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विश्व दर्पण (संग्रामी लहर-जुलाई २०१९)

विश्व दर्पण (संग्रामी लहर-जुलाई २०१९)

रवि कंवर

डेनमार्क में ट्रेड यूनियनों द्वारा नर्ई सरकार पर श्रमिक समर्थक नीतियां अपनाने के लिए दबाव
डेनमार्क, जिसका सरकारी नाम ‘किंगडम आफ डेनमार्क’ है, उत्तरी यूरोप में स्थित विश्व के उच्च जीवन स्तर वाले देशों में से एक है तथा विश्व के खुशी सूंचकाक में भी यह फिनलैंड के बाद आते दूसरे स्थान वाले देशों में से एक है। यह जूटलैंड प्रायद्वीप में 443 द्वीप समूहों पर आधारित देश है, जिसकी भू-सीमा जर्मनी से इसे जोड़ती है जबकि उत्तरी सागर व बाल्टिक सागर इसे स्वीडन से जोड़ते हैं।
डेनमार्क में 5 जून 2019 को हुए संसदीय चुनावों में सोशल डैमोक्रेट पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। देश की संसद की 179 सीटें हैं जिसमें 175 पर ही चुनाव होते हैं। इनमें से 135 सीटों पर अनुपातिक प्रणाली के आधार पर प्रत्यक्ष चुनाव होता है बाकी 40 सीटें 2 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करने वाले सभी दलों में उन्हें मिले मतों के अनुपात के अनुसार बांट दी जाती है ताकि छोटे दलों को भी संसद में प्रतिनिधित्व प्राप्त हो। इन चुनावों में सोशल डैमोक्रेट पार्टी ने 48 सीटें, वेनसत्रे ने 43, डी.पी.पी. ने 16, सोशल लिबेरल पार्टी ने 16, एस.एफ. ने 14, रैड-ग्रीन ने 13, कंजरवेटिव ने 12, री-आल्टरनेटिव ने 5, लिबरल एलाइंस ने 4, न्यू राइट ने 4 तथा अन्य 9 दलों ने एक-एक सीट प्राप्त की है। 4 सीटें उन सामाजिक व नस्ली समूहों के लिये हैं जिनकी संख्या 2 प्रतिशत से भी कम है। नामजदगियों द्वारा उन्हें प्रतिनिधित्व दिया जाता है। डेनमार्क की चुनाव प्रणाली की यह विशेषता है कि 7 दल इनमें से ऐसे हैं जिन्होंने मात्र 3 प्रतिशत से लेकर 2 प्रतिशत तक ही मत प्राप्त किए हैं तथा उन्हें भी संसद में 17 सीटें उन द्वारा प्राप्त मतों के आधार पर मिली हैं।
इन चुनावों में किसी भी एक पार्टी को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ है, जो कि अनुपातिक प्रणाली वाले देशों में आम ही होता है। देश में अब नई सरकार बनाने के लिए विभिन्न पार्टियों में बातचीत चल रही है।
देश की ट्रेड यूनियनें बातचीत की प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए सरकार के मुख्यालय क्रिस्चीयनवर्ग महल के सामने 8 जून से प्रतिदिन दिन में दो घंटे के लिए सांकेतिक निगरानी एकत्रता करती हैं। देश की राजधानी कोपेनहेगेन में क्रिस्चीयनवर्ग महल में ही यह बातचीत चल रही है, जिसका नेतृत्व सबसे बड़ी पार्टी सोशल डैमोक्रेटस द्वारा प्रधानमंत्री पद के लिए मनोनीत उम्मीदवार मेटे फ्रेडरिकसेन कर रही हैं। यह एक वामपक्ष की ओर झुकाव रखने वाली पार्टी मानी जाती है। इन चुनावों में रैड ब्लाक गठजोड़ को बहुमत प्राप्त हुआ है जिसमें सोशल डैमौक्रेटस, सोशलिस्ट पीपल्ज पार्टी, रैड-ग्रीन एलाइंस, फैरोईज सोशल डैमोक्रेटिक पार्टी तथा सिऊमट पार्टी शामिल हैं, इन्हें कुल 93 सीटें प्राप्त हुई हैं। 2015 के चुनावों के बाद देश में वेनस्त्रे पार्टी के नेतृत्व में एक दक्षिणपंथी गठजोड़ ने देश में सरकार बनाई थी। जो कि इन चुनावों में बहुमत प्राप्त नहीं कर सकी है।
