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वामपंथ के लिए बड़ी चुनौती हैं, इस बार के चुनाव परिणाम

वामपंथ के लिए बड़ी चुनौती हैं, इस बार के चुनाव परिणाम

मंगत राम पासला
2019 के चुनाव में भाजपा ने अपने सहयोगियों सहित अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। 200 से अधिक स्थानों पर अकेले भाजपा ने 50 प्रतिशत या इससे अधिक मत प्राप्त किए हैं। भाजपा विरोधी दल केवल तामिलनाडु, केरल एवं पंजाब में ही सीमित मात्रा में भाजपा के विजयी रथ को रोक पाने के योग्य रहे हैं। केरल में भाजपा की हार से कांग्रेस को लाभ हुआ है जबकि वहां शासक वाम मोर्चा को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। गत वर्ष कांग्रेस के हाथों राजस्थान, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनावों में मिली पराजय को भाजपा ने लोकसभा चुनाव में भारी जीत में परिर्वतित कर लिया है। साथ ही पश्चिमी बंगाल, कर्नाटका, यू.पी., बिहार, आसाम, महाराष्ट्र तथा उत्तर पश्चिम के अन्य प्रांतों में आर.एस.एस. की विचारधारा एवं सघन संगठन की सहायता से भाजपा का विशाल जनाधार बनना लोकतांत्रिक क्षेत्रों में भारी चिंता का विषय बना हुआ है।
पूंजीपति-जागीरदार वर्गों के दूसरे राजनीतिक दलों की भारी पराजय के साथ ही इन चुनावों में वामपंथी दलों की जो दुर्दशा हुई है वह भी बहुत दुखदायी एवं निराशाजनक है। वामपंथ के केवल पांच ही उम्मीदवार विजयी हुए हैं। इनमें से चार तो केवल तामिलनाडु से हैं जहां कांग्रेस, डी.एम.के. एवं वामपंथी दलों का गठबंधन था।
वामपंथ के मजबूत किले केरल से केवल एक ही उम्मीदवार विजयी हुआ है। वाममोर्चा का सबसे मजबूत दल सी.पी.आई.(एम), जो लगभग चार दशक पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा में वाम शासन का अगुआ रहा है, द्वारा बंगाल में खड़े किए गए उम्मीदवारों में से केवल एक की ही जमानत राशि बच पायी है। ऐसे वातावरण में जीत की तो आशा करना ही व्यर्थ है। पश्चिम बंगाल में वाम पक्ष का वोट 2014 के 29.7 प्रतिशत की तुलना में इस बार गिर कर 7.46 प्रतिशत तक जा पहुंचा है। यह भी याद रखने योग्य है कि जितने वोट वामपक्ष के कम हुए हैं लगभग उतना ही भाजपा को वहां मतों में लाभ हुआ है। देश के अन्य प्रांतों में भी वामपंथी दल मतों के रूप में कोई सम्मानयोग्य समर्थन नहीं जुटा पाए।
देश की राजसत्ता पर पूंजीवादी-भूस्वामी वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाली तथा आर.एस.एस. की सांप्रदायिक विचारधारा को समर्पित पार्टी भाजपा का दूसरी बार काबिज हो जाना न केवल देश के धर्म निरपेक्ष एवं लोकतांत्रिक स्वरूप के लिए चिंतनीय है अपितु देश की राजनीति का दक्षिणपंथ की ओर केन्द्रित हो जाना, समस्त भारतवासियों के लिए चुनौतीपूर्ण घटनाक्रम है। आर.एस.एस. अपने तयशुदा ध्येय; धर्म आधारित हिन्दु राष्ट्र की स्थापना की तरफ द्रुत गति से अग्रसर है। ऐसा होने से, देश एक बार फिर मध्ययुगीन प्रतिगामी राजकीय एवं सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तित हो जाएगा। जहां अल्पसंख्यकों, दलितों, वनवासियों एवं स्त्रियों पर अमानवीय अत्याचारों के भयावह खेल का पुन: शुरू होना अवश्यंभावी है। शासकों का विरोध करने या समानांतर विचार रखने के लोकतांत्रिक वातावरण के स्थान पर असहनशीलता एवं असहिष्णुता का बोलबाला स्थापित करने की स्थितियां निर्मित की जा रही हैं।
