महीपाल
पंजाब विधान सभा के चल रहे बजट सत्र के दौरान, 18 फरवरी को राज्य के वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल द्वारा पंजाब का साल 2019-2020 का बजट पेश किया गया। उर्दू के कद्दावर शायरों जनाब अलामा इकबाल और जगननाथ आज़ाद के कालजयी शेयरों व बड़े-बड़े दावों के साथ श्रृंगारित इस बजट में आम पंजाबियों विशेषतय: औद्योगिक कामगारों, खेत मज़दूरों, किसानों, बेरोजग़ार नौजवानों, कच्चे कामगारों, अपनी वाजिब माँगों की प्राप्ति के लिए संघर्ष कर रहे विभागीय कर्मचारियों, छोटे व्यापारियों और असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए कुछ भी नहीं था। गुजरात और दिल्ली के जुमलेबाजों के पदचिह्नों पर चलते हुये वित्त मंत्री ने बड़े-बड़े नामों वाली दो योजनाएँ ‘‘मेक इन पंजाब’’ और ‘‘मेरा कर्म मेरा सम्मान’’ लागू करने का ऐलान भी किया। वित्त मंत्री ने पंजाब और पंजाबवासियों के समक्ष बड़ी चुनौतियों व समस्याएँ तथा पंजाबियों के जीवन पर इनके पड़ रहे व्यापक नकारात्मक प्रभावों का नक्शा पेश करने से बहुत चतुरता से टालमटोल किया है। राज्य की बुरी वित्तीय अवस्था के लिए पिछली सरकार को कोसने का कार्य वित्तमंत्री ने लगातार बजट में भी ‘बखूबी’ निभाया। कैप्टन अमरिन्दर सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का यह लगातार तीसरा बजट है जिसने बहुसंख्यक पंजाबियों के पल्ले भारी निराशा डाली है। चुने हुए विधायकों के दिल व दिमाग़ में बजट के प्रति कितनी गंभीरता है इसका अंदाज़ा तो बजट के पेश करने के समय सत्ताधारी और विरोधी पक्ष के विधायकों के बीच हुई घटिया स्तर की तकरारबाजी से सहज ही लगाया जा सकता है। इन असामयिक, ग़ैरज़रूरी झड़पों ने इस स्थापित सत्य की एक बार पुन: पुष्टि कर दी है कि सत्ताधारी और विरोधी, दोनों पक्ष वास्तव में लोगों के असली मुद्दों से किनाराकशी करना चाहते हैं। वास्तव में यही लोग हैं जिनके शासन के दौरान लोगों की झोली दुखों-दर्दों व दुश्वारियों से भर गई है। पंजाबियों को पेश आज की सब से बुरी दुश्वारियों की दरजाबन्दी निम्नानुसार की जा सकती है :
(क) ख़तरनाक हद तक बढ़ चुकी महंगाई व पल-पल बढ़ती जा रही बेरोजग़ारी के कारण नौजवानों में पैदा हो चुकी निराशा, नौजवान के एक हिस्से में समाज विरोधी गतिविधियों में शामिल का रुझान और हर खतरे में पडक़र भी विदेश जाने की तीव्र इच्छा।
(ख) कृषि में आमदन-ख़र्च के पहाड़ों जैसे अंतर के कारण खेती मुकम्मल रूप में घाटे का धंधा बन गया, खेती में ज़रूरत और गुज़ारे से कहीं ज़्यादा अधिक श्रम शक्ति का होना जिसके फलस्वरूप खेत मज़दूरों और छोटे व सीमांत किसानों द्वारा बेरोक हो रही आत्महत्याएँ।
(ग) नशा तस्करों और हर किस्म के माफिया गिरोहों की दिनों दिन तीखी हो रही लूट-पाट व घौंस पट्टी।
(घ) सामाजिक उत्पीडऩ, लिंग आधारित भेदभाव व अपराधों में अति बढ़ौत्तरी और बहुपक्षीय सांस्कृतिक पतन।
