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विश्व दर्पण (संग्रामी लहर-जून २०१९)

विश्व दर्पण (संग्रामी लहर-जून २०१९)

रवि कंवर

मध्य-पूर्व एशिया को एक और युद्ध में धकेलने के लिए आमादा अमरीकी साम्राज्यवाद
अमरीकी साम्राज्यवाद की तेल की लालसा से उपजी जंग की भ_ी में सड़ रहा मध्य-पूर्व एशिया अब एक और जंग के मुहाने पर खड़ा है। अमरीकी साम्राज्यवाद के पि_ू साऊदी अरब द्वारा मक्का में बुलाए गए इस्लामिक सहयोग संगठन के आपात शिखर सम्मेलन में साऊदी अरब ने ईरान के विरुद्ध सख्त कदम उठाए जाने का आह्वान किया है।
इस शिखर सम्मेलन ने विज्ञप्ति जारी करके साऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात को, उनके तेल पंपिंग स्टेशनों व तेल टैंकरों पर हुए हमलों को देखते हुए, दोनों देशों को अपने हितों की रक्षा करने का अधिकार होने की पुष्टि की है। यहां यह वर्णनीय है कि कुछ दिनों पहले साऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात ने अपने तेल टैंकरों व पंपिंग स्टेशनों पर ईरान द्वारा हमले किए जाने के बारे में कहा था। यह पूरा घटनाक्रम ही अमरीकी साम्राज्यवाद की शह पर झूठ पर खड़ा किया गया दिखता है। ईरान ने इन घटनाओं के होने के समय ही स्पष्ट कर दिया था कि उसका इन हमलों से कोई लेना-देना नहीं है तथा दूसरी ओर यमन के हूथी विद्रोहियों ने इन हमलों की जिम्मेदारी ले भी ली थी। हूथी विद्रोही यमन में पिछले काफी लंबे समय से अपने ही देश में एक स्वतंत्र देश की मांग के लिए संघर्षरत हैं तथा पिछले चार साल से साऊदी अरब उनके विरुद्ध निर्मम फौजी कार्यवाही कर रहा है, जिसमें उन पर लगभग नित्य ही किए जाते हवाई हमले भी शामिल हैं।
इस शिखर सम्मेलन में उपस्थित ईराक ने अरब शिखर सम्मेलन की विज्ञप्ति पर यह कहते हुए आपत्ति जताई थी कि ईरान से कोई भी सहयोग ‘‘अन्य देशों में दखलंदाजी न करने’’ के सिद्धांत पर आधारित होनी चाहिए। जबकि अमरीकी अधिकारियों का कहना था कि खाड़ी में सैन्य बल बढ़ाने के कारण ही ईरान ने और हमले नहीं किए हैं।
अमरीका ने पिछले हफ्ते ही खाड़ी में हुए तेल टैंकरों पर हमलों को बहाना बनाते हुए अपना युद्धक बेड़ा, यू.एस.एस. अब्राहम, बी-52 बमवर्षक, एक पैट्रियाट मिजाइल वेधी व कई अन्य समुद्री सैन्य पोतों को ईरान के विरुद्ध कार्यवाही करने की धमकी देते हुए भेज दिया है। तथा साथ में ही देश के रक्षा मंत्री ने यह भी मई में घोषणा कर दी थी कि यदि ईरान अमरीकी सैन्य बलों पर हमला करता है या पुन: आणविक हथियार बनाने का कार्य आरंभ करता है तो पैंटागन  की योजना 1 लाख 20 हजार सैना भेजने की है। यहां यह भी नोट करने योग्य है कि अमरीका ने अप्रैल में ही ईरान की सशस्त्र सेना के विशेष दस्तों  ‘ईस्लामिक रैवोल्यूशनरी गार्डस’ को आतंकवादी गुट घोषित कर दिया था जो कि उसकी संप्रभुता का नग्न उल्लंघन है।
