Now Reading
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, माक्र्स और भारत

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, माक्र्स और भारत

अनिल राजिमवाले
आर.एस.एस. की अज्ञानता स्पष्ट रूप से सामने आ जाती है, जब वह कार्ल माक्र्स तथा भारत के सम्बन्ध में उस के विचारों को, विशेषत: तथा आम तौर पर समूचे दर्शन को तोड़ मरोड़ कर अपने साहित्य तथा प्रचार तन्त्र के द्वारा पेश करते हैं। हम, माक्र्स को मानवता के एक महान दार्शनिक के रूप में बहुत सम्मान देते हैं, जैसे आर.एस.एस. के मुख पत्र ‘आर्गेनाइजर’ के 29 जुलाई, 2018 के अंक में दर्शाया गया है। यह माक्र्स ही थे, जिन्होंने वर्तमान इतिहास में, मजदूर तथा मजदूर वर्ग को, केंद्र बिन्दू के रूप में प्रस्तुत किया है। वास्तव में कर्म के सिद्धांत की यही सच्ची पूजा थी, जो कार्ल माक्र्स ने करके दिखाई, क्योंकि उसने अपने विचारों के द्वारा पूंजीपतियों द्वारा मजदूर वर्ग की, की जाने वाली लूट को, विशेष रूप से नंगा किया। उसने समाज को, भारतीय समाज सहित, दर्शाया है कि किस प्रकार यह र्निविध्न रूप में, एक इस प्रकार के दौर की ओर बढ़ रहा है, जहां न कोई अमीर होगा और न ही कोई गरीब। यह कार्ल-माक्र्स ही थे, जिन्होंने इस सिद्धांत को सब से पहले प्रस्तुत किया कि प्रकृति, समाज तथा चेतना/विचार गतिशील हैं तथा ये कभी स्थिर नहीं रह सकते।
माक्र्स, अन्य दार्शनिकों के समान, मजदूरों के पक्ष में दया तथा प्रेम तक ही सीमित नहीं रहे बल्कि वह मजदूरों को भूतकाल, वर्तमान तथा भविष्य के निर्माता के रूप में देखते थे। यह बात भारत के सन्दर्भ में भी पूरी तरह ठीक है। इस बात में जरा सा भी संशय नहीं है कि भारत तथा विश्व भर में महान दार्शनिक, सन्त तथा बहुत से चिंतक हुए हैं। जिन का हम बहुत सम्मान करते है तथा उन की महान शिक्षकों को मानते भी हैं।
यह केवल माक्र्स ही थे जिन्होंने श्रमिकों तथा श्रमिक वर्ग को इतिहास का सक्रिय भाग माना। यहां तक ही नहीं, बल्कि उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि इस पृथ्वी पर एक नये समाज का निर्माण किया जा सकता है, जिसमें कोई किसी का शोषण न करे तथा लूट-रहित समाज किसी, स्वर्ग-नर्क के चक्र में पड़े बगैर, अस्तित्व में आ सकता है। हम सब के लिए महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कार्ल माक्र्स भारत तथा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महान दोस्तों तथा समर्थकों में से एक थे।
माक्र्स तथा भारत
यह आश्चर्यजनक बात है कि आरएसएस के मुख पत्र ‘आर्गेनाईजर’ तथा उसके अन्य साहित्य में माक्र्स को भारत से घृणा करने वाला तथा इसके विरुद्ध विद्वेष रखने वाले के रूप में प्रचारित किया जाता है। यह भी आश्र्चजनक है कि माक्र्स को मिल तथा मैकाले जैसे लोगों के समान देखा रहा है। जो भारत को पश्चिमी दृष्टिकोण से देखते थे। इस से दक्षिणपंथी प्रचार करने वाली शक्तियों की सम्पूर्ण अज्ञानता या तोड़ मरोड़ करने की बुरी नीयत का साफ पता चलता है। माक्र्स की निंदा इसलिए भी की जाती है कि उन्होंने कभी भी भारत की यात्रा नहीं की तथा इसलिए उनको भारत के सम्बंध में सही परिस्थितियों का पूरा ज्ञान नहीं था।
यह बात प्रसन्नता वाली होती, यदि माक्र्स भारत की यात्रा कर सकते लेकिन उन्होंने भारत का अध्ययन तथा वर्णन, यात्रा कर चुके किसी भी विद्वान से कहीं भी ज्यादा गंभीरता तथा गहराई से किया है। उसने भारत को अन्य किसी से भी ज्यादा भारत को जाना और समझ। यहां तक कि भाजपा, आरएसएस द्वारा केंद्रीय सरकार में राजसत्ता के स्वामी होकर भी चार वर्षों में भारत तथा भारतीय लोगों को समझा सकने से भी कहीं ज्यादा, माक्र्स ने भारत को जाना था।
