रवि कंवर
फ्रांस के मेहनतकशों का ईंधन की कीमतों में बढ़ौत्तरी के विरुद्ध ‘पीली बनियान’ आंदोलन
यूरोपिय देश फ्रांस आजकल देश की मैकरां सरकार के विरुद्ध संघर्षों के मैदान का रूप ग्रहण कर गया है। लगभग नित्य ही देश की मेहनतकश जनता का कोई ना कोई भाग अपनी मांगों या समस्याओं को लेकर संघर्षरत दीखता है। 17 नवंबर से समूचे देश में ‘पीली बनियान’ आंदोलन चल रहा है। आंदोलनकारी ‘पीली बनियान’ पहने होते हैं। यह बनियान, फ्रांस में सभी वाहन चालकों को अपने वाहन में रखनी अनिवार्य है तथा रास्ते में वाहन के खराब होने पर, जहां वाहन के समक्ष चमकीला ‘लाल तिकोन’ रखना अनिवार्य है, उसी तरह चालक को भी ‘पीली बनियान’ पहननी होती है यह चमकीली होती है तथा अंधेरे में दूर से दिखाई देती है। इस तरह यह ‘पीली बनियान’ सडक़ सुरक्षा की एक आवश्यक वस्तु है।
परंतु, शनिवार 17 नवंबर को यह सडक़ सुरक्षा की वस्तु, एक आंदोलन का प्रतीक बन गई तथा समूचे देश में आंतरिक सुरक्षा विभाग के अनुसार ही 2 लाख 87 हजार लोगों ने 2000 स्थानों पर रोष प्रदर्शन किये। इन सभी आंदोलनकारियों ने ‘पीली बनियान’ पहनी हुई थी। इस तरह इस आंदोलन का नाम ही ‘पीली बनियान’ आंदोलन पड़ गया।
यह आंदोलन ईंधन, विशेषकर डीजल व पेट्रोल की कीमतों में हो रही निरंतर बढ़ौत्तरी व सरकार द्वारा 1 जनवरी से की जाने वाली प्रस्तावित बढ़ौत्तरी से पैदा हुये रोष से उत्पन्न हुआ है। फ्रांस में आम तौर पर डीजल का ही प्रयोग कारों में ईंधन के रूप में होता है। पिछले 12 महीने में यह औसतन 1.51 यूरो प्रति माह की दर से महंगा हुआ है, यह बढ़ौत्तरी साल 2000 के बाद से सबसे अधिक है। दुनिया भर में तेल की कीमतें बढक़र पुन: गिरावट की ओर हैं परंतु देश की मैकरां सरकार ने ‘स्वच्छ पर्यावरण के अनुरूप कारें व ईंधन’ के नाम पर चलाये जा रहे अभियान के अंतर्गत इस साल डीजल की कीमतों में 7.6 सैंट प्रति लीटर व पैट्रोल में 3.9 सैंट प्रति लीटर की बढ़ौत्तरी की है। इस आंदोलन के लिये आग में घी की भूमिका सरकार द्वारा 1 जनवरी से इन कीमतों-डीजल में 6.5 सैंट प्रति लीटर व पैट्रोल में 2.9 सैंट प्रति लीटर की अनुमोदित बढ़ौत्तरी ने निभाई है।
स्व: स्फूर्त रूप से आरंभ यह आंदोलन ईंधन की कीमतों में बढ़ौत्तरी से आगे बढ़ गया है। इसकी मांगों में नित्यप्रति टैक्सों में हो रही बढ़ौत्तरी तथा देश में बढ़ती जा रही जीवन यापन की लागतें भी जुड़़ गई हैं। इसने, इस आंदोलन को और भी व्यापक बना दिया है। बिना किसी राजनीतिक पार्टी, ट्रेड यूनियन या अन्य संगठन के आह्वान के इस आंदोलन में मेहनतकश जनता के सभी वर्ग, सभी आयु वर्ग के लोग शामिल हो रहे हैं। यह आंदोलन यूरोपिय यूनियन के अन्य देशों विशेषकर बेल्जियम तक जा पहुंचा है। इसमें लगभग सभी राजनीतिक धाराओं के लोग शामिल हैं।