अमरीका का दावा है कि उसे गुप्त सूत्रों से पता लगा है कि ईरान मध्य-पूर्व में तैनात इसके सैन्य बलों पर हमले की योजना बना रहा है तथा साऊदी अरब के तेल टैंकरों पर हमले ईरान ने ही किए हैं। वास्तव में यह सब उतना ही बड़ा झूठ है जैसे कि ईराक पर 2003 में आक्रमण के समय संयुक्त राष्ट्र के सामने शपथ खाते हुए तत्कालीन अमरीकी रक्षा मंत्री कोलिन पोबेल ने कहा था कि सद्दाम हुसैन के पास जन-संहार के हथियार हैं जो कि बाद में पूर्ण रूप से असत्य सिद्ध हुआ था।
एक बार पुन: यह दिख रहा है कि ईरान के बहाने अमरीकी साम्राज्यवाद मध्य-पूर्व को एक और युद्ध में धकेलने की तैयारी कर रहा है। ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने तो एक भरोसे योग्य सूत्र के हवाले से कहा है कि इस विषय पर अमरीकी प्रशासन में मतभेद हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टोन व विदेश मंत्री माईक पोंपियो युद्ध के इच्छुक हैं जबकि अन्य इस बारे में अधिक सावधानी अपना रहे हैं।
वास्तव, में अमरीकी साम्राज्यवाद वेनेजुएला की तरह ही ईरान के तेल निर्यात पर पाबंदियां लगा कर उसे कुचलते हुए देश में शासन में परिवर्तन करके अपने पि_ूओं को सत्ता में बैठाना चाहता है। इसका स्पष्ट सबूत है उस द्वारा भारत व अन्य देशों को ईरान से तेल निर्यात करने से रोकने के लिए मजबूर करना। परंतु, न अमरीकी साम्राज्यवाद वेनेजुएला में अभी तक सफल हो सका है तथा न ही वह ईरान में सफल होगा।
अमरीका ईरान रिश्ते यहां तक कैसे पहुंचे यह समझना भी इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है :
1951 में ब्रिटेन समर्थित प्रधानमंत्री अली रजामारा की हत्या के बाद देश की सत्ता संसदीय मतों द्वारा चुने गए प्रधानमंत्री डा. मोहम्द मोसादेघ ने संभाली जिसकी पुष्टि देश के राजा रजा शाह पहलवी द्वारा भी कर दी गई। उन्हें देश में काफी लोकप्रियता मिली, जब उन्होंने ब्रिटेन के स्वामित्व वाले तेल उद्योग व तेल कुओं का राष्ट्रीयकरण कर लिया। परंतु यह ब्रिटेन व अमरीकी साम्राज्यवाद के लिए असहनीय था। जहां ब्रिटेन ने देश के तेल निर्यातों पर पाबंदियां लगाई वहीं अमरीकी राष्ट्रपति आइजनआवर ने ‘आपरेशन अजैक्स’ की आज्ञा देकर 1953 में डा. मोसादेघ की सरकार का तख्तापलट कर दिया। अमरीका द्वारा किया गया किसी गैर-सैन्य चुनी हुई सरकार का यह पहला तख्ता पलट था। तख्ता पलट के बाद सत्ता पर बैठे शासकों को कुछ समय बाद ही चलता कर देश की राजसत्ता प्रत्यक्ष रूप में राजा रजा शाह पहलवी ने संभाल ली तथा ब्रिटिश तेल उद्योग से नया समझौता करके पुन: देश में प्रवेश करवा दिया गया। शाह ने संपूर्ण देश में तानाशाह राज्य स्थापित कर दिया। इसके साथ ही अमरीका की उपस्थिति भी चरम सीमा पर पहुंच गई। लाखों अमरीकी सशस्त्र सैनिक देश में पहुंचे, स्थानीय सेना के प्रशिक्षण के नाम पर। अमरीका देश में चहुं ओर छा गया। देश में स्थित अमरीकी दूतावास ही वास्तव में सत्ता का केंद्र बन गया। शाह ने अरब देशों व फिलिस्तीनी हितों की पूरी तरह अनदेखी करते हुए इजरायल से भी गहरे संबंध स्थापित कर लिए। ईरान की धरती का उपयोग उसके पड़ोसी समाजवादी देश सोवियत यूनियन की जासूसी करने के लिए भी अमरीकी साम्राज्यवाद ने भरपूरता से किया। 1979 में देश में ईस्लामिक क्रांति हो गई तथा रजा शाह पहलवी देश छोड़ कर भागने के लिए मजबूर हुआ। तभी से अमरीकी साम्राज्यवाद निरंतर ईरान में अपनी पि_ू सरकार स्थापित करने के लिए प्रयत्नरत है।
