महीपाल
पंजाब राज्य पावर कार्पोरेशन लिमिटिड (पावरकॉम) द्वारा एक बार फिर बिजली की कीमतों में भारी वृद्धि कर दी गई है। बार-बार की जाने वाली यह वृद्धि राज्य के अधिसंख्य उपभोक्ताओं की बर्दाश्त से बाहर चली गई है। इस वृद्धि के विरूद्ध प्रथम एतराज, जो यह है कि यह आमदन-वर्ग या सामाजिक हैसियत अथवा विद्युत उपभोग के उद्देश्यों आदि का भेद किये बगैर अमीर-गरीब सभी पर एक समान लाद दी जाती है। दूसरा एतराज, यह है कि प्राँत में बिजली की कीमतें देश में सब से अधिक हैं। ऊपर से तुर्रा ये कि इन कीमतें पर लगाये जाने वाले अन्य टैक्सों की दर भी भारत के बाकी प्राँतों से बहुत अधिक हैं। ठीक वैसे ही, जैसे डीजल-पैट्रोल पर अन्य प्रांतों से अधिक कर वसूले जाने के चलते पंजाब के निवासी पूरे देश के लोगों से महंगा पैट्रोल डीकाल खरीदने को शापित हैं।
ये सभी कर : विद्युत उत्पादन, ढाँचागत विकास तथा स्थानीय सरकार विभाग आदि के नाम पहर वसूल किये जाते हैं। गौवंश संभाल के नाम पर जबरन वसूला जाता गऊ सैस इन सब करों के अतिरिक्त लिया जाता है। यह भी आश्चर्य की बात है कि इतनी बड़ी मात्रा में वसूला जाता यह सैस गौ-संभाल हेतु खर्च किया गया कहीं नजर भी नहीं आता।
देश के अधिसंख्य राज्यों में घरेलू बिजली पर लगने वाला कर व्यापार तथा उद्योगों पर लगने वाले कर से बहुत कम है। परन्तु पंजाब एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ बिजली दरों पर लगने वाला अतिरिक्त कर घरेलू, व्यापारी तथा ओद्यौगिक संस्थानों के लिए एक जैसा यानि कि 20 प्रतिशत है। गुजरात में घरेलू बिजली के लिए 1 प्रतिशत जब कि व्यापारिक संस्थाओं पर 25 प्रतिशत, छोटे उद्योगों पर 10 प्रतिशत तथा बड़े उद्योगों पर 25 प्रतिशत टैक्स वसूल किया जाता है। हरियाणा में घरों की बिजली पर 2 प्रतिशत, हिमाचल प्रदेश में 4 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 1 प्रतिशत, तामिलनाडू में 2 प्रतिशत कर बिजली दरों से अतिरिक्त वसूले जाते हैं। इस मामले में पंजाब सरकार का रवैया बाकी प्राँतों से कहीं अधिक निर्दयतापूर्वक तथा अतार्किक है। विदित हो कि पुडूचेरी, लक्ष्यद्वीप, अंडेमान-निकोबार द्वीप समूह, दादरा नगर हवेली, मिजारम आदि में घरेलू उपभोक्ताओं से कोई कर नहीं वसूला जाता। जबकि पंजाब सरकार की निर्मम नीति के चलते यहाँ बिजली दरें 6.53 रूपये प्रति यूनिट (औसत) हैं तथा अतिरिक्त कर 1.13 रूपये प्रति यूनिट (औसत) हैं। इस तरह से पंजाब के लोग एक यूनिट बिजली के लिए 7.84 रूपये प्रति यूनिट अदा करते हैं तथा यह लगभग सभी राज्यों से अधिक हैं। अगर यह अत्याधिक कर वसूली ही बंद कर दी जाए तो पंजाब कम से कम 19 राज्यों से सस्ती बिजली उपलब्ध करवा सकता है। पावरकॉम प्रबंधन तथा राजनैतिक आका यह डींगें मारते नहीं थकते कि पंजाब जरूरत से अधिक (सरपलस) बिजली पैदा करने वाला राज्य है। इस के बावजूद यहाँ के वासियों को पूरे देशवासियों से अधिक कीमत पर बिजली खरीदने को विवश होना किसी की भी समझ से परे है।