(ड़) वातावरण से सम्बन्धित गंभीर और जटिल समस्याएँ।
(च) कच्चे व ठेका भर्ती कर्मचारियों में फैली व्यापक निराशा के कारण बढ़ रहा प्रशासनिक पतन।
वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में उक्त हालात का रस्मी तौर पर जिक्र तक भी नहीं किया। लोगों के आंखों में धूल झोकने के लिए भांति-भांति की घोषणाएं मात्र की गई हैं। इसी कारण सभी राष्ट्रीय और स्थानीय भाषाई अखबारों द्वारा बजट की समीक्षा करते हुये इसको 2019 के लोक सभा चुनाव जीतने के लिए किये गए एलान/ब्यान के तौर पर परिभाषित किया है।
एक लाख अ_ावन हज़ार चार सौ तिरानवें करोड़ रुपए के भारी भरकम बजट में 18 से 35 साल तक की उम्र के बेरोजग़ार युवकों को रोजग़ार देने के लिए वित्त मंत्री की तरफ से ‘दरियादिली’ दिखाते हुये सिर्फ नब्बे करोड़ रुपए की राशि आरक्षित की गई है। यह रकम लगभग अंतिम घडिय़ां गिन रहे रोजग़ार विभाग के द्वारा नौजवानों को प्रशिक्षण देने तथा साल में एक बंधी मियाद के लिए काम देने के लिए ख़र्च की जायेगी। राज्य में बेरोजग़ारी की गंभीर समस्या को देखते हुए यह नग्णय राशि बेरोजग़ार नौजवानों के ज़ख्मों पर नमक छिडक़ने का काम करेगी। बेरोजग़ार नौजवान पहले ही रोजग़ार मेलों में होती परेशानियों से रोष में हैं। एक कड़वा सत्य यह भी है कि इस मामूली रकम का अच्छा भाग भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों की तोंदों में नष्ट हो जायेगा। वित्त मंत्री ने तो बजट भाषण में बेरोजग़ारों की सही संख्या तक भी बताने का कष्ट नहीं किया। कुल मिला कर बेरोजग़ारी के बारे में बजट उतना ही गंभीर है जितना कैप्टन अमरिन्दर सिंह सरकार का ‘हर घर एक रोजग़ार’ देने का किया गया चुनावी वायदा। चुने हुए विधायक व समूचा शासन तंत्र राज्य की नौजवानों के प्रति पूरी तरह असंवेदनहीन हो चुके हैं। नौजवानों के इस अपमान के विरुद्ध प्रगतिशील और रेडिकल आंदोलन की अनुपस्थिति भी बड़ी सामाजिक चिंता का विषय है। इसी कारण हर साल भारी संख्या में नौजवान हर जायज-नाजायज तरीके द्वारा विदेशें में प्रवास कर रहे हैं। हर किस्म के अपराधों में युवकों की बढ़ रही शमूलियत इस समूची अवस्था में से पैदा होती है। अलगाववादी व देश द्रोही तत्वों की ओर से अपने मानवता विरोधी कारनामों को अंजाम देने के लिए नौजवानों का इस्तेमाल भी इसी स्थिति के कारण संभव होता है।
वित्त मंत्री की तरफ से बजट में किसानों की कजऱ् माफी के लिए केवल तीन हज़ार करोड़ रुपए की राशि रखी गई है। जबकि किसानी कजऱ् तकरीबन एक लाख करोड़ रुपए है। इस तरह यह राशि कुल कजऱ् के मुकाबले कुछ भी नहीं। इससे भी बड़ी त्रासदी यह है कि किसानों पर कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है। किसानों को फसलों के मिलते भाव और खेती लागतों में भारी असमानता कर्ज की जन्मदाता है। सरकारी तंत्र की उदासीनता और काम-चलाऊ व्यवहार नयी दिक्कतें पैदा करता है। प्रति एकड़ के हिसाब से जितनी श्रम शक्ति खेती में से गुज़ारा कर सकती है उससे अनेकों गुणा अधिक कामगार राज्य के कृषि क्षेत्र हैं। सरकारी मशीनरी इस के लिए वैकल्पिक रोजग़ार का प्रबंध करने के बारे में सोच तक भी नहीं रही। वित्त मंत्री के बजट प्रस्ताव भी इस व्यवहार की स्पष्ट मिसाल हैं।
वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में शहरी और ग्रामीण बुनियादी ढांचा मज़बूत करने व कृषि, स्वास्थ्य सेवाओं और शैक्षणिक ढांचे की मज़बूती पर ज़ोर देने के बारे में बड़े विद्वत्ता भरपूर अल्फाज़ बोले। परन्तु ठोस प्रस्ताव व प्रस्तावों को अमल में लागू करने संबंधी अपेक्षित राशि और योजनाबंदी के बारे में एक शब्द तक भी नहीं बोला। कृषि-अनुसंधान केन्द्रों, कृषि यूनिवर्सिटी, सहकारिता विभाग, सिंचाई ढांचे, भूगर्भीय पानी, फसलों के उचित मंडीकरण, सहकारिता संस्थाओं में आवश्यक सुधार आदि के बारे में यह सरकार तिनका तोड़ कर दोहरा नहीं करना चाहती, इस बजट भाषण से यह और अधिक स्पष्ट हो गया है। शिक्षा व स्वास्थ्य विभाग में आज नियमित के मुकाबले अस्थाई कामगारों की संख्या कहीं ज़्यादा है। इस के बावजूद अभी भी हजारों पद इन विभागों में खाली पड़े हैं। इन विभागों के कर्मचारी अपनी आर्थिक व समस्त पंजाबियों की बेहतरी से संबंधित माँगों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वित्त मंत्री ने इस स्थिति में सुधार का संकेत मात्र भी नहीं दिया। फिर पता नहीं किस तरह सरकार कृषि, स्वास्थ्य सेवाओं और शैक्षणिक ढांचे की मज़बूती पर फोकस करते हुए ग्रामीण और शहरी बुनियादी ढांचा मज़बूत करना चाहती है? वित्त मंत्री ने अपने भाषण में अनुसूचित जातियों की बेहतरी के लिए फिक्रमंदी का इज़हार करते हुये नयी स्कीमों लांच करने का ऐलान किया। परंतु इससे यह भी स्पष्ट दिखाई देता है कि भूमिहीन, बेरोजग़ारी के सताये, अति निचले दर्जे के घरों में रहने के लिए मजबूर, शिक्षा और स्वास्थ्य सहूलियतों से वंचित, सामाजिक भेदभाव और जाति-पाती उत्पीडऩ के सताए, सरकारी सुविधाओं से वंचित इस वर्ग की दुश्वारियां वित्त मंत्री को याद तक भी नहीं।
वास्तविकता यह है कि केंद्र की मोदी सरकार और पंजाब की कैप्टन अमरिन्दर सिंह सरकार साम्राज्यवाद निर्देशित नवउदारवादी नीतियों की अलम्बरदार हैं। निजीकरण, उदारीकरण, विश्वीकरण पर आधारित यह नीतियाँ किसी भी रूप में लोगों का कुछ नहीं संवार सकतीं। वित्त मंत्री की तरफ से पेश किया गया बजट इसी नीति निर्देश के अनुसार तैयार व पेश किया गया है। यह बजट पंजाबवासियों को नगण्य सी राहत भी प्रदान नहीं कर सकेगा। पंजाब और देश के आवाम के पास अपनी माँगों-उमंगों की प्राप्ति के लिए उक्त नीतियों के विरुद्ध निरंतर, ठोस व निर्णायक संग्राम ही एकमात्र रास्ता है।