निगरानी करने वाली देश की लगभग सभी ट्रेड यूनियनें चाहती हैं कि नई सरकार श्रमिक समर्थक नीतियां अपनाते हुए पिछली सरकार की सार्वजनिक व्यय में कटौती करने वाली नीतियों को त्यागे। इस निगरानी एकत्रता में भाग लेने वाली ट्रेड यूनियनों, एफ.ओ.ए.-एस.ओ.एस. तथा बी.यू.पी.एल. होवेस्टेडेन। उनके इस आयोजन को देश में पर्यावरण के बारे में कार्य कर रहे कार्यकत्ताओं का भी समर्थन मिल रहा है, वे भी मौसम संबंधी चिंताओं के लिए नई सरकार पर दबाव बनाने के लिए इसमें शामिल हो रहे हैं।
ट्रेड यूनियनों की प्रमुख मांगें हैं कि बजट एक्ट खत्म किया जाए, कल्याणकारी सुविधाओं को बढ़ाया जाए, असमानता पर रोक लगाई जाए, कल्याणकारी कार्यक्रमों पर किए जाने वाले खर्च में प्रतिवर्ष 2 प्रतिशत कटौती करना बंद किया जाए। बजट एक्ट 2012 में पारित किया गया था, जिस द्वारा कड़े वित्तिय नियम लागू किए गए, जिनमें केंद्रीय, क्षेत्रीय व स्थानीय संस्थाओं के स्तर पर होने वाले सार्वजनिक खर्चों पर सीमा लगाई जाती थी। केंद्रीय स्तर पर इस सीमा का प्रभाव प्रचालन खर्चों व गैर-चक्रीय आमदनी स्थानांतरणों पर पड़ता था, जैसे कि पैंशनें, विद्यार्थियों के दिए जाने वाले कर्ज व अनुदान। क्षेत्रीय स्तर पर इनसे स्वास्थ्य व क्षेत्रीय विकास पर होने वाले खर्च प्रभावित होते थे। जबकि स्थानीय संस्थाओं के स्तर पर नगर निकायों द्वारा स्कूलों, वृद्ध संभाल, सडक़ों आदि पर किए जाने वाले खर्च प्रभावित होते थे।
निगरानी करने वाली ट्रेड यूनियनों का कहना है कि- ‘‘इन चुनावों में देश के मतदाताओं की जो आवाज उभर कर आई है वह अब नीतियों में भी ठोस रूप में प्रदर्शित होना चाहिए। इसलिए देश की ट्रेड यूनियनें राजनीतिक पार्टियों को कह रही हैं कि वे उस सरकार का समर्थन करें जो हमारी अधिक कल्याणकारी सुविधाओं की मांग को मान्यता प्रदान करती हैं। हम चाहते हैं कि बजट एक्ट समाप्त किया जाए ताकि सार्वजनिक अर्थव्यवस्था को जंजीरों से मुक्त किया जा सके तथा बढ़ रही असमानता व भत्तों के हो रहे क्षरण को रोका जा सके। हम शिक्षा में भी पुन: निवेश चाहते हैं।’’
देश की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रकाशन ‘दी वर्कर’ के अनुसार सोशल डैमोक्रेटस की नेता मेटे फ्रैडरिकसेन ने सरकार के निर्माण के लिए बातचीत 7 जून को शुरू की है जिसे अब तक सोशल लिबेरल पार्टी, सोशल पीपुल्स पार्टी तथा रेड-ग्रीन एलायंस (यूनिटी सूची) का समर्थन प्राप्त हो गया है।

स्विटजरलैंड में समानता व लैंगिक न्याय के लिए सफल स्त्री हड़ताल
स्विटजरलैंड मध्य यूरोप में स्थित एक खूबसूरत देश है। इसका 60 प्रतिशत भाग ऐल्पस पहाड़ों से ढका है। विश्व के उच्चतम जीवन स्तर वाला देश ‘खुशी सूचकांक’ में विश्व भर में दूसरे स्थान पर है। 14 जून को इस देश में लाखों स्त्रियों ने हड़ताल करके देशभर की सडक़ों पर प्रदर्शन किए। उनकी मुख्य मांगें थीं- समान वेतन व लिंग आधारित हिंसा के प्रति शून्य सहनशीलता। यह राष्ट्रीय हड़ताल 10 से 21 जून तक जेनेवा में होने जा रहे अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन की 108वीं बैठक के संदर्भ में की गई थी। इस बैठक में कार्यस्थलों पर होने वाली हिंसा व उत्पीडऩ से निपटने के बारे में अंतराष्ट्रीय कानून विशेष रूप में विचार-विमर्श के केंद्र में होंगे।