पावरकॉम प्रबंधन तथा राज्य सरकार यह दलील अक्सर देते हैं कि क्योंकि हम कृषि क्षेत्र तथा अन्य गरीबों को बिजली निशुल्क देते हैं इसलिए महंगी बिजली बेचना हमारी विवशता है। शहरों में रहने वाले आम तौर पर इस दुष्प्रचार को सच मान लेते हैं। कई व्यापारिक तथा सामाजिक संगठन, जो ज्यादातर संघ-भाजपा से संबद्ध हैं, शहरी तथा ग्रामीण श्रमिकों में फूट डालने हेतु इस दुष्प्रचार को सदैव तूल भी देते रहते हैं।
बहरहाल हम यह स्पष्ट कहना चाहेंगे कि जब तक सभी देशवासियों को सर्वपक्षीय विकास के एक समान अवसर बिना भेद-भाव के उपलब्ध नहीं करवाये जाते तब तक शोषित-वंचित वर्गों विशेषत: हाशीयागत समूहों को हर क्षेत्र में रियायतें तथा सब्सिडियाँ इत्यादि मिलनी चाहिए। बिजली की माफी भी इसी समझ के अनुसार सभी भूमीहीन/साधनहीन शहरी तथा ग्रामीण श्रमिक परिवारों को मिलनी चाहिये। वैसे, सत्य बात ये है कि गरीबों को दी जाने वाले निशुल्क बिजली सुविधा के चलते बिजली मंहगी होने के राज्य सरकार के सभी तर्क पूर्णतय आधारहीन तथा झूठे हैं। क्योंकि इस सुविधा का अत्याधिक लाभ ग्रामीण तथा शहरी धनाडय वर्ग क्रमश: बड़े भूमीपति तथा उद्योगपति उठा रहे हैं।
राज्य में सभी वर्गों के कुल 94 लाख 78 हजार कुनैक्शन हैं। इनमें से 1 लाख 27 हजार ओद्यौगिक ईकाईयों के हैं जिन्हें 1930 करोड़ 30 लाख सब्सिडि प्रतिवर्ष दी जाती है। इनमें से 87302 लघु उद्योग हैं जिनके हिस्से इस बड़ी रकम में से मात्र 176 करोड़ 60 लाख रूपये आते हैं। कमोबेश ऐसा ही हाल 31235 मध्यम ओद्यौगिक इकाईयों का भी हैं। 1930 करोड़ रूपये की भारी सब्सिडी का बहुत विशाल भाग मात्र 8223 बड़े उद्योगपति ही हड़प कर जाते हैं। फिर भी अगर ये औसत निकाली जाये तो 19.30 लाख रूपये प्रति इकाई प्रति वर्ष बनती है। जबकि कृषि क्षेत्र में यही औसत 44 हजार ही बैठती है। जो लोग जान बूझ कर या अज्ञानतावश ग्रामीणों को बिजली मुफ्त देने तथा इसका बोझ शहरी लोगों पर डालने का राग अलापते रहे हैं उन्हें ये विवरण अवश्य देख-पढ़ लेने चाहिएं। पावरकॉम की साल 2019-20 की अनुमानित कमाई 31762 करोड़ रूपये आँकी गई है। इस में से लगभग 30 प्रतिशत यानि कि 9674 करोड़ रूपये बिजली माफी अथवा सब्सिडी दी जाती हैं। ऊपर दर्शाये आँकड़े साफ ईंगित करते हैं कि इस भारी भरकम सब्सिडी का बहुत बड़ा हिस्सा बड़े उद्योगपतियों एवं बड़े भूमीपतियों की पहले ही ठसाठस भरी तिजोरियों में समा जाने वाला है। पंजाब सरकार की इन ‘गरीबों’ पर की गई मेहरबानी का बोझ राज्य के आम उपभोक्ताओं को देश भर से अधिक महँगी बिजली खरीद कर उठाना पड़ रहा है।