भाजपा द्वारा वर्तमान चुनाव, विगत पांच वर्ष के अपने शासन में लागू की गई तथाकथित लोकपक्षीय आर्थिक नीतियों के आधार पर नहीं लड़ा गया। कहने को तो नरेन्द्र मोदी एवं अमित शाह चुनाव अभियान में, गरीबों के लिए बनाए करोड़ों शौचालयों एवं इतनी ही मात्रा में दिए गए गैस कनैक्शनों सहित तेज आर्थिक विकास के दावे करते रहे हैं पर यह सभी दावे झूठे आंकड़ों के मायाजाल पर आधारित थे। अपितु बेरोजगारी में भयावह वृद्धि, नोटबंदी तथा जी.एस.टी. आदि घातक कदमों, जिनसे करोड़ों लोगों को अभूतपूर्व कष्ट सहने पड़े, कृषि संकट का हल निकालने में घोर असफलता, विदेशों से काले धन की वापसी आदि मुद्दे बड़ी चतुराई से विसार दिए गए। आम जन के जीवन से जुड़े इन मुद्दों के स्थान पर अंधराष्ट्रवाद आधारित धुआंधार प्रचार पर सारा जोर दिया गया। बालाकोट (पाकिस्तान) में भारतीय सेना द्वारा किए गए सर्जिकल स्ट्राईक एवं देश की सुरक्षा हेतु की जाती सैन्य कार्यवाहियों का पूरा-पूरा श्रेय नरेन्द्र मोदी द्वारा स्वयं को दिए जाने के भरसक प्रयास किए गए। भाजपा विरोधी अन्य राजनीतिक दलों ने भी इसी दिशा में लाभ उठाने के हर संभव प्रयास किए किन्तु अपार धन संपदा के आधार पर कार्यान्वित की गई भाजपा की योजनाबंदी से पार पाना इन के लिए कठिन साबित हुआ। देश की सुरक्षा को खतरा एवं आतंकवादियों के भय के वातावरण का सृजन करना तथा इससे रक्षा करने योग्य एकमात्र योद्धा के रूप में नरेंद्र मोदी को लोगों के समक्ष प्रस्तुत करना, भाजपा को भारी लाभांवित करने का साधन बना। मोदी द्वारा संघ की शाखाओं से सीखी गई इस कला का बड़ी चालाकी ये प्रयोग किया जाना स्पष्ट नकार आता है। इलैक्ट्रानिक मीडिया तथा अन्य प्रचार साधनों द्वारा नरेन्द्र मोदी एवं भाजपा का एकतरफा गुणगान किया गया। विरोधी राजनीतिक दलों की जम कर भत्र्सना की गई तथा विशाल पैमाने पर झूठे तथ्यों का सहारा लेकर वोटरों को हर तरह से भ्रमित किया गया। भारतीय चुनाव आयोग ने भाजपा को माडल कोड आफ कंडक्ट के पूर्णत: उल्लंघन की खुली छूट देकर अपनी निष्पक्षता एवं विश्वसनीयता को दागदार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वस्तुत: भाजपा-संघ के चुनाव रणनीतिकारों द्वारा निर्वतमान चुनावों को मोदी के आभामंडल पर केन्द्रित करने की योजनाएं बना रखी थी। इस ढंग से देश के करोड़ों लोगों को प्रभावित किया गया। स्पष्ट एवं अस्पष्ट तरीकों से संघ-भाजपा नेताओं द्वारा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति का चुनाव जीतने हेतु युद्धस्तर पर इस्तेमाल किया गया। इन की भडक़ाऊ, विषैली एवं सांप्रदायिक भाषा ने गंभीर राजनीति की बजाय, निम्नस्तरीय कार्याकलाप के सभी रिकार्ड ध्वस्त कर दिए। आतंकवाद के खतरे को एक धर्म विशेष के मानने वालों से जोडक़र हिन्दू भाईचारे को मुसलमान देशवासियों के विरुद्ध भडक़ाया गया। 