रजा शाह पहलवी ने 1963 में देश की कृषि को ‘आधुनिक’ बनाने के लिए ‘सफेद क्रांति’ आरंभ की। इसके अधीन आधुनिकतम तकनीक पर आधारित बड़े-बड़े फार्म स्थापित किए गए। इसके फलस्वरूप जहां लाखों छोटे व मंझौले पारंपरिक कृषक उजड़ कर शहरों की झुग्गी-झोंपड़ी बस्तियों में बसने के लिए मजबूर हुए वहीं बड़े पैमाने पर रसायनों आदि के कृषि में उपयोग के कारण देश का वातावरण भी असुंतलित हो गया। 1977 में देश की राजधानी तेहरान की इन झुग्गी-झोंपड़ी बस्तियों से ही क्रांति की चिंगारी उठी। बिजली, पानी, सीवरेज, स्वास्थ्य सेवाओं, अच्छे आवासों व यातायात सुविधाओं की मांग के लिए विशाल प्रदर्शन हुए। जिन्हें दबाने के लिए सरकार ने अद्र्ध-सैन्य बलों व बुलडोजरों का उपयोग किया। लोग इनके विरुद्ध पारंपरिक हथियारों से लड़े। यह संघर्ष ही दो सालों से भी कम समय में क्रांति का रूप ग्रहण कर गया। दिन-प्रति-दिन प्रदर्शन विशाल से विशालतर होते गए। 1978 के सितंबर तक इनमें 30 से 40 लाख लोग भाग लेने लगे। जिन्हें दबाने के लिए शाह ने देश भर में मार्शल-ला लगा दिया। अक्तूबर में हुई एक बैंक हड़ताल ने देशभर में आम हड़ताल का रूप ले लिया। इसके साथ देश की कई उत्पीडऩ राष्ट्रीयताओं ने भी इस आंदोलन में प्रवेश किया। इस विशाल आंदोलन के दबाव में राजा रजा शाह पहलवी देश छोडक़र 16 जनवरी 1979 को भाग गया तथा देश में एक अपने पि_ूओं पर आधारित सरकार स्थापित कर गया।
इस समूचे आंदोलन में मेहनतकश लोगों ने निर्णायक भूमिका निभाई तथा यह क्रांति उन्हीं द्वारा की गई थी। परंतु देश में कम्युनिस्ट व वामपंथी शक्तियां बहुत कमजोर होने के कारण वे इस क्रांति को नेतृत्व प्रदान नहीं कर सकीं तथा इस स्थान को भरते हुए शिया धर्म गुरूओं ने इसका नेतृत्व संभाल लिया। एक वरिष्ठ धर्मगुरू रुहोल्ला खुमैनी को 1963 में एक असफल बगावत का नेतृत्व करने के कारण देश से निष्कासित करके फ्रांस भेज दिया गया था। उन्होंने देश पहुंच कर राजसत्ता संभाली। इस तरह देश में एक धर्म-आधारित राज्य की स्थापना हो गई जो कि मेहनतकश वर्गों के प्रति उत्पीडक़ ही है।
1979 से ही अमरीकी साम्राज्यवाद देश में हुई इस क्रांति का तख्ता पलट करने के प्रयत्नों में जुटा है, परंतु वह सफल नहीं हुआ। 