देश के कई स्त्री संगठनों व ट्रेड यूनियनों ने इस हड़ताल का आयोजन किया था। इसमें मुख्य थे ‘विमैन स्ट्राइक’ व ‘फैमीनिस्ट स्ट्राइक’। अप्रत्याशित रूप से सफल इस हड़ताल के दौरान बर्न, ज्यूरिख, जेनेवा, ल्यूसने, वादूका, थन्स, जोफिनगेन, शैफहोसेन, डेगेरशीम व फ्रीवोर्ग समेत देशभर के 100 से भी अधिक स्थानों पर प्रदर्शन व अन्य आयोजन हुए। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य मांगों के अतिरिक्त मांग की कि सांभ-संभाल क्षेत्र में अधिक निवेश किया जाए, स्त्रियों द्वारा घर व समाज में किए जाते अवैतनिक कार्य के वास्तविक मूल्य को मान्यता दी जाए तथा मानसिक व शारीरिक उत्पीडऩ दोनों पर रोक लगाने के लिए प्रभावशाली कदम उठाए जाएं। प्रदर्शनकारियों ने सरकार की जीवन के हर क्षेत्र में लैंगिक अंतर को पाटने के लिए उठाए जाने वाले प्रयत्नों की कमी के लिए भी निंदा की।
रिर्पोटों के अनुसार देश में स्त्रियां मर्दों से औसतन 20 प्रतिशत कम कमाती हैं। देश के राष्ट्रीय आंकड़ा कार्यालय के अनुसार समान योग्यता वाले मर्दों व स्त्रियों के बीच वेतन अंतर 8 प्रतिशत है। यहां यह भी वर्णन योग्य है कि स्विटजरलैंड की स्त्रियों को मताधिकार 1971 में मिला है तथा 1985 तक नौकरी करने या बैंक में खाता खोलने के लिए भी स्त्री को पति या पुरूष संबंधी की आज्ञा की आवश्यकता होती थी।
इस हड़ताल का आह्वान करने वाले संगठनों के वक्तव्य इस असमानता को अधिक सटीक रूप से दर्शाते हैं तथा इसके विरुद्ध उनके संघर्ष करने की प्रतिबद्धता को प्रकट करते हैं:
‘वल्र्ड मार्च आफ वूमैन’ का कहना है- ‘‘स्त्रियों के अधिकारों को प्रणालीबद्ध ढंग द्वारा नजरंदाज किया जा रहा है। हम इससे गुस्से में हैं तथा हमने अब इस स्थिति के साथ न चलने का निर्णय लिया है। आज हम लोगों से अपने अनुभव व अपनी इच्छाएं सांझा करने के लिए सडक़ों पर हैं।’’ उन्होंने देश की राजधानी बर्न में 22 सितंबर  को समान वेतन के मुद्दे को लेकर राष्ट्रीय आयोजन करने की भी घोषणा की।
स्विस राजनीतिक पार्टी सोलिडैरिटी ने कहा- ‘‘विश्वभर में मी टू, गर्भपात के अधिकार के लिए लामबंदी, लिंग आधारित हिंसा के विरुद्ध, स्त्री हड़ताल के रूप में नारीवादी आंदोलन की पुन:जागृति हो रही है। स्विटजरलैंड भी, 1981 से हमारे संघीय संविधान में समानता का प्रावधान होने के बावजूद लिंगवाद, असमानता तथा स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा जारी है। इस हड़ताल ने देश भर में उन स्त्रियों को लामबंद किया जो महीनों से सामूहिक रूप में इसके लिए संगठित हो रही थीं। मांगों में से हम विशेष रूप में कार्यस्थलों पर स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को उभारना चाहते हैं अर्थात तथाकथित ‘नारी’ व्यवसायों पर कार्य करने वाली स्त्री श्रमिकों के स्वास्थ्य पर पडऩे वाले दुप्र्रभावों के अक्सर नजरअंदाज व अदृश्य कर दिया जाता है।’’