1947 में हुए पीड़ादायक देश विभाजन के जख्मों को उचेट कर बहु-संख्यक धार्मिक समुदाय की वोटें प्राप्त की गईं। सीमा पार के आतंकवादी गुटों द्वारा की जा रही कार्यवाहियों ने भी भाजपा के पक्ष में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का वातावरण बनाने में सहायता प्रदान की। चुनाव अभियान में धार्मिक चिन्हों एवं हिन्दुओं के रीति-रिवाजों का भाजपा एवं सहयोगियों को लाभ मिलना सुनिश्चित करने हेतु बड़ी चतुराई से इस्तेमाल किया गया। कांग्रेस पार्टी द्वारा ठीक ऐसे ही 1984 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या के बाद लोगों में सिक्खों के विरुद्ध पैदा हुई अस्थाई घृणा से लाभ लेने के लिए व उस समय हुए चुनाव जीतने के लिए किया गया था।
अल्पसंख्यकों को निशाने पर लेने की आर.एस.एस. की एक सुनियोजित साजिश है जो भारत को एक धर्म आधारित राज्य में परिवर्तित करने के उस के ध्येय की पूर्ति का सबसे कारगर हथियार है। भारतीय समाज में सामंती तथा अर्ध-सामंती पैदावार के संबंधों के प्रभाव अधीन, वर्तमान पूंजीवाद प्रबंध के संकटग्रस्त होने के चलते, प्रतिगामी विचार, जातीय भेदभाव तथा किस्मतवादी सोच निरंतर जोर पकड़ते जा रहे हैं। इसी कारण जब भी जन साधारण किसी राजनैतिक दल की सरकार की नाकामियों से उकता जाते हैं तो उन्हें कोई दूसरा दल जब भी चाहे उनके प्राथमिक मुद्दों से भटका कर पृथकतावादी नारों तथा प्रतिगामी मुद्दों के आधार पर सहजता से आकर्षित करने में सफल हो जाता है। वामपंथी दलों की असफलता  मुख्य कारण भी इसी में निहित है। वामपंथी लोगों के राजनैतिक एवं बौद्धिक स्तर तथा देश की ठोस परिस्थितियों को समझने में असफल रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टियां पूंजीवाद व्यवस्था के संकट तथा इसके जनविरोधी चरित्र का सही-सही मूल्यांकन करने के बावजूद इस व्यवस्था के बारे में लोगों की समझदारी को अंतर्मुखता के आधार पर आंक रही है। जबकि वास्तव में भारतीय आम जन का बहुत बड़ा भाग अभी भी अपने दुखों दर्दों का असली जिम्मेदार पूंजीवादी व्यवस्था को नहीं ठहराता। लोग शासक वर्गों की एक या दूसरी पार्टी के बदलाव के रूप में ही अपनी मूल समस्याओं का समाधान ढूंढ रहे हैं। जब एक सरकार या राजनैतिक गुट से लोगों का मोहभंग हो जाता है तो वे उस जैसे ही किसी दूसरे गुट या सरकार की ओर आकर्षित हो उसके पिछलग्गू बन जाते हैं। नाम मात्र की वित्तीय रियायतों को वे अपने पर शासकों का बहुत बड़ा एहसान मान कर चलते हैं। जबकि वास्तव में ये वित्तीय सहूलियतें इन्हीं लोगों की विशालकाय लूट का एक अंश भर ही होती हैं। एक या दूसरी शासक वर्गीय पार्टी के पीछे हो लेना, लोगों की वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था के बारे में नग्णय समझदारी का ही दर्पण है।