1980 में एक प्रयत्न उस द्वारा किया भी गया। परंतु वह असफल रहा। इसी वर्ष के अन्त में साम्राज्यवाद की शह पर ईराक ने ईरान पर बड़ा सैन्य आक्रमण कर दिया। अमरीका को लग रहा था कि ईरान की सैना क्रांति के कारण कमजोर हो गई होगी। परंतु, उसकी यह सोच पूर्ण रूप में मिथ्या सिद्ध हुई। यह युद्ध पूरे 8 साल चला तथा लाखों ईरानियों ने वीरतापूर्ण बलिदान देते हुए इसे नाकाम कर दिया। ईरानी शासकों ने इस आक्रमण के बहाने दमन तंत्र मजबूत कर लिया। ईराक आक्रमण को सोवियत रूस का समर्थन होने के चलते ईरान ने कम्युनिस्टों व समाजवादियों पर अकथनीय जुल्म ढाए तथा 5000 के लगभग कम्युनिस्टों व समाजवादियों को मौत की सजाएं दी गईं। इसके साथ ही 1979 की क्रांति के दौरान मजदूरों, किसानों व देश की उत्पीडऩ राष्ट्रियताओं की आशाओं-उमंगों का भी 1983 तक पूर्ण रूप से दबा दिया गया तथा एक अधिक उत्पीडक़ राज्य इस युद्ध से उदय हुआ। इस युद्ध में सफलता प्राप्त करने  के बाद ईरान ने मध्य-पूर्व एशिया में शिया धर्माविलंबियों के बीच अपने प्रभाव का विस्तार किया। अमरीकी साम्राज्यवाद ने आर्थिक पाबंदियां लगाकर इसे रोकने का प्रयास किया।
ईरान ने शिक्षा, विज्ञान आदि के क्षेत्र में गणनीय उपलब्धियां कीं। उनमें से एक थी उस द्वारा परमाणु शक्ति के क्षेत्र में प्रगति। परमाणु शक्ति को विकसित कर परमाणु हथियार बनाने को बहाना बनाते हुए अमरीकी साम्राज्यवाद ने पाबंदियों को और अधिक सख्त कर दिया। 2016 में दुनिया के 7 देशों के साथ हुए परमाणु समझौते के बाद ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित कर दिया। इससे देश को आर्थिक राहत, इन पाबंदियों के वापिस किए जाने से मिली। परंतु अमरीका में राष्ट्रपति का पद ट्रम्प द्वारा संभाल दिए जाने के बाद उसने इस समझौते को रद्द कर दिया तथा पुन: पाबंदियां लगा दीं। नई पाबंदियों द्वारा अमरीकी साम्राज्यवाद ईरान के मुख्य आर्थिक स्त्रोत तेल के निर्यात में बाधाएं पैदा कर उसका गला घोंटना चाहता है।
परंतु, जिन अन्य देशों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, वे इसके प्रति अभी भी प्रतिबद्ध हैं। वे हैं, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, जर्मनी, चीन व यूरोपिय संघ, वे इस समझौते को जिंदा रखने के लिए प्रयासरत हैं। परंतु वे अमरीकी साम्राज्यवाद के दबाव के समक्ष कब तक टिक पाएंगे या कितने प्रभावशाली रहेंगे यह तो समय ही बताएगा, क्योंकि ईरान वायदे के अनुसार इन देशों द्वारा प्रदान की जाने वाली आर्थिक राहत पिछले दो माह से प्राप्त नहीं कर सका है। ईरान ने इसके मद्देनजर चेतावनी दी है कि यदि दो माह में उसे राहत प्रदान नहीं की जाती तो वह अपने परमाणु कार्यक्रम को पुन: नवीनीकरण करेगा।
इस समूचे घटनाक्रम से एक बात तो स्पष्ट रूप से निकल कर आती है कि ईरान हमेशा ही अमरीकी साम्राज्यवाद के विरोध में पूरी मजबूती से खड़ा रहा है, यही कारण है कि अमरीका उसे अपने दुश्मनों के रूप में देखता है।
स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है, अमरीका धमकी दे रहा है कि यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम का नवीनीकरण करेगा तो वह सैन्य हमला कर देगा। स्पष्ट है कि अमरीकी साम्राज्यवाद मध्य-पूर्व को एक और युद्ध में धकेलने पर आमादा है। ईरान के विरुद्ध युद्ध, जो कि निश्चित ही एक पूर्ण युद्ध का रूप ग्रहण करेगा अफगानिस्तान व ईराक में हुए युद्धों से कहीं अधिक भीषण होगा तथा मध्य-पूर्व एशिया, जिसका की काफी बड़ा भाग पहले ही खंडहर बन चुका है तथा इसके लाखों लोग इसकी भेंट चढ़ गए हैं के लिए ही नहीं बल्कि समूचे विश्व के लिए भयानक परिणाम सामने लेकर आएगा।