सोशल मीडिया की कोख से उत्पन्न यह आंदोलन 17 नवंबर को कुछ ड्राईवरों द्वारा सोशल मीडिया पर किये गये आह्वान पर शुरू हुआ था। ईंधन की कीमतों में बढ़ौत्तरी के विरुद्ध पसरे गुस्से ने इसमें चिंगारी का कार्य किया तथा पहले ही दिन 2000 से अधिक स्थानों पर रोष प्रदर्शन हुये जिनके दौरान राजमार्गों पर यातायात बाधित करने के लिये रुकावटें भी खड़ी की गईं। कई जगह टोल बैरियरों पर भी प्रदशनिकारियों ने कब्जा कर लिया तथा बिना टोल टैक्स दिये वाहनों को निकाला गया। 3 लाख के करीब लोगों ने समूचे देश में इसमें भाग लिया तथा 2 व्यक्तियों की इन प्रदर्शनों के दौरान मौत हुई तथा 50 से अधिक लोगों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया।
अगले शनिवार 24 नवंबर को यह आंदोलन और भी व्यापक रूप ग्रहण करता हुआ राजमार्गों, चौराहों के साथ साथ राजधानी के उस क्षेत्र, ‘चैंप्स इलिसीज’ पहुंच गया जहां राष्ट्रपति महल के साथ-साथ बहुत से दूतावास स्थित हैं। यहां 5000 के करीब पुलिस वाले तैनात थे तथा इस क्षेत्र को बाधायें खड़ी करके प्रदर्शनकारियों को आगे बढऩे से रोका गया। पुलिस से झड़पें हुई व प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिये आंसू गैस का प्रयोग किया गया, जिससे भडक़ाहट में आकर कुछ लोगों ने तोडफ़ोड़ भी की। सरकारी सूत्रों के अनुसार 4 पुलिस अफसरों सहित 14 लोग घायल हुये तथा 40 लोगों को गिरफ्तार किया गया। बाकी देश भर में समूचे रूप में प्रदर्शन शांतिमयी रहे। सरकारी सूत्रों के अनुसार देश भर में 1,06,000 लोगों ने 24 नवंबर के प्रदर्शनों में भाग लिया तथा 1600 जगहों पर यह प्रदर्शन हुये।
तीसरे शनिवार 1 दिसंबर को भी यह आंदोलन बादस्तूर जारी रहा। प्रदर्शनकारी हजारों की संख्या में देश की राजधानी पेरिस के केंद्रीय भाग में स्थित ‘चैंप्स-इलिसीज’ पहुंचे। परंतु वहां जबरदस्त पुलिस प्रबंध होने के कारण बाधाओं को लांघने में नाकाम रहे। हजारों की संख्या में एकत्रित इन प्रदर्शनकारियों की पुलिस से सख्त झड़पें हुई। तोड़-फोड़ भी हुई। युद्ध में शहीद हुये जवानों की याद में बने स्माक ‘आर्क-डी-ट्रिओंफ’ पर प्रदर्शनकारियों ने पेंट से ‘मैकरां इस्तीफा दो’, ‘पीली बनियान-आंदोलन की जीत होगी’ नारे लिख दिये। सरकारी सूत्रों के अनुसार यहां हुई झड़पों में 14 पुलिस अफसरों समेत 90 लोग घायल हुये। समूचे देश में 75000 लोगों ने इस प्रदर्शनों में भाग लिया, बाकी समूचे देश में प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे। इस दिन के रोष एक्शन को और भी महत्त्वपूर्ण बना दिया, विभिन्न जनसंगठनों के आह्वान पर हजारों की तादाद में काम बंद करके इस आंदोलन के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे मजदूरों, कर्मचारियों, किसानों व विद्यार्थियों ने। इसी दिन यह ‘पीली बनियान’ आंदोलन पड़ोसी देश बेल्जीयम की राजधानी ब्रुसेल्ज पहुंच गया। यहां इसकी मुख्य मांग सरकार द्वारा सामाजिक सेवाओं में कटौती करने संबंधी लागू किये जा गये कदमों को वापस लेने की थी। प्रदर्शनकारी देश के दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री चाल्र्स माईकल के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। यहां उनकी पुलिस से झड़पें भी हुई, जिसमें 12 लोग घायल हुये व 74 को गिरफ्तार किया गया।