यह कहना भी असत्य नहीं होगा कि लोगों की भारी बहुसंख्या धर्म निरपेक्ष तथा जनवादी राज्य व्यवस्था के बारे में वैज्ञानिक समझदारी अथवा प्रतिबद्धता से कोरी है। उनके लिए धर्मनिरपेक्ष तथा धर्म विशेष पर आधारित राज्य अथवा जनवादी राज्य प्रणाली तथा एकाधिकारवाद (तानाशाही) में अंतर करना तब तक संभव नहीं हो पाता जब तक तानाशाही किस्म की राज्यप्रणाली उनके जीवन पर सीधे-सीधे कुप्रभाव न डाले। 1977 में श्रीमती इंदिरा गांधी की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति को इसीलिए भारी मतों से पराजित किया क्योंकि आवाम ने उन पर थोपी गई एमरजैंसी के थपेड़ों को स्वयं  महसूस किया था। लगता है आज भी लोगों को भविष्य में होने वाले कड़वे अनुभवों का अंदाजा नहीं है। विश्वस्तर पर भी जब भी अमरीका, फ्रांस, ब्राजील आदि देशों में आर्थिक संकटों की पृष्ठभूमि में दक्षिणों पंथी सरकारें बन रही हैं तो यह कहना उचित रहेगा कि वहां के जनसाधारण का भी पूंजीवाद की सीमाओं संबंधी ज्ञान नग्णय है। परन्तु भारतीय लोगों की स्थिति अधिक दयनीय है।
देश का वामपंथी आंदोलन वर्तमान संकट के समय में जनसाधारण के आर्थिक मुद्दों पर संघर्ष छेडऩे में तो एक सीमा तक सफल रहा है। परन्तु इस से आगे राजनैतिक तथा वैचारिक संघर्षों द्वारा लोगों की चेतना स्तर बढ़ाने की ओर उचित ध्यान देने में असफल रहना, बड़ी कमजोरी बना हुआ है। वामपंथी सरकारें (बंगाल, केरल तथा त्रिपुरा) भी अपने कार्यकालों में वर्तमान कार्पोरेट पक्षीय विकास मॉडल के मुकाबले एक भरोसेमंद, जनपक्षीय विकास मॉडल पेश करने में पूर्णत: असफल रही हैं। इस के विपरीत इन्होंने भी जनविरोधी विकास मॉडल (मोदी-मनमोहन मार्का नवउदारवादी नीतियों वाला) को ही तेज आर्थिक विकास की गारंटी मान लिया था। वस्तुत: यह विकास मॉडल भारत सहित पूंजीवादी देशों में बेकारी, महंगाई, गरीबी, सामाजिक सुरक्षा का खात्मा, भ्रष्टाचार आदि का जनक है। इस सबके चलते आवाम का वामपक्ष को छोडक़र भाजपा जैसी साम्प्रदायिक पार्टी के साथ हो लेना बहुत दुखदायी एवं चिंतनीय है पर साथ ही यह मौका उन वामपंथियों पर भी लानतें भेजने का है। जिन्होंने विश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण के इस दौर में वर्ग संघर्ष के तिलांजली देकर घोर संसदीय अवसरवाद को अपनाया। विकास के वर्तमान मॉडल के फलस्वरूप बड़ी संख्या में बढ़ रहे मध्यम वर्ग की आशाओं, आकांक्षाओं के अनुरूप रणनीति गढऩे में भी वामपक्ष असफल रहा। इस के विपरीत, अनेकों वामपंथी विचारक एवं नेतागण माक्र्सवादी, लैनिनवादी वैज्ञानिक विचारधारा को अलविदा कह दक्षिणपंथी भटकावों के शिकार बन गए हैं। वह भी तब, जब इस मानवता पक्षीय विचारधारा का गहराई से अध्ययन करते हुए भारत के ठोस हालत के अनुसार निर्णय लेते हुए आगे बढऩे की जरुरत थी। निस्संदेह हम भारतीय जनमानस में पैठ बनाए बैठे साम्प्रदायिक विचारों, अंधविश्वासों, किस्मतवादी मानसिकता, मनुवादी वर्ण व्यवस्था पर आधारित जाति उत्पीडऩ तथा नारी पर अत्याचारों आदि दुराग्रहों को समय रहते समझने एवं इस से पार पाने में सफल नहीं रहे हैं। इस भटकाव के चलले वामपंथी आंदोलन भारत के श्रमिक वर्ग की विभिन्न धाराओं का विश्वास जीत तथा इन्हें संगठित कर सामाजिक बदलाव के संघर्षों में शामिल करा पाने में सफल नहीं हो पाया। श्रमिक वर्ग की बड़ी जनसंख्या का भरोसे जीते