भारत के सम्बंध में माक्र्स के विचार
माक्र्स की रचनाओं पर बिहंगम दृष्टि डालते हुए ही भारत के सम्बंध में मित्रतापूर्ण तथा हमदर्दी वाले विचारों का पता चल जाता है कि वह भारतीय लोगों की समस्याओं के प्रति कितना गंभीर था तथा उसने कितनी गहराई से भारत पर अंग्रेजों के राज्य तथा उनकी ओर से की जाने वाली लूट को बुरी तरह नकारा था।
आरएसएस को तो कार्ल-माक्र्स से जानना चाहिये कि वह कैसे तथा कितना सम्मान भारतीय संस्कृति का करते थे तथा बर्तानिया के विदेशी हाकिमों की ओर से इस प्राचीन संस्कृति के विनाश के विरुद्ध उन की निंदा करते थे। कार्ल-माक्र्स के एक निबंध ‘‘द फ्यूचर रिजल्टस आफ द ब्रिटिश रूल इन इंडिया’’ (भारत में बर्तानिया के शासन के भावी परिणाम) में माक्र्स लिखते हैं कि बर्तानवी विदेशी शासकों ने देशीय या स्थानीय समुदाय को तोडऩे तथा स्थानीय स्थिति में जो कुछ बढिय़ा था, उसको तबाह करके संस्कृति को नष्ट कर दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा कि भारत की राजनैतिक एकता बर्तानिया की तलवार के कारण थी तथा यह और भी ज्यादा मजबूत हो जायेगी।  जब अंग्रेजी शासन इलैक्ट्रिक टैलिग्राफ शुरू करेगा।
देखो! कार्ल-माक्र्स ने कितनी सच्ची तथा सटीक भविष्यवाणी की थी, क्योंकि हम देखते हैं कि भारत आजकल इस तकनीक के कारण ही महान शक्ति बन सका है, जो इस की समृद्ध परम्परा, संस्कृति तथा सभ्यता के बलबूते ही विकसित हो सकी है।
आर.एस.एस. के चिंतकों को प्रसन्न होना चाहिये कि माक्र्स प्राय: ‘‘हिन्दू’’ शब्द का उपयोग करते रहे हैं, लेकिन उन्होंने यह शब्द कभी किसी विशेष समुदाय के लिए उपयोग नहीं किया बल्कि, भारत की भौगोलिक-संस्कृति के चिन्हों की पहचान के रूप में उपयोग किया गया। ‘‘हिन्दु’’ शब्द की जड़ें ‘‘इन्दुस’’ नदी से जुड़ी हुई है, जिसकी घाटियों में एक विशेष सभ्यता तथा संस्कृति ने विकास किया तथा जो बाद में ‘इण्डिया’, यानी भारतीय संस्कृति कहलाई। कार्ल माक्र्स ने भारत की भिन्न भिन्न जातियों, समुदायों को विशेष महत्त्व दिया तथा बताया कि किस प्रकार ये सब भारतीय समाज के अभिन्न अंग बन गये।
कार्ल-माक्र्स ने आश्चर्यजनक सीमा तक भारत की तात्कालिक स्थिति की व्याख्या की। उसकी रचना ‘‘द ब्रिटिश रूल इन इंडिया’’ (भारत में अंग्रेजी शासन) में तथा ‘‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’’ रिवोल्ट इण्डिया, आदि में अपनी महान दूर-दृष्टि से भारतीय सामाजिक-आर्थिक ढांचों का बिल्कुल सटीक मूल्यांकन किया।
कार्ल-माक्र्स दुनिया के प्रथम चिंतक थे, जिन्होंने भारत में रेलवे के आगमन से भविष्य के परिणामों की भविष्यवाणी की थी। रेलवे लाईन थाने से बंबई तक बिछाई गई थी। 1853 की रेलवे लाईन के कुछ समय के पश्चात ही माक्र्स के द्वारा की गई भविष्यवाणी थी। माक्र्स ने लिखा था कि ब्रिटिश शासकों ने भारत में सामाजिक-क्रांति के बीज बो दिये हैं। कार्ल माक्र्स की यह भविष्यवाणी भारत की स्वतंत्रता से 1947 में पूर्ण रूप से सही सिद्ध हुई।