यह आंदोलन निरंतर फैलता जा रहा है। जबकि प्रदर्शनकारियों की संख्या में कमी आ रही है, परंतु यह हिंसक रूप ग्रहण करता जा रहा है। विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार देश के हर तीन नागरिकों में से दो इस आंदोलन के समर्थक हैं। 81 प्रतिशत नागरिकों के अनुसार मैकरां प्रदर्शनकारियों की मांगों की पूर्ण रूप से अनदेखी कर रहा है। राष्ट्रपति मैकरां द्वारा धमकियां देने व देश के प्रधानमंत्री द्वारा ‘पीली बनियान’ आंदोलनकारियों को बातचीत के लिए बुलाने के बावजूद इस आंदोलन की व्यापकता में कोई कमी नहीं आई है।
स्व: स्फूर्त रूप से शुरू हुये आंदोलन को सबसे पहले समर्थन मेरीन ली पेन की धुर-दक्षिणपंथी पार्टी ने दिया था। इसीलिये देश के वामपंथी संगठनोंं ने अपने आप को इससे दूर रखने की कोशिश की परंतु इस आंदोलन की जायज मांग व लोगों में फैले गुस्से के परिणामस्वरूप इसकी विशालता से प्रभावित होकर वामपंथ की निचली कतारें इसमें शामिल हो गईं। इस आंदोलन को प्रारंभ करने के लिये अपील करने वाले ट्रक ड्राईवर, डरोयूट ने फेसबुक पर पोस्ट डालकर स्थिति को स्पष्ट किया था-‘‘यह महत्त्वपूर्ण है कि जो भी इस आंदोलन में भाग लेने की इच्छा रखता है, इसमें भाग ले, चाहे उसकी चमड़ी का रंग जो भी हो, किसी भी देश से आया प्रवासी हो, उसका लिंग या धर्म जो मर्जी हो…। नहीं, पीली बनियान किसी भी राष्ट्रवादी, फाशीवादी या अतिवादी आंदोलन की भेड़ नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे कि हमारा आंदोलन किसी पार्टी या यूनियन द्वारा संचालित नहीं है। हम सरकार द्वारा लगाये जा रहे टैक्स की निंदा करते हैं, क्योंकि यह जरूरतमंदों पर है, जबकि धनवानों को और अधिक अमीर करेगा।’’
देश के राष्ट्रपति मैकरां द्वारा ईंधन में की जा रही निरंतर बढ़ौत्तरी के लिये ‘देश द्वारा वातावरण रक्षा के लिये की गई प्रतिबद्धताओं’ का तर्क दिया गया है। यहां, यह वर्णन योग्य है कि इस ‘पीली बनियान’ में सबसे अधिक शिरकत पेरिस के दूर दराज के उपनगरों व अन्य देश के दूर दराज के क्षेत्रों के लोगों की है, यह स्वाभाविक रूप में वित्तीय रूप में कमजोर वर्गों से हैं तथा इन क्षेत्रों में सार्वजनिक यातायात सुविधायें भी पर्याप्त ना होने के कारण इन्हें मजबूरन कारों या निजी वाहनों का प्रयोग करना पड़ता है। राष्ट्रपति मैकरां तथा उसकी सरकार के तर्क से ये लोग सहमत नहीं हैं। देश के प्रधानमंत्री फिलिप द्वारा ‘पीली बनियान’ आंदोलनकारियों से बातचीत करने के आह्वान करने पर उनसे बात करने गये, जेसन हेरबर्ट ने बातचीत के बाद कहा ‘‘हम सम्मान से रहना चाहते हैं, अपने काम की कमाई पर, पर आज स्थिति यह नहीं है। मैकरां, फ्रांस को कैसे वातावरण प्रतिबद्धताओं के अनुरूप बनाया जाये बिना गरीबों पर टैक्स लगाये, के बारे में तीन महीने लंबी बातचीत करके लोगों के गुस्से को शांत करना चाहता है। परंतु जनवरी में बढ़ाये जाने वाली दरों को वापिस लेने के लिये सहमत नहीं है।’’