कृषि क्षेत्र में दी जाने वाली बिजली सब्सिडी का बड़ा लाभ भी राज्य के साधन संपन्न, धनी किसानों द्वारा उठाया जा रहा है। कुल 13 लाख 80 हजार टयूबवैल कुनैक्शनों को यह सुविधा प्राप्त है। माफी का लाभ लेने वाले 10128 वे व्यक्ति हैं जिनके पास चार या इससे अधिक कुनैक्शन हैं। 29322 लोग तीन मोटरों वाले तथा 1 लाख 42 हजार दो मोटरों वाले हैं। एक अध्ययन अनुसार बिजली माफी का लाभ लेने वाले 80 प्रतिशत धनी किसान हैं। सभी रंग की राज्य सरकारें बड़े घरानों को नाजायका लाभान्वित करने वाली इस नीति को जारी रख रहीं तथा इस की आड़ में गरीब उपभोक्ता का महंगी बिजली के रूप में खून चूस रही हैं। इतना ही नहीं इस पक्षपातपूर्ण नीति का उपयोग शहरी तथा ग्रामीण श्रमिकों को आपस में लड़वाने के लिए कर रही हैं।
हमारी राय में किसी को भी निशुल्क बिजली दिये जाने का मुख्य आधार उसकी गरीबी होना चाहिये ना कि जाति इत्यादि। इस, दृष्टिकोण से निशुल्क बिजली दिये जाने के मुख्य पात्र शहरों तथा गाँवों में रहने वाले भूमीहीन/साधनहीन श्रमिक एवं गरीब तथा सीमांत किसान ही होने चाहिएं। ओद्यौगिक मंदी की मार झेल रहे छोटे तथा मंझोले उद्योगपति एवं व्यापारी होने चाहियें। बाकी सभी से बिजली का मोल अवश्य वसूल किया जाना चाहिये। एक अन्य तथ्य भी है जो अत्यंत दुखद है। पावरकॉम के अधिकारी तथा अन्य यथास्थितीवादी लोग अक्सर ही यह जुमला छोड़ते हैं कि आम लोग बिजली चोरी करने से बाज नहीं आते फलस्वरूप बिजली के रेट मजबूरन बढ़ते जाते हैं। पिछली सरकार के अंर्तगत ‘‘ग्रामीण तथा खेत मजदूर संगठनों के सांझा मंच’’ के नेताओं संग तब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की मजदूर मांगों संबंधी एक बैठक मोहाली में हुई थी। इस में कई मंत्री तथा सभी विभागों के उच्चाधिकारी भी शामिल हुए थे। मीटिंग में पावरकॉम के निर्वतमान चेयरमैन के.डी.चौधरी की गैर जिम्मेदाराना टिप्पणियों से माहौल काफी तनावग्रस्त हो गया था। यहाँ तक कि स्वयं मुख्यमंत्री एवं तत्कालीन विद्युत मंत्री को बीच बचाव करना पड़ा था। चौधरी का कहना था कि मजदूरों को बिल न भरने एवं बाद में लम्बित बिलों को माफ किये जाने की मांग करने की आदत पड़ चुकी है। यहाँ तक कि उन्होने इशारों-इशारों में मजदूरों पर बिजली चोरी के इल्जाम भी लगाये। किन्तु वस्तुस्थिती कुछ और ही दर्शाती है।
बड़े उद्योगपतियों, रसूखदार राजनैतिक हस्तियों, नौकरशाहों तथा सरकारों के प्रिय नाना प्रकार के धनाढ़ों ने बिजली चोरी के ऐसे-ऐसे आयाम स्थापित किये हैं कि पावरकॉम का दीवाला सा ही पिट गया। हाल ही में ऐसी अनेकों चोरियों-सीनाजोरीयों के कई भेद खुले हैं। कुछ उदाहरण प्रस्तुत है : रोपड़ के डिप्टी कमिश्नर तथा एस एस पी दोनों के मीटरों पर बिजली उपभोग का विवरण शून्य है। इस का सीधा-सीधा मतलब यह हुआ कि यह अधिकारीगण बिजली का बिलकुल भी प्रयोग नहीं करते।