स्विस पार्टी आफ लेबर की सोंजा सरीवेली का कहना था-‘‘देश के मौजूदा संविधान व सिविल कोड ने नारी मुक्ति के मामले में बहुत ही छोटे व कमजोर कदम उठाए हैं तथा इनके परिणाम भी बहुत ही अशक्त हैं। दूसरे शब्दों में यह पूर्ण रूप में अप्रभावशाली हैं। हम ऐसी शिक्षा चाहते हैं जो इन चीजों को अग्रगामी रूप में परिवर्तित करे, जो कि बचपन से ही, आरंभ हो, स्कूलों में जारी रहे तथा समाज के सभी भागों तक पहुंचे। स्त्रियों ने सम्मान व न्याय प्राप्त करने के लिए लंबा संघर्ष किया है तथा यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक कि वे आर्थिक हिंसा, शोषण व पराधीनता से मुक्त नहीं हो जातीं तथा अपनी शिक्षा व अपने शरीर के बारे में खुद निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र नहीं हो जातीं।’’ अंतर्राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस ने भी इस हड़ताल के प्रति अपनी एकजुटता को प्रकट किया। स्विटजरलैंड में पहली स्त्री हड़ताल 28 साल पहले 1991 में हुई थी, जिसमें 5 लाख लोगों ने भाग लिया था तथा यह आज तक के इतिहास में देश के सबसे बड़ा ओद्यौगिक एक्शन का स्थान रखती है।

पाकि में वामपंथी संसद सदस्य अली वजीर की गिरफ्तारी, रिहाई के लिए आंदोलन
हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में वहां की संसद के दो वामपंथी सदस्यों अली वजीर व मोहसिन डाबर को देश की सेना द्वारा उस समय बंदी बना लिया गया जब वे देश की अफगानिस्तान से लगती सीमा पर स्थानीय ग्रामीणों द्वारा सेना के अत्याचारों के विरुद्ध लगाए गए एक रोष-धरने में सम्मिलित होने के लिए पहुंचे थे।
अफगानिस्तान सीमा पर पाकिस्तान की खरककमर सेना पोस्ट जो कि उत्तरी वजिरिस्तान के बोया क्षेत्र में स्थित है पर स्थानीय ग्रामीणों द्वारा 25 मई को रोष धरना लगाया गया था। यह धरना सेना द्वारा गांवों की कथित तलाशी लेने के दौरान स्थानीय स्त्रियों से किए गए दुव्र्यवहार व मारपीट के विरुद्ध था। इसी क्षेत्र से चुने गए वामपंथी नेता अली वजीर को जब इसके बारे में 26 मर्ई को पता लगा तो वे अपने कुछ साथियों तथा दक्षिणी वजिरिस्तान से चुने गए एक और वामपंथी नेता मोहसिन डाबर के साथ बन्नू से खरक-कमर के लिए रवाना हो गए। यहां यह वर्णन योग्य है कि यह दोनों नेता इन क्षेत्रों के स्थानीय लोगों के संघर्षों का नेतृत्व करने वाले पश्तून तहफ्फुज मंच के प्रमुख नेता हैं तथा इसी मंच के उम्मीदवारों के रूप में यहां से संसद सदस्य चुने गए हैं। इन दोनों संसद सदस्यों के पहुंचने पर स्थानीय लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई तथा यह धरना और भी तीव्र रूप ग्रहण कर गया। सेना द्वारा इस पर गोलीबारी कर दी गई। सेना के ही सूत्रों के अनुसार इसमें तीन लोग मारे गए तथा 45 लोग घायल हुए हैं। सेना की इस गोलीबारी में मोहसिन डाबर को भी चोट लगी। सेना ने अली वजीर को 8 अन्य साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया।