वातावरण प्रतिबद्धताओं के मुद्दे पर कृषि अर्थशास्त्र के राष्ट्रीय खोज संस्थान के विशेषक्ष बेनोइट कुआर्ड का कहना था ‘‘यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि ‘पीली बनियान’ आंदोलन रत्ती भर भी वातावरण प्रतिबद्धताओं के विरोध में नहीं है। मुद्दा दोहरे मापदंडों का है। विवाद यह है कि मध्य व निम्न वर्ग के ड्राईवरों को इन प्रतिबद्धताओं के लिये भुगतान करने के लिये बाध्य किया जा रहा है। उनकी नजरों में बड़ी कंपनियों व अमीरों से पर्याप्त नहीं लिया जा रहा, जबकि वे सबसे अधिक प्रदूषण फैलाते हैं।’’
प्रदर्शनकारियों में यह आम धारणा है कि आम लोगों पर ईंधन टैक्स व सामाजिक टैक्सों में की जा रही बढ़ौत्तरी थोपी जा रही हैं जबकि मैकरां प्रशासन ने दुनिया भर में प्रसिद्ध फ्रांस के अमीरों पर लगने वाले ‘संपदा टैक्स’ में कटौती कर दी है। पावान, एक ड्राईवर के शब्द इससे उपजे गुस्से को स्पष्ट रूप में पेश करते हैं-‘‘फ्रांस को वातावरण के बारे में चेतन होना चाहिये, बिल्कुल ठीक, परंतु इस परिवर्तन के लिये हर कोई योगदान दे-सिर्फ मेहनतकश लोग ही क्यों? निम्न वर्गों के लोग भुगतान करें, बड़े लोग क्यों नहीं। लोग अन्याय को शिद्दत से महसूस कर रहे हैं, तथा यह कब समाप्त होगा कुछ नहीं पता।’’
ब्रिटेन में नस्लवाद व फाशीवाद के विरुद्ध विशाल प्रदर्शन
यूरोप के मुख्य देश ग्रेट ब्रिटेन में 17 नवंबर को देश की राजधानी लंदन के केंद्रीय भाग में एक विशाल प्रदर्शन किया गया। 40 हजार से भी अधिक लोगों की शमूलियत वाले इस प्रदर्शन का आह्वान ‘स्टैंड अप टू रासिज्म’ (नस्लवाद के विरुद्ध खड़े हो) व ‘युनाईट अगेंस्ट फासिज्म’ (फाशीवाद के विरुद्ध एकजुट हो) नाम के संगठनों ने किया था तथा यह देश में पैदा हो रहे नस्लवाद व फाशीवाद के खतरे के विरुद्ध था। इस प्रदर्शन में ट्रेड यूनियनों से लेकर लेबर पार्टी के सदस्य, ब्राजील व अन्य देशों के प्रवासी, मुस्लिम, काऊंसलर, सोशालिस्ट, फिलस्तीन के पक्ष में मुहिम चलाने वाले लगभग सभी वर्गों व देशों के जनवाद पसंद लोग शामिल थे।
यह प्रदर्शन नस्लवादियों व अति दक्षिणपंथी शक्तियों द्वारा किये जा रहे झूठे व भ्रामक प्रचार के विरुद्ध एक जबर्दस्त संघर्षशील एकजुटता को प्रकट कर रहा था तथा नस्लवाद, फाशीवाद व इसके विभिन्न रूपों के विरुद्ध एक शक्तिशाली बुलंद आवाज था।
इस प्रदर्शन में शामिल प्रदर्शनकारियों के उद्गार इस भावना को स्पष्ट रूप में पेश करते हैं :
