मदन कोथुनियां
जम्हूरियत में चुनाव कोई जंग का मैदान नहीं होता। चुनाव के माध्यम से अगले पांच साल के लिए बेहतर जन-प्रतिनिधियों का चयन किया जाता है। सत्ताधारी पार्टी चुनाव के मैदान में उतरती हैं तो अपने पिछले घोषणापत्र व बीते पांच साल का लेखा जोखा पेश करते हुए अगले पांच साल का रोडमैप सामने रखती हैं। विपक्षी पार्टियां सत्ताधारी पार्टी के कार्यों, नीतियों की खामियां जनता के सामने रखती हैं। क्या और कैसे उनसे बेहतर विकान वो अवाम के सामने रखती हैं। जनता अपने विवेक से बेहतर का चयन करती है। क्या इस चुनाव के दौरान आपने कभी महसूस किया कि राजनैतिक पार्टियां लोकतांत्रिक सिद्धांतों का कहीं पालन कर रही थीं?
यह चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया कम युद्ध ज्यादा था। जिसके विकास का दावा था उनके सुख-दु:खों की कहीं चर्चा नहीं, घोषणापत्र छापकर कूड़ेदान में फेंक दिए गए, भाषा की तमाम मर्यादाएं लांघी गईं। कटुता व द्वेष से लबरेका राजनैतिक भाषणबाजों के पीछे गाली-गलौच वाले उन्मादी युवाओं की फौज थी! नजारा दो दुश्मन देशों के बीच युद्ध से बदतर था। हर बार के चुनाव देश की एकता, अखंडता व संप्रभुता के दावों व इरादों पर लड़ा गया मगर इस बार चुनाव की प्रक्रिया ही देश को खंडित करने वाली, विरोधी विचारों को कुचलने वाली, विपक्षियों, जागरूक नागरिकों को देशद्रोही/गद्दार बताकर नफरत फैलाने वाली रही!
जमकर ऐतिहासिक गड़े मुर्दों को खोदा गया, मीडिया को सत्ता का मुखौटा बनाकर जनता को भ्रमित करने के लिए छोड़ दिया गया! एक मजहब को दूसरे मजहब का दुश्मन बताकर खड़ा किया गया और मजहब का स्थान हिंसा ने लिया। धार्मिक नारों के साथ हिंसा को जस्टिफाई किया गया! यह जाहिर कर दिया कि देश का मुसलमान दंगों की सियासत में उपयोग लिये जाने की वस्तु मात्र है! तमाम किसान जातियों को किसानियत के मुद्दों से उठाकर मजहबी राजनीति के भंवरजाल में फंसाकर तोड़ा गया, रौंदा गया! भूख, भ्रष्टाचार पर चर्चा के बजाय भय का माहौल पैदा किया गया!
न राममंदिर बना, न धारा 370 हटी, न बांग्लादेशी-रोहिंग्या लौटे, न कश्मीरी पंडित घर पहुंचे! न युवाओं को रोजगार मिला, न किसानों की आय दुगुनी हुई, न गरीबों को रोटी नसीब हुई और न मूलनिवासियों पर अत्याचार कम हुए! ऐसा लगा कि खिलाड़ी घोड़ों को आपस मे लड़ा रहा है! देश के भीतर ही कई देश खड़े नजर आए और आपस में ही लड़ाकर वतन के माथे को कलंकित करने का खेल चलाया गया!
खुलेआम तलवारें लहरा रही थीं! भारत माता की जय बोलने वाला ही देशभक्त, ‘‘भारत में रहना होगा तो वन्दे मातरम कहना होगा’’ सरीखे नारों से टीवी स्टूडियो से लेकर गली-कूचे गुंजायमान रहे! हिन्दू राष्ट्र की रोज धौंस जमाती साम्प्रदायिकता की गोलियां कभी कलबुर्गी तो कभी गौरी लंकेश को लीलती रही! लोकतंत्र की बस यही मजबूरी है कि वक्त बेवक्त गुजरात, मुजफ्फरनगर, हरियाणा या कश्मीर दोहराया नहीं जा सकता और हर कहीं सलवाजुड़ूम भी नहीं आजमाया जाता। इसी मजबूरी का नाम लोकतंत्र है वरना हत्यारों का तिरंगे में जनाजा व बलात्कारियों के समर्थन में रैलियां करके हमने साबित किया है कि हम मुकम्मल हिंदू राष्ट्र ही हैं!
मैं नहीं तो कौन, का जाली कांसेप्ट आम जन के दिमाग में इस तरह भरा गया कि तर्क-विवेक की सारी क्षमताएं गौण हो गईं। धमकियां, रोब व एक दूसरे को खत्म करने सरीखी शत्रुता चरम पर व बदले की भावना जनमानस में कूट-कूटकर इस कदर भरी गई कि चुनाव परिणाम के बाद भी थमने के बजाय बढ़ती नजर आ रही है। 70-80 के दशक में जिस तरह देश उलझा था उससे बदतर हालात में पहुंचा नजर आता है!