पश्तून तहफ्फुज (सुरक्षा) मंच, वजिरिस्तान व अफगान सीमा से लगते पाकिस्तानी क्षेत्रों में तालिबान आतंकवादियों के विरुद्ध संघर्षरत है, जिन्हें कि देश की सरकार व सेना का पूर्ण संरक्षण प्राप्त है तथा ये आतंकवादी स्थानीय ग्रामीणों पर हर तरह के अत्यातार ढाते हैं। यह मंच सैनिक कार्यवाहियों व आपरेशनों के दौरान विस्थापित होने वाले कबीलाई नागरिकों के पुर्नवास व इन क्षेत्रों में सेना द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों के विरुद्ध निरंतर संघर्ष करता है। साथी अली वजीर, तालिबान आतंकवादियों व सेना के अत्याचारों के शिकार लोगों का प्रतीक भी हैं। उनके परिवार के 13 सदस्यों का तालिबान आतंकवादियों द्वारा कत्ल कर दिया गया तथा सेना ने भी उनके ऊपर अत्याचार ढाए तथा उनकी समस्त संपत्ति बर्बाद कर दी। वे एक माक्र्सवादी हैं तथा इन अत्याचारों के विरुद्ध प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में समूचे देश ही नहीं बल्कि विश्व भर में जाने जाते हैं। यहां यह भी नोट करने योग्य है कि पश्तून पाकिस्तान का तीसरा सबसे बड़ा नस्ली भाईचारा है तथा मुख्य रूप में यह अफगान सीमा के साथ-साथ बसा हुआ है।
साथी अली वजीर व अन्य की गिरफ्तारी के विरुद्ध पाकिस्तान ही नहीं बल्कि दुनिया भर में आवाज उठी है। जहां देश की सत्तारुढ़ पार्टी तहीरिके इंसाफ व मुख्य धारा के मीडिया, जो कि पूंजीवादियों द्वारा संचालित है, ने अली वजीर व उसके साथियों को देश के हितों के विरुद्ध कार्य करने वाले के रूप में चित्रित किया है वहीं सोशल मीडिया में व्यापक रूप में उनके पक्ष में आवाज बुलंद हुई है। जिस समय उन्हें गिरफ्तार किया गया, सोशल मीडिया में उस समय व स्थान की वीडियो व्यापक रूप में प्रसारित हुई है जो स्पष्ट रूप से सेना द्वारा किए जा रहे प्रचार कि धरनाकारियों द्वारा सेना पर हमला किया गया, को झूठा सिद्ध करती है।
देश की संसद में विरोधी पक्ष के बहुसंख्यक नेताओं ने इस घटना की निंदा करते हुए अली वजीर व उसके साथियों को रिहा करने की मांग की है। संसद सदस्य अख्तर मेंगल ने संसद में इस प्रकरण को उठाते हुए इस घटना की न्यायिक जांच की मांग की। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के चेयरपर्सन बिलावल भुट्टों ने अली वजीर को एक संसद सदस्य होने के नाते प्रोडक्शन आर्डर जारी करके संसद में लाने की मांग की ताकि वे अपना पक्ष रख सकें। देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी ने एक टी.वी. साक्षात्कार में कहा कि वीडियो स्पष्ट दर्शाती है कि लोगों के पास हथियार नहीं थे जबकि सेना हथियारबंद थी।
पाकिस्तान के मानव अधिकार आयोग के चेयरपर्सन डा. मेहदी हसन ने एक प्रैस विज्ञप्ति द्वारा संसद सदस्य अली वजीर व अन्य गिरफ्तार लोगों की तुरंत रिहाई की मांग की तथा इस घटना का सत्य जानने के लिए एक संसदीय आयोग बनाकर तुरंत मामले की जांच किए जाने की भी मांग की। उन्होंने कहा कि सरकार 26वां संविधान  संशोधन पारित करके भूतपूर्व फाटा क्षेत्र तक मीडिया व सिविल समाज की स्वतंत्र पहुंच को यकीनी बनाए। उन्होंने देश के मुख्य धारा के मीडिया से भी अपील की कि वह जिम्मेवारी से इस क्षेत्र की घटनाओं की निष्पक्ष रिपोरटिंग करे।
विश्व के अन्य देशों नीदरलैंड, अर्जेंटीना, उरूग्वे, पैरुगुए, कोलंबिया, वेनेजुएला, चिली, रूस, बेलारस, फ्रांस, ग्रीस, तुर्की में भी वामपंथी कार्यकत्ताओं ने प्रदर्शन व सभाएं करके साथी अली वजीर व अन्य साथियों की गिरफ्तारी की निंदा की तथा उनकी तुरंत रिहाई की मांग की। देश में भी सैंकड़ों स्थानों पर प्रदर्शन करके हजारों कार्यकत्र्ताओं ने उन्हें रिहा करने की मांग की।