मारिया मोरिस, ब्राजील देश से आई प्रवासी व ‘ब्राजीलियन अगेंस्ट फासिज्म’ ग्रुप की सदस्य है, के शब्द ‘‘मैं ब्राजील से हूं जहां अभी हाल ही में जैर बोलसोनारो राष्ट्रपति चुने गये हैं। वह धार्मिक कट्टरपंथी है, वह नस्लवादी है तथा स्त्री विरोधी है। वह हमारे देश का ट्रंप है। हमें ऐसे लोगों से हर जगह लडऩा होगा।’’
यार्क से इस प्रदर्शन में शामिल हुई विद्यार्थी, बेकी ने धुर दक्षिणपंथियों के खतरे के बारे में आगाह करते हुए कहा- ‘‘दक्षिणपंथ हमारी नाक के नीचे प्रफुल्लित हो रहा है। यह हाथ-पर-हाथ धरके बैठने का समय नहीं है, ना ही यह सोचने का कि अगली सरकार आयेगी और यह सब निरस्त हो जायेंगे।’’ यूरोप के घुमक्कड़ जिप्सी कबीलों से 2 नौजवानों, जो इस प्रदर्शन में शामिल थे, उन्होंने कहा-‘‘वे रोमनी व जिप्सी जातियों पर किये जा रहे नस्लवादी हमलों के प्रति रोष प्रकट करने के लिये आये हैं।’’
प्रदर्शन में शामिल विद्यार्थियों का एक बड़ा जत्था जोर-शोर से नारा लगा रहा था ‘‘जोर से बोलो, स्पष्ट बोलो-प्रवासियों का यहां स्वागत है।’’ समूचे प्रदर्शन का यह ध्यान खींच रहा था।
फायर ब्रिग्रेड यूनियन के पूर्वी क्षेत्रीय सचिव रिकार्डो ला टोरे ने बताया ‘‘हम अपनी अपनी यूनियन में नस्लवाद विरोधी सरगरमियां करते रहते हैं। हमें इस बात पर गर्व है कि है मेहनतकश लोगों के हितों को नुकसान पहुंचाने वाली विचारधाराओं के विरुद्ध खड़े होने की अपनी शानदार परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। टोमी रोबिनसन जैसे नस्लवादियों के विरुद्ध आवाज बुलंद करते समय हम अपने भाईचारे की सेवा कर रहे होते हैं।’’ मजदूर वर्ग के बीच फैलाये जा रहे भ्रामक प्रचार के बारे में बात करते हुये उसने कहा ‘‘वे कहते हैं कि प्रवासी हमारी नौकरियां हथिया लेते हैं व इसके कारण ही हमारी तनख्वाहें कम हैं। इसका उत्तर हमें संघर्ष के समय पिकेट लाइनों पर मिल जाता है, पोलिश पलंबर या स्थानीय मुस्लिम इसके लिये जिम्मेवार नहीं बल्कि इसके लिये जिम्मेवार टोरी सरकार की नीतियां हैं। नस्लवाद हमें असल मुद्दों से भटकाता है। टोमी रोबिनसन ने ग्रीनफैल के समय लगी आग के लिये प्रवासियों को जिम्मेवार ठहराकर अपनी वास्तविकता को प्रकट कर दिया कि वह मजदूर वर्ग का हितैषी नहीं बल्कि उसमें फूट डालना चाहता है।’’
पी.सी.एस. ट्रेड यूनियन के महासचिव मार्क सखोटका ने कहा ‘‘हालिया वर्षों के दैरान हुये प्रदर्शनों में यह सबसे महत्वपूर्ण प्रदर्शन है। हम बहुत खतरनाक समय से गुजर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप व नीगेल फराग (ब्रिटेेन के अंध राष्ट्रवादी नेता) जैसे लोग सबसे घृणित विचारों को सम्मान प्रदान करने का प्रयत्न कर रहे हैं। हमें ऐसे विचारों को गटर में पहुंचाना होगा। नस्लवाद के विरुद्ध लडऩे के साथ-साथ हमें सत्ताधारियों के सामाजिक खर्चों को घटाने वाले कदमों, नौकरियों व घरों के लिये भी लडऩा होगा। श्रमिक आंदोलन इस देश में फासीवादियों व नस्लवादियों के अतिरिक्त सभी का स्वागत करता है।’’