धर्म व सत्ता का गठजोड़ होता है तो मानवता का कत्लगाह साथ-साथ तैयार होता जाता है। लोकतंत्र की सियासत व सत्ता में धर्म को कोई जगह नहीं होनी चाहिए, मगर पिछले पांच सालों में हमने देखा है कि सत्ता ही धर्म थी और और धर्म ही सत्ता। मजहबी सत्ता जब चुनावी मैदान में उतरती है तो उसके लिए लोकतांत्रिक मर्यादाएं, नैतिकता, सर्व-धर्म समभाव, सबका साथ सबका विकास, सहिष्णुता जैसी बातें कोई मायने नहीं रखती।
जब जनरल बक्शी जैसे लोग कहते हैं कि हमने जेएनयू फतेह कर ली है अब जादवपुर यूनिवर्सिटी पर कब्जा करना है और तोप तैनात करने की बातें गूंज रही हों तो हमें याद रखना चाहिए कि पाकिस्तान की मजहबी हुकूमत ने ढाका विश्विद्यालय में बख्तरबंद तोपें भेजकर बागी जेहन पैदा करके कत्लेआम मचाया था। बाबरी मस्जिद को गोला-बारूद से व स्वर्णमंदिर को तोपों से गिराने वाले देश में यह नामुमकिन तो नहीं है!
जब आतंक की आरोपी को टिकट दिया जाता है और वो कहती है कि हेमंत करकरे देशद्रोही है, मेरे श्राप से मरा है व विरोध होता है तो सत्ताधारी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष कहता है कि यह हमारा आतंकवाद के खिलाफ सत्याग्रह है और देश तमाशबीन बन जाता है क्योंकि तानाशाही व हिन्दू राष्ट्र से भयभीत समाज बोलने की हिम्मत हार जाता है। हिम्मत व हौसला हारा समाज देश को कभी मजबूत नहीं कर सकता है। इस चुनाव में देश ही नहीं, समाज ही नहीं बल्कि सियासत हारी है! लोकतंत्र हारा है! सत्ता-मीडिया-पूंजीपतियों के नेक्सस के आगे आम-अवाम हारी है।
नाथूराम गोडसे, बाबू बजरंगी, माया कोडनानी, शम्बू रैगर सहित अखलाक, पहलू खां, कलबुर्गी, गौरी लंकेश आदि के हत्यारों की पूजा शुरू हो जाए या चौक-चौराहों पर बड़े-बड़े स्टैचू बनने लगें तो कोई अचरज नहीं करना चाहिए क्योंकि सत्ताधारी पार्टी ने तमाम बुनियादी मुद्दों व सिद्धांतों को दरकिनार करते हुए इन्हीं मुद्दों की आड़ में छुपे राष्ट्रवाद, देशहित व हिन्दूराष्ट्र के नाम पर चुनाव लड़ा और इन्होंने प्रचंड बहुमत हासिल किया है!
50 साल तक अपने मातृ संगठन के हेडक्वार्टर पर तिरंगा न लगाने व इसके संस्थापकों द्वारा तीन रंग अशुभ बताने वाली विचारधारा के लोग दुबारा प्रचंड बहुमत से सत्ता में लौटे हों तो तिरंगे की जगह भगवा, अशोक चक्र की जगह स्वास्तिक का चिन्ह, सत्यमेव जयते की जगह हिन्दुमेव जयते लिखे तो क्या गलत होगा! इनको जनमत दिया है जनता ने और पूर्ण अधिकार है!
बाहुबल, धनबल, अहंकार, प्रतिशोध, झूठ, साम्प्रदायिकता के दल-दल में उतरकर राजनैतिक दल इतने बड़े स्तर पर कमल खिला सकते हैं तो फिर जनता के बुनियादी मुद्दों पर बात करने की कहां जरूरत है? पहले नंगी तलवारें लहराकर कमल खिलाये जाते थे और अब कमल ही नंगी तलवारें बन जाये तो कैसा आश्चर्य? ठीक ही कह रहे हैं कि हम संविधान बदलने आये हैं! नजारा सब देख रहे थे, सब देख रहे हैं मगर मौन हैं! किसी लहर या सुनामी की जरूरत नहीं थी! खुला मैदान था व खुले सांड़ थे!
फासिज्म के राजकाज का असल चेहरा दरअसल कोई महाजिन्न, टाइटेनिक बाबा या कंप्यूटर बाबा नहीं है दरअसल वह हिन्दू हृदय सम्राट, 56 इंची अहंकार के पीछे खड़ी मुकम्मल हिंदुत्व ब्रिगेड है और देश का कानून भी वही हिंदुत्व है! यह तो अन्तराष्ट्रीय समुदाय व पूंजी निवेश का तकाजा है कि लोकतंत्र का लिबास ओड़े रखना पड़ता है बाकी है तो हिन्दूराष्ट्र ही!
यकीनन, घोषित आपातकाल की तुलना में अघोषित आपातकाल को समझने में देर लगती ही है! याद रखिये यह भारत है! प्रेम का आचमन व नफरतों का इलाज समय-समय पर करता रहा है। जनता जब भी समझेगी तब न ऐसी सियासत बचेगी और न हुकूमत! राष्ट्रवाद के नाम पर उन्माद पैदा करके तानाशाही का सितम सरताज होता है तो आखिर में हिटलर को भी आत्महत्या करनी पड़ती है!
(मदन कोथुनियां पत्रकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)