बगैर राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक किसी भी प्रकार का कोई सामाजिक बदलाव असंभव है। देश के अन्य शासकों के ढर्रे पर ही चलते हुए बंगाल, केरल एवं त्रिपुरा की वामपंथी सरकारों द्वारा उक्त दिशा में की गलतियां अब किसी से छुपी हुई नहीं हैं। मेहनतकतश जनसमूहों के शहरी एवं ग्रामीण भागों से इन राज्यों के वामपंथी अलग-थलग पड़ गए हैं। यथास्थितिवाद से किए गए बार-बार के गैर-सैद्धातिक समझौतों ने इनकी अपनी क्रान्तिकारी तथा विशिष्ट पहचान ही दांव पर लगा दी है।
दक्षिणपंथ के पास, वाम के मुकाबले बुद्धिजीवियों, इतिहासकारों, लेखकों, साहित्यकारों आदि की बहुतात है जो अंधविश्वास, अंधराष्ट्रवाद, सांप्रदायिक द्वेष तथा अन्य प्रतिगामी विचारों के प्रचार-प्रसार में सिद्धहस्त है। वामपक्ष के सभी घटक इस दुष्प्रचार से पार पाने में संगठनात्मक एवं वैचारिक स्तरों पर कहीं पीछे छूट गए हैं। सोवियत संघ तथा अन्य पूर्वी यूरोप के देशों में समाजवादी प्रणाली के ध्वस्त हो जाने के चलते संसार भर के कम्युनिस्टों के मन में बेचैनी एवं माक्र्सवादी विचारों की उचितता को लेकर नाना प्रकार के संदेह उत्पन्न हो गए हैं। विशेषकर समानता पर आधारित समाज के निर्माण हेतु सब कुछ न्यौछावर कर देने की भावना को गहरा आघात लगा है। वैचारिक परिपक्वता एवं प्रतिबद्धता ही आदर्श कायम रख सकती है। इस के विपरीत संघ के कार्यकर्ता दोजख रूपी हिन्दु राष्ट्र के निर्माण कार्य में पूरी तन्मयता से लगे हुए हैं। हम उनके इस जुनून की प्रतिक्रियावादी कहकर जितनी भी आलोचना कर लें लेकिन उन के हठ और उपलब्धियों को नकार नहीं सकते। आखिर नकारात्मक जुनून भी तो रंग लाता ही है। अपितु हमें सीखना यह चाहिए कि हम अपने सर्मथकों में दोबारा वहीं त्याग एवं जुझारूपन की भावना कैसे जगाएं जिसके लिए कम्युनिस्ट जाने जाते रहे हैं। रूस, चीन, वीयतनाम, क्यूबा के क्रान्तिकारी संघर्षों में वहां के कम्युनिस्ट योद्धाओं के मन-मस्तिष्क में ज्वलंत रही भावना एक महती मिसाल है हमारे यहां भी समानता, स्वतंत्रता पर आधारित, मानव के हाथों मानव के शोषण का अंत करने वाले समाज का निर्माण करने के लिए संघर्षरत रही गदर पार्टी किरती किसान पार्टी, शहीद-ए-आजम भगत सिंह के नेतृत्व वाला युवा संगठन तथा 1920 के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के योद्धाओं ने अपने प्राण न्यौछावर कर तथा काले पानी जैसे भयानक कारावासों में अनेकों अत्याचारों का वीरता से सामना करते हुए स्वतंत्रता संग्राम में त्याग के अनेकों प्रेरणामयी आयाम स्थापित किए। हाल ही के वर्षों में अनेकों कारणों से फीके पड़ गए इन आदर्शों को पुर्नजीवित करने तथा इन से प्रेरणा लेते हुए बड़े आंदोलन का निर्माण करना आज भी प्राथमिकता बन चुकी है।