माक्र्स ने अपनी रचनाओं में दर्शाया कि किस प्रकार विदेशी शासकों ने अपने पूंजीवादी तथा साम्राज्यवादी हथकंडों से तथा लालचवश भारतीयों के खून को निचोड़ा। ये कार्ल-माक्र्स ही थे, जिन्होंने अपनी अनेकों रचनाओं में उत्तरी भारत के मैदानों, जो भारतीय दस्तकारों तथा किसानों की कठिन मेहनत से निर्मित सभ्यता तथा संस्कृति से भरपूर थे का वर्णन किया। उन्होंने स्पष्ट रूप में लिखा कि ब्रिटिश शासकों ने पूंजीवादी लालच के वश में होकर औद्योगिक उत्पादों का प्रसार किया तथा वैज्ञानिक आविष्कारों का उपयोग करके भारत के पारंपरिक उद्योगों, कृषि तथा बाजार को तबाह कर दिया तथा उनका व्यापक विनाश किया। माक्र्स ने वर्णन किया कि ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में आगमन से पहले भारत विदेशों को माल भेजने का केंद्र था। लेकिन, भारत में ब्रिटिश शासन के आगमन से यह प्रक्रिया विपरीत रूप धारण कर गई। अर्थात भारत अब विदेशों से माल मंगवाने का केंद्र बन गया। भारत ने विश्व अर्थ-व्यवस्था में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान गंवा लिया, क्योंकि यह विदेशी ब्रिटिश शासकों की नीतियों का परिणाम था। भारतीय संदर्भ में माक्र्स ने, पूंजीवादी अंगरेज शासकों के गहरे षडय़ंत्रों तथा आंतरिक बर्बादी वाली पूंजीवादी संस्कृति का कुरूप चेहरा संसार के सामने नंगा कर दिया। माक्र्स ने स्पष्ट रूप से कहा कि ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासक यूरोप में कुछ और करते हैं तथा भारत में कुछ और।
पूंजी के केंद्रीयकरण से बाजार तथा अर्थव्यवस्था निर्भर हो जाती है, जिससे किसानों, दस्तकारों तथा मेहनतकश लोगों का शोषण बढ़ जाता है। यही कारण था कि लोगों का 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय सशस्त्र विद्रोह सामने आया।
माक्र्स अपनी रचनाओं में बम्बई, मद्रास तथा बंगाल के महान कृषि मजदूरों के विद्रोहों का विस्तारपूर्ण वर्णन करते हैं। वह राबर्ट क्लाईव को ‘महान-लुटेरा’ कह कर सम्बोधन करते हैं तथा कहते हैं कि वह ‘‘भ्रष्टाचार का शैतान’’ तथा भारत को लूटने वाला था। ब्रिटिश शासकों ने अपने देश के जो शहर बसाये, जैसे लिवरपूल, मानचैस्टर, बर्मिंघम तथा लण्डन आदि वे सब बंगाल, पंजाब तथा समूचे भारत को लूटकर बसाये थे, विशेषत: उत्तरी भारत की लूट से।
कार्ल माक्र्स स्वतन्त्रता के प्रथम संग्राम 1857 से लेकर 1859 की आश्यर्चपूर्ण विस्तार से जानकारी प्रदान करते हैं तथा लखनऊ, हरिद्वार, दिल्ली, मेरठ, बिहार, केंद्रीय भारत, दक्षिण-भारत, कोलकत्ता आदि से सम्बंधित महान योद्धाओं के नाम लेते हुए विस्तार से वर्णन करते हैं।  वह वर्गीय तथा सामाजिक विश्लेषण करके बताते हैं कि किस प्रकार भारतीय लोग विदेशी ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध उठ खड़े हुए। वह तथ्य तथा आंकड़े पेश करके दर्शाते हैं कि कैसे तथा कितनी आर्थिक, राजनैतिक तथा सैनिक-तबाही भारत में विदेशी ब्रिटिश शासकों ने की।
माक्र्स भारतीय लोगों का प्राय: जिक्र करते हैं कि हिन्दुओं, मुसलमानों तथा अन्य समुदाय से सम्बंधित लोगों को अंग्रेजी शासकों ने अपने लालच की पूर्ति के लिए शोषण का शिकार बनाया, लेकिन, ये सभी भारतीय समाज के अविभाजित तथा अटूट अंग हैं।
माक्र्स का प्रचीन भारत का विश्लेषण पश्चिमी दृष्टिकोण नहीं। यह एक बहुत ही दिलचस्प पक्ष है कि कार्ल माक्र्स प्राचीन तथा मध्यकालीन युग के समय वाले भारतीय समाज तथा इस के आधारभूत ढांचे का बहुत गंभीरता व गहराई से विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। उसकी कई धारणाओं का कोई समर्थन न भी करे, लेकिन उसकी बौद्धिकता, अध्ययन तथा भारतीय लोगों से सहानुभूति तथा इस देश के प्राचीन सांस्कृतिक ढांचे सम्बंधी सम्मानपूर्ण व्यवहार से कोई इनकार नहीं कर सकता। वह महानता से परिपूर्ण भारतीय समाज के विकास तथा भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता के विकास का प्रशंसापूर्ण ढंग से वर्णन करते हैं।