आज विश्व भर के जनवाद पसंद, शांतिकामी व मानवता पक्षीय नागरिकों का कत्र्तव्य बनता है कि वह ईरान से पाबंदियां हटाने, ईरान परमाणु समझौते का सम्मान करने व शांति बनाए रखने के पक्ष में आवाज बुलंद करे।

वेनेजुएला : साम्राज्यवाद का वामपंथी सरकार का तख्तापलट करने का प्रयत्न नाकाम
लातीनी अमरीका महाद्वीप का वामपंथी सत्ता वाला देश वेनेजुएला अमरीकी साम्राज्यवाद के हस्तक्षेप का दंश झेल रहा है, यह हस्तक्षेप वास्तव में एक हमले का रूप ग्रहण कर चुका है। वैसे तो पिछली डेढ़ सदी, अर्थात 150 वर्षों से ही अमरीका इस महाद्वीप, जो कि प्राकृतिक संसाधनों से लबरेज है, में सैन्य व अन्य रूपों से हस्तक्षेप करते हुए अपनी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा इनके इस बहुमूल्य खजाने को लूटता रहा है तथा कोई भी उसकी इस लूट में बाधा बनता है, उसे वह अपने दुश्मनों में शुमार करके येन-केण-प्रकरेण नेस्तनाबूद करने का हर संभव प्रयास करता है।
वेनेजुएला की भी कहानी इसी प्रकार की है। यह देश दुुनिया का पांचवा सबसे बड़े तेल भंडारों वाला देश है। 20वीं सदी में इसकी खोज होने के बाद से ही अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस पर काबिज थीं। यहां तक कि 1970 में अमरीकापरस्त शासकों ने तेल क्षेत्रों का राष्ट्रीकरण तो कर दिया परंतु फिर भी वे बहुत ही सस्ते दामों पर अमरीका को तेल प्रदान करते रहे तथा एक अन्य द्रोह जो उन्होंने इस देश से कमाया वह था, इसकी अर्थव्यवस्था को पूर्ण रूप से अमरीकी साजिश के अनुसार इस तेल आय पर निर्भर बना देना। देश में अन्य उद्योग व कृषि के विकास का कोई प्रयत्न नहीं किया तथा अन्य सभी उपभोक्ता वस्तुओं के लिए आयात पर देश को पूर्ण रूप से निर्भर बना दिया।
इसके फलस्वरूप देश में पैदा बेचैनी से उभरे विशाल जनआंदोलनों में वामपंथी नेता साथी हुगो शावेज सत्तासीन हुए उन्होंने राष्ट्रीयकृत तेल क्षेत्रों का विस्तार किया तथा इससे मिलने वाले धन को देश की आम मेहनतकश जनता को जन-सुविधाएं प्रदान करने के लिए व्यापक रूप में खर्च करना शुरू किया। अमरीकी साम्राज्यवाद को यह हजम नहीं हुआ तथा उसने 2002 में उसके विरुद्ध असफल तख्ता पलट किया। साथी हूगो शावेज ने साम्राज्यवादी विश्वीकरण आधारित सामाजिक-आर्थिक नीतियों को चुनौती देते हुए जनपक्षीय सामाजिक-आर्थिक नीतियों पर आधारित विकल्प पेश किया जिसने सोवियत संघ के ध्वस्त होने के बाद से निराशा में डूबीं जनपक्षीय राजनैतिक शक्तियों में एक नए उत्साह का संचार किया, समस्त लातीनी अमरीकी महाद्वीप इससे प्रभावित हुआ तथा कई देशों में जन समर्थक वामपंथी नेताओं ने सत्ता संभाली।