भाजपा की अगुवाई में सांप्रदायिक एवं फासीवादी तत्वों के हाथों सत्ता का स्थानांतरण गहन चिंता का विषय है। लोगों का यह $फतवा मानने योग्य तो है पर इसे तर्कसंगत कदापि नहीं ठहराया जा सकता। यह फतवा कार्पोरेट घरानों द्वारा फिरकापरस्तों के साथ की गई सांठ-गांठ तथा संचार साधनों द्वारा बड़े पैमाने पर किए गए हर प्रकार के दुष्प्रचार द्वारा कुप्रभावित होने के चलते सही अर्थों में लोकमत कहलाने योग्य नहीं है। आने वाले पांच साल लोगों के लिए अवर्णनीय मुसीबतें लाने वाले हैं। इस बात में रत्ती भर भी संदेह नहीं है। लोग भुखमरी, महंगाई, कुपोषण, निजीकरण के चलते स्वास्थ्य एवं शैक्षणिक सेवाओं से वंचित किए जाने आदि कठिनाईयों का दंश झेलने को मजबूर होंगे। कृषि संकट आज भी आत्महत्याओं द्वारा किसानों, खेतिहर मजदूरों की जानें लीलने को मुंह खोले तैयार खड़ा है। मोदी सरकार के चलते पिछले पांच सालों से संकटग्रस्त चली आ रही अर्थ-व्यवस्था में सुधार की भी कोई संभावना नहीं। इसके विपरीत साम्राज्यवादी लुटेरों तथा भारतीय धन्नासेठों के और मजे लूटने का समय आ गया है। देशवासियों के अधिकारों की नगण्य सीमा तक गारंटी करने वाली संवैधानिक धाराओं का अस्तित्व भी खतरे में है। राष्ट्रीय सुरक्षा के झूठे बहाने के आधार पर काले कानून निर्मित कर लोगों को संवैधानिक तथा जनतांत्रिक अधिकारों से बड़े स्तर पर महरूम किया जाना तय है। लोकराज, धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यकों के साथ समानता पर आधारित सम्मानीय व्यवहार, दलितों तथा महिलाओं की जातीय तथा लैंगिक अत्याचारों से मुक्ति आदि सब कुछ नेपथ्य में चला जाएगा। धर्म जाति आदि के नाम पर लोगों को अनेकों जुल्म सहने को मजबूर किया जाएगा। चुनाव परिणाम आते ही मध्यप्रदेश, गुडग़ांव, बेगुसराय आदि में अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों तथा महिलाओं पर हुए जघन्य अत्याचार ऊपर प्रकट की गई शंकाओं का मुंह बोलता सबूत है। इस सबका मुकाबला करने के लिए सभी देशभक्त, जनतांत्रिक तथा वाम शक्तियों की एकजुटता तथा प्रगतिशील, जनतांत्रिक, धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की रक्षा के लिए छेड़े जाने वाले निरंतर संघर्ष ही एक मात्र समाधान है। परन्तु इस एकजुटता का मूल आधार सैद्धांतिक होना चाहिए। इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए सभी वामपंथी शक्तियों का एक जैसा समर्पित होना भी अति आवश्यक है। यह भी विचारणीय है कि सामाजिक बदलाव के विशाल लक्ष्य की प्राप्ति हेतु वामपंथ के लिए अन्य विशाल प्रगतिशील हिस्सों की सहभागिता भी जरूरी शर्त है। सभी वामपंथी घटकों के मिल बैठकर, गहन विचार विमर्श करते हुए अतीत की भूलों से उचित सबक लेते हुए भविष्य के लिए दरुस्त रणनीति गढऩे की जरुरत है। वाम की एकता एवं मजबूती के बगैर न तो सांप्रदायिकता तथा फासीवाद को शिकस्त दी जा सकती तथा न ही नवउदारवादी नीतियों के समानांतर लोक पक्षीय नीतियों पर आधारित दरुस्त विकल्प का निर्माण किया जा सकता है। आज के कमजोर आंदोलन को देखते हुए सामाजिक परिवर्तन हेतु तो सोचा भी नहीं जा सकता। वर्तमान में देश को एक विशाल जनाधार वाले मजबूत आंदोलन की आवश्यकता है। इस कार्य की सफलता का जिम्मा सभी कम्युनिस्टों, प्रगतिशीलों, जनतंत्र की मजबूती चाहने वालों तथा देशभक्तों को संयुक्त रूप में उठाना होगा।

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