देश की ट्रेड यूनियनों में से एक महत्त्वपूर्ण यूनियन -‘युनाईट’ के महासचिव लेन मक्कलसिकी ने इस प्रदर्शन के संदर्भ में बात करते कहा-‘‘टोमी रोबिनसन से मैं कहता हूं कि आप मेरे मजदूर वर्ग के पक्ष में बात नहीं करते इसलिये मजदूर वर्ग हमेशा आप जैसी नस्लवादी गंदगी के विरुद्ध संघर्षरत रहता है। अगर आप मेरे मुस्लिम भाईयों व बहनों पर हमला करने आओगे तो हम तुम्हारा मुकाबला करेंगे।’’
एफ.बी.यू. यूनियन के मम्ट रैक ने कहा-‘‘हमारे आंदोलन का बुनियादी सिद्धांत एकता है। कोई भी इसके रास्ते में बाधा बनेगा उसे हम अपने रास्ते से हटा देंगे।’’
एन.ई.यू. यूनियन के सहसचिव केविन कर्टनी के विचार थे ‘‘आप नस्लवाद को टोमी रोबिनसन व डीएफएलए के रूप में देख रहे हैं परंतु मुख्यधारा की राजनीति में भी इसे हमें देखना चाहिये।’’
एस.यू.टी.आर. ट्ऱेड यूनियन केंद्र के सहसंयोजक वेअमैन बेनिट ने अपने उद्गार बड़ी दृढ़ता से प्रकट करते हुये कहा ‘‘हमने अपना कार्य पूर्ण किया है। हमने टोनी रोबिनसन को रोका है तथा वह यदि फिर आयेगा तो फिर भी उसे रोकेंगे। उनके पास बोलसोनारो, ट्रंप व जर्मनी में एएफडी है परंतु हमारे पास संख्या बल व दृढ़ इरादा है। हम में उन्हें मार भगाने के योग्य एकता व एकजुटता है। यह प्रदर्शन टोरी नस्लवाद के विरुद्ध तथा टोमी रोबिनसन व उसके समर्थकों के अति दक्षिणपंथी हमले के विरुद्ध जंग की ओर एक शक्तिशाली कदम है।
‘‘इसके बाद भी और ऐसे प्रदर्शन व कार्यवाहियां होंगी व एस.यू.टी.आर. स्थानीय स्तर व कार्य स्थलों में रोबिनसन व उसके समर्थकों द्वारा किये जाने वाले प्रदर्शनों व आयोजनों का विरोध करेगी।
‘‘हम लेबर पार्टी पर भरोसा नहीं कर सकते, उनका सत्ता में रहते हुये व विपक्षी पार्टी के रूप में नस्लवाद के विरुद्ध संघर्ष का रिकार्ड बिल्कुल भी विश्वसनीय नहीं है। क्योंकि पूंजीवाद व नस्लवाद आपस में गुंथे हुये हैं, व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में नस्लवाद के विरुद्ध संघर्ष केंद्र बिंदु में होना चाहिये। तथा नस्लवाद की गंदगी से पूर्ण रूप से मुक्ति पाने के लिये हमें पूंजीवादी व्यवस्था से भी मुक्ति पानी होगी।’’
पेशावर में आतंकवाद के विरुद्ध रोष प्रदर्शन
हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के पेशावर प्रांत भर में 17 नवंबर को आतंकवाद के विरुद्ध जबर्दस्त रोष प्रदर्शन हुये हैं। इनका आह्वान अवामी नैशनल पार्टी ने एक पुलिस अफसर ताहिर डाबर की आतंकवादियों द्वारा निर्मम हत्या कर देने के विरुद्ध रोष प्रकट करने के लिये किया है। ताहिर डाबर, एक पख्तून पुलिस अफसर थे, जिनका कुछ सप्ताह पहले देश की राजधानी इस्लामाबाद से अपहरण कर लिया गया था तथा कुछ दिन पहले ही उनका शव अफ्गानिस्तान से मिला था। प्रदर्शनकारियों का आरोप हेै कि यह हत्या पख्तूनों की आतंकवादियों द्वारा की जा रही हत्याओं की ही एक कड़ी है।
