपने उम्मीदवार खड़े किये जायेंगे जहां पार्टी का जन-आधार काडर या जन-संघर्षों की विरासत मौजूद हो। अनावश्यक तथा शक्ति से बाहर जाकर अपने उम्मीदवार खड़े करने से गुरेज करेगी।
आर.एम.पी.आई. देश की वर्तमान परिस्थितियों में, इस सब से स्पष्ट तथा सिद्धांतपूर्ण चुनावी-दृष्टिकोण (पहुंच) को दरुस्त समझती है। जो इसकी अन्य बायें या दायें भटकाव के शिकार वामपंथी-दलों से अलग पहचान बनाने में मदद करेगा तथा देश में एक वास्तविक क्रांतिकारी पार्टी के रूप में वामपंथी-शक्तियों की एकता के लिए एक ईमानदार राजनैतिक-शक्ति के रूप मेें स्थापित करेगी। पारंपरिक तथा बायें भटकाव की शिकार कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ  न्यूनतम सहमति प्राप्त मुद्दों पर एकता कायम करने के लिए, आर.एम.पी.आई. सदा अपने प्रयत्नों को जारी रखेगी, क्योंकि सिर्फ यह ही एक ऐसा रास्ता है वर्तमान परिस्थितियों मेें वामपंथी-लोकतांत्रिक आंदोलन को विकसित करने का। यदि वामपंथी नेता, इन प्रयत्नों के प्रति कोई सार्थक दृष्टिकोण या व्यवहार नहीं दिखाते, तब भी आम जनसमूहों तथा वामपंथी दलों का जन-आधार तो एक दिन इस क्रांतिकारी आवाज को जरुर सुनेगा। आर.एम.पी.आई. का यह संकल्प तथा दृढ़-विश्वास स्पष्ट है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, आर.एम.पी.आई. स्वतन्त्र रूप में, जन-संर्घषों द्वारा अपने जन-आधार को मकाबूत तथा विशाल करने के लिए क्रांतिकारी संघर्ष को जारी रखेगी।                          हिन्दी रुपांतरण-म.ल.राही

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