देश की वामपंथी पार्टियों के मंच, लाहौर वाम मार्चा जिसमें कि देश की तीन वामपंथी पार्टियां आवामी वर्कर्स पार्टी, पाकिस्तान किसान मजदूर पार्टी, मक्र्सिस्ट स्ट्रगल ग्रुप समेत कर्ई वामपंथी दल शामिल है; ने भी एक प्रैस विज्ञप्ति जारी करके यह घटना विस्तारित रूप में पेश की तथा इसकी वास्तविकता सामने लाने के साथ-साथ इसकी सख्त निंदा की तथा कहा कि यह घटना सेना के उच्च स्तरीय अफसरों में व्याप्त निराशा को दर्शाती है जो कि मुख्य धारा के कारपोरेट मीडिया, राजनीतिक धनवानों व उनकी पार्टियों, वर्तमान प्रतिक्रियावादी इमरान खान सरकार व उसके सहयोगियों को पूरी तरह अपने कंट्रोल में करके उनके द्वारा इस जन समर्थक आंदोलन को दबा देना चाहते हैं। उन्होंने इस गोलीबारी में शहीद हुए लोगों के संबंधियों व दोस्तों-मित्रों के प्रति गहरी संवेदना प्रकट करते हुए इन निहत्थे व शांतिपूर्ण रूप से विरोध प्रकट कर रहे लोगों पर गोलीबारी करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को तुरंत गिरफ्तार करने की भी मांग की।
‘लाहौर वाम मार्चे’ ने इस प्रैस विज्ञप्ति द्वारा मांग की कि:

साथी अली वजीर को तुरंत रिहा किया जाए तथा उसकी सुरक्षा की गारंटी की जाए।

सरकार तुरंत यह बताए कि संसद सदस्य मोहसिन डाबर कहां है तथा उसकी सुरक्षा की गारंटी की जाए।

भूतपूर्व ‘फाटा’ क्षेत्र (संघीय प्रशासित कबीलाई क्षेत्र, जिसमें कि वजिरिस्तान व अन्य अफगान सीमा से लगते क्षेत्र स्थित हैं) से सेना को तुरंत वापस बुलाए तथा उन क्षेत्रों में लगाया क्र्फर्यू तुरंत हटाया जाए।

इन क्षेत्रों के लोगों की समस्त न्यायपूर्ण मांगों को पूरा किया जाए, जिन्हें कि पहले ही सेना के जनरल व प्रधानमंत्री अपने सार्वजनिक व्क्तव्यों में उचित होने की पुष्टि प्रदान कर चुके हैं।

‘मंच’ इस क्षेत्र के लोगों द्वारा दमन-उत्पीडऩ, लूट-खसूट तथा अन्याय के विरुद्ध चलाए जाने वाले संघर्षों के दौरान उठाई जाती सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक मांगों का पूर्ण समर्थन करता है।

न्यूजीलैंड के अध्यापकों की हड़ताल
आस्ट्रेलिया महाद्वीप के देश न्यूजीलैंड में 29 मई को हजारों अध्यापक एक दिवसीय हड़ताल पर रहे। देशभर के 52000 अध्यापकों जिनमें प्रिंसीपल भी शामिल थे, ने इस हड़ताल में भाग लिया तथा 8 लाख विद्यार्थी इससे प्रभावित हुए। हड़ताल करने के बाद इन्होंने रोष प्रदर्शन भी किए। जिनमें उनके अतिरिक्त विद्यार्थियों व अभिभावकों के साथ-साथ आम मेहनतकश लोंगों ने भी भाग लिया। देश के शहर आकलैंड में 15000 अध्यापकों व विद्यार्थियों ने क्वींस स्ट्रीट में प्रदर्शन किया। देश की राजधानी वेलिंगटन में 5000 लोगों ने देश की संसद की ओर मार्च किया। अन्य शहरों क्राइसट-चर्च, डूनेडिन, हैमिलटन, पाल्मरस्टोन, भंगारई, इन्वकारगिल, न्यू प्लेमाऊथ, रोटोरूआ तथा नैल्सन समेत छोटे-छोटे कस्बों में भी हजारों की संख्या में अध्यापकों ने हड़ताल करने के बाद रोष प्रदर्शन किए।