प्रांत की राजधानी पेशावर के प्रैस क्लब के समक्ष की गई एक रोष रैली को संबोधन करते हुये आवामी नैशनल पार्टी के केंद्रीय महासचिव मियां इफ्तिखार हुसैन ने कहा कि तहिरीक-ए-इंसाफ पार्टी की सरकार देश के नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने में नाकाम रही है। यह सरकार जब अपने एक पुलिस अफसर को ही सुरक्षा नहीं प्रदान कर सकी तो आम नागरिक को किस तरह सुरक्षा प्रदान करेगी। इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। उन्होंने कहा कि ताहिर डाबर की हत्या आतंकवादियों द्वारा की गई है तथा इसके लिये केंद्रीय व प्रांतीय दोनों ही सरकारें जिम्मेदार हैं। उनके अनुसार शव के अफ्गानिस्तान से बरामद होने के कारण दोनों देशों के संबंध भी तनावपूर्ण हो जायेंगे। उन्होंने देश के गृह मंत्री शहरियार आफरीदी के प्रति भी रोष व हैरानी प्रकट की कि उन्हें यह तक पता नहीं था कि उनके पुलिस विभाग के एस.पी. जिंदा हैं या मारे जा चुके हैं। उन्होंने देश के वास्तविक ‘शासकों’ जो डीगें मारते हैं, से पूछा कि वे चार महीने बीत जाने के बाद भी देश की संसद के चुनावों के दौरान मारे गये आवामी नैशनल पार्टी के प्रत्याशी हारून बिल्लौर के हत्यारों को अभी तक क्यों नहीं पकड़ सके हैं? ताहिर डाबर के परिवारजनों द्वारा उनकी हत्या की किसी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी से जांच करवाने की मांग का भी मियां इफ्तिखार हुसैन ने समर्थन किया।
आवामी नैशनल पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाम अहमद बिल्लौर ने अपने संबोधन के दौरान इस प्रश्न को उभारा कि अफगानिस्तान की सीमा तक जाती सडक़ पर यात्रा करने वाले गरीब आदमी की तो उस पर लगे अनेकों चैक-पोस्टों पर शरीर तक की गहन तलाशी ली जाती है, परंतु वही चैक पोस्ट देश के एक पुलिस अफसर का अपहरण करके उसे अफ्गानिस्तान ले जा रहे आतंकवादियों को पकडऩे में किस तरह नाकाम रहे? उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट रूप से सरकार द्वारा किये जा रहे सीमा सुरक्षा के पुख्ता होने के दावे तथा देश की सुरक्षा स्थिति के संदर्भ में गंभीर प्रश्न खड़े करती है। उन्होंने इस समूची घटना के लिये पाकिस्तान व अफ्गानिस्तान के अधिकारियों को जिम्मेवार ठहराते हुये जल्द इस अपराध को अंजाम देने वाले आतंकवादियों को गिरफ्तार करने की मांग की। उन्होंने देश की न्याय पालिका से भी अपील की कि पख्तूनों के हो रहे इस कत्लेआम का वह नोटिस लें। उन्होंने देश भर के पख्तूनों व देश के जम्हूरियत पसंद आवाम का आह्वान किया कि वे इस हत्याकांड के विरोध में सडक़ों पर उतरें।
पेशावर प्रांत के शहरों लंडीकोट, मर्दान, घालानाई, खार, बन्नू, नौशहरा आदि में हुये प्रदर्शनों में हजारों की संख्या में लोगों ने भाग लिया। आवामी नैशनल पार्टी के झंडे तथा बैनर उठाये प्रदर्शनकारी ‘पख्तूनों का नरसंहार बंद करो’, ‘दहशतगर्दी मुर्दाबाद,’ ‘दहशतगर्दी नहीं चलेगी’ आदि नारे बुलंद कर रहे थे।