वेनेजुएला पर वर्तमान अमरीकी हस्तक्षेप, अमरीका की उस परिवर्तन की लहर को रोकने के प्रयासों की निरंतरता ही है। 5 मार्च 2013 को साथी हूगो शावेज के निधन के बाद उनके साथी निकोलस मादुरो देश के राष्ट्रपति 2014 में बाकायदा रूप में चुनाव जीतने के बाद बने। उनके समस्त कार्यकाल में ही अमरीका अपने पि_ू विरोधी राजनीतिक दलों द्वारा उनके विरुद्ध आंदोलनरत रहा। 2018 में राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनावों में वे पुन: 68 प्रतिशत वोट लेकर विजयी हुए जबकि सभी विपक्षी उम्मीदवारों, जिनमें साम्राज्वाद समर्थित उम्मीदवार हेनरी फालकन भी शामिल थे को मात्र 32 प्रतिशत मत मिले। परंतु फिर भी 10 जनवरी 2019 को राष्ट्रपति मादुरो ने अपने दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ ली, तो अमरीकी साम्राज्यवाद समर्थित विरोधी पक्ष ने इसे सत्ता हड़पना करार देते हुए जुआन गाइडो को अंतरिम राष्ट्रपति घोषित कर दिया। पहले तय योजना के अनुसार ही अमरीकी साम्राज्यवाद व उसके समर्थक यूरोपीय व अन्य देशों ने भी उसे मान्यता प्रदान कर दी।
उसी समय से वेनेजुएला के बाकायदा जनमत द्वारा चुने हुए राष्ट्रपति मादुरो को सत्ता से उतारने के लिए सभी तरह के प्रयास साम्राज्यवाद व उसके सहयोगियों द्वारा किए जा रहे हैं। देश भर में हिंसक प्रदर्शन रोजाना का कार्यक्रम बन गया है। देश पर पाबंदियां लगा कर उसके आय के मुख्य साधन तेल के निर्यात को जाम कर दिया गया है, जिसके परिणामस्वरूप उपभोक्ता वस्तुओं का आयात न होने के कारण उनकी भयानक किल्लत पैदा हो गई है। यही नहीं देश के बिजली नैटवर्क के कंप्यूटर आधारित सिस्टम में हैकिंग करके दो से अधिक बार पूरे देश को अंधेरे में ही नहीं धकेला बल्कि अस्पतालों, चिकित्सा सुविधाओं व पेयजल परियोजनाओं को भी ठप्प कर दिया गया है। कई बार जुआन गाइडो द्वारा सैना का तख्ता पलटने के लिए आह्वान किया जा चुका है। अमरीका द्वारा सैन्य हस्तक्षेप की धमकियां वास्तविक रूप लेने से रुके रहने का एक बड़ा कारण रूस व चीन द्वारा किसी तरह के भी सैन्य हस्तक्षेप के विरुद्ध दी गई चेतावनी है।
30 अप्रैल को तख्ता पलट का प्रयास एक अन्य विरोधी पक्ष के नेता लियोपोल्डो लोपेज जो कि अपने घर में नजरबंद थे, को कुछ सैन्य व खुफिया विभाग के अफसरों व जवानों द्वारा रिहा करने के साथ शुरू हुआ। वहां  से वे जुआन गाइडो के पास राजधानी क्षेत्र में स्थित लाकारलोटा एयर बेस पहुंचे। परंतु उनका यह प्रयास देश की सैना ने असफल बना दिया तथा राष्ट्रपति महल मीराफ्लोरिस पहुंचे लाखों लोगों ने इस तख्तापलट से राष्ट्रपति महल की रक्षा के लिए अपने मजबूत इरादे को प्रकट करते हुए राष्ट्रपति मादुरो के पक्ष में विशाल जन समर्थन का परिचय दिया। इस तरह 5 महीने से अमरीकी साम्राज्यवाद की हर तरह की साजिशों व हमलों का मुकाबला करते हुए देश की वामपंथी सरकार कायम है।