उच्च पुलिस आयुक्त गुरदासपुर के बंगले में पांच मीटर लगे हुए जिनमें से दो की रीडिंग शून्य है जबकि एक ‘चतुर मीटर’ 6 दिन का बिजली व्यय केवल 66 यूनिट बता रहा है। एस एस पी तरनतारन के घर का मीटर भी 64 दिन की रीडिंग केवल 12 यूनिट दिखा रहा है। एस एस पी होशियारपुर की मालरोड स्थित कोठी का मीटर 63 दिन की रीडिंग 74 यूनिट बता रहा है। जालंधर के कमिश्नर की रिहाईश का मीटर दो महीने की खपत चार यूनिट प्रति दिन (औसत) बताता है। डी.सी. कपूरथला के घर की 63 दिन की बिजली रीडिंग 118 यूनिट बतायी जाती है। इसी तरह डी सी संगरूर के घर के मीटर की रीडिंग 32 दिन की 96 यूनिट है। क्या ये सभी मीटर रीडिंग विश्वास करने योग्य हैं? पावरकॉम अधिकारी इन बंगलों की तरफ मुँह भी नहीं करते। किन्तु के.डी. चौधरी तथा उस जैसे अन्य बिजली अधिकारी भरी पंचायत में गरीबों को बिजली चोर कहते हैं। क्या ये ‘सत्यवान’ बता सकते हैं कि वे बादल गाँव या कस्बा भगता तथा साथ लगते गाँवों में कितनी बिजली चोरी की पड़ताल करने गये हैं। भगता कस्बा दो भूतपूर्व बिजली मंत्रियों सिकंदर सिंह मलूका एवं गुरप्रीत सिंह कांगड़ के विधान सभा क्षेत्र में पड़ता हैं। वहीं बादल गाँव के बारे में तो कुछ भी बताने की जरूरत नहीं। सभी बड़ी चोरियाँ नजरअंदाज की जा रही हैं तथा धड़ल्ले से जारी हैं। एक अध्ययन के अनुसार यह चोरी रोजाना 2 करोड़ 20 लाख रूपये तथा 800 करोड़ रूपये प्रति वर्ष के लगभग बनती है। पावरकॉम विभाग इसे वितरण घाटा (डिस्ट्रीब्यूशन डैफीसिट) कहता है। पूरे राज्य में यह 13.31 प्रतिशत बनता है। विगत वर्ष के आखरी नौ महीनों में गाँवों से संबंधित फीडरों में यह घाटा 27.58 प्रतिशत तक भी पहुँच गया था। यह घाटा बढ़ाने में सब से अधिक बार्डर जोन सर्किल क्रमश : 45.80 प्रतिशत तथा 33.54 प्रतिशत घाटे के साथ सबसे ऊपर हैं। पंजाब के 20 मंडल (डिवीजन) ऐसे हैं जहाँ यह घाटा 24.39 प्रतिशत से लेकर 72.76 प्रतिशत तक पहुँच जाता है। इनमें भिक्खीविंड, पट्टी, भगता भाई का तथा बादल मंडल भी आते हैं। हम यह कतई नहीं कहना चाहते कि इन इलाकों में बिजली चोरी में आम जन बिलकुल भी शामिल नहीं हैं। परन्तु मुख्य प्रश्न यह है कि ये सब किस के इशारों पर होता है और इस में बड़ी मछलियाँ कौन सी हैं। कोई भी संतुलित दिमाग का व्यक्ति, किसी भी प्रकार की चोरी का समर्थन नहीं करता। हम भी यही कहते हैं कि न केवल बिजली चोरी अपितु हर किस्म की चोरी रोकने के समग्र प्रबंध किये जाएँ। साथ ही हम ये भी कहते हैं कि आर्थिक अपराध राजनैतिक आकाओं तथा नौरकरशाहों की मिली भुगत तथा संरक्षण के बगैर संभव नहीं।