माक्र्स की एक अन्य महानता यह भी है कि उसने ‘एशियाटिक मोड आफ प्रोडक्शन’ (उत्पादन के एशियाई ढंग) की धारणा की रचना की, ताकि भारतीय समाज की प्रमुख विशेषताओं की ठीक से व्याख्या की जा सके। उसने ग्रामीण समाज तथा जाति प्रथा के शुरू होने के कारणों का विश्लेषण किया। संघ परिवार सहित कुछ लोग कार्ल माक्र्स को पश्चिमी दृष्टिकोण का बताकर उसके संबंध में भ्रम पैदा करने का प्रयत्न करते हैं। माक्र्स की विचार पद्धति बिल्कुल भी पश्चिमी नहीं थी, बल्कि उसकी तो वास्तविक दृष्टि थी, अर्थात, विश्व समाज का वैज्ञानिक दृष्टिकोण समेत भारतीय समाज।
कार्ल-माक्र्स भारतीय समाज के लिए यूरोपीय समाज वाला दृष्टिकोण नहीं अपनाते तथा एशिया के समाज के सम्बंध में भी ऐसा करते हैं। वह भारत तथा एशियाई समाज सम्बंधी जब वर्णन करते हैं तो वह वर्ग, वर्ग संघर्ष, सामाजिक विकास के पड़ाव आदि का वर्णन करते हैं। उदाहरणस्वरूप, वह कहते हैं कि भारतीय तथा एशियाई समाज के विकास का रास्ता वह नहीं था, जो यूरोपीय समाज का था। उस ने यूरोप के सम्बंध में अपने विश्लेषणों की अपेक्षा भारतीय तथा एशियाई विकास का अलग ढंग से विश्लेषण पेश किया क्योंकि यह मूल रूप से ही भिन्न-भिन्न पड़ावों वाली विचार-प्रणालियां रही हैं।
कार्ल माक्र्स ने एक बिल्कुल नई और अलग किस्म की धारणा का निर्माण किया, जिस का नाम है ‘‘राज्य के सीधे ग्रामीण समुदाय से सम्बंध तथा इसकी विशेषतायें।’’ इस के सम्बंध में बहस अभी भी जारी है तथा अन्य नई धारणाओं के सम्बन्ध में भी जारी है, लेकिन, इस तरह उस के महान गुणों को नकारा नहीं जा सकता। वास्तव में माक्र्स पश्चिमी दृष्टिकोण से बाहर निकल कर स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार भारतीय समाज, पश्चिमी समाज से भिन्न है। लेकिन, वह इस काम के लिए अपने विश्लेषण तथा संश्लेषण के लिए इतिहास की भौतिकवादी धारणा की विधि को अपनाते हैं।
माक्र्सवादी-विधि तथा भारतीय समाज का अध्ययन
माक्र्स से मतभेद रखने तथा उसकी आलोचना करने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन ऐसा करते समय, उसकी रचनाओं का अध्ययन करने के पश्चात तथा गुण-दोष के आधार पर करना चाहिये। उसे भारत विरोधी कह कर निंदा करना, केवल दार्शनिक-निर्धनता तथा विचारों की कमी को दर्शाता है।
कार्ल-माक्र्स ने भारतीय समाज सहित, समूचे-विश्व के समाजों का अध्ययन तथा विश्लेषण करने के लिए सामाजिक-विकास की एक अपूर्ण तथा अलग ही विधि प्रणाली हम सबको दी है क्योंकि वैज्ञानिक विधि में कुछ भी देशीय या विदेशी अर्थात पश्चिमी तथा भारतीय नहीं होता। जैसे सर आईजक न्यूटन की ओर से प्रतिपादित या आविष्कार किये गये ‘ला आफ ग्रैवीटेशन’ (गुरूत्वाकर्षण का सिद्धांत)  में कुछ भी देशीय या विदेशी नहीं है। बल्कि यह तो एक विश्व व्यापी वैज्ञानिक सिद्धांत है।
वैज्ञानिक विधि, समाज को समझाने के लिए एक बढिय़ा ढंग है, जिसमें हमारे सभी महान तथा बुद्धिमान दार्शनिकों, संतों तथा विचारकों के विचारों तथा अलग अलग धर्मों, समुदायों तथा विधियों का निचोड़ है। वैज्ञानिक विचार तथा विधि अर्थात वैज्ञानिक दर्शन/विचार तथा प्रणाली उन सभी के विश्व सम्बंधी दृष्टिकोण का सार है। इसलिए यह एक व्यापक दृष्टिकोण है काश! आरएसएस भी इस विधि तथा दृष्टिकोण को अपना सकती।         
(पंजाबी दैनिक ‘नवां जमाना’ से धन्यवाद सहित)

Scroll To Top