इसके साथ ही अंतराष्ट्रीय शक्तियों द्वारा इस संकट का समाधान करने का पिछले समय में प्रयास किया गया था, जिसे देश की वामपंथी सरकार ने पूर्ण समर्थन दिया था। इस बारे में नार्वे की राजधानी ओस्लो में दोनों पक्षों, सरकार व विरोधी पक्ष के बीच बातचीत चली है। नार्वे की मध्यस्थ टीम ने 17 मई के दोनों पक्षों से प्रारंभिक संपर्क स्थापित किया था। सरकार की ओर से टीम में देश के संचार मंत्री व उपराष्ट्रपति जार्ज रोडरिग्स, विदेश मंत्री जोर्ग इरीकाा तथा मिरांडा राज्य के गर्वनर हैक्टर रोडरिग्स शामिल हैं। जबकि विरोधी पक्ष की ओर से राष्ट्रीय असैंबली के द्वितीय उपाध्यक्ष स्तालिन गोंजालेज, भूतपूर्व मंत्री फर्नेडो मारटीनेका मोटोला, भूतपूर्व मेयर गेरारडो बालीडे तथा विसैंड डियाका शामिल हैं। इसी सप्ताह राष्ट्रपति मादुरो, जुआन गाइडो तथा रूस व अमरीका ने भी इस प्रक्रिया के बारे में विचार प्रकट किए हैं।
राष्ट्रपति मादुरो ने आशा प्रकट की है कि यह बैठकें ऐसे समझौते पर पहुंचेगी जो देश में ‘‘शांति व स्थिरता’’ की गारंटी प्रदान करेंगे। उन्होंने नार्वे सरकार का इन प्रयासों के लिए धन्यवाद भी किया। यहां यह भी नोट करने योग्य है कि राष्ट्रपति मादुरो ने इस प्रक्रिया के प्रति सकारात्मक पहुंच अपनाते हुए देश की संसद के चुनाव पहले करवाने की भी पेशकश की है।
जुआन गाइडो बाधा उत्पन्न करने के प्रयत्न करते हुए विपक्षी टीम के नार्वे जाने के विरुद्ध थे, परंतु बाद में यह टीम भी बातचीत में शामिल हुई। उसका कहना है कि इस वार्ता के लिए प्रारंभिक शर्त होनी चाहिए कि मादुरो सत्ता को हड़पने को त्यागे अर्थात त्यागपत्र दे तथा नए चुनावों को संपन्न करवाने के लिए अंतरिम सरकार बनाई जाए।
अमरीकी साम्राज्यवाद ने इस वार्ता पर चिंता प्रकट करते हुए कहा है कि 2017-18 में हुई पहली वार्ता ने विरोधी पक्ष में विभाजन पैदा कर दिया था। उसने कहा कि गाइडो की टीम सिर्फ एक मुद्दे को लेकर ही बात करे कि ‘‘मादुरो के सत्ता छोडऩे का तरीका क्या होगा।’’
रूस की सरकार जिसने पहले अमरीका को किसी भी प्रकार का देश में हस्तक्षेप करने के विरुद्ध चेतावनी दी थी, ने इन वार्ताओं का पूर्ण समर्थन करते हुए कहा कि हम उन सभी देशों, जो कि वेनेजुएला की स्थिति में शरीक हैं तथा देश की प्रमुख शक्तियों के बीच चल रही राजनीतिक प्रक्रिया का समर्थन करते हैं, का आह्वान करते हैं कि वे वेनेजुएला के नेतृत्व को किसी भी तरह के अल्टीमेटम देेने से गुरेज करें।
यूरोपीय नेतृत्व वाले अंतर्राष्ट्रीय संपर्क ग्रुप, जो कि हाल ही में सरकार व विपक्ष से मिला है, ने भी इस वार्ता पहल का पूर्ण समर्थन किया है तथा ‘‘एक राजनीतिक, शांतिपूर्ण व जनवाद आधारित समाधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता’’ को पुन: प्रकट किया है।
यहां स्पष्ट निकल कर सामने आता है कि अमरीकी साम्राज्यवाद इस वार्ता प्रक्रिया को प्रति पूर्ण रूप से सुहृदय नहीं है। इस वार्ता का अगला दौर 27 मई के बाद होगा। विश्व का हर न्यायप्रिय व शांतिप्रिय नागरिक वेनेजुएला के इस संकट के समाधान के पक्ष में हैं।                          (5-6-2019)

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