एक बड़ा प्रश्न, बड़े लोगों की तरफ लंम्बित पड़ी, पावरकॉम की बड़ी रकमों को उगाहने का भी है। डी.सी. अमृतसर की रिहाईश के दो मीटरों के बिल क्रमश: 13 लाख 56 हजार तथा 1 लाख 62 हजार रूपये जाने कब से बकाया हैं? यहाँ के एस एस पी की रिहाईश का भी 4 लाख 87 हजार रूपये लंबित है। एसपी रोपड़ की तरफ 1 लाख 42 हजार रुपये निकलते हैं। एसएसपी. फरीदकोट की तरफ 6 लाख 43 हजार तथा डी.सी. फाजिलका की तरफ 2 लाख 88 हजार रूपये का बिल पैंडिंग हैं। क्या कोई साधारण उपभोक्ता ऐसा दुस्साहस कर सकता है? इसी से जुड़ा प्रश्न ये है कि ऐसे ‘विशिष्ट देनेदारों’ के सामने पावरकाम प्रबंधन की सख्ती कहां जाती है।
राज्य सरकार तथा प्रबंधन एक और यज्ञ प्रश्न से भी मुंह मोडऩा चाहते हैं, किन्तु देर सवेर इस प्रश्न से जुड़ी सत्यकथा भी लोगों को पता चल ही जाएगी। यह मामला है, बिजली पैदावार के क्षेत्र में राज्य को आत्मनिर्भर बनाने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के थर्मल प्लांटों को बंद करके निजी क्षेत्र के थर्मल प्लांटों से किये गये बिजली खरीदने के अर्ताकिक समझौतों का। बिजली क्षेत्र के विशेषज्ञों अनुसार इन समझौतों के दो सूत्र बहुत खतरनाक हैं। प्रथम, जिस खर्च पर सरकारी थर्मल प्लांट बिजली पैदा करते हैं उससे कहीं अधिक कीमत प्राइवेट थर्मलों को अदा की जानी है। दूसरा यह है कि इन्हें उपयोग के हिसाब से खरीदी गई बिजली के लिए अदायगी नहीं होगी। बल्कि कम खरीदने पर भी एक निश्चित बिजली की मात्रा के पैसे देने ही पड़ेंगे। वहीं अगर इस तय मात्रा से अधिक खरीदी की तो उस के पैसे तो अलग से देने ही पड़ेंगे।
इसी कारण, निर्वतमान अकाली-भाजपा सरकार द्वारा किये गये इन समझौतों के विवरण न वह सरकार लोगों के समक्ष रख रही थी और न ही वर्तमान कांग्रेस सरकार। साफ दिखाई देता है कि जो स्वार्थ ये समझौते करने के पीछे पहली सरकार के आकाओं का था वहीं, स्वार्थ वर्तमान सरकारी आकाओं की आत्मा पर भी कुंडली मार कर बैठ गया है। यह विवेकहीन समझौते जहां निजीकरण की नीतियों की पैदावार हैं वहीं इन के साथ बड़े राजनैतिक नेताओं की खुदगर्जीयां भी जुड़ी हुई हैं। भटिंडा वाला थर्मल तो बंद ही समझो। यह भी पता चला है कि बाकी के दो लहरा मुहब्बत तथा रोपड़ वाले थर्मल भी इस वर्ष के अंत तक समेट दिये जाएंगे। बिजली उत्पादन जब पूरी तरह निजी हाथों में चला जाएगा तब किस रफ्तार से रेट बढ़ेंगे तथा किस निर्दयता से वसूले जाएंगे यह सोचकर ही रूप कांप उठती है।
हम पंजाबवासियों से आग्रह करते हैं आये दिन बढऩे वाली बिजली दरों के बारे में उदासीनता का रवैया त्यागें। इसका केवल मौखिक विरोध भी कुछ खास प्रभाव नहीं डालता। आज श्रमिक वर्गों के लगातार तथा निर्णायक संघर्षों की जरूरत है। इन संघर्षों का नेतृत्व वामपंथ को करना होगा। वामपंथ को नेतृत्व के लिये जरूरी भावना, लोगों का विश्वास प्राप्त करने की योजनाबंदी बिनी देरी करनी चाहिये। इस दिशा में आरएमपीआई हर स्तर के काडर एव नेतृत्व को पहल करनी चाहिए।