वास्तव मेें यह हड़ताल वर्तमान लेबर पार्टी की सरकार द्वारा दूसरा वार्षिक बजट पेश करने के अवसर पर की जा रही है। सरकार इसे ‘कल्याण बजट’ के रूप में लोगों के समक्ष पेश कर रही है जबकि वास्तव में यह पिछली नैशनल पार्टी सरकार की सार्वजनिक खर्चों में कटौती करने की नीतियों को ही आगे बढ़ाता है तथा स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा व अन्य बुनियादी जन सुविधाओं पर होने वाले खर्चों में कटौती करता है तथा सेना व पुलिस को अरबों रुपए अधिक देता है।
न्यूजीलैंड के अध्यापकों की मांग है कि वेतन में 15 से 16 प्रतिशत की बढ़ौत्तरी की जाए, और अधिक अध्यापक व अन्य स्टाफ भर्ती किया जाए, कक्षा का आकार छोटा किया जाए, उन पर कार्य दबाव को कम किया जाए। पिछले वर्ष देश के प्राइमरी अध्यापकों द्वारा हड़ताल किए जाने पर सरकार ने वेतन में मात्र 3 प्रतिशत प्रति वर्ष बढ़ौत्तरी करने तथा अध्यापक ट्रेनिंग संस्थाओं में बहुत ही नग्णय सी बढ़ौत्तरी करने की पेशकश की थी तथा इस तरह मात्र 1.2 अरब डालर खर्च बढ़ाने की बात की थी जो अध्यापकों की मांग की तीसरा भाग मात्र है। वास्तव में सरकार द्वारा जो ‘‘पैसा नहीं है’’ का बहाना बनाया जा रहा है वह हर क्षेत्र में पैदा हो रहे सामाजिक संकट का समाधान करने के अपने कर्तव्य से पीछे हटने को उचित ठहराने के लिए किया जा रहा है। जबकि वास्तविकता यह है कि देश की सरकार पिछले वर्ष ही 5.5 अरब डालर अतिरिक्त (स्ह्वह्म्श्चद्यह्वह्य) वाला बजट पेश कर चुकी है। सरकार मेहनतकश लोगों की मांगों को मानने के इंकार कर रही है तथा सार्वजनिक सेवाओं को अधिक सक्षम बनाने के लिए धन जुटाने हेतु अमीरों पर टैक्स लगाने के लिए तैयार नहीं है तथा दूसरी ओर सेना खर्चों में अरबों डालर की बढ़ौत्तरी कर रही है। अध्यापकों को देने के लिए सरकार द्वारा मात्र 1.2 अरब डालर की पेशकश की जा रही है जबकि चार नए युद्धक जहाजों के लिए 2.3 अरब डालर रखे गए हैं।
देश की राजधानी वेलिंगटन में हड़ताल के बाद हुए प्रदर्शन में भाग ले रहे 30 वर्ष से प्राइमरी व सेकैंडरी स्कूलों में अध्यापन कार्य कर रहे अध्यापक निक द्वारा एक बैव-समाचार पोर्टल से की गई बातचीत समस्त समस्या को बेहतरीन ढंग से पेश करती है – ‘‘कार्य स्थितियां खराब हुई हैं। एक दशक से भी अधिक से वेतनों में सुधार नहीं हुआ है। सरकार का यह कहना है कि धन नहीं है, कोरा झूठ है। हमें स्कूलों में कई तरह की समस्याओं से निपटना पड़ता है, उनमे एक है, निरंतर बढ़ रही गरीबी। विद्यार्थियों में व्यवहारिक व सीखने की विकलांगताएं बढ़ रही हैं, हिंसक होने की घटनाएं बढ़ रही हैं, स्कूलों में भूखे, बिना जूतों के तथा बिना बरसाती कपड़े पहने आने वाले बच्चों की संख्या में बढ़ौत्तरी हो रही है। अध्यापकों को अध्यापन से अधिक समय, समीक्षा कार्यों पर खर्च करना पड़ रहा है। कई को सप्ताह के अंतिम दिनों में बहुत सा ऐसा कार्य करना पड़ता है जिसका कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता। वेतन कम हैं। बहुत से ऐसे स्नातक हैं जिन्होंने 4 वर्षीय डिग्री कोर्स किए हैं तथा 1 लाख से अधिक के कर्ज में हैं। वे कर्ज चुकाने जितना वेतन नहीं पा रहे हैं।’’ अंत में उन्होंने पूर्ण दृढ़ता के साथ अपनी बात समाप्त की कि वह जब तक उनकी मांगें मान नहीं ली जाती, तब तक वे संघर्षरत रहेंगे।

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